गुरुवार, अप्रैल 29, 2010

गंगा बचाओ..यमुना बचाओ.??.

गंगा बचाओ..यमुना बचाओ..भारतीय संस्क्रति बचाओ..ऐसा हो हल्ला आपने अवश्य सुना होगा और मैं इसके विरुद्ध भी
नहीं हूँ बल्कि मैं तो कहता हूँ कि आप छोटे छोटे तालाब कूंआ यहाँ तक कि सार्वजनिक नल आदि जो लोग पता नहीं क्यों तोङ देते हैं उन्हें भी बचाओ..एक कार्य जो मैं अक्सर करता या करवाता हूँ.. प्रायः हर शहर के लोग ये शिकायत करते हैं कि नगर निगम कूङा ठीक से नहीं उठवाता . मैं इस बात की
अपेक्षा एक बङा बांस (बाम्बू) या डंडा लेकर पोलीथिन आदि के ढेर को एकत्र करता हूँ जहाँ ये इकठ्ठे कूङे के ढेर रूप में होती
है और माचिस से आग लगा देता हूँ..पोलीथिन होने से आग आसानी
से लगती जाती है और मैं डंडे से सरकाते हुये कूङे की होली जलाता रहता हूँ इस तरह कुछ ही देर में कूङे का मुंह चिङाता विशाल ढेर
छोटे से राख के ढेर में बदल जाता है .यही कार्य मैं हानिकारक और गैर उपयोगी पोधों जैसे गाजर घास के साथ करता हूँ..गाजर घास आस पास होने से दमा की या स्वांस बीमारियों की संभावना रहती है..देखा आपने गम्भीर समस्याओं का समाधान एक डंडे और माचिस के द्वारा..ऐसे ही आप दूषित पानी की समस्या से जूझ रहे हैं तो बहुत सस्ता एक उपाय आजमायें..गुलाबी फ़िटकरी आप बेर के साइज के बराबर लगभग पन्द्रह लीटर पानी में रात में बाल्टी में डाल दें सुबह होने पर किसी गिलास से पानी बिना अधिक हिलाये आप दूसरे बर्तन में निकाल लें ध्यान रहे कि फ़िटकरी नीचे तली में रहेगी..यह पानी किसी भी वाटर फ़िल्टर से बेहतर है क्योंकि फ़िटकरी पानी को फ़ाङकर अशुद्धियों को अलग कर देती है और पानी छानकर एकदम शुद्ध हो जाता है..ध्यान रहे फ़िटकरी गुलाबी
ही हो सफ़ेद नहीं..ये पानी पेट रोगों के लिये हितकारी है पर विशेष ध्यान रखें कि सुबह पानी निथारते समय फ़िटकरी का अंश न जाय हालांकि ये हानिकारक नहीं पर आपसे पीया नहीं जायेगा..इस उपाय से नाले के समान गन्दा पानी पीने योग्य हो जाता है
मैंने ये अध्याय गंगा यमुना बचाओ से शुरु किया और क्या कहने लगा दरअसल मुझे हंसी तब आती है जब संत समुदाय ये बात कहता है कि इन्हें बचाओ या भारतीय संस्क्रति को बचाओ..हालांकि मैं फ़िर भी कहता हूँ कि हमें ऐसी कोशिश करनी चाहिये...लेकिन..इसमें एक बङा लेकिन लगा हुआ है..जिन लोगों ने श्रीकृष्ण से सम्बन्धित पुराणो का अध्ययन किया होगा उन्हें एक बात पता होगी कि देवी राधा के शाप से पांच हजार बरसों के लिये गोलोक से ये गंगा यमुना . तुलसी और शंखचूङ इस मृत्युलोक में आये हैं और वो समय समाप्ति की ओर है
अतः क्यों कि इनकी विदाई का समय निकट है अतः लाख प्रयासों के बाद कुछ नहीं होगा और इसी का ये परिणाम है कि इनके पानी या तुलसी के पत्तों में वह गुणवत्ता नहीं है जो आयुर्वेद आदि में वर्णित है. आप शायद ये बात भी न जानते हों कि उच्च लोकों में वास करने वाली आत्मायें प्रथ्वीलोक के नाम पर नाक भों सिकोङ लेती हैं इसी लिये जब द्वापर में श्रीकृष्ण का अवतार होता है तब देवी राधा की इच्छानुसार गोलोक की भूमि का व्रन्दावन नाम का विशाल बाग जो कई सो योजन लम्बा चौङा है मृत्युलोक में आ जाता है और जब अवतार हेतु समाप्त होता है तो ये बाग वापस चला जाता है..उस बाग की भूमि और भगवान की लीला आदि मिलाकर इस मथुरा व्रन्दावन (जो वर्तमान में है ) में वो दिव्यता की खुशबू जैसी बनी रहती है जो अध्यात्म वातावरण का प्रभाव पैदा करती है .इसलिये जो आज के प्रश्न है उनके शास्त्रों में उत्तर हैं जो आत्म ग्यान या मुक्ति ग्यान के प्रश्न है उनके संत वाणी या संतमत की पुस्तकों में उत्तर हैं .??

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