गुरुवार, जुलाई 22, 2010

प्रेतनी का मायाजाल 7

लेखकीय -- प्रेत जगत पर आधारित मेरी कहानी " प्रेतनी का मायाजाल " आठ भागों में है । जो एक साथ ही प्रकाशित है । ये कहानी पाठकों की बेहद मांग पर लिखी गयी है ।
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कोई आधा घन्टे तक मैं निर्विकार उससे बिना बोले लेटा रहा । इस बीच कुसुम ने मेरी परवाह न करते हुये अपने स्तनों पर स्वतः ही हाथ फ़िराया । और बार बार जीभ सेअपने सूखे होंठो को चाटने लगी । इसकीवजह थी । उसकी प्रेतक गतिविधियों का ज्यों ज्यों समय होता जा रहा था । वह बैचेनी महसूस कर रही थी । एक पुरुष का सामीप्य उसे और भी ज्यादा बैचेन कर रहा था । और वास्तव में मेरा उद्देश्य ही उसके अन्दर के प्रेतत्व को पूरी तरह जगाना था । मेरे पास पहले से तैयार पीपल की पत्तों युक्त टहनी थी । जिससे
मैं बीच बीच में उसके बदन पर बहुत हल्का प्रहार सा कर देता था । आखिरकार वो वक्त आ ही गया । जव वो पूरे प्रेत आवेश में हो गयी । मैंने बैठते हुये एक सिगरेट सुलगायी । और भरपूर धुंआ उसके मुंह पर फ़ेंका । उसके वक्षों पर फ़ेंका । और अन्यत्र उसके बदन पर फ़ेंका । वह एक कामुक अंगडाई लेती हुयी बेशर्मी से हंसने लगी । और मेरे बदन पर चडने की कोशिश करने लगी । वह बार बार मेरे अंग को छूने की चेष्टा करती । तब अंत में मैंने उसकी गंदले मटमैले रंग की मुर्दा आंखों में आंखे डाल दी । वह जोर जोर से झूमने लगी और अपने गालों छातियों पर प्रहार करने लगी । फ़िर मुझे गन्दी गन्दी गालियां देने लगी । गालियां देते हुये सम्भोग के लिये उकसाने लगी । पर मैंने उसकी किसी बात पर ध्यान नहीं दिया ।जैसे ही वह खडी हुयी । मैंने अभिमंत्रित पीपल की टहनी के भरपूर वार उसके शरीर पर किये और बोला , " अब बता । असली कहानी क्या है । और तू है कौन ? "
" मैं शारदा हूं । " वह सिसकियों के बीच बोली , " कुसुम की बडी बहन ? "
उसने जो बताया । वह मेरे लिये आश्चर्यजनक नहीं था । मुझे बहुत कुछ पहले से ही मालूम था । बस उस पर प्रेतनी की स्वीकारोक्ति का ठप्पा लगना था । जो वह लगा चुकी थी ।
शारदा युवावस्था से ही मनचले स्वभाव की थी और राजेश नाम के एक लडके को प्यार करती थी । उन दोनों के बीच शारीरिक सम्बन्ध भी थे । जो दयाराम से शादी से पहले और शादी के बाद भी बदस्तूर जारी रहे थे । दयाराम के साथ शादी का इतना लम्बा वक्त गुजर जाने के बाद । तीन बच्चे हो जाने के बाद भी । उसके दिल में राजेश ही बसता था । वह अपने पहले प्यार को कभी भुला न सकी थी । फ़िर दोनों की अलग अलग शादियां हो गयीं । इसके बाद भी राजेश गांव के नाम पर शारदा के घर आता रहा । और दयाराम के अधिकतर घर पर न रहने के कारण उनकी कामलीला निर्विघ्न चलती रही । लेकिन यह इश्क चौदह साल बाद खुल ही गया । जब दयाराम ने अचानक उनको सम्भोगरत देख लिया । इसके बाद भी घर बिगडने का ख्याल करते हुये उसने शारदा से तत्काल कुछ नहीं कहा और गुमसुम रहने लगा । पति से खुद की बेबफ़ाई और गलती के अपराधबोध से ग्रस्त होकर शारदा ने बिजली के तार से चिपककर जान दे दी । जिसे कि दयाराम दुर्घटना समझ बैठा था । इस अकाल मौत के बाद जब
वह लोखटा प्रेतों में भटक रही थी । दुर्गा सिंह नामक एक मसान पूजक तान्त्रिक ने उसकी शेष आयु
कंकाल कालिनी विध्या का उपयोग करते हुये किसी अपने की खातिर निकाल ली । और वह तिलमिलाकर रह गयी । सूक्ष्म शरीर में पहुंचने पर उसे ग्यात हुआ कि अभी वह गलती मानें । पश्चाताप करे तो शेष आयु के लिये फ़िर से जन्म ले सकती है । पर उसकी शेष आयु तो वो कमीना तान्त्रिक खत्म कर चुका था । अब प्रेत होकर भटकने के अलावा और कोई चारा नहीं था । तभी प्रेतो मे लपका नाम से प्रसिद्ध कामभोग का रसिया मसान उसे पकड ले गया और रखैल की तरह रखने लगा । वहीं उसने जाना कि दुबारा वह फ़िर से शरीर प्राप्त कर सकती है । पर इसके लिये उसे किसी जीवित औरत को उसके शरीर से निकालना होगा । शारदा प्रेत के रूप में अक्सर हवेली पर आती रहती थी । उसे अपने बच्चों और घर से भी मोह था । जो उसने मरने के बाद जाना । उसने सोचा कि किसी तरह वह दोबारा ही इस घर में आ सके तो कितना अच्छा हो । लेकिन प्रेत जिंदगी में होने के कारण प्रेतों के गुण भी उसके अन्दर तेजी से आ रहे थे । तभी उसे पता चला कि दयाराम दुबारा से कुसुम से शादी कर रहा है । उसके मन में एक खतरनाक योजना आयी । उसने लपका के सहयोग से कुसुम के शरीर को प्राप्त करने का निश्चय
किया । पर लपका किसी भी हालत में उसे बिलकुल छोडने को तैयार नहीं था । तब शारदा ने कहा कि वह दयाराम के घर को भ्रष्ट कर देगी और इस हालत में प्रेत आराम से हवेली में आ जा सकेंगे । और कुछ समय बाद वह भी रात में शमशान में आने लगेगी । क्योंकि वह भी प्रेत जीवन की अभ्यस्त हो चुकी थी । लपका राजी हो गया । और उसे कंकाल कालिनी के तरीके बताने लगा । आखिरकार वह दिन आ ही गया । जब दयाराम कुसुम को विदा कराकर ला रहा था । प्रेतवासा की अभिशप्त बगिया से पहले ही लपका ने दयाराम का दिमाग फ़ेर दिया और दयाराम मोटर साइकिल बगिया में ले आया और कुछ ही देर में रहस्यमय नींद में चला गया । तब प्रेतों ने कुसुम के दिमाग पर कब्जा करना शुरू किया । और उसे जोहड के पानी में डुबोकर मार डाला । शारदा लपका के सहयोग से कुसुम के शरीर में घुस गयी ।
" लेकिन । " मैंने कहा , " कुसुम कहां गयी ? "
कुसुम काली टेकरी के आसपास रहती है । और सच्चाई जानने के बाद मुझसे नफ़रत करती है । पर हम प्रेतों में नफ़रत मुहब्बत की बाते मायने नहीं रखती । यहां सब जायज है । वाला खेल चलता है । प्रेतों और इंसानी रिश्तों के बीच इसी तरह के सम्बन्ध रहते हैं । यह इंसानो को अजीव लग सकता है । पर प्रेतों को नहीं । इसके बाबजूद भी प्रेतों में अच्छी आत्माएं भी होती हैं जो किसी का बुरा नहीं करती । दरअसल मरने से पहले जो स्वभाब मनुष्य का होता है । प्रेत बनने के बाद उसमें और भी दुर्गुण समा जाते हैं । पेट की भूख और योनि की भूख जब इंसान से क्या क्या नहीं कराती ? तो प्रेतों के तो साधन फ़िर भी सीमित होते हैं । पेट की भूख के लिये प्रेत भोजन से उडने वाली खुशबू को आहार के रूप में ग्रहण करते हैं । और योनि की भूख हेतु अनेको उपाय होते हैं । "
" अगर । " मैंने जानते हुये भी बीच में ही उसे टोकते हुये कहा , " जो खेल तूने कुसुम के साथ लपका के सहयोग से मिलकर खेला । वही खेल दुबारा से कुसुम खेलना चाहे । तो वापस अपने शरीर को प्राप्त कर सकती है ? "
" हां । " वह बोली , " पर वह शरीर इंसानी शरीर नहीं होगा । बल्कि एक मुर्दा शरीर में प्रेतात्मा ही होगी । इस तरह के शरीर के नियम कायदे बेहद अलग हैं । उसे इंसान और प्रेतों दोनों से वास्ता रखना होगा । शुरुआती अवस्था में ऐसे औरत शरीर से सम्भोग करने पर उसके बच्चे तो हो जाते हैं । पर वे जीवित नहीं रहते । ये बडी विचित्र बात है कि वह शरीर जिंदा भी होता है और नहीं भी होता । जैसे इस वक्त कुसुम का ये शरीर महज एक लाश है । इसकी पहचान ये है कि यदि इसको छेदकर यदि खून निकाला जाय । तो पीले मटमैले रंग का द्रव निकलेगा । "
" वास्तव में । " वह सिसकती हुयी बोली , " इंसानी शरीर की चाहत ने मुझे अन्धा कर दिया था । जिसके चलते मैंने अपनी निर्दोष बहन के साथ धोखा किया । जबकि ये शरीर मामूली और कामचलाऊ उपयोग का ही होता है । एक प्रेत को इससे भोजन और सहवास की पूर्ति अवश्य मिलती है । लेकिन इस शरीर के साथ बरताव करने की परेशानियां भी कम नहीं हैं ...यह असल जिन्दगी जैसा नहीं है । मैंने अपनी बहन का घर और जिंदगी भी बरबाद की और मुझे वो लाभ भी नहीं मिला जो मैं समझ रही थी । "
" अब । आखिरी सबाल । " मैंने उसके स्तन को टहनी से छूते हुये कहा , " इस घर को कैसे छोडेगी ? "
वह अचानक क्रुद्ध होकर मुझ पर झपटी । मैंने एक झन्नाटेदार थप्पड उसके मुंह पर मारा और टहलता हुआ छत की बाउंड्री के पास आ गया । मैंने सडक के पार स्कूल के सामने खडे बरगद पर निगाह डाली । जिस पर तीन प्रेत मौजूद थे । और आश्चर्य से हवेली की ओर बार बार देखते थे । पर हवेली बंधी होने के कारण वह न तो हवेली के अन्दर आ सकते थे और न ही देख सकते थे । यही हालत हवेली के अन्दर कुसुम ( शारदा ) की थी ।
शारदा बार बार मुझसे मुक्त करने के लिये गिडगिडा रही थी । और विश्वास दिला रही थी कि जल्दी ही लौट आयेगी । मैंने रहस्यमय अन्दाज में कहा । कल में हमेशा के लिये उसे मुक्त कर दूंगा । उसके बाद तखत को सीमारेखा में बांधकर मैं निश्चिंत होकर सो गया । अब शारदा मुझे किसी प्रकार से डिस्टर्ब नहीं कर सकती थी । और घर से बाहर भी नहीं जा सकती थी । वह क्या सोच रही थी । इससे मुझे कोई लेना देना नहीं था । मेरी पूरी सहानुभूति कुसुम के साथ थी । जो सूक्ष्म शरीर के असह्य कष्ट भोग रही थी । पर इसमें स्थायी रूप से कोई भी तान्त्रिक शक्ति किसी प्रकार का बदलाब नहीं कर सकती थी ।

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