सोमवार, जून 21, 2010

बन्दर ( बाबा ) क्या जाने अदरक ( बीबी ) का स्वाद ?

मैं सतसंग में जब भी योग या भक्ति की बात करता हूँ । तो प्रायः आम लोग अपनी पूर्व और बेहद मजबूत धारणा के चलते यही मानते हैं कि ये सब बातें या तो फ़ुरसतिया लोगों के लिये हैं ।
या फ़िर उन लोगों के लिये जो जीवन के कार्यों और जिम्मेदारियों से निवृत हो चुके हैं और घर के लोगों द्वारा उठाकर कूङे की तरह बाहर फ़ेंक दिये गयें हैं । अक्सर लोग मुझे अपने ग्यान का उदाहरण भी देते हैं -  नारि मरी गृह सम्पति नासी । मूङ मुङाय भये सन्यासी । यदि कुछ लोग इधर चलने का प्रयास भी करना चाहते हैं । तो वे मानते हैं कि योग भक्ति आदि बेहद कठिन कार्य है । और full time job है । 
कुछ ने यह भी कहा - बाबा आप नहीं जानते ? दिन भर का थका मांदा आदमी..वैल घोङे की तरह जुता आदमी..शाम को जब घर पहुँचता है । और दरबाजे पर नहा धोकर ..लिपिस्टिक.पाउडर से लैस अपनी चमाचम ..झमाझम बीबी को देखता है । तो सब भक्ति धरी रह जाती है । वो थकान बीबी ही दूर कर सकती है..? अपने प्यारे प्यारे बच्चे जब कूदकर गोद में बैठते है । तो भक्ति समझ में नहीं आती । पंजाबी में एक कहाबत है - ये जग मिठ्ठा वो कौन दिठ्ठा..? 
इसका अर्थ है । यहाँ पूरा मजा आ रहा है । स्वर्ग नरक पता नहीं है या नहीं ? भगवान है या नहीं ? किसने देखा ? बाबा हमारा मजा मत खराब कर..? बन्दर ( बाबा ) क्या जाने अदरक ( बीबी ) का स्वाद ?
सचमुच ! सही कहते हैं । हमारे ये भाई । बीबी का स्वाद तो मुझे नहीं मालूम..पर बिना अदरक डाले चाय मुझे भी अच्छी नहीं लगती । क्या बीबी अदरक जैसी तीखी होती है ..? 
जो लोग मेरे पुराने reader हैं । उन्हें मेरे इस सतसंग से कोई बैचेनी नहीं हो रही होगी । पर  बाबा  के नये reader अवश्य उलझन और असमंजस महसूस कर रहे होंगे । यह baba का style है । आप modern लोग समझते हैं कि baba modern नहीं हो सकता ।
खैर..इस तमाम सतसंग का निष्कर्ष यह है कि ज्यादातर ग्रहस्थ और नौकरीपेशा या उधोगपुरुषों का मानना होता है कि भक्ति और संसार का समागम नहीं होता - जगत भगत को बैर..बैर जैसे मूस बिलाई..।
आईये देखें । जगत के कार्य करते हुये भक्ति कैसे की जा सकती है ? इस प्रयोजन हेतु योग या भक्ति को तीन भागों में बाँटा गया है ।
1 - पहला " कर्म योग " है । मन बुद्धि चित्त अहम । पाँच ग्यानेन्द्रियाँ । पाँच कर्मेंन्द्रिया । ये संसार का कार्य करने के लिये हैं । तुम्हारा शरीर एक प्रकार की जेल है । जिसमें तुम्हारे पाप पुण्य के फ़लस्वरूप तुम्हें डाला गया है । अपने इस

शरीर के साथ जो भी अच्छा या बुरा जीवन तुम्हें कर्मफ़ल के रूप में मिला है । उसको भोगना ही होगा - देह धरे के दण्ड को भोगत है हर कोय । ग्यानी भोगे ग्यान से मूरख भोगे रोय ।
यानी - उसकी  रजा में रजा तो कट गयी सजा  ।
कर्म योग का आशय यही है । कि निजी वासनाओं से तुम जिस और जैसे शरीर को प्राप्त हुये हो । जिस और जैसी स्थिति को प्राप्त हुये हो । उसे निर्विकार भाव से भोगो
2 - दूसरा " ग्यान योग " है । ग्यान योग भी बेहद सरल है । इसका मुख्य सूत्र है । चेतना आत्मा के द्वारा गति कर रही है । शरीर और इंद्रियों से जगत के कार्य और व्यवहार करो । और चेतना को परमात्मा में लगा दो । इसी के लिये भगवान श्रीकृष्ण ने कहा था कि - हे अर्जुन तू युद्ध कर और निरंतर ध्यान कर " जो श्रीकृष्ण के इस वाक्य का अर्थ समझ लेगा । उसके लिये ग्यान योग अत्यन्त सरल हो जायेगा ।
3 - तीसरा " भक्ति योग " है । भक्त का अर्थ ही जुङ जाना है । भक्त का अर्थ ही समर्पण है । भक्त का अर्थ ही सुमरन है । भक्ति के लिये भक्त का मुख्य सूत्र है । यह सब परमात्मा की कृपा से हो रहा है । मैं तो केवल निमित्त मात्र हूँ । संसार एक रंगमंच के परदे की तरह है । जिस पर प्रभु की लीला हो रही है । अतः इस लीला का भरपूर आनन्द तो अवश्य लो । पर मेरा तेरा भूल जाओ । practical रूप में देखो तो । मेरा तेरा करने से आपको कुछ हासिल होता है क्या ? बस यह मानना ही असली भक्ति योग है ।
विशेष - ऊपर के तीनों योग जब विधिवत मिलकर एक हो जाते हैं । तब " हँस " के ग्यान वैराग्य भक्ति नाम के तीनों पंख जो तुम्हारी नादानी और गलतियों से टूट चुके हैं । या घायल हो गये हैं । फ़िर से स्वस्थ हो जातें हैं । और हँस अनन्त की यात्रा पर उङने को तैयार हो जाता है ।

2 टिप्‍पणियां:

vinay ने कहा…

धन्यवाद राजीव जी ।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

इस सुन्दर पोस्ट की चर्चा "चर्चा मंच" पर भी है!
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http://charchamanch.blogspot.com/2010/06/193.html

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