सोमवार, जुलाई 12, 2010

बदला । बदला ।

अगर किसी भी चरित्र के एक ही पक्ष का मूल्यांकन करें । तो फ़िर तो कोई बात नहीं । जैसा उसके बारे में कहा गया होगा । वैसा ही प्रतीत होगा । लेकिन अगर हम सामाजिक मर्यादा और उच्च आदर्शों के नियम से उसकी तुलना करें । तो बहुत कुछ अलग होगा । अब रामायण को लें । राम । लक्ष्मण । भरत । आदि चरित्रों की बात करते ही हमारे अन्दर भरी गयी रेडीमेड श्रद्धा जाग उठती है । और हम नतमस्तक होने लगते हैं । पर इन चरित्रों ने ऐसा कौन सा बङा तीर मारा । जो एक सज्जन आदमी नहीं करता । हमें ये विचार नहीं आता । क्योंकि भक्ति और भगवान हमारे अन्दर इस तरह ठूंस
ठूंसकर भरे गये हैं । कि जैसी तोता रटन्त हमें सिखायी गयी है । उससे परे जाकर हम नहीं सोच पाते । अब " मर्यादा पुरुषोत्तम " कहलाये राम को लें । राम के चक्कर में पूरे खानदान की तारीफ़ स्वतः हो जाती है । कैकयी द्वारा वनवास केवल राम के लिये माँगा गया था । सीता जी चौदह वर्ष पति से अलग कैसे रहूँगी ? यह सोचकर । और विभिन्न प्रकार के तर्क और हठ कर राम के साथ ही चली गयीं । कुछ जद्दोजहद के बाद लक्ष्मण भी साथ हो गये । उर्मिला को किस बात का दन्ड मिला ? उसे भी ले जाते ।राम पिता की (आधी) आग्या मानकर सपत्नीक वन को चले गये । साथ में सेवा करने वाला भाई भी था । कैकयी तो सिर्फ़ राम का वनवास चाहती थी । तो माता की आग्या । का कोई अर्थ नहीं था ?
राम को कौशल्या । सुमित्रा । उर्मिला । और पूरी अयोध्या की जनता की भावनाओं से कोई लेना देना नहीं था । सिर्फ़ पिता की आग्या का ही महत्व था । और अपनी पत्नी तो साथ जा ही रही थी । अगर आग्या " पत्थर की लकीर " की तरह मानना था । तो अकेले जाना था । दशरथ । कौशल्या । सुमित्रा । और यहाँ तक कैकयी भी ये बात नहीं चाहती थी कि सीता वन को जाय । लेकिन ऐसा होता । तो राम को दिक्कत होती ? तो फ़िर ये निरी आग्या वाली बात कहाँ रह गयी । ये तो स्वेच्छा हुयी ।
भरत को वर के अनुसार राजगद्दी पर बैठना था । यह पिता का वचन था । और माता की इच्छा थी । भरत ने दोनों में से किसी का कहना नहीं माना । राम ने सिर्फ़ पिता की आग्या को महत्व दिया । जबकि बाद में दशरथ ने भी कह दिया कि तुम मेरी आग्या मानने से इंकार कर दो । पूरी अयोध्या नहीं चाहती थी कि राम वन को जाँय । लक्ष्मण ने कई स्थानों पर दशरथ को बूढा । कामी और सठियाया हुआ बताया है । भरत के प्रति भी लक्ष्मण के भाव अच्छे नहीं थे ( देखें वाल्मीक रामायण ) एक स्थान पर राम कह रहें हैं । बादल बरस रहें हैं । मुझे सीता की याद आ रही है..वो दिन कब होगा जब सीता जैसी सुन्दरी मेरे सीने से लगी होगी ? लक्ष्मण विचारे को उर्मिला की याद नहीं आती होगी ? बाली का प्रश्न देखिये कितना महत्वपूर्ण है । जिसका राम के पास जबाब ही नहीं था । मैं बैरी । सुग्रीव पियारा । कारण कवन । नाथ मोहि मारा । यानी राम तुम्हारे लिये तो सब समान है । फ़िर मुझे क्यों
मारा । और वो भी छुपकर ? अरे वो हम भाईयों का झगङा था । तुम्हें क्या मतलब । और मतलब था । तो मारने जैसा निर्णय सीधा सीधा ले लिया । मध्यस्थता करके भी तो मामला सुलझाया जा सकता था । निश्चित ही बाली अपने भाई को प्यार करता था । वो तो उसे महाबली दैत्य के चक्कर में कुछ गलतफ़हमी हो गयी थी ।आप गौर करें कि रावण से युद्ध के समय राम ने कितनी बार सुलह समझौते के लिये दूतों को भेजा । तो राम बाली से एक बार भी नहीं कह सकते थे कि भाई तुम दोनों भाईयों के बीच गलतफ़हमी हो गयी है ? यहाँ यह भी महत्वपूर्ण है । कि बाली जब दैत्य को मारकर लौटा तो सुग्रीब तारा को बाली को युद्ध में मरा बताकर अपने साथ रखने लगा था । और बाली की मृत्यु के बाद फ़िर से उसने तारा को अपने साथ रखा था ।उस समय की वानर जाति के लिये ये कोई
बहुत हल्ला मचने वाली बात नहीं थी । तब से लेकर आज तक करोङों ऐसे उदाहरण मिल जायेंगे । जब बङे भाई ने छोटे भाई की पत्नी को " पत्नी " के समान रखा । और छोटे भाई ने बङे भाई की पत्नी को " पत्नी " के समान रखा । किसी एक भाई के हमेशा के लिये चले जाने या मर जाने की बात छोङो ।
बहुत लोग तो आमने सामने मौजूद होते हुये ऐसा कर रहें हैं । उनका वध कौन करेगा ? राम ने बालि को मारने का कारण ये बताया था । अनुज वधू । भगिनी । सुत नारी । रे सठ । कन्या सम । ए चारी । इन्हें कुदृष्टि । विलोके जोई । ताहि हने । कछु पाप न होई । अर्थात छोटे भाई की पत्नी । बहिन ।और पुत्रवधू इनका कन्या के समान विचार किया गया है । इन्हें काम दृष्टि से देखने वाले को मारने पर पाप नहीं लगता । यहाँ राम ने अग्रज वधू यानी भाभी की बात नहीं कहीं । क्योंकि बालि ने तो सुग्रीव की पत्नी को पत्नी की तरह एक बदले के रूप में रखा था । सुग्रीव तो तारा को पहले ही रख चुका था । मजे की बात ये है कि राम ने एक बङे और समर्थ आदमी की तरह उस वक्त टाल
मटोल और तर्क वितर्क करके बात दबा अवश्य दी । पर " महाप्रभु " के विधान के अनुसार जैसे को तैसा मिलता अवश्य है । उस वक्त तो बाली उस प्राणघातिनी शक्ति से मर गया । अतः बदला नहीं ले सकता था । लेकिन " निरंजन " ने राम के बाद द्वापर में जब श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया । तो इसी बाली ने बहेलिया के रूप में जन्म लेकर कृष्ण को अंतिम समय में तीर मारकर बदला पूरा किया ।यहाँ कुछ लोग ये भी कहते हैं कि तीर के घाव से श्रीकृष्ण को गेंगरीन हो गया था । जिससे उनका देहत्यागन हुआ था । पर मैं इस बात से सहमत नहीं हूँ । और तुलसी रामायण ये कह रही है । कि राम के हाथों मरने के बाद बाली मोक्ष को प्राप्त हो गया । मोक्ष को प्राप्त होने के बाद भी बाली में बदले की भावना बनी ही रही । और उसने द्वापर में जन्म लेकर बदला चुकाया । ये कैसा मोक्ष था ?
राम के " बलप्रयोग " का एक और नमूना देखिये । जब समुद्र ने उन्हें लंका में जाने हेतु रास्ता नहीं दिया । तो राम समुद्र को शस्त्र विधा आदि से सुखाने पर आमादा हो गये । यहाँ भी निर्बल और जबर की सौदा थी । समुद्र राम के आगे कमजोर पङा । और उसे अपने ऊपर " सेतु " के निर्माण के लिये मंजूरी देनी पङी । यह समुद्र के आचरण और स्वभाव के विपरीत था । बंधने पर उसकी समुद्र वाली हैसियत समाप्त हो गयी । उस समय तो समुद्र दब गया पर समुद्र भी बदले की ताक में था । जब कोई मौका नहीं मिला तो उङीसा के राजा ( कलियुग में ) समुद्र के किनारे जगन्नाथ मन्दिर बनबाना चाहते थे । समुद्र राम से बहुत पहले का खार खाया बैठा था । उसने तीन बार आधे बन
चुके मन्दिर को अपनी ताकतवर लहरों से नष्ट कर दिया । राजा बेहद चिंतित हुआ । उसे कोई मार्ग नहीं सूझ रहा था । तभी कबीर साहब वहाँ पहुँच गये । राजा ने अपनी समस्या बतायी ।
तो कबीर ने समुद्र से बात की । समुद्र ने बताया कि राम से मैं त्रेता से ही चिङा बैठा हूँ । कबीर राजा को वचन दे चुके थे । अतः उन्होंने समुद्र को आग्या दी कि बदले के रूप में तुम द्वारिकापुरी को डुबो दो । पर मन्दिर बन जाने दो । समुद्र जानता था । कबीर का आदेश किसका आदेश है ? अतः उसने द्वारिका डुबोकर बदला पूरा किया । एक बात तो निश्चित है । थोङे समय के लिये किसी को दबा अवश्य लो । पर वो अपना बदला लिये बिना नहीं मानेगा ?
अब चलते चलते इसी संदर्भ में एक बात याद आ रही है । महाभारत के युद्ध के दौरान श्रीकृष्ण ने कहा कि युद्ध के परिणाम अच्छे नहीं होंगे । युद्ध में वीरगति को प्राप्त सैनिकों की विधवाएं वासना पूर्ति हेतु इधर उधर रुख करेंगी । तो इससे समाज में वर्ण संकरता आयेगी । उनके संतान भी अवैध होगी । वर्ण संकरता के सही मायने देखें । तो सबसे पहले श्रीकृष्ण ही वर्ण संकर थे । किसी ने जन्म दिया । किसी ने पाला । और पालने वाले को भी असलियत पता नहीं कि ये किसका बच्चा है ? इससे बङी वर्ण संकरता क्या होगी । ये सब कहने का मेरा अभिप्राय क्या है । कि राम कृष्ण कोई मामूली चीज थे ? या अपने स्तर पर गलत थे । हरगिज नहीं । मैं " रावण " को गलत नहीं मानता । तो राम इत्यादि तो बेहद अलग हैं ।
जरा सोचिये । इन चरित्रों के बारे में हम वाल्मीक रामायण या तुलसी रामायण से ही जानतें हैं । तो इनमें लिखी हुयी बात एक पक्षीय भी हो सकती है । इसलिये आँखे बन्दकर । ताली बजाते हुये । राम राम करते हुये । इन्हें पढने से कोई लाभ नहीं होने वाला । वाल्मीक और तुलसी भी तुम्हारी तरह आदमी ही थे । दूसरी बात जब आप वाल्मीक रामायण और तुलसी रामायण पढेंगे तो दोनों के भाव में खासा अंतर होगा । पर दिमाग की खिङकी खुली रखकर पढें तो ?

1 टिप्पणी:

vinay ने कहा…

आपकी अन्तिम पंक्ति दिमाग की खुली रख कर पड़ें तो,

जाकि रही भावना जैसी । हरि मुरत तिन देखी तैसी ।
इसमें निहित सत्य कह गयी ।

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