शुक्रवार, मई 21, 2010

गंगा का रहस्यमय दिव्य कंगन..ganga ka rahasymay divy kangan


रैदास जी का नाम आत्मग्यान के उच्चकोटि के संत के रूप में इतिहास में दर्ज है ये कबीर के समकालीन थे और दिखावे के लिये उनके गुरुभाई भी थे पर वास्तविकता कुछ और ही थी ये कबीर जी को हमेशा " कबीर साहब " के आदरपूर्ण सम्बोधन से पुकारते थे और उन्हे गुरु के समान ही मानते थे । दुनिया की नजरों में कबीर और रैदास तथा कुछ अन्य साधकों की टोली रामानन्द के शिष्य के रूप में जानी जाती थी..पर हकीकत एकदम अलग ही थी । एक बार रामानन्द को भगवान ने कबीर की वास्तविकता दिखायी उससे प्रभावित होकर रामानन्द ने कबीर को साधक मन्डली का शिरमौर नियुक्त कर दिया..आगे चलकर इन्ही रामानन्द ने
धर्मदास के रूप में जन्म लिया तब कबीर ने इन्हें वास्तविक सच याने आत्मग्यान की सही शिक्षा दी और जन्म मरण के आवागमन से मुक्त कराया..लेकिन मैं बात रैदास जी की कर रहा था..बहुत कम लोग इस बात को जानते है कि कृष्ण भक्त के रूप में प्रसिद्ध परमभक्त मीराबाई संत रैदास की प्रिय और उच्चकोटि की साधक शिष्या थी । मीरा ने सुरतीशब्द साधना की थी और सारशब्द का ग्यान प्राप्त किया था " नाम लेयु ओ नाम न होय , सभी सयाने लेय । मीरा
सुत जायो नहीं , शिष्य न मुँड्यो कोय ।।रैदास जी भले ही दलित कुल में पैदा हुये थे पर आत्मग्यानी संत होने के कारण राजा महाराजा उनके आगे सर झुकाकर प्रणाम करते थे और उनके शिष्य भी थे । जो मन चंगा तो कठौती में गंगा..ये प्रसिद्ध कहावत रैदास जी के द्वारा ही प्रचलन में आयी थी इसके पीछे बङी ही रोचक कहानी है जो मात्र किवदंती न होकर सत्य घटना है । अविश्वसनीय सी लगने वाली इस घटना पर वे लोग सहज ही विश्वास कर सकते हैं जो संतो की महिमा से थोङे भी परिचित हैं । हाँ जनसामान्य को ऐसी घटनाओं पर विश्वास दिलाना कठिन होता है क्योंकि वे अद्रश्य और अलौकिकग्यान की a b c d भी नहीं जानते हैं । रैदास जी प्राय घर पर ही रहकर पनही ( जूते ) बनाने आदि का कार्य करते थे । कबीर की तरह इनके घर पर भी ज्यादातर साधुसंतो का आवागमन लगा रहता था इस वजह से सीमित आय होने के कारण ये घर का खर्च मुश्किल से चला पाते थे और इस हेतु उन्हें अधिक समय तक कार्य करना होता था । रैदास जी जूते बनाते और भजन ( एक विशेष प्रकार का ध्यान जिसको कार्य करते हुये आसानी से किया जा सकता है ) में पूरा पूरा मन लगाते थे " भाय कुभाय अनख आलस हू , नाम जपत मंगल सब दिस हू । सबहि सुलभ सब दिन सब देसा , सेवत सादर शमन कलेशा ।
आज की तरह उन दिनों भी लोगों में पाप धोने के लिये गंगा स्नान का बङा चाव रहता था इस हेतु वे चलते समय रैदास से भी गंगा स्नान करने के लिये चलने का आग्रह करते थे पर रैदास जी आत्मग्यानी होने के कारण भलीभाँति जानते थे कि वास्तविक गंगा स्नान क्या है और कैसे होता है ? ये बात आपको बेहद अटपटी लगेगी पर आप कुछ ऐसे छोटे महत्व के ही धर्मग्रन्थों में इसका प्रमाण देख सकते हैं जिनमें नाङीशोधन , प्राणायाम योगासन या कुन्डलिनी चक्रों के बारे में बताया गया हो । आज भारत से आत्मग्यान की परम्परा प्राय लुप्त सी हो जाने के कारण ये कुन्डलिनी आदि ग्यान जाने कितना महान मालूम होता है पर न तो ये आत्मग्यान है और न ही ज्यादा महान है । आत्मग्यान की किताब में यह एक प्रस्तावना जैसी हैसियत ही रखता है..तो भी जब आप ऐसे ग्रन्थों का अध्ययन करेंगे तो उसमें इडा पिंगला सुषमना आदि नाङियों का वर्णन मिलेगा..यही वास्तविक गंगा जमुना सरस्वती है नाक छिद्र से इनकी धाराओं का प्रवाहन होता है और भ्रूमध्य में इनके मिलन को वास्तविक कुम्भस्नान कहते हैं ..हाँलाकि इसका ये अर्थ नहीं निकालना चाहिये कि धरती पर बहने वाली गंगा का कोई महत्व ही नहीं है पर संत जिस गंगा में स्नान करते है वो हिमालय की न होकर यही है...इस हेतु रैदास जी बहस से बचने के लिये प्राय बहाना बना देते कि आज काम अधिक है इसलिये मैं नहीं जा पाऊँगा..
पर एक दिन रैदास जी को मौज आ ही गयी और उसी मौज में जब गंगास्नान जाने वालों ने एक तरह से उन्हें चिङाते हुये स्नान के लिये चलने का आग्रह किया तो रैदास जी बोले कि स्नान करने तो नहीं जा पाऊँगा लेकिन ये लो दो पैसे..मेरा परसाद लेकर गंगा में अवश्य अर्पित कर देना...परचित लोगों ने सोचा कि चलो कुछ तो अक्ल आयी ? तभी रैदास जी ने कहा कि सुनो गंगा ने परसाद स्वीकार किया या नहीं ये कैसे पता चलेगा इसके लिये तुम गंगा से कहना कि रैदास ने परसाद भेजा है और बदले में तुम क्या देती हो..लोगों ने सोचा कि रैदास की बुद्धि खराब हो गयी है । हम सालों से स्नान कर रहें है गंगा ने आज तक हमें कुछ नहीं दिया तो इसको क्या देगी...उनके संशय और उपहास मुद्रा को समझते हुये रैदास ने कहा कि तुम इतनी बात कह देना आगे गंगा की मरजी कि वो क्या करती है ? लोगों ने मन में सोचा कि इसने अपना उपहास कराने का मौका स्वयँ ही दे दिया । खैर वे गंगा पहुँचे स्नान किया और रैदास की बात याद आते ही उन्हें हँसी आ गयी फ़िर भी उन्होनें परसाद का दोना गंगा की तरफ़ करते हुये कहा कि " गंगा मैया ये परसाद रैदास ने आपके लिये भेजा है.." तुरन्त गंगा की धारा में से देवी गंगा का हाथ प्रकट हुआ और बेहद श्रद्धा से उसने प्रसाद को ग्रहण किया...हाँ कुछ गुप्त वजहों से उन लोगों को गंगा की शेष आकृति दिखायी न दी..इसके बाद उस हाथ में एक अनूठी आभा वाला दिव्य कंगन प्रकट हुआ और साथ ही गंगा की मधुर आवाज सुनायी दी " हे भक्तजन ये मेरी तरफ़ से प्रभु ( रैदास ) को दे देना " उन लोगों की " काटो तो खून नहीं " जैसी स्थिति हो गयी पर प्रत्यक्ष को कैसे झुठला सकते थे । हक्की बक्की अवस्था में उन्होनें कंगन लाकर रैदास को दे दिया..दरअसल कुछ कहने के लिये उनके पास शब्द ही नहीं थे...खैर रैदास ने वो कंगन अपनी पत्नी को दे दिया जिसे उसने बक्से में डाल दिया..कुछ समय के अंतराल के बाद रैदास को पैसों की समस्या आ गयी पर कंगन की उन्हें याद तक नहीं थी..तब पत्नी के द्वारा याद दिलाने पर रैदास ने पत्नी से कह दिया कि वो कंगन को किसी सुनार के यहाँ बेच दे । इस तरह ये दिव्य कंगन रैदास के बक्से से निकलकर सुनार की दुकान पर पहुँच गया जिसे उसने बङे जतन से सजाकर रख दिया..सुनार उस कंगन को देखकर भौंचक्का था..कंगन एक अनूठी आभा से हमेशा दमकता रहता था और इस तरह का सोना सुनार ने अपने जीवन में कभी नहीं देखा था..यही नहीं उसने कंगन के डिजायन का नकल करते हुये दूसरा कंगन बनाने की लाख चेष्टा की पर कभी सफ़ल नहीं हुआ । उसे इस बात की भी हैरत थी कि रैदास के पास ऐसा कंगन कहाँ से आया ?
खैर साहब..कुछ ही दिनों में राजकुमारी सुनार की दुकान पर आभूषण खरीदने आयी और पहली ही निगाह में उसने वो दिव्य कंगन पसंद कर लिया..और सुनार से उसका दूसरा जोङा निकालने को कहा ..सुनार की साँस मानो गले में ही अटक गयी..उसने राजकुमारी को बहुतेरा समझाया कि इस तरह का एक ही कंगन उसके पास है पर कंगन के अति आकर्षण से मोहित राजकुमारी उसकी कोई बात सुनने को तैयार न हुयी..और पन्द्रह दिन के अन्दर दूसरा कंगन राजमहल में पहुँचा देने का शाही आदेश करके चली गयी..वह सुनार भलीभाँति इस आदेश का मतलब जानता था..यदि राजकुमारी का मूड बिगङ गया तो राजाग्या उसे फ़ाँसी के फ़ंदे पर पहुँचा दे ये भी कोई ज्यादा बङी बात नहीं थी..सो वह अपना तमाम धन्धापानी छोङकर दूसरे कंगन की तलाश में लग गया और तलाश की मंजिले तय करता हुआ रैदास जी के पास पहुँच गया । उसने रैदास जी के सामने अपनी परेशानी रखी । रैदास जी ने कहा कि वो कंगन उन्हें इस इस तरह से देवी गंगा ने दिया है और उस तरह का दूसरा कंगन भला कैसे मिल सकता है । सुनार उनके पैरों पर गिर पङा और बोला कि रैदास जी किसी तरह मेरी जान इस जंजाल से छुटा दो । आपकी कृपा से मेरा जीवन बच सकता है...आप गंगा के पास चलिये और जिस तरह से उन्होंने आपको ये कंगन दिया है उसी तरह से गंगा आपको इसका दूसरा कंगन भी दे देगीं । रैदास जी उसकी परेशानी पर मुस्कराये और बोले कितुम्हारी बात ठीक है लेकिन इसके लिये गंगा जाने की क्या जरूरत है..सुनार भौंचक्का सा उनका मुँह देखने लगा..रैदास ने उसकी परेशानी दूर करते हुये कहा कि अरे भाई " जो मन चंगा तो कठौते में गंगा " और चमङा भिगोने वाले कठौते में हाथ डालकर दूसरा कंगन निकालकर दे दिया..बेहद आश्चर्यचकित सुनार उनके पैरों में गिर पङा ।

3 टिप्‍पणियां:

संजय कुमार चौरसिया ने कहा…

achchhi jaankari di

dhnyvad

माधव ने कहा…

बदिया

कविता रावत ने कहा…

..काश रैदास जैसे संत आज भी होते!
सार्थक और प्रेरक प्रस्तुति के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ

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