सोमवार, अगस्त 09, 2010

सृष्टि का रहस्य..1

एक लम्बे समय तक योग निद्रा में रहने के बाद । योग निद्रा से जागने पर भगवान की सृष्टि करने की इच्छा हुयी । भगवान में इच्छाशक्ति सदैव विधमान रहती है । उस समय उन्होंने इच्छाशक्ति से लौकिक स्वरूप धारण किया । और अपने उस रूप से प्रलय का फ़ैला हुआ अंधकार नष्ट किया । महाविष्णु के सभी अवतार पूर्ण कहे गये हैं । उनका पर स्वरूप भी पूर्ण है । और पूर्ण से ही पूर्ण उत्पन्न होता है । विष्णु का परत्व और
अपरत्व व्यक्ति मात्र से है । देश काल के सामर्थ्य से परत्व अपरत्व नहीं है । उस पूर्ण से ही पूर्ण का विस्तार होता है । और अन्त में उस रूप को ग्रहण करके पुनः पूर्ण ही शेष रहता है । प्रथ्वी के भार रक्षण आदि का
जो कार्य है । यह भगवान का लौकिक व्यवहार होता है । गुणमयी माया में ही भगवान अपनी शक्ति का आधान करते हैं । वे वीर्य स्वरूपी भगवान वासुदेव सब काल में सब देश में सर्वत्र विधमान होते हैं और तब ईश्वर कहलाते हैं । अपनी माया में प्रभु स्वयं वीर्य का आधान करते हैं । वीर्य स्वरूप भगवान वासुदेव हैं और सभी काल में सभी अर्थों से युक्त हैं । इनके अचिन्त्यवीर्य और चिन्त्यवीर्य के भेद से दो रूप हैं । जिनमें एक स्त्री रूप है । दूसरा पुरुष रूप है । दोनों स्वरूप ही वीर्यवान हैं । इनमें भेद नहीं मानना चाहिये । देवी लक्ष्मी कभी हरि से अलग नही हैं । वे सदा उनकी सेवा में रहती हैं । नारायण नाम से कहे जाने वाले हरि यधपि पूर्ण स्वतंत्र हैं । किन्तु वे लक्ष्मी के विना अकेले कैसे रह सकते हैं । पुरुष नामक उन विभु ने तीन गुणों की सृष्टि की है । भगवान ने प्रकृति के तीन गुणों की सृष्टि की । लक्ष्मी ने भी तीन रूप धारण किये । श्री । भू और दुर्गा । इनमें श्रीदेवी । सत अभिमानी । भू देवी रज अभिमानी । और दुर्गा तम अभिमानी हैं । फ़िर भी इन तीनों में अन्तर नहीं है । हरि ने तीन रूप धारण किये । जो ब्रह्मा विष्णु महेश के नाम से जाने गये । लोकों का पालन करने से सत गुण युक्त विष्णु कहलाये । सृष्टि हेतु रजोगुण से संयुक्त होने पर ब्रह्मा कहलाये । और संहार हेतु तम से संयुक्त शंकर कहलाये । भगवान जब सृष्टि कार्य हेतु उन्मुख हुये । तो उनमें क्षोभ उत्पन्न हुआ । इसके फ़लस्वरूप तीन गुणो वाला महतत्व प्रकट होता है । उस से ब्रह्मा और वायु का प्राकटय होता है । यह महतत्व रज प्रधान है । इस सृष्टि को गुण वैषम्य सृष्टि जानना चाहिये । फ़िर इस विशिष्ट
महतत्व में लक्ष्मी के साथ स्वयं हरि प्रविष्ट हुये । उन्होंने महतत्व को क्षुब्ध किया । इस क्षोभ के फ़लस्वरूप
उससे ग्यान द्रव्य क्रियात्मक यानी अहम तत्व उत्पन्न हुआ । इस अहं तत्व से शेष गरुण और हर उत्पन्न हुये ।
फ़िर से हरि ने लक्ष्मी के साथ इस अहं तत्व को क्षुब्ध किया । यह अहं तत्व वैकारिक तामस और तैजस तीन प्रकार का है । इस अहम के नियामक रुद्र भी तीन प्रकार के हैं । वैकारिक रुद्र । तामस रुद्र और तैजस रुद्र ।
फ़िर से भगवान ने लक्ष्मी के सात तैजस अहं तत्व को क्षुब्ध किया । इससे वह दस प्रकार का हो गया । जो श्रोत्र । चक्षु । स्पर्श । रसना । और घ्राण तथा वाक । पाणि पाद पायु और उपस्थ इन कर्म इन्द्रियों तथा ग्यान इन्द्रियों के रूप में दस प्रकार का कहा जाता है । फ़िर वैकारिक अहं तत्व को हरि ने क्षुब्ध किया ।
महतत्व से ग्यारह इन्द्रियों के ग्यारह अभिमानी देवता प्रकट हुये । पहले मन के अभिमानी इन्द्र और कामदेव हुये । बाद में अन्य देव उत्पन्न हुये । इसी प्रकार द्रोण प्राण ध्रुव आदि ये आठ वसु हुये । रुद्रों की सख्या दस है । मूल रुद्र भव कहे जाते हैं । रैवन्तेय । भीम । वामदेव । वृषाकपि । अज । समपाद । अहिर्बुधन्य । बहुरूप । महान ये दस रुद्र हैं । उरुक्रम । शक्र । विवस्वान । वरुण । पर्जन्य । अतिवाहु । सविता । अर्यमा । धाता । पूषा । त्वष्टा । भग ये बारह आदित्य हैं । प्रभव । अतिवह आदि उनचास मरुदगण हैं । पुरुरवा । आर्द्रव । धुरि । लोचन । क्रतु । दक्ष । सत्य । वसु । काम । काल । ये दस विश्वेदेव हैं ।
इन्द्रियों के अभिमानी देवो के समान ही स्पर्श रूप रस गन्ध आदि तत्वों के अभिमानी अपान व्यान उदान आदि वायु देवों की सृष्टि हुयी । रैवत । चाक्षुष । स्वरोचिष । उत्तम । ब्रह्मसावर्णि । रुद्रसावर्णि । देवसावर्णि । दक्षसावर्णि । धर्मसावर्णि आदि मनु हुये । ऐसे ही पितरों के सात गण हुये । इनसे वरुण आदि की पत्नी के रूप में गंगा आदि का आविर्भाव हुआ । च्यवन महर्षि भृगु के पुत्र और उतथ्य ब्रहस्पति के पुत्र हुये ।

2 टिप्‍पणियां:

arvind ने कहा…

bahut hi jaankaripurn lekh.

vinay ने कहा…

जय गुरूदेव की । कुछ तो जिज्ञासा शान्त हुयी,धन्यवाद ।

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