गुरुवार, जुलाई 22, 2010

प्रेतनी का मायाजाल 2

लेखकीय -- प्रेत जगत पर आधारित मेरी कहानी " प्रेतनी का मायाजाल " आठ भागों में है । जो एक साथ ही प्रकाशित है । ये कहानी पाठकों की बेहद मांग पर लिखी गयी है ।
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कोई बीस मिनट तक वह चरसी सिगरेट के सुट्टे लगाता रहा । फ़िर उसने शमशान की तरफ़ निगाह डाली । मानों वह बडी बेकरारी से किसी की प्रतीक्षा कर रहा हो । मुझे उसकी इस हरकत पर हैरत हो रही थी । अंधेरे में भला वह कैसे अपने लक्ष्य को देख सकता था । हांलाकि चन्द्रमा की रोशनी से गहरा अंधेरा तो नहीं था । फ़िर भी वह इतना पर्याप्त नही था कि यहां से आधा किलोमीटर दूर स्थित
वह किसी को देख सके । उसने दो तीन बार माचिस जलाकर बहाने से मेरा चेहरा मोहरा देखकर ये अन्दाजा लगाने की कोशिश की । कि मैं विश्वास करने योग्य हूं या नही । मैं अच्छी तरह समझ रहा था कि वो बार बार यही सोच रहा है कि अपना राज मुझे बताये या ना बताये । " तुम । " वह बोला । " सोच रहे होगे । कि आखिर मैं कौन हूं । यहां क्यों आया हूं । सच तो ये है प्रसून । मैं अपनी बीबी की हत्या करने आया हूं । वो बीबी जो मेरी बीबी है । पर जो मेरी बीबी नहीं है । " बात के बीच में ही वो अचानक हंसा । फ़िर जोर से हंसा । और अट्टहास करने लगा । " उफ़ है न कमाल ।
बीबी है । पर बीबी नहीं है । तो सबाल ये है प्रसून कि बीबी आखिर कहां गयी ? है वही । पर वो नही है । तो फ़िर कुसुम कहां गयी । अगर मेरे साथ चार साल से रह रही औरत एक प्रेतनी है । तो फ़िर कुसुम कहां है ? तो क्या कुसुम लडकी नहीं एक प्रेत है ? कौन यकीन करेगा इस पर ? " " तुम । तुम । " वह मुझे लक्ष्य करता हुआ बोला । " तुम शायद यकीन कर लो । और तुम यकीन करो या ना करो । पर इस वीराने में तुम्हें अपनी दास्तान बताकर मेरे सीने का ये बोझ हल्का हो जायेगा...? "
दयाराम परतापुर का रहने वाला था । उसकी तीन शादिंया हो चुकी थी । पर शायद उसकी किस्मत में पत्नी का सुख नहीं था । दयाराम की पहली शादी पच्चीस बरस की आयु में राजदेवी के साथ हुयी थी । नौ साल तक उसका साथ निभाने के बाद राजदेवी का देहान्त हो गया । मरने से पूर्व सात साल तक राजदेवी गम्भीर रूप से बीमार ही रही थी और इसी बीमारी के चलते अंततः उसका देहान्त हो गया । राजदेवी के कोई संतान नहीं हुयी थी । पैंतीस बरस की आयु में दयाराम का दूसरा विवाह शारदा के साथ हुआ । शारदा से दयाराम को तीन बच्चों का बाप बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ । उनकी ग्रहस्थी मजे से चल रही थी कि एक दिन चौदह साल बाद शारदा भी बिजली के करेंट से चिपक कर मर गयी ।
जिस दिन शारदा मरी । उसका सबसे छोटा बच्चा दो साल का था । बीच का आठ साल का । और बडा ग्यारह साल का । दयाराम के सामने बच्चों के पालन पोषण की बेहद समस्या आ गयी । उसके घर में ऐसा कोई नहीं था । जो इस जिम्मेदारी को संभाल लेता । तब दयाराम की सास ने अपने धेवतों का मुख देखते हुये अपनी तीस साल की लडकी कुसुम जो शादी के सात साल बाद विधवा हो गयी थी । उसकी शादी फ़िर से दयाराम के साथ कर दी । यहीं से दयाराम की जिंदगी में अजीव भूचाल आना शुरू हो गया ?
विवाह के बाद दयाराम कुसुम को पहली बार जब बुलाने गया । तो मोटर साइकिल से गया था ।। उसके घर और ससुराल के बीच में लगभग एक सौ साठ किलोमीटर का फ़ासला था । लगभग सौ किलोमीटर का फ़ासला तय करते करते दोपहर हो गयी । दयाराम ने सुस्ताने और खाना खाने के विचार से मोटर साइकिल एक बगिया में रोक दी । घने वृक्षों से युक्त इस बगिया में एक कूंआ था । जिस पर एक रस्सी बाल्टी राहगीरों को पानी उपलब्ध कराने के लिये हर समय रखी रहती थी । बगिया से कुछ ही दूर पर बडे बडे तीन गड्डे थे । और कुछ ही आगे एक विशाल पीपल के पेड के पास एक बडी पोखर थी । थकान सा अनुभव करते हुये दयाराम का ध्यान इस विचित्र और रहस्यमय बगिया के रहस्यमय वातावरण की ओर नहीं गया । अलबत्ता खेतों हारों बाग बगीचों में ही अधिक घूमने वाली कुसुम को जाने क्यों ये बगिया बडी रहस्यमय सी लग रही थी । बगिया एक अजीब सा रहस्यमय सन्नाटा ओडे हुये जान पडती थी । उसके पेडों पर बैठे उल्लू और खुसटिया जैसे पक्षी मानों एकटक कुसुम को ही देख रहे थे । दयाराम खाना खाकर आराम करने के लिये लेट गया था । लेकिन कुसुम कई सालों बाद एक आदमी की निकटता पाकर शीघ्र सम्भोग के लिये उत्सुक हो रही थी । जब दयाराम ने बगिया में मोटर साइकिल रोकी थी । तभी उसने सोचा था । कि दयाराम ने ये निर्जन स्थान इसीलिये चुना है कि वो भी कुसुम के साथ सहवास की
इच्छा रखता है । क्योंकि बगिया के आसपास दूर तक गांव नहीं थे । और न ही वहां कोई पशु चराने वाले थे । अपने पति के मरने के बाद कुसुम सम्भोग सुख से वंचित रही थी । इसलिये आज दयाराम को दूसरे पति के रूप में पाकर उसकी सम्भोग की वह इच्छा स्वाभाविक ही बलबती हो उठी ।
पर उसकी इच्छा के विपरीत दयाराम लेटते ही सो गया और जल्दी ही खर्राटे लेने लगा । हालांकि कुसुम भी कुछ थकान महसूस कर रही थी । पर कामवासना के कीडे उसके अन्दर कुलुबुला रहे थे । जिनके चलते वह बैचेनी महसूस कर रही थी । अभी वह दयाराम से इतनी खुली नहीं थी कि उसे जगाकर सम्भोग का प्रस्ताव कर देती । उसने एक आह भरी और सूनी बगिया के चारों तरफ़ देखा ।
फ़िर हारकर वह एक पेड से टिककर बैठ गयी । और उसकी निगाह वृक्षों पर घूमने लगी । तब अचानक ही उसके शरीर में जोर की झुरझुरी हुयी और उसके समस्त शरीर के रोंगटे खडे हो गये । उल्लू जैसे वो छोटे छोटे पक्षी कुसुम को ही एकटक देख रहे थे । उनकी मुखाकृति ऐसी थी । मानों हंस रहे हों । उसने अन्य वृक्षों पर नजर डाली । वहां भी उसे एक भी सामान्य पक्षी नजर नहीं आया । सभी गोल मुंह वाले थे और एकटक उसी को देख रहे थे । पहली बार कुसुम को अहसास हुआ कि क्यों वो बगिया उसे रहस्यमय लग रही थी । वहां अदृश्य में भी किसी के होने का अहसास था । कोई था जो उसके आसपास था । बेहद पास । भयभीत होकर उसने दयाराम को पुकारा । पर वह जैसे मायावी नींद में सो रहा था । तभी कुसुम ने अपने स्तनों पर किसी का स्पर्श महसूस किया । वह बेहद घबरा गयी । अभी वह कुछ समझ पाती कि उसकी योनि को किसी ने छुआ । वह चिल्लायी । बचाओ । पर उसके मुंह से आवाज न निकली । तब उसका सिर चकराने लगा । और कोई उसे जोहड की तरफ़ खेंचकर ले जाने लगा । कुसुम की चेतना गहन अंधकार की गहराईयों में डूबती चली गयी ।
" फ़ंगत । " मेरे मुंह से अचानक निकल गया । " लोखटा ? "
दयाराम ने चौंककर मेरी तरफ़ देखा । वह अतीत से बाहर आ गया था । उसका नशा हल्का होने लगा था । मैंने एक सिगरेट जलायी और सिगरेट केस उसकी तरफ़ बडाया । सिगरेट सुलगाने के बाद उसने फ़िर एक निगाह शमशान पर डाली । पर वहां कोई नहीं था । पेंट में घुसी हुयी रिवाल्वर से उसे परेशानी हो रही थी । उसने रिवाल्वर निकालकर शिला पर रख दी । और सिगरेट के कश लगाता हुआ टहलने लगा । फ़िर मानों उसे कुछ याद आया । और वह बोला , " अभी अभी तुमने क्या कहा था । लोखटा ? "
यह एक तरह से मुझसे गलती हो गयी थी । मैं दयाराम को अपनी प्रेत जगत आदि की जानकारी का परिचय नहीं देना चाहता था । क्योंकि ऐसा होने पर वह उत्सुकता से अनेकों सवाल करता और सबसे बडी बात कलियारी कुटी वाला गुप्त स्थान जो इस पहाडी से महज चार फ़र्लांग दूर था । उस तरफ़ उसका ध्यान जा सकता था । और उस स्थिति में मुझे विशेष उपाय करने होते । अतः मैंने बात को घुमाते हुये कहा , " कुछ नहीं अभी अभी मुझे एक दुर्लभ जीव पास ही नजर आया था । पर मेरा ध्यान तुम्हारी बातों पर लगा था । खैर कोई बात नहीं जाने दो । फ़िर आयेगा । "
** फ़ंगत या लोखटा प्रेत की वो किस्म होती है । जो किसी अभिशप्त स्थान पर या इस्तेमाल न किये जाने वाले शमशान स्थल के आसपास ही रहती है । अब तक दयाराम की संगत में मैं बहुत कुछ जान गया था । कुछ घटना वह अपने दिमाग से अपनी जानकारी के अनुसार सुना अवश्य रहा था । पर कुछ रहस्य इसमें ऐसा भी था । जिसके बारे में दयाराम नहीं जानता था । दरअसल ना जानकारी में दयाराम एक अभिशप्त बगिया और अभिशप्त स्थान पर रुक गया था । जहां प्रेतवासा था । और पचास साठ या अस्सी साल पहले उस स्थान को शमशान के रूप में प्रयोग किया जाता होगा । बाद में कुछ घटनाएं ऐसी घटी होंगी । जिससे वो स्थान अभिशप्त या अछूत समझा जाने लगा होगा । इसी वजह से उसके आसपास आवादी नहीं थी । और इसी वजह से वहां पशु आदि चराने वाले नहीं थे । क्योंकि जो लोग प्रेतवासा के बारे में जानते होंगे । वह जानबूझकर आफ़त क्यों मोल लेंगे । इस तरह धीरे धीरे मनुष्य के दूर होते चले जाने से उस स्थान पर प्रेतों का कब्जा पक्का होता चला गया । और दयाराम कुसुम जैसे व्यक्ति अग्यानता में उसमें फ़ंसने लगे ।
पर मेरे दिमाग में और भी बहुत से सवाल थे । कुसुम पर प्रेत का आवेश हो जाना कोई बडी बात नहीं थी । लेकिन चार साल में उसने या प्रेत ने ऐसा क्या किया था जो दयाराम उसे मारने पर आमादा था । दयाराम को कैसे मालूम पडा कि कुसुम पर प्रेत था । उसने क्या इलाज कराया । और सबसे बडा सबाल दयाराम उसको मारना ही चाहता था तो घर पर आसानी से मार सकता था । वह इस वीराने में क्यों आया ? चार साल तक प्रेतनी का एक आदमी के साथ रहना मामूली बात नहीं थी । आखिर प्रेतनी कौन थी और क्या चाहती थी ? अगर प्रेतनी पूरी तरह कुसुम के शरीर का इस्तेमाल कर रही थी तो कुसुम इस वक्त कहां थी और किस हालत में थी ? ये ऐसे कई सवाल थे । जिनका उत्तर दयाराम और सही उत्तर कुसुम के पास था । पर कुसुम इस वक्त कहां थी ? ( क्रमशः )

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