गुरुवार, जुलाई 22, 2010

प्रेतनी का मायाजाल 5

लेखकीय -- प्रेत जगत पर आधारित मेरी कहानी " प्रेतनी का मायाजाल " आठ भागों में है । जो एक साथ ही प्रकाशित है । ये कहानी पाठकों की बेहद मांग पर लिखी गयी है ।
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रात और अधिक गहरा चली थी । अपनी कहानी सुनाते सुनाते दयाराम भावुक हो उठा था । जिंदगी की अजीव और रहस्यमय परिस्थियों ने इस धनी सम्पन्न और जीवट इंसान को लगभग तोडकर रख दिया था । वह अपने मासूम बच्चों का मुंह देखकर हार जाता था । वरना तो वह गोली मारकर कब का इस भूतनी का खेल खत्म कर चुका होता । पर उसके सामने और भी सवाल थे । वह अपनी सास को क्या बताता । वह समाज को क्या बताता । दूसरे उसे खुद यह रहस्य मारे डाल रहा था कि अच्छी भली कुसुम आखिर प्रेत कैसे बन गयी ? वह जब अपनी ससुराल जाता था । वो एक सामान्य औरत की तरह व्यवहार करती । उससे जीजा जीजा कहकर खूब हंसी मजाक करती । उस समय उसमें ऐसी कोई बात नहीं थी । पहली विदा के समय बगिया में जो अजीव स्वप्न सा उसने देखा था । उसका क्या रहस्य था । ये कुछ ऐसे सवाल थे । जो उसे जीने पर मजबूर कर रहे थे । लडने पर मजबूर कर रहे थे । वरना तो ऐसी जिंदगी से वह अब मर जाना ही चाहता था । इस प्रेतनी का उद्देश्य क्या था । और ये कौन थी । जिसने उसकी हंसते खेलते घर को आग लगाकर रख दी थी ।
***आखिर दयाराम ने रात में उसका पीछा करने का निश्चय किया । और भरी हुयी रिवाल्वर के साथ वह इंतजार करने लगा कि कब वह रात को बाहर जाय । इंतजार की आवश्यकता ही न पडी । कुसुम लगभग हर रात ही बाहर जाती थी । रात के बारह बजते ही कुसुम उठी । और दयाराम पर एक दृष्टि डालकर घर से बाहर निकल गयी । दयाराम बेहद फ़ुर्ती से उठा । उसने रिवाल्वर खोंसा । और अहाते में आ गया । जहां कुसुम बाउंड्रीबाल के पास खडी सडक की तरफ़ देख रही थी । मानों किसी का इंतजार कर रही हो । और फ़िर वह बेहद फ़ुर्ती से दीवाल पर चडकर लहराई और सडक पर कूद गयी । दयाराम अपनी पूर्ण शक्ति से उसका पीछा कर रहा था । लेकिन वह मानों चल न रही हो । हवा में उड रही हो । दयाराम के लिये उसका पीछा करना मुश्किल हो रहा था । कुछ ही देर में उसने बस्ती छोडकर पीपराघाट का रास्ता पकड लिया । और दयाराम एकदम चकरा गया । उस सडक पर जो पीपराघाट से नदी के पार वीरान टेकरी पर ले जाती थी । उसकी गति और भी बड गयी । और फ़िर मानों वह उडन छू हो गयी ।
दयाराम को दूर दूर तक वह नजर नहीं आयी । दाता क्या माजरा था । उसकी अच्छी तरह से समझ में आ गया था । कि उसकी चाल इंसानी चाल हरगिज नहीं थी । और कोई भी इंसान इंसानी गति से उसे कभी नहीं पकड सकता था । उसका ये मन्सूबा भी फ़ेल हो गया था । कि आखिर ये कहां जाती है और क्या करती है । दयाराम का मन हुआ कि इन अजीब परिस्थितियों में अपने बाल नोच ले ।
आखिरकार दयाराम को इस समस्या का हल भी मिल गया । मंगलवार की शाम जब वह हनुमान मन्दिर पर प्रसाद चडाने गया । उसे मन्दिर के बाहर दो बुजुर्ग आदमी बात करते हुये मिले जो किसी पिलुआ वाले सिद्ध अघोरी की बात कर रहे थे । जो यमुना के खादरों में रहता था और रात के दस बजे के बाद ही मिलता था । दयाराम ने उन आदमियों से पिलुआ का सही पता पूछा और उसी रात पिलुआ पहुंचा । यह अच्छा था कि खादर होने के बाद भी मोटर साइकिल आराम से वहां तक जाती थी । पिलुआ पहुंचकर दयाराम को बेहद आश्चर्य हुआ । वो जानता था कि अकेला वही प्रेत समस्या से जूझ रहा है । जबकि वहां इस तरह की समस्या और अन्य समस्याओं वाले लगभग चालीस लोग मौजूद थे । जिनमें आठ महिलाएं भी थी । दयाराम का नम्बर रात दो बजे सबके बाद आया । अघोरी ने बडे शान्त होकर उसकी बात सुनी । वह थोडा चिंतित भी दिख रहा था । फ़िर अघोरी ने अपनी विधा का उपयोग करते हुये बताया कि कुसुम रात को अक्सर तीन स्थानों पर ही जाती है । काली टेकरी । पलेवा मन्दिर जो खन्डित हो चुका था और कलियारी शमशान । जिसमें कलियारी शमशान वह अधिक जाती थी । अघोरी ने बताया कि कुसुम पूरी तरह प्रेत ग्रस्त हो चुकी है । और यदि वह यहां गद्दी पर आ जाय तो वह उसकी कुछ सहायता करसकता था । वरना वह घर में नहीं जा सकता था । दयाराम ने बहुत उसके हाथ पैर जोडे । पर अघोरी ने कहा कि वह मजबूर है । दूसरे अघोरी ने एकरहस्यमय बात ये भी कही कि कुसुम के प्रेत बाधा से मुक्त हो जाने पर भी कोई लाभ नहीं होने वाला था क्योंकि.....?
पिलुआ पहुंचने का एक सबसे बडा लाभ दयाराम को ये हुआ कि अघोरी के पास किसी श्रद्धालु का दिया हुआ मोबायल फ़ोन था । जिसके जरिये वह कभी भी अघोरी से बात कर सकता था और इसका खास फ़ायदा उसे ये मिलने वाला था । कि अघोरी बाबा उसे एन टाइम पर बता सकता था । कि कुसुम उस वक्त कहां है ? उसने कुसुम का फ़ोटो बाबा के पास जमा कर दिया । उसे अघोरी की रहस्यमय बातें समझ में नहीं आ रही थी । अघोरी ने उसे प्रेत बाधा से मुक्त कराने में कुछ खास रुचि नहीं दिखाई थी । अघोरी को ऐसा क्या राज पता चला । जिसके बाद वह कुसुम के मामले से उदासीन हो गया था । दयाराम पागल सा होने लगा । गुत्थी सुलझने के बजाय दिन पर दिन उलझती ही जा रही थी । फ़िर अगले मौके पर दयाराम ने जो देखा । उससे उसका दिमाग ही घूमकर रह गया । अघोरी ने फ़ोन पर बताया कि आज रात एक बजे कुसुम काली टेकरी पर जायेगी । बाबा की बात आजमाने
के उद्देश्य से दयाराम कुसुम का पीछा करने के स्थान पर काली टेकरी से पहले ही एक स्थान पर जाकर छुप गया । उस समय रात के बारह बजने वाले थे । दयाराम सशंकित ह्रदय से कुसुम का इंतजार कर रहा था । ठीक पौन बजे कुसुम एक हवा के झोंके के समान आयी । वह एकदम नंगी थी । कुछ देर तक इधर उधर देखने के बाद वह चिता जलने के स्थान पर लोटने लगी । दयाराम के दिमाग में मानों भयंकर विस्फ़ोट हुआ । कुसुम गायब हो गयी थी और अब उसके स्थान पर एक लोमडी और सियार के मिले जुले रूप वाला छोटा जानवर नजर आ रहा था । दयाराम का दिमाग इस दृश्य को देखते ही मानों आसमान में चक्कर काटने लगा । अब वह सोचने समझने की स्थिति में नहीं था । उसने रिवाल्वर निकाला और जानवर को लक्ष्य करके फ़ायर कर दिया । मगर जानवर तो अपने स्थान से गायब हो चुका था ।
मैं ( प्रसून ) एक झटके से उठकर खडा हो गया । ये आदमी वाकई मुसीवत में था । मेरे अनुमान से ज्यादा मुसीवत । अब मैं समझ गया कि अघोरी ने उसकी सहायता से क्यों इंकार कर दिया था ? शिव के नाम की बात करने वाले अक्सर अघोरी वास्तव में " मसान " पूजक होते है । और ये आसानी से मसान को सिद्ध कर छोटे मोटे चमत्कार दिखाते हैं । दयाराम ने कुसुम के द्वारा जो रूप बदलने की बात कही थी और जिस तरह रूप बदलने की बात कही थी । वह मसान का ही काम था । इस तरह अघोरी मसान से प्रभावित उस परिवार को नहीं छुडा सकता था । क्योंकि वे खुद ही ज्यादातर मसान से काम लेते हैं और ऐसी स्थिति में मामला बिगड सकता था । अतः यह अघोरी के बस का मामला था ही नहीं । और इसीलिये जटाधारी जैसा छोटा साधक कोई भी " पंगा " लिये बिना ही निकल गया ।
" कंकाल कालिनी विधा " और " हाकिनी विधा " ये दो विधा या एक तरह से सिद्धियां होती हैं । कंकाल कालिनी में अकाल मृत्यु को प्राप्त लोगों की आयु को साधक अपनी या किसी की आयु में बदल सकता है । इसी की निकटवर्ती हाकिनी विध्या होती है । जिसमें हजारों मील दूर की बात जानी जा सकती है । हजारों मील दूर बैठे व्यक्ति को बुलाया जा सकता है । आम आदमी को ये जादू जैसे चमत्कार करने वाली विध्याएं बहुत आकर्षित करती हैं । पर इनका मोल बहुत चुकाना होता है और इनका अंत तो निश्चय ही पतनकारक होता है । मेरे दृष्टिकोण से साधारण मन्दिरों में की जाने वाली भक्ति इससे कहीं ज्यादा अच्छी होती है । द्वैत की सही साधनाओं में इन विध्याओं का कोई महत्व नहीं होता । अब मुझे दयाराम की कहानी सुनने में कोई रुचि नहीं थी । पूरा खेल मेरी समझ में आ चुका था । लेकिन इसके साथ ही कई सवाल भी उठ खडे हुये थे । जिनका कोई उचित तरीका मुझे नहीं सूझ रहा था । मैं आखिर दयाराम की सहायता करूं तो कैसे करूं ? क्या कुसुम अभी जीवित थी । मेरे ख्याल से नहीं । कुसुम की लाश जो अभी चल फ़िर रही थी । उसका क्या किया जाय । और सबसे बडी बात दयाराम को कैसे समझाया जाय कि मैं इस केस को हल करना चाहता हूं ?
ऐसे और भी अनेको प्रश्न थे । जिनका उस वक्त कोई सही हल मुझे नहीं सूझ रहा था । सुबह के चार बजने वाले थे । पूरब दिशा में रोशनी धीरे धीरे बडती जा रही थी । मैंने एक सिगरेट सुलगाया और कलियारी कुटी को देखते हुये आगे के कदम के बारे में सोचने लगा । साथ ही ये विचार भी स्वतः ही मेरे दिमाग में आ रहे थे कि इसी प्रथ्वी पर किसी किसी के लिये जीवन कितना रहस्यमय हो जाता है । ऐसे मकडजाल में फ़ंसा आदमी या कोई परिवार ये तय नहीं कर पाता कि करे तो आखिर क्या करे ? जाय तो किसके पास जाय । अक्सर लोग डर की वजह से ऐसी स्थिति का जिक्र भी अपने परिचय वालों से नहीं करते क्योंकि दूसरे लोग भयभीत हो जाते हैं । और भूत प्रभावित परिवार से सम्पर्क ही खत्म कर देते हैं कि कहीं भूत उन पर हावी न हो जाय । मुख्य इसी कारण की बजह से जो भी प्रेत घटनायें होती हैं वो लोगों की निगाह में नहीं आ पाती ।
दयाराम पत्थर की शिला पर लेटा हुआ निर्विकार भाव से आसमान की ओर देख रहा था । उसे थोडी देर इंतजार करने की कहकर मैं कलियारी कुटी की तरफ़ निगाह बचाकर चला गया ।( क्रमशः )

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