रविवार, जून 06, 2010

एक रात अघोरियों के साथ अघोरवासा

रात के बारह बज चुके थे । उस वातानुकूलित कमरे में मैं , नतालिया और सवेटा मौजूद थे । सवेटा नेट पर किसी फ़्रेंड से चैटिंग में व्यस्त थी ।
नतालिया बेड पर मेरे पास ही तीन तकियों के सहारे अधलेटी सी बैठी थी । हमने अभी अभी सेक्स किया था जिसमें सवेटा ने इच्छा न होने से भाग तो नही लिया था पर हमारे साथ उसने पूरा एन्जाय अवश्य किया था ।
नतालिया ने अभी भी वस्त्र नहीं पहने थे और पैरों पर एक चादर डाले वो एक पतली सी लम्वी विदेशी सिगरेट के कश लगा रही थी । मैंने प्रायः लेडीज सिगरेट का टेस्ट कम ही लिया है । सो उसके सिगरेट बाक्स से एक सिगरेट निकालकर मैंने भी सुलगा ली
नतालिया से मेरी पहचान दस महीने पहले नेट के ही जरिये हुयी थी । वह यू. के. के एक पब्लिकेशन के लिये सीनियर रिपोर्टर का कार्य करती थी और न्यूयार्क में रहती थी । नतालिया 32 की हो चुकी थी और उसके परिवार में उसकी एक छोटी बहन और माँ के अलावा कोई न था । उसके पिता जीवित थे पर उनका आपस में तलाक हो चुका था । नतालिया ने विवाह तो नही किया था पर छह साल तक मार्टिन के साथ रहने के बाद उनकी फ़्रेंडशिप में दरार पङ गयी और वे स्वेच्छा से अलग अलग रहने लगे । मार्टिन से नतालिया को एक चार साल का लङका भी था
नतालिया भारत में मेगजीन के काम से यानी भारत के अघोरी बाबाओं पर एक विस्त्रत रिपोर्ट तैयार करने के लिये आयी थी । जब ये काम एडीटर द्वारा उसे सोंपा गया तो नतालिया को स्वतः ही मेरा नाम याद आ गया और उसने फ़ोन पर अपने आने की सूचना दी । मैंने उसे समझाना चाहा कि अघोरियों की रिपोर्टिंग करना तुम्हारे बस की बात नहीं है । अपने एडीटर को बोलो कि इसके लिये किसी पुरुष रिपोर्टर को भेजे ।
तब उसने जबाब दिया कि एक तो वह इंडिया आना चाहती है और दूसरे उसकी निजी ख्वाहिश है कि वो अघोरियों को पास से देखे और इस तरह से घूमने में उसका एक भी पैसा खर्च नहीं होगा और रही बात पुरुष की तो उसके लिये तुम हो तो - माय डियर ही मेन ।

अब मेरे पास कोई जबाब नहीं रह गया था । तीसरे दिन नतालिया अपनी फ़्रेंड सवेटा के साथ इंडिया मैं , मेरे घर में , मेरे बेडरूम में साधिकार मौजूद थी । सिगरेट के कश लगाता हुआ मैं एक ही बात सोच रहा था कि औरत अभी कितनी तरक्की और करेगी । दो लगभग अनजान लङकियाँ मेरे अकेले के बेडरूम में कुछ देर की चुहलबाजी के बाद सेक्स करती हैं और बिना किसी औपचारिकता के इस तरह बर्ताब कर रही हैं । मानों हमारी जान पहचान कितनी पुरानी हो ।
- क्या सोच रहे हो नीलेश !  नतालिया ने मेरी तरफ़ देखते हुये अंग्रेजी में कहा ।
- मुसीबत कभी पहले से बताकर नहीं आती ।  मैंने अफ़सोस सा प्रकट करते हुये कहा । इसके साथ ही कमरा उन दोनों की मधुर खिलखिलाहट से गूँज उठा । सवेटा ने कम्प्यूटर आफ़ कर दिया था । उसने लाइट भी आफ़ कर दी और लगभग जम्पिंग स्टायल में बेड पर आ गयी । अब सवेटा सेक्स के लिये इच्छुक हो रही थी । पर मुझे और नतालिया को नींद आ रही थी । अतः हम गुडनाइट करके सो गये ।
********
सुबह जब में नतालिया के साथ ब्रेकफ़ास्ट ले रहा था तो उसकी बात की गम्भीरता मुझे समझ में आयी ।दरअसल मेरे सहयोग से यदि नतालिया बेहतरीन रिपोर्टिंग करने में कामयाब हो जाती तो उस वीडियो से न सिर्फ़ वह ढेरों डालर कमा सकती थी बल्कि उसका कैरियर भी चमक सकता था ।

इसलिये जिस बात को मैं हल्के से ले रहा था यानी कि पास के कुछ घाटों पर मध्यम किस्म के अघोरियों का इंटरव्यू करवा देना । वो इरादा अब मैंने बदल दिया । अब मैं पूरा रिस्क उठाकर उसे " झूलीखार " के जंगलो में एक रात के लिये ले जाना चाहता था । जहाँ बेहद खतरनाक किस्म के अघोरी बाबाओं का जमावङा रहता था । मैंने अपने मित्र सुनील को फ़ोन किया कि अपनी स्पेशियो गाङी ड्राइवर के हाथों मेरे पास भिजबा दे ।
" झूलीखार " जंगल बसेरबा पुल से चालीस किलोमीटर अंदर था और कोई भी आदमी दिन में भी वहाँ जाने की हिम्मत नहीं करता था । बसेरबा पुल से पाँच किलोमीटर अन्दर चलकर एक शमशान था । बस वहीं तक पास के गाँवो के लोग पशु आदि चराने जाते थे । बल्कि वे शमशान के पास जाने में भी परहेज करते थे क्योंकि एक तो उसका माहौल ही बेहद डराबना था और दूसरे वहाँ से खतरनाक अघोरियों का इलाका शुरू हो जाता था ।
बसेरबा पुल से ही धङधङाकर बहती हुयी गंग नहर शमशान तक पहुँचते पहुँचते मानों रौद्र रूप धारण कर लेती हो । और उस पर जगह जगह घूमते काले भयानक अघोरी जो देह पर चिता की राख मले रहते थे । आम लोगों के दिलों में खौफ़ पैदा करने के लिये पर्याप्त थे । शमशान के बाद ही अक्सर उनके द्वारा खायी गयी मानव लाशों के सङे टुकङे किसी भी जिगरवाले का दिल हिला देने के लिये काफ़ी थे ।
झूलीखार का जंगल इतने घने वृक्षों से आच्छादित था कि दिन के समय में भी रात का आभास होता था और उसकी वजह यही थी कि अघोरियों के डर से कभी भी कोई लकङी या वृक्ष काटने नहीं जाता था । इससे पूर्व में मैं तीन बार झूलीखार जा चुका था पर इस बार जो हल्की सी घबराहट मुझे हो रही थी इससे पहले कभी नहीं हुयी थी और इसकी मुख्य वजह मेरे साथ जाने वाले वे मेरे विदेशी मेहमान थे ।
हालाँकि नतालिया और सवेटा अपनी तरफ़ से पूरी दिलेरी दिखा रही थी पर वास्तविकता मैं जानता था कि झूलीखार पहुँचते ही इनकी सिट्टीपिट्टी गुम हो जाने वाली है और वास्तव में अन्दर ही अन्दर मैं यह भी सोच रहा था कि इन्हें झूलीखार ले जाने का मेरा निर्णय सही है या गलत । पर मैं कोई निर्णय नहीं ले पा रहा था ।
दरअसल मैं झूलीखार लगभग चार साल बाद जा रहा था और इतने समय में नये अघोरी इकठ्ठे हो गये हों । मेरे परिचित अघोरी मिले या न मिले । अघोरी काफ़ी संख्या में हो सकते हैं और दो जवान युवतियों के साथ अकेला मैं । रात को अघोरी अक्सर कच्ची शराब पीकर उन्मत्त हो जाते हैं । हो सकता है उनका लङकियों को देखकर संयम टूट जाय । और वे लङकियों के साथ सामूहिक रूप से बलात्कार कर बैठें ।


ऐसी तमाम बातें क्रमश मेरे दिलोदिमाग में चक्कर काट रही थी । जब नतालिया ने मेरी आँखो के आगे हाथ हिलाते हुये हेलो..हेलो..कहकर मेरी तन्द्रा भंग की । तब मुझे सुनाई पङा कि बाहर स्पेशियो का हार्न बज रहा था । अचानक मेरे दिमाग में एक आयडिया आया और मैंने सुनील को फ़ोन लगाकर कहा कि अगर आज की रात मैं तेरा ड्राइबर भी साथ ले जाऊँ तो । सुनील ने पूछा । कोई विशेष बात है क्या ।
मैंने संक्षेप में मगर बात की गम्भीरता उसे पूरी तरह समझा दी । सुनील हमारे लिये चिन्तित हो गया और एक बार तो उसने न जाने की सलाह ही दे डाली । मगर बाद में मान गया । अब उसके ड्राइवर को समझाना था । झूलीखार का नाम सुनते ही उसने इस तरह मुझे देखा कि मानों मेरे सिर पर सींग निकल आये हो और मैं एकदम पागल होऊँ । उसका इलाज मैं अच्छी तरह से जानता था । वह इंकार करे इससे पहले ही मैंने दो बङे गान्धी उसकी आँखो के आगे लहराये और बोला - इतने ही लौटने के बाद ये एडवांस..रखो ।
एक महीने की तनखाह एक रात में । कैसे इनकार करता बेचारा ।
गाङी में जरूरत का सभी सामान रख लेने के बाद दोपहर दो बजे हम झूलीखार के लिये रवाना हो गये और ठीक चार बजे बसेरबा पुल पर पहुँच गये । नतालिया बीच बीच में गाङी रुकवाकर फ़ोटो लेती और शूटिंग भी करती । नतालिया जब अपने काम में व्यस्त थी मैं अपनी गोद में लेटी हुयी सवेटा से पूछ रहा था कि क्या उसे पिस्टल चलाना आता है ।
दरअसल सुरक्षा के लिहाज से मैंने तीन पिस्टल का इंतजाम करके रख लिया था । और अब तो ड्राइबर के साथ होने से मैं लगभग निश्चिंत था । क्योंकि अघोरी हो या कोई अन्य जान सबको प्यारी होती है । दो आदमी और दो पिस्टल चलाने में सक्षम युवतियाँ । अघोरी का बाप भी हमारा कुछ नहीं बिगाङ सकता था। 
हाँ एक आम आदमी को अघोरियों के कारनामों और उनकी छुपी शक्तियों के प्रति जैसा भय होता है । वैसा मुझे कतई नहीं था । उनकी किसी भी प्रकार की मान्त्रिक शक्ति मेरा कुछ नहीं बिगाङ सकती थी ।
बसेरबा पुल से शमशान तक का रास्ता तय करने में ही एक घन्टा और लग गया । हालाँकि शमशान तक पक्का खडंजा रोड था फ़िर भी किनारे पर उगी झाङियों और बीच बीच में बेहद पतली हो गयी रोड आदि दिक्कतों की वजह से गाङी स्लो ही चल पा रही थी । उस पर बार बार नतालिया फ़ोटोग्राफ़ी के लिये रोक देती । शमशान के परिसर में पहुँचकर स्पेशियो रुक गयी और हम चारों गाङी से बाहर निकल आये । दरअसल यहाँ गाङी मैंने जानबूझकर रुकवायी थी । मैं ड्राइवर और दोनों लङकियों पर उस जगह का रियेक्शन देखना चाहता था । ड्राइवर के चेहरे पर तो मुझे कुछ दहशत के भाव नजर आये 
पर सवेटा और नतालिया इस तरह प्रसन्न थी कि मानों शमशान में न होकर किसी पिकनिक स्पाट पर आयी हो । नतालिया बेहद तन्मयता से शमशान की वीडियोग्राफ़ी कर रही थी । मैंने एक सिगरेट सुलगा ली और शमशान की बाउन्ड्रीवाल पर बैठकर कश लगाने लगा ।उफ़ दुनिया के लिये डरावना लगने वाले इस स्थान पर कितनी घनघोर शान्ति थी ।
शाम के सवा पाँच बज चुके थे । और झूलीखार स्थिति " अघोरीवासा " अभी यहाँ से पैंतीस किलोमीटर दूर था । जबकि शमशान के आगे कोई खङंजा जैसी भी रोड नहीं थी । पर एक बात जो राहत देने वाली थी । वह ये कि शमशान के रास्ते की अपेक्षा वो कच्चा दङा अधिक चौङा और गाङी चलाने के लिये सुगम था । लगभग दो किलोमीटर आगे बङते ही इस तरह गाङा अन्धकार हो गया । मानो अमावस की काली रात हो । इसकी वजह बेहद घने वे पेङ थे । जो झूलीखार में बे तादाद थे । पर इससे बेखबर बोर महसूस करती हुयी नतालिया और सवेटा मानों मेरे साथ किस किस खेल रही हों । जबकि मैं आने वाली परस्थितियों को लेकर चिंतित था । और ये चिंता अगर मैं उन तीनों के सामने जाहिर कर देता । तो उनका मनोबल और भी टूट सकता था । मुझे प्रसून की याद आ रही थी । वो अगर साथ होता । तो मैं काफ़ी हद तक निश्चिंत रह सकता था । पर प्रसून बाबाजी के साथ तिब्बत गया था ।
अघोरीवासा से तीन किलोमीटर पहले ही निर्वस्त्र अघोरी और अघोरिंने नजर आने लगे । नतालिया वीडियो कैमरा लेकर तेजी से उन्हें शूट कर रही थी । और सवेटा के हाथ में स्टिल कैमरा था । हाँ ड्राइवर रतीराम अवश्य शक्ल से भयभीत था । अभी हम गाङी के अन्दर ही थे ।
तभी गाङी के इंजन की आवाज से आकर्षित होकर करीब पचीस अघोरियों का एक दल गाङी के सामने आ गया और स्पेशियो की खिङकी में जोरदार डंडा मारा । इस स्थिति के बारे में मैंने तीनों को पहले ही समझा दिया था ।
- पंगा ।  मेरे मुँह से निकला ।
मैंने प्रसून भाई की एक कूटनीति अपनाते हुये बेहद कामुकता से उन छह अघोरिनों को देखा । जो निर्वस्त्र होकर अघोरियों के बीच खङी थी । और स्पेशियो का द्वार खोलकर अकेला ही बाहर निकल आया । वे सब अजीव निगाहों से मुझे देख रहे थे । मैं लगभग टहलने के अन्दाज में उस अघोरी के पास पहुँचा । जो उनका लीडर मालूम होता था । और जिसने गाङी में डंडा मारा था । फ़र्स्ट इम्प्रेस इज द लास्ट इम्प्रेस ।
विना किसी चेताबनी । बिना कोई बात किये । मैंने एक भरपूर मुक्का उस तगङे अघोरी के मुँह पर मारा । और रिवाल्वर उसकी और तान दिया । साथ ही गाङी की तरफ़ इशारा किया । जहाँ खिङकी खोले खङी । दो विदेशी हसीनायें किसी फ़िल्मी पोस्टर की तरह उनकी तरफ़ पिस्टल ताने खङी थी । और न चाहते हुये भी उनकी वह मुद्रा देखकर उस परिस्थिति में भी मेरी हँसी निकल गयी ।
- इसकी गोली ।  मैं बेहद जहरीले स्वर में बोला - मन्त्र से पहले काम करती है..और वो ये नहीं देखती ..कि उसके द्वारा मरने वाला कौन है ?
ये तरीका काम कर गया और अघोरियों का वह दल चिल्लाता हुआ ..ऊ भाला..छू चा..आदि जैसे आदिवासियों की तरह शब्द निकालता हुआ अघोरीवासा की तरफ़ भागने लगा । हमारी गाङी उनके पीछे पीछे भागने लगी और तीन किलोमीटर का निर्विघ्न सफ़र तय करके अघोरीवासा पहुँच गयी ।
अघोरीवासा में पहले से ही कोहराम मचा हुआ था । और लगभग सत्तर अघोरियों का एक दल भाला , त्रिशूल , लाठी , आदि लेकर हमारे स्वागत के लिये तैयार था । दरअसल उन्हें मेरी निर्भयता को लेकर बेहद हैरानी हो रही थी ।
अगर अघोरियों की मान्त्रिक आदि ताकत को नजरन्दाज कर दिया जाय तो वे हमारी तरह ही आम आदमी होते हैं । वे कोई आसमान से नहीं टपकते । बल्कि स्त्री पुरुष के साधारण सम्भोग से पैदा होते हैं । नंगे होकर गर्म तेल चुपङकर , बदन पर चिता आदि की राख मल लेने , और जटाजूट बङा लेने से कोई आदमी शक्तिशाली नहीं हो जाता । उसका बाह्य रूप डरावना अवश्य हो जाता है । पर अन्दर से वह एक साधारण इंसान ही होता है । अब क्योंकि एक आम आदमी इस तरह के माहौल का , इस तरह की तान्त्रिक मान्त्रिक गतिविधियों का अभ्यस्त नहीं होता । इसी लिये वो इन्हें देखकर भयभीत हो जाता है । और ये मिट्टी के शेर इसी बात के अभ्यस्त होतें हैं कि प्रत्येक आदमी न सिर्फ़ उन्हें देखकर भयभीत हो । बल्कि दन्डवत भी करें । लेकिन यहाँ ठीक उल्टा हो रहा था । जैसा उनके जीवन में शायद कभी नहीं हुआ था । इसलिये वे अचम्भित से थे ।
रात को कच्ची शराब पीकर , बीसियों जंगली मुर्गा मुर्गी तीतर बटेर..आदि को उमेठ कर मार डालने वाले..फ़िर उनको आग पर भूनकर..उनकी हड्डियाँ माँस आदि चूसकर..हू हुल्ला जैसा हुङदंग करने वाले वे नंगधङंग अघोरी उन्मुक्त उन्मादी कामवासना का खेल खेलते..पर आज पूरा मामला ही बदल गया था और वे अपनी हीरोइनों के सामने खुद को बेइज्जत महसूस कर रहे थे और हम चारों को तुरन्त मार डालना चाहते थे । ताकि दो कोमलांगियों और दो हट्टे कट्टे पुरुषों का माँस खाकर वे अपने आप को त्रप्त कर सकें और जश्न मनायें ।
मैंने एक सिगरेट सुलगाया । और फ़िल्मी स्टायल में उंगलियों में रिवाल्वर घुमाता हुआ उनके सामने टहलता हुआ उनके अगले कदम की प्रतीक्षा करने लगा । मेरे मना करने के बाद भी नतालिया और सवेटा स्पेशियो से बाहर निकल आयी । पर रतीराम वहीं बैठा रहा । उसे अपनी जान प्यारी जो थी
अघोरीवासा का यह मेन अड्डा लगभग छह बीघा लम्बे चौङे फ़ील्ड के रूप में था । जिसमें स्थान स्थान पर कमरे और गुफ़ायें आदि बनी हुयी थी । जगह जगह छोटी छोटी होलियों जैसे अलाव बने हुये थे । दस बारह कुत्ते..कुछ सुअर..मुर्गे आदि पक्षियों के दङवे आदि भी वहाँ थे । फ़ील्ड के एक साइड में गंगा नहर कुछ कुछ गोलाई के आकार में बलखाती हुयी सी निकल जाती थी ।
मैं टहलते हुये कुछ कुछ आशंकित सा अगले पलों के बारे में सोच रहा था । दरअसल कोई भी बखेङा खङा करके पंगा करके यदि मैं हीरोगीरी का रुतबा जमाने में कामयाब भी हो जाता । तो इससे कोई फ़ायदा होने के बजाय मुझे नुकसान ही होता । इसीलिये मैं अघोरियों के उस झुन्ड में किसी परिचित चेहरे को ढूंढने की कोशिश कर रहा था कि तभी दौङकर आते हुये भौंकते कुत्तों ने मेरा काम आसान कर दिया । नतालिया और सवेटा चीखकर गाङी में चङ गयी । पर मैं कुत्तों को देखकर अजीव से अन्दाज में मुस्कराया । यानी आधा किला फ़तह ।
वही हुआ । कुत्ते पहले तो मुझ पर भौंके । फ़िर उनमें से कुछ कुत्ते पास आकर कूँ कूँ करते हुये मेरे पैर चाटने लगे । जाहिर था कुछ पुराने कुत्तों ने मुझे पहचान लिया था । अघोरियों का दल ये देखकर आश्चर्यचकित रह गया । तभी मुझे थोङी और राहत मिली । जब धन्ना और सुखवासी अघोरियों के उस झुन्ड से निकलकर मेरे पास आये और दुआ सलाम करने लगे ।
धन्ना और सुखवासी सात साल से अघोरपंथ में शामिल हुये थे । और उन्हें सिद्धि आदि में कोई उपलब्धि नहीं हुयी थी । जब में पिछली बार यहाँ आया था तब उनसे मेरी मुलाकात हुयी थी । और उस समय यहाँ का मेन बाबा मोरध्वज बाबा था । धन्ना ने बताया कि मोरध्वज बाबा चम्बा की तरफ़ चला गया है और इस समय यहाँ की गद्दी मुन्डा स्वामी संभाले हुये है । मुन्डा स्वामी उस समय धूनी पर बैठा हुआ था । हमें आपस में बात करते हुये देख नतालिया और सवेटा भी मेरे पास आ गयी । और आक्रमण करने को तैयार अघोरी भी कुछ समय के लिये रुककर हैरत से यह नजारा देख रहे थे ।
सुखवासी ने वापस अघोरियों के झुन्ड के पास जाकर उन्हें बताया कि मैं यहाँ का पुराना वाकिफ़ हूँ । और मोरध्वज का जानकार हूँ । इसे सुनकर अघोरियों के अस्त्र शस्त्र तो नीचे झुक गये । पर वे अभी भी बदले और अपमान की आग में जल रहे थे । धन्ना ने जोर देकर कहा कि - वह द्वैत का साधक है और तुम्हारी अघोर विधा उसके आगे काम नहीं करेगी । इस बात ने उन पर गहरा असर तो किया । पर मेरा हीरो स्टायल देखकर उनका दिल ये मानने को तैयार नहीं था कि कोई साधु ऐसा भी हो सकता है । 
तभी मुन्डास्वामी धूनी पर से उठकर गुफ़ा से बाहर आ गया । और एक विशाल चबूतरे पर पंचायत होने लगी । धन्ना और सुखवासी मेरा प्रतिनिधित्व कर रहे थे । एक घन्टे की लम्बी बातचीत के बाद सुलह समझौता हो गया । पर मुन्डा का अहंकार ये मानने को तैयार न था कि मैं एक अच्छा और उसकी तुलना में बङा साधक हो सकता हूँ । दूसरे उसकी नजरें बता रही थी कि वो नतालिया और सवेटा के प्रति क्या सोच रहा है ? वास्तव में यदि मेरे पास पिस्तोल और अलौकिक शक्ति न होती तो धन्ना के कहने के बाबजूद वे दोनों लङकियों पर टूट पङते ।
लेकिन इस सबके बाद भी अपने अहं से मजबूर मुन्डा ने चुपचाप तीन बार शक्तिशाली मन्त्र मुझ पर चलाने की कोशिश की । जो मैंने पलक झपकते ही निष्क्रिय कर दिये । तब मुन्डा के दिल में मेरे लिये स्वतः आदर और दोस्ताना जाग उठा । दरअसल वह मुझसे कुछ अलौकिक शक्तियों की प्राप्ति में सहायता हेतु इच्छुक था ।
रतीराम भी भय छोङकर बाहर निकल आया और चोर निगाहों से नंगी अघोरिनों को देखने लगा । मैंने उसे स्पेशियो में रखी देशी शराब का बङा थैला बाहर लाने को कहा । और फ़िर शराब के पाउच जमीन पर फ़ैला दिये । इसके साथ ही वहाँ दोस्ताना माहौल में जश्न शुरू हो गया और कुछ ही देर में नशे में लङखङाते हुये अघोरी उन्मुक्त हो उठे । वे मुर्गा तीतर आदि पक्षियों को पकङ कर हवा में उछालते और जीवित अवस्था में ही उसके पंख आदि नोचते । फ़िर अघोरी अघोरिनें उसको बाल की तरह एक दूसरे की तरफ़ उछालकर बालीबाल जैसा खेल खेलते । इसके बाद पक्षी को घायल अवस्था में ही जलती आग पर लटका देते ।
निर्दोष और असहाय पक्षियों का करुण कृन्दन सुनकर मुझे इतना गुस्सा आ रहा था कि एक एक गोली इन सबके सीने में उतार दूँ । पर मैं कहाँ कहाँ और कितनों को मार सकता था । इस अखिल सृष्टि में ऐसी लीला न जाने कितने अनगिनत स्थानों पर हो रही थी । मुझे एक दोहा याद हो आया - दया कौन पर कीजिये , निर्दय कासो होय । साई के सब जीव है , कीरी कुंजर दोय ।
अघोरी भले ही मुझसे डर गये थे और सहमें हुये थे । पर जाने क्यों मुझे ऐसा लग रहा था । कि मेरे सामने से हटते ही वे नतालिया और सवेटा के कपङे चीर फ़ाङकर अलग कर देंगे । इस सबसे बेखबर वे दोनों अपना अपना कैमरा संभाले तत्परता से काम कर रही थी । पक्षियों का भुना माँस नोचते..और शराब के घूँट भरते वे अघोरी अब उन्मुक्त हो उठे और पश्चिमी देशों की किसी हैलोवीन पार्टी की तरह सेक्स वर्ताव करने लगे ।
कुछ देर की उनकी शूटिंग के बाद हम चारों लोग मुन्डास्वामी और छह अन्य अघोरियों के साथ एकान्त में एक अलाव के सामने बैठ गये और उनका इंटरव्यू लेने लगे । मैं नतालिया के प्रश्न ट्रान्सलेट करता हुआ दुभाषिये का काम कर रहा था । रतीराम निर्लिप्त सा बैठा हुआ उत्सुकता से अघोरियों की कामक्रीङा को देख रहा था । ये पूरा अघोरी मिशन कवरेज होते होते सुबह के पाँच बज गये । अधिकांश अघोरी अब फ़ील्ड में ही निढाल होकर सो रहे थे ।मुन्डा की एक पर्सनल साध्वी हम लोगों के लिये चाय बना लायी ।
ठीक छह बजे हम पूरा पेकअप करके स्पेशियो में बैठ गये । मुन्डा , साध्वी , और अन्य कई अघोरियों ने वाकायदा विदा करते हुये हम सबका अभिवादन किया और मुन्डा ने कई बार आग्रह किया कि या तो मैं वहाँ जल्द ही आऊँ और खासतौर पर प्रसून जी को लेकर आऊँ । या फ़िर वो मुझसे मिलने मेरे घर आयेगा ।
गाङी वापस शहर की और चलने लगी । नतालिया और सवेटा अपनी जिंदगी की इस रोमांचक रात को लेकर बहुत एक्साइटेड थी । और रतीराम की परवाह किये बिना बार बार मुझे किस कर रही थी ।मैंने प्रसून के बारे में सोचते हुये एक सिगरेट सुलगायी और हौले हौले कश लगाने लगा ।

2 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत खूब!
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यह संस्मरण भी अच्छा रहा!

vinay ने कहा…

अघोरियो के बारे में जानकारी देता हुआ,अच्छा संसमरण ।

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