रविवार, अप्रैल 04, 2010

इन्द्र चींटा बना....??.

एक बार महात्मा श्रीकृष्ण आराम कर रहे थे और राधाजी
उनके पास बैठी हुयीं थी अचानक श्रीकृष्ण जमींन की और
देखकर मुस्कराने लगे..तब राधाजी ने पूछा कि प्रभो आप
क्यों हँस रहे हैं . श्रीकृष्ण ने कहा रहने दो तुम जान कर क्या
करोगी..इस पर राधाजी ने जिद करते हुये कहा कि आपको
बताना होगा..तब श्रीकृष्ण ने कहा कि नीचे जो ये चींटा जा
रहा है ये सोलह बार इन्द्र की पदवी प्राप्त कर चुका हैं और
अपने करमों के कारण इस दशा को प्राप्त हुआ है .
बहुत से लोग ये समझते हैं कि देवी देवता आदि के पद बेहद
महत्वपूर्ण होतें हैं किन्तु यदि आप धर्मग्रन्थों का अध्ययन करें तो ये बात सामने आती हैं कि अपने पुण्यकर्मों और तपस्या आदि से तमाम पदों की प्राप्ति होती है और परमात्मा के कानून में चींटी से लेकर हाथी तक सबको समान महत्व दिया है. परन्तु एक बात सर्बथा भिन्न है कि समस्त योनियों में मानव शरीर सर्वश्रेष्ठ है..इसका कारण बेहद गूढ है और वही लोग जानते हैं जो संतमत का सतसंग सुनते रहते हैं .दरअसल यही वो एकमात्र शरीर है जिसमें मुक्ति का द्वार है . जिसे आत्मग्यान की भाषा में दसवां द्वार भी कहते हैं .मेरी बात पङकर बहुत लोग मेरी हँसी उङा सकते हैं क्योकि आजकल प्रायः सतसंग में यह बात बतायी जाती है फ़िर भी मेरा सतसंगी अनुभव कहता है अभी भी करोङों की संख्या में ऐसे लोग हैं जो इस बात को नहीं जानते और जो जानते भी हैं उनमें मुश्किल से कुछ ही ऐसे होंगे जो इस का वास्तविक रहस्य जानते होंगे..जैसे उदाहरण के तौर पर आप किसी से भी कहिये कि आप अमेरिका को जानते हैं तो कोई
आप को ही पागल समझेगा..आप फ़िर से गहरायी से कहिये सोच के देखो तुम वास्तव में जानते हो ..सच ये है कि आमतौर पर जो कह रहा है वो भी नहीं जानता और जिससे कहा जा रहा है वो भी नहीं जानता क्योंकि दोनों ने केवल अमेरिका के बारे में सुना ही है गया कोई नहीं यही स्थिति अध्यात्म में भी है कहने सुनने वाले बहुत है जाने वाला..? कोई कोई ही होता है .
देह धरे के दन्ड को भोगत है हर कोय ...ग्यानी भोगे ग्यान से मूरख भोगे रोय .
गुरुआ तो घर घर फ़िरें कन्ठी माला लेय ..सरगे जाओ या नरके जाओ मोय रुपैया देयु

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