गुरुवार, जुलाई 22, 2010

प्रेतनी का मायाजाल 3

लेखकीय -- प्रेत जगत पर आधारित मेरी कहानी " प्रेतनी का मायाजाल " आठ भागों में है । जो एक साथ ही प्रकाशित है । ये कहानी पाठकों की बेहद मांग पर लिखी गयी है ।
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बेहद सुहानी मगर बेहद रहस्यमय हो उठी रात धीरे धीरे अपना सफ़र तय कर रही थी । मैंने कलियारी कुटी की तरफ़ देखा । अगर दयाराम न आया होता तो मैं क्या कर रहा होता ? दयाराम अब भी टहल रहा था । उसने उत्सुकतावश शिला पर रखी टार्च की रोशनी पेड पर डाली । पेड नीबू और बेर के मिले
जुले आकार वाले फ़लों से लदा पडा था । ये गूदेदार मीठा फ़ल था । जो अक्सर मैं भूख लगने पर खा लिया करता था । कलियारी कुटी से पांच सौ मीटर दूर ऐसा ही एक अन्य वृक्ष था । जिस पर जामुन के समान लाल और बेंगनी चित्तेदार फ़ल लगते थे । ये फ़ल भी खाने में स्वादिष्ट थे । पर ये एक चमत्कार की तरह कलियारी विलेज और अन्य गांव वालों से बचे हुये थे । क्योंकि पहाडी के नीचे का इलाका किसी प्रेत शक्ति ने बांध रखा था । और कलियारी कुटी को किसी तपस्वी की आन लगी हुयी थी । ऐसी हालत में सामान्य मनुष्य यदि इधर आने की कोशिश करता तो उसे डरावने मायावी अनुभव हो सकते थे । जैसे अचानक बडे अजगर का दिखाई दे जाना । अचानक किसी हिंसक जन्तु का प्रकट हो जाना । अचानक कोई रहस्यमयी आकृति का दिखाई देना । वर्जित क्षेत्र में कदम रखने वाले को तेज चक्कर आने लगना । आदि जैसे कई प्रभाव हो सकते थे । जिससे आदमी घबरा जाता है और ऐसी जगहों पर आना छोड देता है । ये वास्तविकता दयाराम भी नहीं जानता था कि वो मेरे होने से इतनी देर यहां टिक सका था । वरना शिकारी खुद ही शिकार हो जाना था । प्रेतों के लिये रिवाल्वर का भला क्या महत्व था ? अचानक दयाराम चौकन्ना हो उठा । मैं रहस्यमय अन्दाज में मुस्कराया । दयाराम ने फ़ुर्ती से रिवाल्वर उठा ली और सतर्कता से इधर उधर देखने लगा । मैं जानता था कि उसके रोंगटे खडे हो चुके हैं । और निकट ही वह किसी की प्रेत की उपस्थिति महसूस कर रहा है । जिसका कि चार साल के अनुभव में वह अभ्यस्त हो चुका था । वास्तव में उस वक्त वहां दो प्रेत पहाडी के नीचे मौजूद थे । जो मुझे स्पष्ट दिखाई दे रहे थे । उनमें से एक औरत अंगी था । जो शायद कुसुम थी । और दूसरा पुरुष अंगी था । हालांकि मैं " कवर्ड " स्थिति में था फ़िर भी वे ऊपर नहीं आ रहे थे । इसके दो कारण थे । एक तो ऊपर वाला इलाका लगभग आन के क्षेत्र में आता था । जहां प्रेत क्या यक्ष
किन्नर गंधर्ब डाकिनी शाकिनी जैसी शक्तियां भी घुसने से पहले सौ बार सोचती । दूसरे मैं भले ही कवर्ड ( उच्च स्तर के तान्त्रिक साधक अपने को एक ऐसे अदृष्य कवच में बन्द कर लेते हैं जिससे उनकी असलियत का पता नहीं चलता । उच्च स्तर के महात्मा साधु संत प्रायः इस तरीके को अपनाते हैं जो किन्ही अग्यात कारणोंवश बेहद आवश्यक होता है । ) था । पर उस स्थिति में भी वे एक अनजाना भय महसूस कर रहे थे । उन्हें खतरे की बू आ रही थी । मैं दयाराम को और अधिक डिस्टर्ब नहीं होने देना चाहता था । इस तरह मेरा कीमती समय नष्ट हो सकता था । मैंने उसकी निगाह बचाते हुये एक ढेला उठाया । और फ़ूंक मारकर प्रेतों की और उछाल दिया । मुझे इसकी प्रतिक्रिया पहले ही पता थी । प्रेत अपने अंगो में जबरदस्त खुजली महसूस करते हुये तेजी से वहां से भागे । उनका अनुमान सही था । पहाडी पर उनके लिये खतरा मौजूद था । और वे अब लौटकर आने वाले नहीं थे । कुछ ही देर में दयाराम सामान्य स्थिति में आ गया । वह फ़िर से पत्थर की शिला पर बैठ गया । और बैचेनी से अपनी उंगलिया
चटका रहा था । एक खुशहाली की खातिर । अपने बच्चों की सही परवरिश की खातिर उसने तीसरी बार शादी की थी और उस शादी ने उसके पूरे जीवन में आग लगा दी थी । पर वह कुछ भी तो नहीं कर सका । क्या करता बेचारा ?
" फ़िर । " उसका ध्यान अपनी तरफ़ आकर्षित करते हुये मैंने पूछा , " उसके बाद क्या हुआ ? "
बगिया में सोया हुआ दयाराम अचानक हडबडाकर उठा । उसने कलाई घडी पर नजर डाली तो तीन बजने वाले थे । यानी ढाई घन्टे वह एक तरह से घोडे बेचकर सोया था । उसे हैरत थी । ऐसी चमत्कारी नींद अचानक उसे कैसे आ गयी थी ? वह तो महज आधा घन्टा आराम करने के उद्देश्य से लेट गया था । मगर लेटते ही उसकी चेतना ऐसे लुप्त हुयी । मानों किसी नशे के कारण बेहोशी आयी हो । पर वह नींद में भी नहीं था ? अपनी उसी अचेतन अवस्था में वह एक घनघोर भयानक जंगल में भागा चला जा रहा था । जंगल में रहस्यमयी पीला काला अंधकार छाया हुआ था । आसमान और उजाला कहीं नजर नहीं आ रहा था । चारों तरफ़ वृक्ष ही वृक्ष थे । उन वृक्षों के बीच में छोटे छोटे मंदिर बने हुये थे । दयाराम को ऐसा लग रहा था कि कुछ अग्यात लोग उसके पीछे पडे हुये हैं । जो उसको मार डालना चाहते हैं । बस उन्हीं से बचने को वह भाग रहा था । अचानक भागते में ही वह एक पेड की झुकी डाली से टकराया और गिर पडा । बस इसके बाद उसे कुछ याद नहीं रहा । दयाराम ने एक बैचेन दृष्टि कुसुम की तलाश में इधर उधर दौडाई । वह गुमसुम सी एक पेड के नीचे बैठी थी । मानों औरत के स्थान पर एक जिंदा लाश हो ? वह अपलक आंखो से कुंए की ओर देख रही थी । दयाराम ने उसे पुकारा और आगे की यात्रा के लिये तैयार हो गया । वह मशीनी अन्दाज में मोटर साइकिल की सीट पर बैठ गयी ।
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दयाराम के तीनों बच्चे मौसी को मां के रूप में पाकर बेहद खुश थे । दयाराम अपने लम्बे चौडे घर में अकेला ही रहता था । शारदा के मरने के बाद उसने एक नौकर रख लिया था । जो उसके तीनों बच्चों और गाय बकरी आदि पशुओं की देखभाल करता था । दयाराम का यह पुश्तैनी मकान काफ़ी बडी जगह में बना हुआ था । जिसमें बडे बडे बाईस कमरे थे । इसके अतिरिक्त बाहर गली पार करके पशुओं के लिये एक अहाता था । और बारह कमरों का एक स्कूल बना हुआ था । जो अब बन्द था लेकिन दयाराम की सम्पत्ति था । दयाराम के एकदम बगल वाला घर किसी व्यवसायी का था । जिसे वह गोदाम के रूप में इस्तेमाल करता था । और उसमें कोई रहता नहीं था । इसी तरह दूसरी साइड में भी लगभग आठ सौ मीटर की जगह खाली पडी थी । कुल मिलाकर दयाराम की वह विशाल हवेली आवादी के लिहाज से लगभग अकेली ही थी । कुसुम के शादी के बाद घर में पहली बार पैर रखते ही एक अजीव सा रहस्यमय वातावरण सृजित हो गया । जिस पर अनजाने में ही दयाराम का ध्यान नहीं गया । उस रात ही पहली बार दयाराम ने जब कुसुम से सम्भोग किया तो उसे कुसुम में एक अजीव सी ताकत का अहसास हुआ । वह पहले ही सम्भोग में शरमाने के बजाय निर्लज्ज सा व्यवहार कर रही थी । दो तीन बार उसने दयाराम को वहशी की तरह
दबोच लिया था । दयाराम ने सोचा । कुसुम साली होने के नाते खुली हुयी है और अपनी ताकत दिखा रही है । उसे कुछ अजीव सा तो लगा पर तत्काल ही कोई बात उसकी समझ में नहीं आयी । अगली सुबह सब कुछ सामान्य था । कुसुम ने बडी दक्षता से घर संभाल लिया था और चुहलबाजी करती हुयी एक नयी पत्नी की तरह व्यवहार कर रही थी । दयाराम ने राहत की सांस ली । उसकी उजडी ग्रहस्थी फ़िर से बस चुकी थी ?
दयाराम ज्यादातर दिन भर घर से बाहर खेतो पर ही रहता था । इसलिये अगले ढाई साल तक वह अपने घर में फ़ैल चुके मायाजाल को नहीं जान सका था । हालाकि उसे कुछ था जो अजीव लगता था । पर वो कुछ क्या था । यह उसकी समझ से बाहर था । इन ढाई सालों में कुसुम के दो बच्चे हुये जो तीन चार महीने की अवस्था होते ही रहस्यमय तरीके से मर गये । कुसुम का व्यवहार अजीव था । इसका जिक्र उसके दोनों बडे बच्चों ने और उसके नौकर रूपलाल ने भी किया था । बच्चों के स्कूल जाते ही घर अकेला होते ही वह एकदम नंगी हो जाती थी और ज्यादातर नंगी ही रहती थी । उसे पानी के सम्पर्क में रहना बहुत अच्छा लगता था । गर्मियों में वह चार बार तक और सर्दियों में दो बार नहाती थी । दयाराम उससे सम्भोग करे या ना करे । वह रात में निर्वस्त्र ही रहती थी । दयाराम के पूछने पर उसने कहा कि कपडों में वह घुटन महसूस करती है । एक अजीव बात जिसने दयाराम को सबसे ज्यादा चौंकाया था । कि उसने अपने बच्चों को स्तनपान नहीं कराया । इसका कारण उसने यह बताया कि उसकी छातिंयो में दूध उतरता नहीं है । रूपलाल के इशारा करने पर दयाराम ने गौर किया कि वह पलक नहीं झपकाती । अर्थात उसकी आंखे किसी पत्थर की मूर्ति की तरह अपलक ही रहती हैं । रूपलाल ने यह भी बताया कि
कभी वो गलती से उसकी नंगी हालत में घर में आ गया तो भी उसने कपडे पहनने या कमरे में जाने की कोशिश नहीं की । रूपलाल बाहर स्कूल में रहता था इसलिये काम पडने पर ही घर में आता जाता था । ढाई साल बाद इस तरह के अजीव समाचार सुनकर दयाराम मानों सोते से जागा । जिन बातों को वह अब तक नजर अन्दाज कर रहा था । उनके पीछे कोई खतरनाक रहस्य छिपा हुआ था । यानी पानी सिर से ऊपर जा रहा था । वह अपने बच्चों की खातिर चिंतित हो उठा । जाने क्यों उसे अपनी ये हवेली रहस्यमय और खतरनाक लगने लगी । उसे एक अदृश्य मायाजाल का अहसास होने लगा । यही सोच विचार करते हुये उसने घर में अधिक समय बिताने का निश्चय किया । और तब उसने दो स्पष्ट प्रमाण देखे ।
पहला जब वह बाथरूम के शीशे के सामने शेव कर रहा था । सुमन उसके ठीक पीछे आकर खडी हो गयी । उसके पुष्ट उरोज दयाराम की पीठ से सटे हुये थे । और उसके दोनों हाथ दयाराम के " अंग " को खोज रहे थे । पर ..? पर शीशे में उसकी कोई आकृति नहीं थी जो कि उस बडे आकार के शीशे में निश्चित होनी चाहिये थी । दयाराम इस रहस्य को अपने दिल में ही छुपा गया । उसने कुसुम से कुछ नहीं कहा । लेकिन अब वह कुसुम से मन ही मन भयभीत रहने लगा । खास तौर पर वह अपने छोटे छोटे बच्चों के लिये चिंतित हो उठा था ।
दूसरा प्रमाण भी उसे जल्दी ही मिल गया । वह दोपहर के टाइम छत पर था । जब सुमन सूखे कपडे उतारने छत पर आयी । दयाराम और कुसुम एक ही स्थिति में खडे थे । लेकिन सूर्य की रोशनी में छाया सिर्फ़ दयाराम की बन रही थी । कुसुम किसी भी कोण से खडी हो । उसकी छाया नहीं बन रही थी । उफ़ ! दयाराम के पूरे शरीर में अग्यात भय की सिहरन हो उठी । उसके जैसा हिम्मती जिगरवाला भी कांप उठा । " भूतनी..? " कुसुम तो औरत के रूप में प्रेत थी ? वह अब तक एक प्रेतनी के साथ रह रहा था । कुसुम नीचे चली गयी । तो दयाराम कुसुम के साथ गुजारे अपने जिंदगी के क्षणों में वह रहस्य खोजने की कोशिश करने लगा । जब जब उसने कुसुम में कोई अजीब बात देखी हो । एक हिसाव से सभी बातें अजीव थी लेकिन उन्हें किसी औरत का विशेष स्वभाव मानों तो कुछ भी अजीव नहीं था ।
" हे भगवन । " उसने असमंजस में माथा रगडा , " तेरे खेल कितने अजीव हैं । तेरे खेल कितने न्यारे हैं । इसको भला तेरे अलावा कौन समझ सकता है ? "
( क्रमशः )

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