गुरुवार, जुलाई 22, 2010

प्रेतनी का मायाजाल 4

लेखकीय -- प्रेत जगत पर आधारित मेरी कहानी " प्रेतनी का मायाजाल " आठ भागों में है । जो एक साथ ही प्रकाशित है । ये कहानी पाठकों की बेहद मांग पर लिखी गयी है ।
****
धीरे धीरे रात के बारह बज गये । दयाराम की बात सच थी । मुझे अपनी कहानी सुनाते सुनाते वह अपने आपको काफ़ी हल्का महसूस कर रहा था । और लगभग भूल ही गया था । कि वह यहां किस उद्देश्य से आया था ? अब वह बार बार चरस की भरी सिगरेट भी नहीं पी रहा था । रिवाल्वर की तरफ़ तो उसका ध्यान ही नहीं था । ये शायद चार सालों से उसके मन में भरा हुआ गुबार निकलने से हुआ था । ठंडी रात और खुला आसमान भी उसको राहत पहुंचा रहे थे । उसकी आधी कहानी मेरी समझ में आ रही थी । आधी को लेकर मैं भी उलझन में था । भूतिया किस्सों में चित्र विचित्र घटनाओं का होना कोई मायने नहीं रखता । पर एक आदमी के लिये वह एक अदभुत तिलिस्म से कम नहीं होता । वास्तव में वह एक तिलिस्म ही होता है । मायाजाल । ये भी एक मायाजाल था । एक प्रेतनी का मायाजाल ।
" फ़िर । " मैंने उत्सुकता से पूछा , " उसके बाद तुमने क्या किया । जब तुम्हें यह पता चला कि बीबी के नाम पर तुम्हारे साथ रह रही औरत कुसुम नहीं बल्कि एक प्रेत है ? "
" मैं क्या करता । " वह अजीब भाव से बोला , " मैं तो अभी ये ही तय नहीं कर पाया था कि वो कौन है ? उसका रहस्य क्या है । कुसुम कहां चली गयी । ये कहना भी बेबकूफ़ी थी क्योंकि थी तो वो कुसुम के शरीर में ही । आखिर वो प्रेतनी कौन थी क्या चाहती थी । ये अनेकों प्रश्न प्रसून मेरे सामने थे । पर इनका जबाब कौन देता ? कहां से लाता मैं इनका जबाब । पर नहीं । ये गलत है । हर प्रश्न का उत्तर है । हर समस्या का समाधान है । वो अगर दर्द देता है तो दवा भी देता है । वो अगर मुसीवत भेजता है । तो हल भी भेजता है । और फ़िर एक दिन " दवा " आयी । "
कुसुम के प्रेत होने के दो प्रमाण मिल जाने के बाद एक दिन सुबह दस बजे दयाराम अपने बन्द स्कूल के सामने बरगद के पेड के नीचे कुर्सी डालकर बैठा था । अब उसके दिमाग में यही द्वंद चलता रहता था । कि इस नयी स्थिति में क्या किया जाय । क्या न किया जाय । वह अपनी समस्या को लेकर तीन अलग अलग तान्त्रिकों से भी कुसुम से छिपाकर मिल चुका था । उन्होंने कुछ गंडा ताबीज बना दिये थे । और कुछ उपाय बताये थे । कि कुसुम के ऊपर सोते में यह भभूत छिडक देना । प्रसाद के बहाने पेडे में उसको यह " विशेष लोंग " खिला देना । यहां अगरबत्ती लगाना । वहां ये धागा बांधना । पर इन उपायों से कोई लाभ नहीं हुआ । तब चिंतित दयाराम रूपलाल के बताये अनुसार हनुमान जी की विशेष पूजा करने लगा । इससे वह अपनी मानसिक स्थिति में कुछ शांति तो महसूस करता पर कुसुम में कोई परिवर्तन नहीं हुआ । तब मानों एक दिन भगवान ने उसकी सुनी । कुर्सी पर बैठा हुआ दयाराम उस समय चौंका । जब गली से गुजरता हुआ एक जटाधारी बाबा उसकी हवेली के सामने रुक गया । और बडे चकित भाव से उसकी हवेली को ऊपर से नीचे तक बार बार देखने लगा । दयाराम ने उसको रोकने टोकने का कोई यत्न नहीं किया । वह बेहद दिलचस्पी से जटाधारी को देख रहा था । जटाधारी ने थैले में से कुछ बीज से निकाले और एक बार गली में इधर उधर देखा । दयाराम शीघ्रता से बरगद के मोटे तने के पीछे छुप गया । गली को एकदम सूना पाकर जटाधारी ने उन बीजों को मुठ्ठी बांधकर मन्त्र सा पडते हुये फ़ूंका । और हवेली के गेट की तरफ़ उछाल दिया ।
आश्चर्यजनक रूप से दो मिनट के अन्दर कुसुम हवेली के गेट पर आकर खडी हो गयी । उसके ब्लाउज के सभी हुक खुले हुये थे और ब्रा तो वह पहनती ही नही थी । उसकी आंखे छोटे बल्ब के समान चमक रहीं थी । वह जलती हुयी आंखों से जटाधारी को घूर रही थी । दयाराम ने सुना । जटाधारी कह रहा था । तो तू है । पूरा अड्डा है प्रेतों का । ए कुलटा तेरा आदमी कहां है ? कुसुम ने भडाक से दरबाजा बन्द कर दिया । मानों जटाधारी के मुंह पर मारा हो । जटाधारी हो हो करके हंसने लगा । और कुछ सोचता हुआ सा आगे बड गया ।
उसके थोडा आगे बडते ही दयाराम बरगद के पीछे से निकलकर दौडते हुये जटाधारी के सामने पहुंचा और हाथ जोडकर खडा हो गया । दयाराम ने बताया कि वह हवेली का मालिक है । और फ़िर संक्षिप्त में बात बताने के बाद वह जटाधारी को स्कूल के अन्दर ले गया । यहां कुसुम कभी नही आती थी । फ़िर भी एतिहयात बरतते हुये उसने अन्दर से दरबाजा बन्द कर लिया । रहस्यमय जटाधारी कुर्सी पर बैठ गया । और स्कूल में नजर घुमाने लगा । दयाराम आगे की बात । कुसुम का रहस्य जानने को बैचेन था । उसने जटाधारी को पूरी बात शूरू से आखीर तक बतायी और फ़िर हाथ जोडकर बोला , " महाराज ये सब क्या घनचक्कर है ? मैं तो तंग आ गया । "
जटाधारी मध्यम स्तर का तान्त्रिक था । और सबसे अच्छी बात थी कि वह स्वभाव का एकदम सच्चा था । वह फ़रुर्खाबाद के निकट कायमगंज का रहने वाला था । और इस वक्त चम्बल के बीहडों में काली नदी के किनारे एक गुप्त स्थान पर साधना कर रहा था । वह बाबा मूलचन्द के नाम से जाना जाता था । और बस्ती में बहुत कम आता जाता था । उसने दयाराम को बताया कि हवेली में तीन प्रेत रहते हैं । जो कुसुम पर आवेशित रहते हैं । लेकिन लगभग तीन साल से तीन प्रेतों से आवेशित वह औरत कैसे जिंदा है । यह उसके लिये भी हैरत की बात थी । उन प्रेतों से उसको बचाना उसके लिये संभव न था । उसकी तान्त्रिक शक्ति अभी उस स्तर पर नहीं पहुंची थी । यह काम उसके गुरु कर सकते थे । पर उसके गुरु उससे आसाम जाने की कहकर गये थे । और तबसे उनका कोई पता नहीं था । ये भी निश्चित नहीं था कि वो कब लौटेंगे । हां उसने तत्काल ही पांच अभिमन्त्रित ताबीज भरे । जो उसके तीन बच्चों के लिये । एक उसके लिये । एक रूपलाल के लिये था । इन ताबीजों से प्रेत उन लोगों का कोई विशेष अहित नहीं कर सकते थे । यह बात बाद में सच साबित हुयी । उसने कुछ और उपाय । कुछ और जरूरी
बातें दयाराम को बतायी । और वहां से विदा हो गया । जटाधारी बाबा से एक तरह से उसे कोई राहत नहीं मिली थी । और एक तरह से बहुत कुछ मिला था । उसकी समस्या ज्यों की त्यों मौजूद थी । पर वह और उसके बच्चे प्रेत के प्रभाव से रक्षित हो गये थे । यही बहुत बडी बात थी । जटाधारी उसका और कुछ भला भले ही न कर सका हो । पर उसे एक विशेष कवच बनाकर दे गया । जिसके होते कोई भी बडी से बडी प्रेत शक्ति न उसको डरा सकती थी और न ही हमला कर सकती थी । ( अब मुझे उसके निडरता से इस स्थान पर होने और प्रेतों से लडने के हौसले का राज पता चल गया । ये बात किसी हद तक तो सच थी । लेकिन पूरी तरह नहीं । मूलचन्द बाबा शायद उसको ये साबधान करना भूल गया । कि ये कवच बस्ती जैसे स्थानों पर ही कारगर होता है । प्रेतों के क्षेत्र में पहुंचकर " अछूत " जगह की वजह से कवच की शक्ति मामूली रह जाती है । और किसी गलती के हो जाने पर कवच
खन्डित भी हो सकता था । और ऐसी हालत में दयाराम की मौत भी हो सकती थी । पर किसी उलझी हुयी समस्या से लगातार परेशान आदमी का दिमाग प्रतिशोध की अवस्था में पहुंच जाता है । और वह मरने मारने पर उतारू हो जाता है । )
पर यह कैसा प्रतिशोध था । और किससे था । यह ठीक से उसकी भी समझ में नहीं आ रहा था । और अदृश्य़ की इस लडाई को लडते हुये दयाराम को कुसु्म की शादी के बाद के तीन साल गुजर गये । और तब कुसुम की आदतों में नये बदलाब होने लगे । वह साधारण औरत से मदमस्त औरत में बदल गयी । दयाराम ने कभी जिक्र नहीं किया था कि वह जानता है कि वो औरत न होकर एक प्रेतनी है । इस तरह के जिक्र से उसे क्या लाभ होना था ? और ढाई साल के बाद तो वह इस हकीकत से ठीक से वाकिफ़ ही हुआ था । अगले छह महीने उसने समाधान खोजने और क्या करना चाहिये । क्या नहीं करना चाहिये । जैसी कशमकश में गुजारे थे । और अब अपनी एक रिश्ते की ताई के सुझाव अनुसार कुसुम को किसी तरह से बालाजी ले जाने की फ़िराक में था । कहते हैं न ऊंट खो जाता है तो परेशान आदमी उसको लोटे में भी खोजने की कोशिश करता है ।
लेकिन दयाराम उसको बालाजी ले जा पाय । उससे पहले ही वह एक मदमस्त हस्तिनी औरत की भांति बेकाबू हो उठी । कामवासना को लेकर उसमें जबरदस्त चेंज हुआ और वह हर वक्त कामातुर सी रहने लगी । वह रात में सोते हुये दयाराम को जबरन ही उठा लेती और बलपूर्वक सम्भोग का आदेश सा देती । हैरत की बात थी कि उस वक्त उसके आदेश में जाने क्या सम्मोहन होता कि दयाराम उसका आदेश पालन करने पर विवश हो जाता । और इस तरह वह एक एक रात में चार बार सम्भोग मांग करने लगी । दूसरी बात ये हुयी कि अच्छे खाने पीने से बना दयाराम का हट्टा कट्टा शरीर तेजी से कमजोर होने लगा । अब दयाराम भी धीरे धीरे प्रेत भाव से आवेशित हो रहा था । लेकिन मामला यहीं पर शांत नहीं हुआ । कुसुम एक नया खेल खेलने लगी । वह अक्सर रात को ग्यारह बारह बजे उठती और दरबाजा खोलकर अहाता पार करते हुये दूसरी गली में छलांग लगाकर कूद जाती और उस रास्ते पर तेजी से दौड लगा देती । जहां " मिंयां भीका " नाम का कब्रिस्तान था । यह बात दयाराम को उस दिन
पता चली । जब रात में कुसुम अपने बिस्तर से गायब थी । उसने चारों तरफ़ देखा । पर उसका कोई पता नहीं था । बैचेनी से सिगरेट फ़ूंकता हुआ वह उसके लौटने का इंतजार करता रहा । इंतजार करने क अलावा वह कर भी क्या सकता था ? उस रात कुसुम साडे तीन बजे लौटी और चुपचाप लेटकर सो गयी ।
दयाराम के लिये ये नया टेंशन था कि कुसुम आखिर रात को कहां जाती है । वह समझ नहीं पा रहा था कि ऐसे अजीव हालातों में उसे क्या करना चाहिये ? उपाय पूछे तो किससे पूछे । और इसका उपाय भला क्या हो सकता था । आखिर में उसने कुसुम का पीछा करने का निश्चय किया । और इस खेल को खत्म करने का निश्चय किया । उसने बरसों से बेकार रखा रिवाल्वर निकालकर चेक किया और गोलियां डालकर फ़ायर आदि करके संतुष्ट हो गया । अब उसे इस बात का इंतजार था कि कुसुम रात मे किसी सुनसान स्थान पर पहुंचे । जहां वो गोली मारकर उसकी हत्या कर दे और लाश ठिकाने लगा दे । उफ़ ।
पागलपन में आदमी पता नहीं क्या क्या सोचता है । जो भी हो वह इस औरत से तंग आ गया था । यह प्रेतनी हो । या कुसुम हो । या कोई भी हो । हर हालत में उससे छुटकारा पाना था । तभी वह चैन की जिंदगी जी सकता था । आखिर उसने कुसुम की हत्या का पक्का निश्चय कर लिया । ( क्रमशः )

कोई टिप्पणी नहीं:

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...