गुरुवार, जुलाई 22, 2010

प्रेतनी का मायाजाल 8

लेखकीय -- प्रेत जगत पर आधारित मेरी कहानी " प्रेतनी का मायाजाल " आठ भागों में है । जो एक साथ ही प्रकाशित है । ये कहानी पाठकों की बेहद मांग पर लिखी गयी है ।
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दूसरे दिन दयाराम के जगाने पर मेरी नींद खुली । वह चाय की प्याली के साथ मेरे सिरहाने मौजूद था । और मेरे ऊपर आकर लेटने पर आश्चर्य महसूस कर रहा था । चाय पीने के बाद मैंने सिगरेट सुलगायी ।और आने वाली रात में उसकी प्रेत समस्या को जड से खत्म करने का निश्चय कर लिया । अब सारा काम आसान ही था । आज शाम को मैं शारदा को मुक्त करता । और फ़िर किसी बहाने से रिवाल्वर के साथ
दयाराम को काली टेकरी ले जाता । शारदा जो कि मेरी कैद में थी । उसको मानसिक आदेश देकर बुलाता । और उसे रूप बदलने पर विवश करता । इसके बाद दयाराम उस अनोखे जानवर को गोली मार देता । जो कि उस दिन उडन छू नहीं हो सकता था और....?
दयाराम उस दिन अपने आपको बेहद प्रसन्नचित्त महसूस कर रहा था । इसका कारण वह स्वयं भी नहीं जानता था । पर मैं जानता था । एक तो वह जब से मेरे साथ था । प्रेत के प्रभाव से प्रभावित नहीं हुआ था । दूसरे वह सालों बाद गहरी नींद सोया था । जिसमें शराब और नींद की गोली की महत्वपूर्ण भूमिका थी । एक क्षण के लिये तो ऐसा लग रहा था । उसे किसी प्रकार की कोई परेशानी है ही नहीं । उसको और अधिक टेंशन फ़्री करने के लिये मैं घुमाने के बहाने नदी के किनारे ले गया । जहां मुझे कुछ आवश्यक कार्य करने थे । दयाराम स्वभाव अनुसार अपने बारे में बताता रहा । जिसको मैं नकली हूं हां करते हुये सुनने का बहाना करता रहा । और अपने कार्य में लगा रहा । दयाराम इस बात से अनभिग्य ही रहा कि मैं कर क्या रहा हूं । एक तो वह अपनी बातों में मस्त था । दूसरे मुझे जमीन आदि पर नुकीली लकडी द्वारा रेखायें खींचते और तन्त्र आदि बनाते हुये देखकर उसने यही सोचा कि मैं जीव जन्तुओं की खोज से सम्बन्धित कोई कार्य कर रहा हूं । वास्तव में तो वह अन्दाजा भी नहीं लगा सकता था कि
उसका कितना बडा काम हो चुका था और कितना होने बाला था । कोई एक बजे मेरा पूरा कार्य खत्म हो गया । लपका मसान इस स्थान पर आज रात के लिये बंध चुका था और काली टेकरी पर वह मुझे या खासतौर पर दयाराम को डिस्टर्ब नहीं कर सकता था । ऐसा मुझे इसलिये करना पडा क्योंकि कल रात कुसुम के बाहर न जाने से लपका को दाल में काला लग सकता था और हवेली के बंधे होने पर तो उसका पक्का यकीन ही हो गया होगा । इसलिये शाम को जब में कुसुम रूपी शारदा को मुक्त करता तो लपका उस समय खामखाम में फ़टे में टांग अडाता । और तब मुझे खुलकर लडाई लडनी पडती । और इस तरह एक फ़ालतू का बखेडा होता । जिससे मैं बचना चाहता था । और दूसरे इस रात का पूरा पूरा समय मैं कुसुम की खातिर खर्च करना चाहता था । जिससे मुझे पूरी सहानुभूति थी ।
वहां से निपटने के बाद मैं दयाराम के साथ बाजार गया । और हनुमान बीसा ? का चमत्कार दिखाने का बहाना करते हुये मैंने कुछ जरूरी सामान खरीदा । दयाराम मेरी बातों पर हंस रहा था पर न जाने किस भावना से प्रेरित होकर मेरा कहना मान रहा था । उसे दरअसल दिलचस्पी थी कि आखिर मैं क्या करने वाला हूं ?
शाम को पांच बजे के लगभग मैंने शारदा पर से बंध हटा लिया । वह नौ बजे तक बैचेन होकर इधर उधर घूमती रही और फ़िर अहाते में जाकर उसकी बाउंड्री कूदकर गायब हो गयी । मैं एक रहस्यमय अन्दाज में मुस्कराया । और वापस कमरे में आकर दयाराम के पास बैठ गया । जो टी. वी के सामने दारू की बोतल खोले मेरा इंतजार करता हुआ टी. वी. देख रहा था । मैंने मना कर दिया । पूजा की वजह से न आज मैं पियूंगा । और न ही वो पियेगा ।
ठीक ग्यारह बजे मैं दयाराम के साथ काली टेकरी पर मौजूद था । कुसुम अपने सूक्ष्म शरीर के साथ गुमसुम सी आम की डाली पर बैठी थी और न जाने कब से भूखी थी । मैं उसको देख सकता था । वह भी मुझे देख सकती थी । लेकिन ये नही जान सकती थी कि मै उसको देख रहा हू । पर दयाराम इस रहस्य को नहीं जान सकता था । कुसुम की उस दशा पर मेरी भी आंखो में आंसू आ गये । मैंने उसी डाली के नीचे देशी घी में चाबल आदि खाद्ध पदार्थ भरपूर मात्रा में मिलाकर आग जलाकर एक कटोरे में रख दिये । दयाराम हैरत से मेरी कार्यवाही देख रहा था । कुछ ही देर में सुगन्धित धुंआ खुशबू के साथ उडकर कुसुम के पास जाने लगा । उसे बेहद आश्चर्य हुआ । पर भूख से व्याकुल होने की वजह से वह इस तरफ़ से ध्यान हटाकर प्रेत आहार ग्रहण करने लगी । मैंने दयाराम की आंख बचाकर अपनी नम आंखों को पोंछा । पौने बारह बज चुके थे । अब मुझे शारदा का इंतजार था । मैंने मानसिक आदेश उसको दिया । लगभग दस मिनट बाद ही एक नंगी औरत लगभग उडने के अन्दाज में काली टेकरी पहुंची । मैंने अभी अभी दयाराम से लिया हुआ रिवाल्वर साबधानी से पकड लिया । और एक निगाह भोजन से त्रप्त होकर
बैठी हुयी कुसुम पर डालकर मन ही मन कहा । कुसुम चार साल से भटकती और तडपती तेरी आत्मा आज निश्चय ही शान्ति को प्राप्त होगी । जब तू अपनी कमीनी बहन का अन्जाम अपने आंखों से देखेगी । हे निर्दोष आत्मा तू नहीं जानती । इतना सारा खेल मैंने तेरी आंखों के सामने ही करने के लिये इतना बडा नाटक रचा । वरना शारदा जैसी कुतिया तो कलियारी कुटी से ही दफ़ा हो जानी थी । मैं उसी वक्त समझ गया था कि दयाराम से ज्यादा तू भुगत रही है । मैं तेरे लिये जितना मुझसे बन पडेगा । करूंगा । शाय़द ऐसा ही होना हो । शायद ऐसा ही लिखा हो । शायद वो मुझे निमित्त बनाकर ऐसा ही चाहता हो ...।
अगला दृश्य दयाराम के लिये पूर्व परिचित था । नंगी मुर्दा औरत चिता वाले स्थान पर लोटने लगी । और लोमडी और सियार की मुखाकृति वाले छोटे जीव में बदलने लगी । मैंने रिवाल्वर वाला हाथ सीधा किया । मेरे मुंह से निकला । अलविदा शारदा । और मैंने घोडा दबा दिया । गोली की आवाज सन्नाटे को चीरती चली गयी । मायावी जानवर की कांय कांय मुश्किल से आधा मिनट हुयी । और फ़िर वहां कुसुम की निश्चल लाश नजर आने लगी । दयाराम हैरत से मुंह फ़ाडे मेरी तरफ़ देखता रह गया । मैंने आम की डाली पर बैठी कुसुम पर नजर डाली । पर वो वहां नहीं थी । मैंने मुडकर देखा । वह दूसरी तरफ़ खडी थी । उसके चेहरे पर गहन संतुष्टि के भाव थे । और वह अजीब नजरों से मुझे देख रही थी ।
खुद दयाराम का यही हाल था । वो हक्का बक्का होकर मुझे देख रहा था । पर मेरे पास ऐसी बातों के लिये वक्त नहीं था । अभी बहुत काम करने थे । मैंने दयाराम के सहयोग से कुसुम की लाश उठाई और पहले से ही सूखी पत्तियों और टहनी से भरे एक गड्डे में पत्तों के बीच दबा दी । इसके साथ ही मैंने मोटर साइकिल पर थैले में बंधे सामान से दस किलो देशी घी गडडे में डाल दिया । और माचिस से एक पलीता जलाता हुआ दयाराम को देकर बोला , " अपनी पत्नी का अंतिम संस्कार करो दयाराम । "
दयाराम ने आंसू बहाते हुये पत्तों को आग लगा दी । मैंने टेकरी के पास पडी दो मोटी पिंडियों को दयाराम के सहयोग से उठाकर गड्डे में डाल दिया । लगभग चार साल पहले मृत्य को प्राप्त हुआ मुर्दा धू धू कर जलने लगा ।
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अगली सुबह कलियारी कुटी जाने के स्थान पर मैं चेन्नई के लिये रवाना हो गया । अपनी साधना को कुछ दिनों हेतु टालना जरूरी हो गया था । दयाराम निश्चित ही मेरी खोज में दुबारा वहां जाता । जो कि मैं किसी कीमत पर नही चाहता था । कुसुम का मैं पक्का इंतजाम कर चुका था । उससे सम्पर्क करके मैंने उसे अपनी असलियत बता दी थी । और उसके किसी शान्त प्रेत लोक में पहुंचाने का वादा कर दिया था । जहां उसे कोई परेशान नहीं करता । जहां उसके भोजन की कोई समस्या नहीं होती । लेकिन जब तक ऐसा नहीं होता । तब तक के लिये मैंने उसे कुछ तरीके बताये । जिनसे वह आराम से रह सकती थी । कुसुम के अचानक गायब होने का उपाय दयाराम को मैंने ये बताया था कि उसके घर फ़ोन कर देना कि घर से लडकर चली आयी है । फ़िर उसके गायब होने की रिपोर्ट लिखा देना । और उसके बाद अखवार में गुमशुदा की खोज । इसके कुछ ही दिनों में मामला समाप्त । शारदा से मुझे कोई सहानुभूति नहीं थी । उसने मुझसे पूछा । मैं क्या करूं ? मैंने कहा । भाड में जाओ ।
दयाराम न चाहते हुये भी बहुत कुछ समझ चुका था । वह मेरा फ़ोन न . और घर का पता जानने की बार बार जिद कर रहा था । जिसे मैंने अगली बार बताने का वादा किया । वह अगली बार कभी नहीं आनी थी । आखिर में बेहद रिकवेस्ट करते हुये उसने पूछा , " कम से कम इतना तो बता ही दो कि आखिर तुम हो कौन ? "
" आय एम प्रसून । ओनली प्रसून । " मैंने हंसते हुये कहा । और गाडी आगे बडा दी ।( समाप्त )

1 टिप्पणी:

ललित शर्मा ने कहा…

रोचक कहानी थी,पूरी पढी अच्छा लगा।
रोमांच और सस्पेंस से भरपुर

आभार

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