गुरुवार, जुलाई 22, 2010

प्रेतनी का मायाजाल 1

लेखकीय -- प्रेत जगत पर आधारित मेरी कहानी " प्रेतनी का मायाजाल " आठ भागों में है । जो एक साथ ही प्रकाशित है । ये कहानी पाठकों की बेहद मांग पर लिखी गयी है ।
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शाम के सात बजकर चवालीस मिनट हो चुके थे । वातावरण में हल्का हल्का अंधेरा फ़ैल चुका था । मैं इस समय कलियारी कुटी नामक एक गुप्त स्थान पर मौजूद था । कलियारी कुटी के आसपास का लगभग सौ किलोमीटर इलाका निर्जन वन था । सिर्फ़ उसकी एक साइड को छोडकर । जो यहां से तीन किलोमीटर दूर कलियारी विलेज के नाम से जाना जाता था । इस को इस तरह से समझें । कि सौ किलोमीटर व्यास का एक वृत बनायें और उसमें बीस डिग्री का हिस्सा काट दिया जाय । यही बीस डिग्री का हिस्सा इंसानों के सम्पर्क वाला था । शेष हिस्सा एकदम निर्जन रहता था । कलियारी कुटी को साधना स्थली के रूप में
मुझे मेरे गुरु " बाबाजी " ने प्रदान किया था । और तबसे इस स्थान पर मैं कई बार सशरीर और अशरीर आ चुका था । अपनी पहली अंतरिक्ष यात्रा मैंने इसी स्थान से अशरीर की थी । कलियारी कुटी के छह किलोमीटर के दायरे में किसी तपस्वी पुरुष की " आन " लगी हुयी थी । वो तपस्वी पुरुष कौन था । इसकी जानकारी मुझे नहीं थी । और न ही बाबाजी ने मुझे कभी बताया था । मेरी कुटी के निकट ही पहाडी श्रंखला से एक झरना निकलता था । जिसमें पत्थरों के टकराने से साफ़ हुआ पानी उजले कांच के समान चमकता था । ये इतना स्वच्छ और बेहतरीन जल था कि कोई भी इसको आराम से पी सकता था । कुटी से चार फ़र्लांग दूर वो पहाडी थी जिस पर इस वक्त मैं मौजूद था । इस पहाडी पर चार फ़ुट चौडी और दस फ़ुट लम्बी दो फ़ुट मोटी दो पत्थर की शिलाएं एक घने वृक्ष के नीचे बिछी हुयी थी । इस तरह यह एक शानदार प्राकृतिक डबल बेड था । कलियारी विलेज से साडे तीन किलोमीटर की दूरी पर और इस पहाडी से आधा किलोमीटर की दूरी पर एक पुराना शमशान स्थल था । इसके एक साइड का दो किलोमीटर का इलाका किसी नीच शक्ति ने " बांध " रखा था । कभी कभी मुझे हैरत होती थी कि एक ही स्थान पर दो विपरीत शक्तिंयां यानी सात्विक और तामसिक अगल बगल ही मौजूद थी जो एक तरह से असंभव जैसा था । मैंने एक सिगरेट सुलगायी और कलियारी विलेज की और देखने लगा । जहां बहुत हल्के प्रकाश के रूप में जीवन चिह्न नजर आ रहे थे । एक तरफ़ साधना के लिये इंसानी जीवन से दूर निर्जन में भागना और दूसरी तरफ़ लगभग अपरिचित से इस जनजीवन को दूर से देखना एक अजीव सी सुखद अनुभूति देता था । मैं पहाडी पर टहलते हुये अपने घर के बारे में सोचने लगा । नीलेश अपनी गर्लफ़्रेंड मानसी के साथ उसके घर मारीशस गया हुआ था । बाबाजी किसी अग्यात स्थान पर थे और इस वक्त मेरे सम्पर्क में नहीं थे । मैंने अंतरिक्ष की और देखा । जहां धीरे धीरे जवान होती रात के साथ असंख्य तारे नजर आने लगे थे । ऐसा दिल कर रहा था । कलियारी कुटी में अशरीर होकर सूक्ष्म लोकों की यात्रा पर निकल जाऊं । जो इन्ही तारों के बीच अंतरिक्ष में हर ओर फ़ैले हुये थे । परबाबाजी के आदेशानुसार मुझे बीस दिन का समय इसी कलियारी कुटी में एक विशेष साधना करते हुये बिताना था ।
" दाता । " मेरे मुख से आह निकली , " तेरी लीला अजीव है । अपरम्पार है । "
मैंने रिस्टवाच की लाइट आन कर समय देखा । रात के नौ बजने वाले थे । कि तभी मुझे आसपास एक विचित्र अहसास होने लगा । हत्या..कुसुम..हत्या..कुसुम..ये शब्द बार बार मेरे जेहन पर दस्तक देने लगे । इसका सीधा सा मतलब था । कि आसपास कोई सामान्य आदमी मौजूद है । जिसके दिमाग में इस तरह के विचारों का अंधड चल रहा था । इस आन लगे हुये और दूसरी साइड पर बांधे गये स्थान पर एक सामान्य आदमी का मौजूद होना । और वो भी किसी हत्या के इरादे से । एक अजूबे से कम नहीं था । तपस्वी की " आन " लगा हुआ स्थान इंटरनेट के उस " वाइ फ़ाइ " स्थान के समान होता है । जिसमें आम जिंदगी की बात दूर से ही बिना प्रयास के कैच होने लगती है । और इसी आन के प्रभाव से " जीव " श्रेणी में आने वाली आत्मायें एक अग्यात प्रभाव से उस स्थान से अनजाने ही दूर रहती हैं । मैं इस नयी हलचल के बारे में सोच ही रहा था कि शमशान स्थल की तरफ़ एक रोशनी हुयी । और कुछ ही देर में बुझ गयी । क्या माजरा था ? मैं पूर्ण सचेतन होकर उसी तरफ़ । उस अनजान जीव की तरफ़
एकाग्र हो गया । क्या मैं उसके पास जाकर देखूं । मैंने सोचा । या यहीं से उसका " माइंड रीड " करूं । अपना यही विचार मुझे सही लगा । और मैंने उसके दिमाग से " कनेक्टिविटी " जोड दी । वह एक आदमी था । जिसके पास इस समय एक भरी हुयी रिवाल्वर थी । और वह कुसुम नाम की किसी औरत की हत्या कर देना चाहता था । इससे ज्यादा इस वक्त उसके दिमाग में और कुछ नहीं था । जो मैं रीड करता । उसकी जिन्दगी के और पिछ्ले पन्ने मैंने खोलने की कोशिश की । जिसमें मैं उस वक्त पूर्णतया असफ़ल रहा । इसकी बेहद ठोस वजह ये थी । कि इस वक्त वह आदमी पूरी एकाग्रता से इसी विचार पर केन्द्रित था । और उसकी जिन्दगी के अन्य अध्याय बैंक के किसी मजबूत सेफ़ वाल्ट की तरह लाक्ड थे । कुसुम नाम की औरत कौन थी और इस वक्त यहां क्योंकर आयेगी । ये मेरे लिये एक अजीव गुत्थी थी । अब मेरे लिये एक बडा सवाल ये था कि मैं उससे कैसे बात करूं ? करूं या न करूं । मैं उससे कैसे पूछूंगा कि वो यहां क्यों है ? यही सवाल वो मुझसे करेगा तो मैं क्या जबाब दूंगा ?
" मालको । " मैंने आह भरी । " अजव में अजव खेल है तेरे । "
फ़िर मुझे एक उपाय सूझा । पहल उसी की तरफ़ से हो तो अच्छा था । मैंने कमर में बंधी बेल्ट से लटकती टार्च निकाली और जलाकर तीन चार बार सर्चलाइट की तरह इस तरह घुमाया । मानों सरकस वाले शो प्रारम्भ होने पर घुमा रहे हों । परिणाम मेरी आशा के अनुरूप ही निकला । वह मेरी यानी किसी की उपस्थित जान गया था । और इसकी एक ही वजह थी । उस समय उसका बेहद चौंकन्ना होना । वह इस नयी स्थिति पर कुछ देर तक खडा खडा सोचता रहा और फ़िर मानो एक निर्णय के साथ मेरी ओर आने लगा । मैंने उसे अपनी और भी सही पोजीशन जताने के लिये आठ दस बार लाइटर इस तरह जलाया बुझाया । मानों सिगरेट जलाने में किसी तरह की दिक्कत हो रही हो । दस मिनट बाद ही वह पहाडी से नीचे एक वृक्ष के पास आकर खडा हो गया । पर उसने मेरे पास आने या मुझे पुकारने की कोई कोशिश नहीं की । उल्टे उसने मेरा फ़ार्मूला मुझी पर आजमाते हुये सिगरेट बीडी में से कुछ मुंह से लगाकर तीन बार माचिस को जलाया । अब वह मुझसे लगभग दो सौ कदम दूर पहाडी के नीचे कुछ हटकर मौजूद था । हम दोनों ही कशमकश में थे । कि एक दूसरे के बारे में कैसे जाना जाय ? तब उसने मानों निरुद्देश्य ही टार्च की रोशनी अपने ऊपर पेड पर फ़ेंकी और स्वाभाविक ही मेरे मुख से तेज आवाज में निकला ।
" ए वहां पर कौन है ? "
" मैं हूं । " वह तेज आवाज में चिल्लाया । " दयाराम । "
अगले कुछ ही मिनटों में वह मेरे पास पत्थर की शिला पर बैठा था और मुझे उस निर्जन और वीराने स्थान में अकेला देखकर बेहद हैरान था । उसकी ये हैरानी और तीव्र जिग्यासा मेरा अत्यधिक नुकसान कर सकती थी । इसलिये मैंने उसे बताया कि मैं बायोलोजी का स्टूडेंट हूं । और मेरा कार्य कुछ अलग किस्म के जीव जन्तुओं पर शोध करना है । जो प्रायः इस क्षेत्र में मिलते है । मैंने जानबूझकर आधी अंग्रेजी और बेहद कठिन शब्दों का प्रयोग किया था । ताकि मेरी बात भले ही उसकी समझ में न आये । पर वह मेरे यहां होने के बारे में अधिक संदेह न करे । और कुछ समझता हुआ । कुछ न समझता हुआ संतुष्ट जाय । वही हुआ । लेकिन इसमें मेरी चपल बातों से ज्यादा इस वक्त उसकी मानसिक स्थिति सहयोग कर रही थी । जिसके लिये वह इस लगभग भुतहा और डरावने स्थान पर रात के इस समय मौजूद था । कुछ देर में संयत हो जाने के बाद उसने मेरा नाम पूछा । मैंने सहज भाव से बताया ।
" प्रसून जी । " वह आसमान की तरफ़ देखता हुआ बोला । " आपकी शादी हो चुकी है ? "
" नहीं । " मैंने जंगली क्षेत्र में लगे घने पेडों की तरफ़ देखते हुये कहा । " दरअसल कोई लडकी मुझे पसन्द नहीं करती । आप की निगाह में कोई सीधी साधी लडकी हो तो बताना । "
" तुम खुशकिस्मत हो दोस्त । " उसने एक गहरी सांस ली । " इस सृष्टि में औरत से ज्यादा खतरनाक कोई चीज नहीं है ? "
वह कुछ देर तक सोच में डूबा रहा । फ़िर उसने चरस से भरी हुयी सिगरेट निकालकर सुलगायी और एक दूसरी सिगरेट मुझे आफ़र की । लेकिन मेरे मना करने के बाद वह सिगरेट के कश लगाता हुआ मानों अतीत में कहीं खो गया । और मेरी उपस्थिति को भी भूल गया । मैंने एक सादा सिगरेट सुलगायी और रिस्टवाच पर नजर डाली । रात के दस बजने वाले थे । चरस की सिगरेट की अजीव और कसैली महक वातावरण में तेजी से फ़ैल रही थी । दयाराम हल्के नशे में मालूम होता था । इसका सीधा सा अर्थ था कि मेरे पास आने से पूर्व ही वह एक दो सिगरेट और भी पी चुका था । यह मेरे लिये बिना प्रयास फ़ायदे का सौदा था । सच्चाई जानने के लिये मुझे उसके दिमाग से ज्यादा छेडछाड नहीं करनी थी । बल्कि उस गम के मारे ने खुद ही रो रोकर मुझे अफ़साना ए जिन्दगी सुनाना था ।
( क्रमशः )

3 टिप्‍पणियां:

Etips-Blog Team ने कहा…

रोचक , अगली कङीयोँ का इंतजार रहेगा ।


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ललित शर्मा ने कहा…

रोचक कहानी,अगली कड़ी का इंतिजार है।

arvind ने कहा…

अगली कङीयोँ का इंतजार रहेगा .रोचक कहानी

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