गुरुवार, जुलाई 22, 2010

प्रेतनी का मायाजाल 6

लेखकीय -- प्रेत जगत पर आधारित मेरी कहानी " प्रेतनी का मायाजाल " आठ भागों में है । जो एक साथ ही प्रकाशित है । ये कहानी पाठकों की बेहद मांग पर लिखी गयी है ।
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मैं जब थोडी देर बाद लौटा तो दयाराम अपने स्थान पर नहीं था । अभी मैं पत्ते टहनिंया आदि जलाकर चाय बना ही रहा था कि दयाराम अंगोछे से हाथ पोंछता हुआ लौट आया । उसने बताया कि दिशा मैदान
( शौच निवृति ) हेतु चला गया था । इस स्थान पर गर्म चाय के साथ बिस्कुट देखकर उसे बेहद आश्चर्य हुआ । चाय की चुस्कियों के बीच मैंने उससे पूछा कि उसने कभी हनुमान बीसा का नाम सुना है ? उसने बेहद आश्चर्य से कहा कि हनुमान चालीसा तो उसने सुना है । हनुमान बीसा आज तक नहीं सुना । मैंने
कहा हनुमान बीसा एक गुप्त विध्या है । गुप्त बीसा है । जो बीस भूतों तक को भगा देता है । इसके बारे में मैं
कुछ थोडा बहुत जानता हूं । यदि उसके घर में भूतों की संख्या बीस या उससे कम हुयी तो शायद मेरा फ़ार्मूला काम कर जाय । अन्यथा देख लेने में क्या हर्ज था ? वास्तव में मैं मजाक कर रहा था । पर मजाक के अन्दाज में नहीं । मैं चाहता था कि दयाराम का काम भी हो जाय । और दयाराम मेरी असलियत भी न जान सके । दयाराम ने मेरी बात पर तो विश्चास नहीं किया । पर मेरे द्वारा उसके घर चलने की बात उसे स्वाभाविक पसन्द आयी । बीती रात में अपनी आपबीती सुनाते सुनाते वह मुझसे एक तरह की निकटता महसूस करने लगा था ।
***
सुबह दस बजे हम दोनों उसके घर में मौजूद थे । हम जब घर में घुसे कुसुम बाथरूम में नहा रही थी । रूपलाल ने हमारे चाय नाश्ते का प्रबन्ध किया । दयाराम के बच्चे स्कूल जा चुके थे । कुसुम जब बाथरूम से बाहर आयी । उसने एक अजनवी की तरह मुझे देखा । मैंने दयाराम की निगाह बचाते हुये अश्लील भाव से उसे देखा । उसकी भूखी आंखों में एक अजीब चमक उभरी । स्पष्ट था कलियारी शमशान में हमारी भेंट के बाबजूद भी वो मुझे पहचान नहीं सकी थी । क्योंकि उस वक्त उसका पूरा ध्यान दयाराम पर ही रहा होगा । और उन्हें आशा भी नहीं होगी कि दयाराम कलियारी भी पहुंच सकता है । इस तरह वो दयाराम ही था या नहीं । ये भी वो पता नहीं कर पाये । क्योंकि आन लगे हुये क्षेत्र में न तो उनकी कोई विध्या काम कर सकती है । और न ही वो घुस सकते हैं । यदि रात में कुसुम और उसके साथी प्रेत को हमारे बारे में जानकारी हो जाती । तो शायद कुसुम कई दिन न लौटती । शायद कभी भी न लौटती । इस तरह रहस्य का रहस्य ही रहता ? और फ़िर उसका उद्देश्य क्या था । वह दयाराम परिवार से क्या चाहती थी । और कब तक उसके परिवार पर काबिज बना रहना चाहती थी ? इन सारे प्रश्नों का उत्तर मिलना संभव ही नहीं था ।
अब मेरे सामने तीन तरीके थे । कुसुम को बांध दिया जाय और घर का अस्थायी कीलन कर दिया जाय । इससे कुसुम घर से बाहर नहीं जा पायेगी । और घर में कोई प्रेत घुस नहीं पायेगा । इस स्थिति में कुसुम और दयाराम दोनों मेरी असलियत जान जायेंगे । दूसरी । कुसुम को पहले की ही तरह " फ़ील्ड " में खेलने दिया जाय । और उसी स्थिति में उसका शिकार किया जाय । इसमें मेरा काम आसान और गुप्त रूप से हो सकता था । मैं अपना काम भी करता रहता और किसी को पता भी नहीं चलता । तीसरा स्थिति को ज्यों का त्यों रहने दिया जाय । यानी प्रेतों को भी भरपूर रूप से आने दिया जाय और खुला खेल खेला जाय ।
ऐसा होता तो मुझे मजा आने वाला था । इन तीनों तरीकों को जरूरत के अनुसार अलग अलग रूप में भी लागू किया जा सकता था । पर सबसे बडी बात थी कि दयाराम की इस खेल में भूमिका कैसे शामिल करूं । और मैं अकेला ही काम करता हूं । तो दयाराम क्या सोचेगा ? वो मुझे क्या समझ रहा है और कितना विश्वास कर रहा है । ये सब समस्याएं थी । जिनका बडी साबधानी से मैंने हल निकालना था । और जितना हो सके । शान्त तरीके से इस खेल को खत्म करना था । तब मुझे एक ही तरीका फ़िलहाल उचित लगा । मैंने कुसुम को घर में बांध ( मन्त्र से ) दिया । और घर में प्रेतों का प्रवेश रोक दिया । और खाना खाने के बाद घोडे बेचकर सो गया । दयाराम भी सो रहा था ।
हम दोनों पूरी रात के जागे हुये थे । और आगे भी हमें जागना था ? दूसरी सबसे बडी बात थी कि बांधे जाने पर और प्रेतों के न आने पर कुसुम और प्रेतों का क्या रियेक्शन होना था । ये मैं देखना भी चाहता था । और मजा भी लेना चाहता था । मुझे केवल एक ही बात का डर था कि कुसुम एंड प्रेत पार्टी में कोई भी लग्गड ( ताकतवर ) प्रेत मेरे परिचय का निकल आया । तो प्रेत पार्टी मैदान छोडकर भाग जायेगी । और फ़िर मुझे मिशन कुसुम के लिये खामखां के अतिरिक्त प्रयास करने होंगे । जिनमें समय भी अधिक लगेगा । और दयाराम मेरी वास्तविकता निश्चय जान जायेगा । जिससे में यथासंभव बचना चाहता था ।
शाम छह बजे मैं उठा तो एकदम तरोताजा महसूस कर रहा था । दयाराम मुझसे पहले ही उठ चुका था । और मेरे जागने का इंतजार कर रहा था । शाम की चाय के बीच मैंने कहा । चरस के सुट्टे ही लगाते हो । या पीना पिलाना भी होता है । दयाराम मेरा आशय समझ गया । उसने बताया । सब इंतजाम है । दरअसल मैंने एक योजना बना ली थी । उस योजना के तहत पूरी रात मुझे कुसुम से ही काम लेना था । दयाराम की उसमें कोई भूमिका नहीं होनी थी । इसलिये मैं नशे में उसे इतना ओवर कर देना चाहता था । कि वो मेरे काम में कोई दखलन्दाजी न कर सके । और बेसुध सोता ही रहे । रूपलाल गली के पार स्कूल में सोता था । और बच्चों का अलग पोर्शन था । इसलिये दयाराम के धुत होते ही मैदान साफ़ हो जाना था । और मुझे इसी का इंतजार था । मैंने कुसुम का जायजा लिया । मेरी आशा के अनुरूप ही वह गडबड महसूस कर रही थी । और बेहद बैचेन थी । वह बार बार मुझे ही देख रही थी और सोच रही थी । कि इन बदली परिस्थितियों में मेरा कितना हाथ हो सकता है । और मैं कौन हूं । वह कंकाल कालिनी विध्या जानने वाली शक्तिशाली प्रेतनी मुझे हर एंगल से तौलने की कौशिश कर रही थी । और आश्चर्य से अपने को असमर्थ महसूस कर रही थी । क्योंकि उस वक्त मैं " कवर्ड " स्थिति में था । और साधारण था । ठीक वैसा ही हुआ । रात दस बजे तक । खाने और पीने के दौर में थोडी और । थोडी और करते हुये मैंने दयाराम को न सिर्फ़ काफ़ी पिला दी । बल्कि नशे के ही क्षणों में दो नींद की गोलियां उसकी दारू में मिला दी । अब मेरे गणित के अनुसार वह सुबह ही उठने वाला था । और इस तरह मेरे लिये मैदान एकदम साफ़ था । फ़िर भी मुझे एक विचार आया । और इसी विचार के तहत मैं ऊपर जाकर छत पर लेट गया ।
दयाराम नशे में धुत नीचे कमरे में ही सो गया था । अब मुझे सिर्फ़ प्रेतनी का इंतजार था । कुसुम का इंतजार था । कुसुम कहां हो सकती है ? ऐसे ही विचारों में खोया हुआ मैं आसमान के उन असंख्य तारों को देख रहा था । जिनके बीच लाखों करोडों प्रेत लोक थे । देव लोक थे । तान्त्रिक लोक थे । अन्धेरे लोक थे । अच्छे लोक थे । बुरे लोक थे । हर लोक का अपना एक अलग अन्दाज था । एक अलग रवैया था ।
मुझे एकान्त होते ही बाबाजी की याद हो आयी । नीलेश की याद हो आयी । नीलेश की कितनी इच्छा होती थी कि वो अधिकाधिक समय मेरे साथ गुजारे । बाबाजी के साथ गुजारे । पर ऐसा संभव नहीं हो पाता था । बाबाजी इन्हीं किन्हीं लोकों में हो सकते थे । या इस ब्रह्मांड के पार अन्य सृष्टि में भी हो सकते थे । चारों तरफ़ माया का अदभुत खेल फ़ैला हुआ था ।
तभी मेरी विचार श्रंखला को झटका लगा । मुझे किसी के ऊपर आने की आहट हुयी । और कुछ ही मिनट बाद कुसुम मेरे सामने थी । कैसा अदभुत खेल था । दयाराम पहले उसे प्रेत होने के बाबजूद पत्नी समझते हुये व्यवहार करता रहा । फ़िर वह जान गया कि पत्नी के रूप में कुसुम प्रेतनी है । फ़िर भी वह कुछ नहीं कर सका और उसे व्यवहार करना पडा । मैं पहले से ही जानता हूं कि मेरे पास खडी औरत प्रेतनी है । फ़िर भी मैं उससे व्यवहार करूंगा । ये अदभुत खेल नहीं तो और क्या था ?
कुसुम के पास आते ही मैंने बहाना करते हुये । चौंकते हुये । कौन है कहकर टार्च की रोशनी उसके ऊपर फ़ेंकी । जबकि आसपास जलती हुयी स्ट्रीट लाइट का हलका उजाला मौजूद था । कुसुम अपने पूरे बदन पर मात्र एक झीनी साडी पहने हुयी थी । उसके शरीर का प्रत्येक कटाव स्पष्ट झलक रहा था ।
" आइये कुसुम जी । " मैंने कोहनी और तकिये के सहारे अधलेटा होकर कहा , " नींद नहीं आ रही थी क्या ? जवान रातों में अक्सर जवान लोगों को नींद न आना एक आम बात है । तब जवान लोग किसी जवान लोग के पास किसी न किसी बहाने से पहुंच ही जाते है ? "
अंधेरे में उसकी आंखे किसी बिल्ली की तरह चमकी । उसने मेरी द्विअर्थी बात और अश्लील संकेत का कोई नोटिस नहीं लिया । वह तखत पर मेरे पास बैठ गयी । और कुछ निर्णय सा करते हुये बोली , " सच सच बताओ । तुम कौन हो ? मैंने तुम्हें पहले तो कभी नहीं देखा । "
" मैं एक चलता फ़िरता प्रेत हूं । " मैंने सीधे सीधे लाइन पर आते हुये कहा , " और जहां तेरी जैसी प्रेतनी जवानी की आग में जल रही होती है । उसको खोजकर पहुंच जाता हूं । "
" तुम प्रेत नहीं हो । " वह लगभग गुर्राकर बोली । " तुम एक तान्त्रिक हो । और मैं जानती हूं । तुमने ही मुझे बांधा है । तुमने इस घर को भी बांध दिया है । "
" अब तू जान ही गयी है । जानेमन । " मैंने ढीटता से कहा । तो मैं कर भी क्या सकता हूं । "
फ़िर मेरी आशा के अनुरूप ही उसने साडी उतारकर फ़ेंक दी । और एकदम निर्वस्त्र हो गयी । उसने अपने लम्बे बालों को हिलाते हुये रूप बदलने की असफ़ल को्शिश की । जिसमें वह नाकामयाब रही । और थोडी ही देर में हांफ़ने लगी ।
" जब तू । " मैंने हंसते हुये कहा । " जानती है कि बंधी हुयी है । फ़िर क्यों हाथ पांव मार रही है । "
वह जलती आंखो से मुझे घूरने लगी । और हथियार डालते हुये बोली , " आखिर तुम चाहते क्या हो "
" अब आयी न लाइन पर । " मैंने सिगरेट सुलगाते हुये कहा , " चल चुपचाप बैठ जा । प्रेतों से आग बुझाने का शौक है तुझे । इस हट्टे कट्टे आदमी में क्या तुझे कांटे नजर आ रहें है ? "
( क्रमशः )

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