शनिवार, फ़रवरी 08, 2014

मायावी नगरी 1

मैं इसी प्रथ्वी के एक गुप्त स्थान पर मौजूद था । वैसे इसको एक तरीके से गुप्त कहने की कोई तुक नही हैं ।
क्योंकि यहां स्थानीय चालीस परिवार महज दो किलोमीटर की दूरी पर रहते थे । जो बर्फ़ीले क्षेत्रों में
पाया जाने वाला एक विशेष किस्म का हिरन पालते थे । और हिरन के मांस तथा उस बर्फ़ीले क्षेत्र में
पायी जाने वाली वनस्पतियों और अन्य चीजों को बेचकर जीवन यापन करते थे । ये लगभग सभी परिवार
अस्थायी रूप से बनाये गये घरों और टेंटो में रहते थे । और मौके के अनुसार अपने घरों को दूसरी जगह
भी शिफ़्ट कर लेते थे । इन परिवारों में पुरुष । स्त्रियां । बच्चे । वृद्ध सभी मौजूद थे । मुझे लगभग आदिवासियों जैसी जीवन शैली में रहते इन परिवारों को देखकर हैरत होती थी कि क्या ये प्रथ्वी की उन्नति या आधुनिक जीवन शैली से अनभिग्य है । पर ऐसा नहीं था । इस स्थान से लगभग तेरह किलोमीटर ऊपर का इलाका बर्फ़ पसन्द करने वाले पर्यटकों की पसन्दीदा जगहों में से एक था । जहां साल के सात आठ महीने अक्सर पर्यटकों का आना जाना लगा रहता था । शेष चार महीने बर्फ़ीले तूफ़ान और अत्यन्त बर्फ़वारी होने की वजह से जहाजों का आना जाना रुक जाता था । आने वाले पर्यटकों को ये परिवार जरूरत की चीजें मुहैया कराते थे । और बदले में अच्छा मूल्य और भेंट भी प्राप्त करते थे । दुनिंया के विभिन्न देशों से आये पुरुषों से आकर्षित होकर सम्भोग करने की एक परम्परा सी शुरू हो जाने के कारण इन परिवारों की महिलाओं ने तमाम सुन्दर और अलग अलग नस्ल के से दिखने वाले बच्चों को जन्म दिया था । जिससे इनकी मूल जाति नष्ट सी हो गयी थी और उसके अवशेष ही रह गये थे । इन परिवारों के गिने चुने लोग मुझसे एक शोधार्थी के तौर पर परिचित थे ।
फ़िर भी इस स्थान को गुप्त मैंने इसलिये कहा है । कि उनके रहने के स्थान से कुछ ही दूर होने के बाबजूद
घाटी में स्थित चार काटेज को उन्होंने दूर से भी नहीं देखा था । इसकी वजह थी । एक अग्यात भय ।
और इसका सबूत थे । वे शव । जो बर्फ़ के ढेर में से अक्सर निकलते थे । हांलाकि कुछ दिलेर और दुस्साहसी
किस्म के पर्यटको ने इस तरफ़ एक " चैलेंज " के रूप में आने की कोशिश की । और नतीजा । मौत । या
मौत के अनुभव जैसा । या मौत को छूने जैसा रहा ।
और इस नतीजे का नतीजा ये था । कि बेहद रहस्यमय ये जगह " बरमूडा ट्रायएंगल " जैसी प्रसिद्ध थी ।
क्योंकि इसके परिणाम बरमूडा से मिलते थे । घाटी से काफ़ी ऊंचाई पर स्थित जिस पहाड पर मैं मौजूद
था । वो " डेंजर जोन " में आता था । इस पहाड से नीचे तलहटी में जहां काटेज मौजूद थी । लगभग
32 किलोमीटर का इलाका मानव क्या पशुओं से भी अछूता रहता था । और अगर कोई गलती से इसमें
घुस आता था तो कभी वापस नहीं जाता था ? इस अछूते स्थान पर अधिकांश जगह घास युक्त और
रंगविरंगे फ़ूलों वाले पेडों से भरी थी । जिनमें वहुत तीखी दिमाग को सुन्न कर देने वाली खुशबू निकलती
थी । इस तरह इसकी बहुत कुछ कहानी भारत के गन्धमादन पर्वत से मिलती थी । जबकि इसके विपरीत मेरे पहाड से दो सौ मीटर दूर ही बर्फ़ का सिलसिला शुरू हो जाता था । बर्फ़ डेंजर जोन में भी थी । पर टुकडों के रूप में दिखाई देती थी ।
मुझे अपने जीवन में पहली बार एक अनोखी हैरत का अनुभव हो रहा था ? मैं कौन था ? ये मैं जानता
था । मैं कहां से आया हूं ? ये मैं जानता था । ये जगह कौन सी है  ? ये मुझे भलीभांति मालूम था । आज की तारीख से । अपने पिछले जीवन के बारे में एक एक बात बखूबी मुझे मालूम थी । फ़िर हैरत किस बात की थी ? ये मेरे लिये । मुझसे ही एक बडा सवाल था । मुझे हैरत तो हो रही थी । पर मैं खुद अपनी हैरत की
असली वजह नहीं जानता था ?
दरअसल ये हैरत इस बात की थी । कि मैं यहां क्यों आया हूं ? आगे मुझे क्या करना है ? यहां से मुझे कहां जाना हैं ? इस बार में स्वयं मुझे ही खुद कुछ नहीं पता था ? बस यही हैरत की वजह थी । बहुत बडी वजह
थी । और मजे की बात ये थी कि अपनी इस स्थिति से हैरत होने के बाबजूद मुझे कोई भी परेशानी महसूस
नहीं हो रही थी । और मैं इस स्थान पर कल से इस तरह से मौजूद था । जैसे मैं यहीं का रहने वाला होऊं ।
इस स्थिति को ठीक से समझने के लिये । आप उस उपन्यास की कल्पना करें । जो आधा फ़टा हुआ हो । और
आगे की कहानी आपको मालूम ही न हो । उस सीरियल की कल्पना करें । जिसके आगे की कडी आपने न देखी हो । बिलकुल ठीक यही स्थिति मेरे साथ थी । मुझे अच्छी तरह मालूम था । मैं प्रसून हूं । इस समय से लेकर अपनी पिछली जिन्दगी मुझे बखूबी मालूम थी । नहीं मालूम था । तो आगे का कोई उद्देश्य ।
क्या ये हैरत की बात नहीं थी ?
मैंने एक सिगरेट सुलगाई और निरुद्देश्य ही बर्फ़ के छोटे छोटे ढेले उठाकर फ़ेंकने लगा । शाम का धुंधलका
तेजी से फ़ैलता जा रहा था । पहाडी पर बर्फ़ीली हवाओं का अहसास तेज होता जा रहा था । रात को कोई छोटा बर्फ़ीला तूफ़ान आने के संकेत लग रहे  थे । पर मैं इन सबसे बेपरवाह था ।  मैंने जेकेट की जेबों में हाथ डाले और तेजी से घाटी में नीचे उतरने लगा । उन काटेज की तरफ़ । जहां यहां के निवासी या कोई
भी सैलानी भूल से भी नहीं जाता । काटेज में पहुंचते पहुंचते अंधेरा काफ़ी हो गया था । मैंने चर्बी का दिया
जलाकर रोशनी की । और बेड पर लेटकर " साधना " का विशेष उपयोग करते हुये ये जानने की कोशिश
करने लगा कि आखिर ये मेरे साथ क्या अजीव हो रहा है ? काफ़ी देर की कोशिश के बाद भी मुझे कोई
सफ़लता नहीं मिली । दूसरों के माइंड रीड करने वाला आज अपने को ही रीड करने में असफ़ल था । मुझे नहीं पता था कि अगले चार घन्टे बाद मेरे साथ क्या घटने वाला है ?
अगले चार घन्टे ? यानी रात के बारह बजे । जब मेरी आंख खुली तो मैं चमत्कार की तरह एक वृक्ष की
वी शेप डाली पर टहनियों की सहायता से बांधी गयी एक लम्बी बेड शीट पर लेटा हुआ था । दाता । मेरे
मुंह से आह निकली । ये सब मैंने ही किया था । और काटेज के उस गर्म और बेहद आरामदायक माहौल से
इस बर्फ़ीली रात में इस खुले में भी मैं ही आया था । पर क्यों आया था । और कब आया था ? ये मुझे अब
भी मालूम नहीं था । शाम लगभग आठ बजे के बाद । अभी आंख खुलने पर बारह बजे के बीच मेरे साथ
क्या घटा था ? ये मेरे लिये आधा रहस्य था । आधा इसलिये । क्योंकि ये मुझे भलीभांति मालूम था ।
कि मैं डेंजर जोन की उस रहस्यमय काटेज से खुद ही यहां आया होऊंगा । पेडों की ऊंची वी शेप डालियों 
पर ये बिस्तर मैंने खुद ही बनाया होगा । बस हैरत और परेशानी की बात ये थी कि मेरे द्वारा जाग्रत अवस्था जैसी स्थिति में  मेरे ही द्वारा किया गया कार्य मुझे याद नहीं था । अपने जीवन के चार घन्टे मेरे दिमाग की मेमोरी में नहीं थे । यहां तक होता । तो फ़िर भी उसका कोई हल मैं निकालने की कोशिश करता । मुझे अब भी पता नहीं था कि मैं यहां किस उद्देश्य से हूं ? और आगे क्या करने वाला हूं ? या कोई अदृश्य मुझसे क्या कराने वाला है ? कोई अदृश्य ? मेरे दिमाग में विस्फ़ोट होना चाहिये था । पर कोई विस्फ़ोट नहीं हुआ । इसका साफ़ मतलब था । कि इस वक्त मेरी स्थिति एक रोबो मेन की तरह है । जो आदेश मिलने पर एक्टिव होता है । पर मुझे आदेश देने वाला कौन था ? मैं इस स्थित को बार बार समझने की कोशिश कर रहा था । पर नाकाम था । दरअसल समझता तो तब । जब आगे के क्षणों के लिये मेरा दिमाग
कार्य कर रहा होता । मेरे लिये आगे के क्षण थे ही नहीं । किसी कम्प्यूटर किसी रोबोट किसी अन्य स्वचालित सिस्टम में भी आगे उत्पन्न होने वाली विभिन्न परिस्थियों के लिये कई आप्शन होते हैं । पर मेरे लिये उस समय कोई आप्शन ही नहीं था । किसी प्रोग्राम किये गये साफ़्टवेयर की तरह इस क्षण से लेकर अपनी गुजरी जिन्दगी का एक एक लम्हा में विचार सकता था । पर आगे का एक सेकेन्ड भी विचार करने में नहीं आ रहा था । मैं यन्त्रचालित सा पेड की डाली पर उठकर बैठ गया । और निरुद्देश्य ही नीचे लटके हुये पैर हिलाने लगा । रात का ये सुनसान वातावरण आम आदमी की रूह कंपा देने वाला था । रात को निकलने वाले स्थानीय जीव जन्तु इधर उधर घूम रहे थे । और कुछ कुछ अनोखी आवाजें पैदा कर रहे थे । पर कम से कम रात और ऐसा रहस्यमय माहौल मेरे ऊपर कोई प्रभाव नहीं डाल सकते थे । मेरा पूरा जीवन ही ऐसे वातावरण और ऐसी रातों में गुजरा था । अदृश्य अलौकिक शक्तियों । अदृश्य आत्माओं के सामने ये दृश्य जीव जन्तु और ये दृश्य सृष्टि एक परसेंट भी भय या रहस्य रोमांच पैदा नहीं करती । तब उस समय पहली बार मुझे कुछ कुछ  सर्दी का अहसास हुआ । मैंने हिक्की नामक एक जडी का टुकडा जेब से निकाला और मुंह में डालकर चूसने लगा । जडी के कसैले स्वाद का रस मुंह में घुलते ही मेरे शरीर में गर्माहट फ़ैलने लगी । अचानक मैं पेड की डाली से नीचे कूदा । और ऊंची नीची जमीन पर चलता हुआ एक समतल मैदान  में आकर वहां पडी हुयी लगभग आठ फ़ुट व्यास वाली शिला पर बैठ गया । मैंने एक सिगरेट सुलगायी और कश लगाता हुआ उस अनोखे मंजर को देखने लगा । और तब उत्तर दिशा में लगभग चार किलोमीटर दूरी पर मुझे एक टावर पर लगी शक्तिशाली लाइट की तरह एक प्रकाश नजर आया ।  जो इधर उधर गति कर रहा था । और जिसका दायरा लगभग चालीस फ़ुट व्यास का था । मैंने जैसे ही सिगरेट का कश खींचा । उस प्रकाश वृत से लेजर किरण के समान एक आसमानी बिजली की तरह बेहद चमकीली सफ़ेद पतली प्रकाश रेखा आकर मुझे छूनी लगी । और उस अग्यात प्रकाश से मेरा सम्बन्ध जुड गया । तुरन्त ही मुझे एक पतली सी झनकारयुक्त स्त्री आवाज सुनायी दी ।  हे । तुम । मनुष्य के जैसे । पर मनुष्य नहीं । कौन हो ? और यहां क्यों हो ? मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ । यह किसी औरत का सूक्ष्म शरीर था । जो अलौकिक विध्याओं की जानकार थी । और अब स्थूल देह से नाता तोड चुकी थी । मैं जीवित मनुष्य शरीर का उपयोग भी कर रहा था । और दिव्य साधना DIVY SADHNA  के द्वारा मेरा अंतरिक्ष आदि के अन्य लोकों से सम्पर्क करने वाला लाक भी खुला हुआ था । जो सामान्य मनुष्य का बन्द होता है । इसीलिये वो मुझसे मनुष्य के जैसे । पर मनुष्य नहीं । जैसी बात कह रही थी ।  पर तुम । मैंने सूक्ष्म शरीर वाली वाणी का उपयोग किया । ताकि मेरी बात वह आसानी से समझ सके । मेरे पास आकर बात क्यों नहीं करती ? क्या तुम्हें अपने गर्भवती होने का डर है । या तुम्हें कांटा घुसने पर ज्यादा दर्द होता है ?
हे । वह मधुर घन्टियों के समान बजती हुयी हंसी । तुम साले पुरुष । औरत में ऊपर नीचे दो ही जगह देखते
हो ।  दो नही तीन । मैं भी उसी के अन्दाज में हंसता हुआ बोला । पीछे भी । नहीं चार । रसीले होंठ भी । नहीं पांच । नहीं आठ । नहीं दस । अरे नहीं टोटल । सुन्दर काया । क्या रूप बनाया । आदमी को काठ का उल्लू बनाया । अब तू इतने तेवर भी क्यो दिखाती है ?
ओमियो तारा । उसने गहरी सांस ली । वाट ए डेयर ।  तुझे में अपनी उस गुफ़ा में एक महीने तक बन्द रखूं । हायो रब्बा । ये मैंने क्या कह दिया ।
अचानक से परिवर्तित हुये उस खुशनुमा माहौल से मुझे काफ़ी अच्छा लगा । कुछ देर के लिये मैं अपनी स्थिति भूल गया । और खडा होता हुआ बोला । अब पास भी आयेगी । या वायरलैस टाक ही करेगी ।
लेकिन । वह खिलखिलाती हुयी बोली । पहले वादा करो । कि तुम मेरे सिस्टम में अपना डाटा फ़ीड नहीं
करोगे ।
अगर तेरे फ़्यूज उड जाते हैं । मैंने अचानक सचेत होते हुये कहा । तो नहीं करूंगा ।
एक झपाका सा हुआ  । और प्रकाश वृत मुझसे बीस फ़ुट दूर आकर लहराने लगा । मैंने कहा । और पास आओ । नहीं आ सकती । उसने जबाब दिया । वह मृत्युलोक की भूमि है  ?
भले ही मैं आगे की बात नहीं सोच सकता था । पर उसने जो कहा । वह तो अब भूतकाल हो चुका था ।
इसी भूतकाल में मेरे दिमाग में विस्फ़ोट हुआ । वह मृत्युलोक की भूमि है । तो वह कहां खडी थी ?
बीस फ़ुट के बाद ही दूसरा लोक । भूमि से छूता हुआ । असम्भव ?
मैंने अपने जीवन में अनेकों रहस्य देखे थे । वह चार किलोमीटर दूरी से महज आठ सेकेंड में एक झपाके  से मेरे पास आयी । ये मेरे लिये कोई रहस्य नहीं था । वह जिस प्रकाश वृत शरीर में थी । ये मेरे लिये कोई रहस्य नहीं था । ये कोई प्रथ्वी से अलग अन्य लोक होता । तो भी वह सब मेरे लिये कोई रहस्य नहीं था ।
रहस्य की बात ये थी कि सिर्फ़ बीस फ़ुट के फ़ासले के बाद वह कह रही थी कि वह मृत्युलोक की भूमि है । जहां मैं था । तो वह कहां खडी थी ? ये मेरे लिये बहुत बडा रहस्य था । और एक तरह से असम्भव था ।
पर ज्यादा समय नहीं था । और मजबूरी थी कि मैं आगे सोच नही सकता था । आगे के लिये कुछ तय नहीं कर सकता था । मुझे गुजरे हुये से ही अपने को तलाशना था । इस रहस्य को जानना था । और उसमें वह औरत बडे काम की चीज हो सकती थी । और इसके लिये मुझे उसकी रसीली बातों से वही रास्ता कारगर लगा । जो एक औरत की सबसे बडी कमजोरी होती है । और एक आदमी के लिये । सबसे ज्यादा कमजोर करने वाली । ऐसा ही लक्ष्य हो । ये मानकर मैंने अंतरिक्ष की भाषा में जहां अधिकतर स्त्री पुरुष के अतिरिक्त अन्य कोई सम्बन्ध होता ही नहीं है । वही कामशस्त्र चलाया । और उसी भाषा में बोला । ये लाइट ही चमकायेगी देवी  । या रूप भी दिखायेगी ?
ओमियो तारा । बीस फ़ुट की दूरी से मुझे उसकी गहरी सांस अपने चेहरे पर महसूस हुयी । मैं कुछ गलत
तो नहीं कर रही ? लेकिन शायद मैं भी तो कब से प्यासी हूं । उफ़ । स्त्री का सौन्दर्य अगर कोई दीवाना बनकर न देखे । तो उसकी कीमत क्या ? उफ़ । भंवरा किसी कली को बार बार न चूमे ? तो कली कैसे फ़ूल
बने । फ़िर ये मनुष्य तो है नहीं । जो मैं कोई गलती कर रही होऊं ?
मैं उसकी फ़ुसफ़ुसाहट को आराम से सुन रहा था । और हिन्दू शास्त्र अनुसार पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों की आठ गुणी अधिक कामवासना से भी बडकर अप्सराओं और यक्षणियों की उन्मुक्त भोग इच्छा से सैकडों बार का पूर्व परिचित था । ये गलत होता । तो भी एक अलौकिक पुरुष के सामीप्य से नागिन की तरह फ़ुंकारती
उसकी वासना उससे कुछ भी करा सकती थी । इतिहास में इसके हजारों उदाहरण मौजूद हैं । 
लिहाजा वही हुआ । कुछ ही देर मैं वह तीस फ़ुट लम्बी औरत और एक खूबसूरत भरे बदन की यक्षिणी के समान नजर आने लगी । बडे पपीते की आकृति के जैसे उसके स्तन थे । उसके नितम्ब अप्सराओं के समान पुष्ट थे । उसके शरीर पर रत्नमालाओं के आभूषण थे और कपडे का नामोनिशान नहीं था । उसके दोनों पुष्ट
उरोजों के बीच लटकती हुयी दिव्य मोतियों की माला झिलमिला रही थी  । जो दो पहाडों के बीच बहती हुयी स्फ़टिक मणि के समान चमकते हुये जल वाली नदी जैसी मालूम पड रही थी । उसकी योनि गहरे  गुलाबी रंग की आभा वाली थी । जो उसके अयोनिजा होने का सबूत थी । ये दैवीय योनियों की पहचान थी । ये मेरे लिये दूसरा झटका था । क्योंकि मेरे अनुभव के अनुसार वह देवयोनि नहीं थी ।
बोय..बोय..। हठात मेरे मुंह से निकला । क्यों तारीफ़ करूं । उसकी । जिसने तुझे नहीं बनाया ।
मुझे अपनी दिव्य साधना DIVY SADHNA  के वे शुरूआती दिन याद आ गये । जब मैंने और प्रोफ़ेसर
दीक्षित ने साधना आरम्भ की थी । हमारी मुलाकात करनपुर विलेज में बरी वृक्ष के नीचे सूबेदार बाबा से
हुयी थी । और उसने बरगदिया यक्षिणी को सिद्ध करने को कहा था । दरअसल प्रोफ़ेसर दीक्षित को भरे
बदन की मोटी औरतों से sex की बेहद चाहत रहती थी । वृषभ जाति का पुरुष । प्रोफ़ेसर दीक्षित । औरत
और sex के मामले में वास्तव में सांड जैसा ही व्यवहारी था । कई औरतों के सम्पर्क में रहने के बाद भी वह
हमेशा यही महसूस करता था । कि उसे त्रप्त कर सके । ऐसी औरत उसे अभी तक नहीं मिली । सूबेदार बाबा जो हमारी बात गौर से सुन रहा था । उसने कहा । कि तुम लोग बरगदिया यक्षिणी को सिद्ध कर
लो । वो तुम्हें हर तरह के मजे करायेगी । कैसे हर तरह के मजे ? मैंने पूछा ।
वह हर बार रात को तुम्हें नये रूप । नये सौन्दर्य । और नये किस्म के शरीर में मिलेगी । सूबेदार अर्थपूर्ण
ढंग से बोला । मतलब तुम्हें लगेगा । कि तुम प्रतिदिन नयी और मनचाही महबूबा के साथ हो । इतना ही
नहीं । वह तुम्हारी इच्छा के अनुसार कुछ ही मिनटों में शरीर की शेप में बदलाब कर लेगी । उदाहरण के
लिये तुम चाहो कि उसकी कमर कुछ और पतली और स्तन कुछ और बडे होते । तो वह ऐसा ही कर लेगी ।
इन सबके बाद तुम किसी खास औरत की चाहत रखते हो । तो तुरन्त ही वह तुम्हारी इच्छानुसार वही औरत के समान बन जायेगी । इसके बाद....एक यक्षिणी के साथ भोग का आनन्द ही अलग है ? सूबेदार
बाबा कहीं खोया खोया सा बोला ।
बोय..बोय..। उस दिन भी मेरे मुंह से निकला था । as you like it .. ये बरगदिया यक्षिणी  सिद्ध कैसे होती है ? सूबेदार बाबा हमें विस्तार से बताने लगा । उसके चेहरे पर एक अनोखी चमक थी । वह कहीं खोया हुआ था । 
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