गुरुवार, अप्रैल 29, 2010

गंगा बचाओ..यमुना बचाओ.??.

गंगा बचाओ..यमुना बचाओ..भारतीय संस्क्रति बचाओ..ऐसा हो हल्ला आपने अवश्य सुना होगा और मैं इसके विरुद्ध भी
नहीं हूँ बल्कि मैं तो कहता हूँ कि आप छोटे छोटे तालाब कूंआ यहाँ तक कि सार्वजनिक नल आदि जो लोग पता नहीं क्यों तोङ देते हैं उन्हें भी बचाओ..एक कार्य जो मैं अक्सर करता या करवाता हूँ.. प्रायः हर शहर के लोग ये शिकायत करते हैं कि नगर निगम कूङा ठीक से नहीं उठवाता . मैं इस बात की
अपेक्षा एक बङा बांस (बाम्बू) या डंडा लेकर पोलीथिन आदि के ढेर को एकत्र करता हूँ जहाँ ये इकठ्ठे कूङे के ढेर रूप में होती
है और माचिस से आग लगा देता हूँ..पोलीथिन होने से आग आसानी
से लगती जाती है और मैं डंडे से सरकाते हुये कूङे की होली जलाता रहता हूँ इस तरह कुछ ही देर में कूङे का मुंह चिङाता विशाल ढेर
छोटे से राख के ढेर में बदल जाता है .यही कार्य मैं हानिकारक और गैर उपयोगी पोधों जैसे गाजर घास के साथ करता हूँ..गाजर घास आस पास होने से दमा की या स्वांस बीमारियों की संभावना रहती है..देखा आपने गम्भीर समस्याओं का समाधान एक डंडे और माचिस के द्वारा..ऐसे ही आप दूषित पानी की समस्या से जूझ रहे हैं तो बहुत सस्ता एक उपाय आजमायें..गुलाबी फ़िटकरी आप बेर के साइज के बराबर लगभग पन्द्रह लीटर पानी में रात में बाल्टी में डाल दें सुबह होने पर किसी गिलास से पानी बिना अधिक हिलाये आप दूसरे बर्तन में निकाल लें ध्यान रहे कि फ़िटकरी नीचे तली में रहेगी..यह पानी किसी भी वाटर फ़िल्टर से बेहतर है क्योंकि फ़िटकरी पानी को फ़ाङकर अशुद्धियों को अलग कर देती है और पानी छानकर एकदम शुद्ध हो जाता है..ध्यान रहे फ़िटकरी गुलाबी
ही हो सफ़ेद नहीं..ये पानी पेट रोगों के लिये हितकारी है पर विशेष ध्यान रखें कि सुबह पानी निथारते समय फ़िटकरी का अंश न जाय हालांकि ये हानिकारक नहीं पर आपसे पीया नहीं जायेगा..इस उपाय से नाले के समान गन्दा पानी पीने योग्य हो जाता है
मैंने ये अध्याय गंगा यमुना बचाओ से शुरु किया और क्या कहने लगा दरअसल मुझे हंसी तब आती है जब संत समुदाय ये बात कहता है कि इन्हें बचाओ या भारतीय संस्क्रति को बचाओ..हालांकि मैं फ़िर भी कहता हूँ कि हमें ऐसी कोशिश करनी चाहिये...लेकिन..इसमें एक बङा लेकिन लगा हुआ है..जिन लोगों ने श्रीकृष्ण से सम्बन्धित पुराणो का अध्ययन किया होगा उन्हें एक बात पता होगी कि देवी राधा के शाप से पांच हजार बरसों के लिये गोलोक से ये गंगा यमुना . तुलसी और शंखचूङ इस मृत्युलोक में आये हैं और वो समय समाप्ति की ओर है
अतः क्यों कि इनकी विदाई का समय निकट है अतः लाख प्रयासों के बाद कुछ नहीं होगा और इसी का ये परिणाम है कि इनके पानी या तुलसी के पत्तों में वह गुणवत्ता नहीं है जो आयुर्वेद आदि में वर्णित है. आप शायद ये बात भी न जानते हों कि उच्च लोकों में वास करने वाली आत्मायें प्रथ्वीलोक के नाम पर नाक भों सिकोङ लेती हैं इसी लिये जब द्वापर में श्रीकृष्ण का अवतार होता है तब देवी राधा की इच्छानुसार गोलोक की भूमि का व्रन्दावन नाम का विशाल बाग जो कई सो योजन लम्बा चौङा है मृत्युलोक में आ जाता है और जब अवतार हेतु समाप्त होता है तो ये बाग वापस चला जाता है..उस बाग की भूमि और भगवान की लीला आदि मिलाकर इस मथुरा व्रन्दावन (जो वर्तमान में है ) में वो दिव्यता की खुशबू जैसी बनी रहती है जो अध्यात्म वातावरण का प्रभाव पैदा करती है .इसलिये जो आज के प्रश्न है उनके शास्त्रों में उत्तर हैं जो आत्म ग्यान या मुक्ति ग्यान के प्रश्न है उनके संत वाणी या संतमत की पुस्तकों में उत्तर हैं .??

मंगलवार, अप्रैल 20, 2010

हम खून पीते हैं ??

मैं अक्सर लोगों से कहता हूँ कि क्या ये बात
आपको पता थी .आज मैं आपको वो बात बताने जा रहा हूँ जो वास्तव में मुझको भी नहीं पता थी और साथ ही ये भी सोचता हूँ कि जिन को मैं दोषी कह रहा हूँ तो मेरी ये धारणा उचित है अथवा अनुचित आप कल्पना करें कि किसी भी जगह एक नवजात शिशु चाहे वो इंसान चिङिया या किसी भी जानवर आदि का क्यों न हो और वो आप सबकी जानकारी में केवल इसलिये
भूख से तङपता हुआ मरेगा क्योंकि उसके जीवन का कोई उपयोग ही नहीं है . कल्पना करिये कि वो आपका ही बच्चा है तो आपको कैसा लगेगा .और मैं एक बात और भी बता
दूँ कि इस पाप को देखने और सहभागी होने के लिये हम सब एक तरह से मजबूर हैं और आगे पङते ही आप जान जायेंगे कि आप या कोई भी इससे अछूता नहीं है . आप महिला है या पुरुष सुबह या शाम आप दूध लेने जाते है..जो आपने किसी भेंस या गाय वाले से बांध रखा है ये दर्दनाक
प्रसंग उसी से जुङा है . भेंस या गाय के दूध देने से पूर्व उसका बच्चा होना आवश्यक होता है ये बच्चा यदि मादा के रूप में जन्मा है फ़िर तो कोई बात नहीं है पर दुर्भाग्य से यदि ये नर के रूप में जन्मा है तो भूख से तङफ़कर मर जाना ही उसकी नियत है क्योंकि आजकल भेंसा या वैल का कोई उपयोग नहीं है लिहाजा कसाई जो पहले से तैयार होता है पड्डा या बछ्डा के जन्म से बेहद खुश होता है और उसको काटकर उसकी खाल में भूसा भरकर भेंस बाले को लौटा देता है कुछ लोग जो थोङा दयालु होते हैं वो जिन्दा पड्डा कसाई को देकर हत्या का पाप नहीं लेना चाहते और उसको भूखा रखकर मार देते हैं .
अब इस पर उनके तर्क सुनिये जो किसी हद तक सही हैं एक पड्डा दोनों समय एक ढेङ किलो दूध तब पीता है जब
उसको थोङा पिलाया जाय यानी लगभग पचास रुपये प्रतिदिन ...फ़िर कब तक उसे खिलाकर जिन्दा रखोगे..? अगर रख भी लोगे तो उसका होगा क्या..?
अब सुनिये जो मेरा विचार है . भेंस या गाय को इससे क्या मतलब कि तुमने (मनुष्य ) आधुनिकी में उसका उपयोग ही खत्म कर दिया क्या वो अपने बच्चे के लिये तङपे भी नहीं या आपको कोसे भी नहीं कि आपने उसके बच्चे की हत्या कर दी..ऐसे ही कुछ मिले जुले विचार और भी हो सकते हैं पर हम इससे इंकार नहीं कर सकते कि हम किसी भी बेबस पशु की हाय और हत्या से बचे हुये है..और इस तरह हम जो दूध पीते हैं वो दूध न होकर खून है सिर्फ़ ...खून..blood..only..

शनिवार, अप्रैल 10, 2010

एक सामने खुला , दूसरा नीचे मुख किये हुये है ??

तप करने का अर्थ ये है कि...??
शरीर और इन्द्रियों को तपाने से शक्तियों का संचय होने लगता है .तपाने या तप करने का अर्थ ये है कि मन को प्राण में और प्राण को परमात्मा में लगायें ..जब प्राण में प्राण का हवन किया जाता है तो प्राण में प्राण के संगत से प्राणसूक्ष्म होने लगता है तब इन्द्रियां शान्त होने लगती हैं .मन अपने दौङने की गति पर रुक कर चलता है तब बुद्धि में शुद्धता आने लगती है यानी प्राण व इन्द्रियों की गति समान होने लगती है . तब शुद्ध ध्यान परमात्मा की ओर चलता है और उस ध्यान से सारतत्व का बोध होने लगता है .?
लम्बा स्वर जो देर तक प्रतीत होता है . वह ध्वनि को प्रकट कर लेता है .सपेरा बीन में लगातार फ़ूँक मारकर ऐसी ध्वनि पैदा करता है तो सर्प मस्त होकर शरीर का ध्यान खो देता है इसी प्रकार शरीर रूपी बाँसुरी में जिसमें सात स्वर ऊपर की ओर और दो नीचे की ओर हो रहे हैं . उन दो नीचे वालों में
एक सामने खुला , दूसरा नीचे मुख किये हुये है . ऐसी शरीर रूपी बाँसुरी में फ़ूँक मारता है तब इस शरीर रूपी बाँसुरी में वाक (वाणी ) पैदा हो जाती है जब स्वर निरन्तर ध्वनि करता है तब उस स्वर में ध्यान की संगति हो जाती है .??

जीव कंठ देश में निवास करता है ??.

सुरति क्या है ???
जब अन्तकरण स्थिर होकर किसी ओर चलता है . यानी मन , बुद्धि , चित्त , अहंकार
एक होकर संगत की इच्छा करतें हैं . उसे सुरति कहा जाता है .उस सुरति से अंतर में देखो तो जीवात्मा का रहस्य मिल जाता है . जीव के रहस्य को जानकर पारब्रह्म परमात्मा का रहस्य या स्वरूप पहचाना जा सकता है .?
जीव कंठ देश में निवास करता है . जब साधक के ह्रदय में अभ्यास के द्वारा शान्ति की धारा बहने लगती है तब साधकशरीर का ध्यान न रखकर परमात्मा में निष्ठा करता हुआ संसार में विचरण करता है यानी सुरति के द्वारा अंतकरण में शून्यता प्रतीत होने लगती है तथा जगत निस्सार लगता है तब साधक अपने साधन में संगत होकर संसार मे विचरता है . यही योगीजनों का क्रीङा रूप है ध्यान मनन चिन्तन सुमरण करता हुआ अन्य जीवों का भी उद्धार करता हुआ अन्दर बाहर विचरता है .??

शून्य आकाश से प्राण में " हँस हँस " इस मन्त्र का उच्चारण करती हुयी....

शून्य में हँस का जनम हुआ है ??
शून्य में हँस का जनम हुआ है जिस प्रकार आकाश में वायु की संभावना है तथा शरीर में जो परावाणी स्वतः अपना कार्य स्वांस को चलाने का कर रही है उसी प्रकार से बाहर जिह्वा के द्वारा बल देने पर वाक्य पैदा हो जाते है यानी शरीर के बाहर शून्य व्यापक ब्रह्म सर्वत्र समाया हुआ है . उससे ही शरीर में प्रवेश होने से " सो " तथा फ़ेंकने पर " हंग " शब्द उत्पन्न होते हैं . कहने का तात्पर्य यह है कि शून्य से ही स्वांसा " हँसो "का उच्चारण कर रही है . शून्य आकाश से प्राण में " हँस हँस " इस मन्त्र का उच्चारण करती हुयी स्वांस में बहती है . इस प्रकार से प्राणायाम का अभ्यास करने वाला पुरुष रात दिन स्वांस प्रश्वांस के साथ 21600 जप सर्वदा करता है .
सत्संग का आशय परमात्मा के संग से है चाहे वह परमात्मा की वाक द्वारा विवेचना करने में या समाधि द्वारा साक्षात्कार करने को ही सत्संग कहा जाता है . वह नाम या रूप के प्रसंग से परिपूर्ण हो यानी परमात्मा का निर्णय किसी भी भाव से किया जाय वह सत्संग ही है .ग्यानी पुरुष को चाहिये कि वह साधक की बुद्धि के आधार पर ही उसके मनन चिन्तन
निदिध्यासन की उपेक्षा करे क्योंकि जीव में अलग अलग निष्ठा होती है .भावनात्मक साधना को करता है और प्रतीक उपासना को ग्रहण करता है .साधना करने वाले की बुद्धि परीक्षा करके उसे वैसे ही परमात्मा का उपदेश
करना चाहिये . बुद्धि मल विक्षेप आवरण से ढकी होती है जब यह आवरण हट जाते हैं तो परमात्मा में स्वतः निष्ठा हो जाती है .

पाँच तत्वों से बने इस शरीर के अन्दर चक्रों का प्रतिपादन

शरीरमें चक्रों की स्थिति क्या है ?
पाँच तत्वों से बने इस शरीर के अन्दर चक्रों का प्रतिपादन इस प्रकार है .शरीर में गुदाद्वार व लिंग के बीच " स्वाधिष्ठान चक्र " है . इसमें गणेश का निवास है . लिंगदेश में " मूलाधारचक्र " है . जिसमें ब्रह्मा का निवास
है जो स्रष्टि की उत्पत्ति करता है . नाभि में " मणिपूरक चक्र " है . जिसमें शक्ति का निवास रहता है . यहाँ पर कुण्डलिनी भी चौबीस नाङियों के सहित निवास करती है .नाभि के ऊपर उदर में " अनाहत चक्र " है जिसमें पार्वती सहित शंकर निवास करतें हैं और संहारकर्ता की भूमिका निभाते है.
और ह्रदय देश में कण्ठ के नीचे "विशुद्धचक्र " है . जिसमें विष्णु भगवान जो स्रष्टि का पालन करते हैं . वह इस क्षीर सागर में निवास करते हैं .कण्ठ पर जीव निवास करता है . जो शरीर को धारण किये हुये शरीर में व्यापक है . मुख में कण्ठ के ऊपर तालु में एक छिद्र जो ऊपर की ओर गया है जिसे " ब्रह्मरन्ध्र " भी कहा जाता है . उसका द्वार ही "व्योमचक्र" है .जहाँ सरस्वती निवास करती है . दोनों भोहों के बीच में "आग्याचक्र" है .
जहाँ गुरुदेव का निवास है .इसके ऊपर चोटी पर" सहस्रारचक्र " है जिसे सहस्रदल भी कहते हैं जहाँ हजार पँखुङियां है जिसके बीच में " हंग " नामक शक्ति रहती है . उसके ही प्रभाव से सारे शरीर में चेतना पहुँचती रहती है . " हंग " का बिम्ब पहले आग्याचक्र में पङता है जिसमें दो पँखुङी का कमल है . तिरछा बिम्ब पङने के कारण दो शब्द प्रकट हुये " हंग क्षंग " फ़िर उसका प्रतिबिम्ब नाभि पर पङा बीच में सभी चक्रों पर शब्द का ऐसा प्रताप हुआ कि सारे चक्रों पर शब्द प्रकट हो गया .
चक्रों पर संयम करने से होने वाले लाभ क्या है ?
नाभिचक्र - नाङियों के ग्यान में पारंगत , शरीर की धातुओं का ग्यान , कुण्डलिनीशक्ति जाग्रत .
ब्रह्मपुर , वक्षस्थल - चित्त तथा शरीर स्थिर .
कण्ठ - भूख प्यास पर विजय , जीव के स्वरूप को जानना .
तालू के छेद , व्योमचक्र - सूक्ष्म स्वरूप को जानना , इसमें प्रवेश होकर दसवें द्वार से होकर स्वर्ग तथा प्रथ्वी के बीच स्थित सभी सिद्ध लोगों को देखता हुआ लोक लोकांतरों में प्रवेश हो ब्रह्म में मिल जाता है .
आग्याचक्र , दोनों भोहों के बीच - त्राटक सिद्ध कर लेता है .
सहस्रदलचक्र - आठों सिद्धियां , नौ निधियां , काफ़ी समय तक प्राण खींचकर समाधिस्थ रह सकता है .

काल समय को कहा गया है .समय सूर्य से उत्पन्न हुआ है .

संजीवनी विधा क्या है ?
जीव के स्थूल शरीर में जो सुषमना नाङी नाभि से लेकर टेङी मेङी नासिका तक आती है इसलिये इसे वक्रनाल भी कहा गया है . इसी नाङी में प्राण के द्वारा श्वसन हो रहा है उस प्राण के टेङी मेङी नाङी में टकराने से एक शब्द प्रतीत होता है . वह दो वर्णों वाला है .वह बाहर के शून्य अविनाशी अक्षर की संगति से प्रकट हुआ है और नाद में उसी में मिल जाता है जैसे घण्टी में हथौङा मारने पर घन्टी में एक शब्द प्रकट होता है और उसी पल ध्वनि रूप बनकर शून्य में पहुँच जाती है . वैसे ही उस स्वर में प्रवेश होने से इन्द्रियों में स्थिरता आ जाती है और उस स्थिरता के बाद शरीर का ध्यान तक नहीं रहता है .
तब जीव ध्वनात्मक सुरंग में प्रवेश होकर ब्रह्म से मिल जाता है यानी स्वर में जब ध्यान पहुँचता है उस समय ध्वनात्मक सुरंग प्रतीत होता है . तब वह विदेह सर्वत्र व्यापक सुरंग में विलीन हो जाता है . जो प्राण को उत्पन्न करने वाला तथा प्राण से भी परे प्राण का आधार ध्वनिमय विराट पुरुष का प्राण शब्द है . वह घट का शब्द नहीं तथा न वर्ण वाला है .
वह सदा एकरस , विदेह तथा व्यापक अति सूक्ष्म एवं अति लम्बा लगातार होने वाला स्वर है . यहाँ पर यह भी कहना पङता है कि उसका ध्यान विराट पुरुष को ध्येय बनाकर करना होगा . उसका मरम सहज योग वाला है . क्योंकि तालू में जो ऊपर की ओर छिद्र गया है . वह एक रास्ता नासिका
की इङा पिंगला नाङियों में मिल गया है और एक सीधा ऊपर की और सहस्रदल कमल में तथा उसी से सटा हुआ एक सहज रास्ता दसवें द्वार से होता हुआ ऊपर की ओर धुर तक गया है . वही विदेह द्वार है . वहाँ से ही योगीजन ध्वनात्मक शब्द को पकङकर यानी प्राण में जो कंपन करनेवाला है . निरन्तर तथा सनातन स्रष्टि का कारण है तथा प्राणों का प्राण है . उसमें ध्यान लगाकर विराट पुरुष में लीन हो जाते हैं . ऐसी स्थिति हो जाने पर उसे काल नहीं मारता क्योंकि वह काल से भी परे विचरण करते हैं . काल समय को कहा गया है .समय सूर्य से उत्पन्न हुआ है .इसलिये वह देहमुक्त योगी सूर्य से भी परे लोकों में जाकर उससे भी आगे धुर तक जाता है तथा फ़िर वापस लौट भी आता है . वह इस प्रकार बार बार मृत्यु को प्राप्त होकर तथा पुनः जनम को धारण होने वाला मृत्यु तथा जनम के मरम को जानकर क्रीङा करता हुआ सारे बन्धनों से मुक्त एकरस निरन्तर सच्चिदानन्द भाव को प्राप्त हो जाता है . वास्तव में वही मेरा परम स्वरूप है .इसको पाकर सबको पाता है . इसे संजीवनी विधा , पारब्रह्म ग्यान आदि सनातन , विराट पुरुष के स्वरूप का माध्यम तथा बोध बताया गया है .

शब्द का तात्पर्य है अक्षर यानी अविनाशी तत्व

शब्द क्या है ??
सबद सबद सब कोय कहे , वो है सबद विदेह .?
जिह्वा पर आवे नहीं , निरख परख कर लेह .?
शब्द का तात्पर्य है अक्षर यानी अविनाशी तत्व जो सदा रहने वाला है . जो जगत का कारण रूप है . वह शब्द ही सारी स्रष्टि लोक लोकांतरों तथा प्रथ्वी आकाश आदि का मिला हुआ गोल रूप सबसे घिरा हुआ आलोक प्रतीत होता है . वह ब्रह्माण्ड ही है
इसमें दो ध्रुव है . एक ध्रुव से दूसरे ध्रुव के बीच एक ऐसा स्पंदन है . जिसमें अक्षर रूप ही स्पंदन है . यह शब्द दो प्रकार का है . वर्णात्मक , ध्वनात्मक .स्वांस लेने और छोङने में जो शब्द है वो वर्णात्मक है . ध्वनात्मक ध्वनिमय है .
घन्टा में हथौङा मारने से एक ध्वनि पैदा होती है . वैसी ही ध्वनि इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में लगातार समायी हुयी है . जो ह्रदय भाव से लगातार प्रतीत होती है ..यानी तत्व बोध का मार्ग रूप है . आकाश का गुण शब्द है . इसलिये यह शब्द सब
जगह आकाश होने के कारण समाया है . शब्द में सुरति के बांधने से सब प्रकार के ग्यान हो जाते हैं और यह अक्षर अविनाशी है जो कभी भी नष्ट नहीं होता है .शब्द के बारे में संतो ने भेद करके बताया कि एक शब्द घटाकाश में तथा एक आकाश में निवास करता है . जिसे निःअक्षर कहा गया है .
सबद सबद सब कोय कहे , वो है सबद विदेह .?
जिह्वा पर आवे नहीं , निरख परख कर लेह .?
शब्द का वाक्य सब लोग कहते हैं .परन्तु जो वास्तविक अक्षर है . वह विदेह है..यानी शरीर के आखिरी सिरे पर प्रकट हो रहा है . जिसको देख और पहचान ले..जो जिह्वा पर नहीं आता और न ही वह घट वाले शब्द जैसा है . वह प्राण के वाक्य से सूक्ष्म सर्वत्र समाया हुआ है . उसे ग्यानी ही जान सकता है . जिसे आँख खोलकर तथा कान के बिना प्रत्याहार से खुले रूप में ही प्रतीत होने वाला है . ऐसा वह
सुन्न में तथा सुन्न के पार स्थित है .
कुदरती काबे की तू महराब में सुन गौर से..आ रही है धुर से सदा तेरे बुलाने के लिये ?
क्यों भटकता फ़िर रहा तू ए तलाशे यार में रास्ता सहरग में है दिलवर पै जाने के लिये .?
कुदरत ने कावा रूपी शरीर दिया है . इसमें सुन . यदि तू उस शब्द को ध्यान से सुनेगा तो जो उस धुर से यहाँ तक जो ध्वनात्मक शब्द हो रहा है . वह तेरे ध्यान पर पङ जायेगा और यह भी महसूस होगा कि वह विदेह शब्द धागे की तरह सम्बन्ध में किये हुये है . वह बुला रहा है .उससे मिलकर खुदा से मिल जा . जो साहरग का मार्ग दसवें द्वार से होकर गया है . उसमें निर्भय होकर रम जा .रास्ता तय होने में कोई समय नहीं लगता .उस परमात्मा का साक्षात्कारप्रवेश होने पर क्षण में ही हो जाता है .जहाँ पाँच तत्वों की गाँठ बनती है वहाँ जीव में चेष्टा होने लगती है .
ब्रह्म में प्रीत न होकर बाह्य विषयों में आसक्ति है तभी तक विकल्प से उत्पन्न यह जगत दिखायी देता है . ब्रह्म में चित्त की स्थिरता होने पर केवल ब्रह्म ही दिखायी देता है .राग , द्वेश , काम ,क्रोध . लोभ , मोह , छह झूलों में झुलाकर ही ये कालक्रीङा कर रहा है .???

आत्मा प्राण से भी अति सूक्ष्म है ??

शरीर का ध्रुव प्राण है . प्राण का केन्द्र आत्मा है .??
शरीर का ध्रुव प्राण है . प्राण का केन्द्र आत्मा है . जब शरीर
की स्थिरता होती है तब प्राण का सूक्ष्म रूप साफ़ साफ़ प्रतीत
होने लगता है . जब वह प्राण का सूक्ष्म रूप ही जब जीव को
सुरति के द्वारा भाषने लगता है तब आत्मा का साक्षात्कार होने लगता है क्योंकि आत्मा प्राण से भी अति सूक्ष्म है .सूक्ष्म आत्मा में प्राण के प्रवेश होने पर प्रकाश होने लगता है .
सूक्ष्म द्रष्टि वाले पुरुषों द्वारा सूक्ष्म तीक्ष्ण बुद्धि से परमात्मा
देखा जाता है क्योंकि परमात्मा सूक्ष्म से भी सूक्ष्म है .
साधक सुरति पर सवार होकर अपने अन्तर में देखता है तथा
प्राण का अभ्यास करता है तब वह एक अदभुत ध्वनिमय शब्द को पाता है . वह ध्वनिमय शब्द देर तक अनुभव में आता है . तब वही लम्बा अभ्यास भूमा का रूप धारण कर लेता है .जो यह आत्मा से उसका स्वरूप पाँच स्वरूपों में आच्छादित किया गया तथा इसका स्वरूप विराटमय है . एक विराट प्रकाश का आलोक जिसमें पाँच महाभूत आकाश , वायु , जल प्रथ्वी , अग्नि आदि सम्मिलित है . यह पाँच कोष वाला है . प्राणमय , मनोमय ,ग्यानमय , विग्यानमय , आनन्दमय पाँच कोषों में व्यापक स्वरूप वाला है .
ध्यान में-प्राण में प्रवेश कर प्राणमय कोष में , तब प्राण सूक्ष्म प्राण में अन्तःकरण होने के कारण मनोमय कोष में मन निर्मल- मन निर्मल हो तो ग्यानमयकोष में , स्वतः ग्यान का आनन्द , ग्यानमय कोष से विग्यानमय कोष में . इन चारों के बाद परमात्मा के वास्तविक सत्य सर्वत्र तथा निरन्तर अविनाशी आनन्द मय कोष में पहुँचकर परमब्रह्म परमात्मा को भलीभांति पाकर आनन्दित हो जाता है .
परमात्मा ही शरीर रूपी वृक्ष पर जीव के साथ ह्रदय में बैठा हुआ है . साधक अभ्यास के द्वारा अन्तःकरण का एक भाव होकर एक दिशा में चलता है तब वही दिव्य नेत्र अन्तर ही ह्रदय में अपनी आत्मा के दर्शन करता है .
जब मनुष्य आत्मतत्व का दर्शन करने के अभ्यास में लग जाता है तब अचेतन शरीर आदि पदार्थों से उसका मोह छूट जाता है तब वह ग्यान नेत्रों के द्वारा अपने आत्म बल को देखता है .

परमात्मा का नाम जिह्वा के द्वारा उच्चारण में आने वाला नहीं .

परमात्मा का नाम क्या है ???
नाम - परमात्मा का नाम जिह्वा के द्वारा उच्चारण में आने वाला नहीं .जबकि सारे वर्ण उच्चारण में आते हैं . वह नाम ध्वनात्मक रूप वाला प्राण में निवास करता है जिससे वाणी आदि उत्पन्न हुयी . हम सारे नाम जानते हैं . राम ,कृष्ण , ईश्वर , खुदा ,गाड , बुद्ध ,परमात्मा , भगवान आदि को ही उस परमब्रह्मपरमेश्वर का नाम समझते हैं .
ब्रह्म राम ते नाम बङि , वरदायक वर दान .
राम चरित सत कोट मह , लिय महेश जिय जान .
यह जो परमात्मा का नाम है वह राम से बङा तथा ब्रह्मा से भी श्रेष्ठ है .इससे यह सिद्ध होता है कि नाम कोई और है जो राम अक्षरों से भी विलक्षण है क्योंकि नाम के ही प्रभाव से राम के चरित्र को शिवजी ने सतकोट में ही जान लिया है . ऐसा वह नाम सबका वरदान तथा वरदाता है . ऐसा वह प्रभावशाली परमात्मा का नाम है .??
जासु नाम सुमरति एक बारा , उतरहिं नर भव सिन्धु अपारा .
राम नाम मनि दीप धरु , तुलसी भीतर बाहिरहु जो चाहिय उजियार .
जीभ के आखिरी सिरे रखकर यानी प्राण के ध्वनात्मक नाम का दहलीज पर रखकर ध्यान करें तो अन्दर बाहर दोनों और उजाला हो जायेगा .ऐसा वह नाम गुण वाला है .

मैंने एक लेपटाप और नेट कनेक्शन

प्रिय इन्टरनेटी बन्धुओं ,मित्रों
मैंने एक लेपटाप और नेट कनेक्शन (इसी होली पर ) महज इसलिये लिया था कि मैं अपने जैसे आध्यात्मिक विचारों वाले बन्धु बान्धवों से मिल सकूँ .जो जीवन को 100 बरस की वह पाठशाला मानते हों जिसमें हमें न सिर्फ़ इस भवसागर से पार होने का रास्ता खोजना है बल्कि उस स्कूल में दाखिला लेकर वह पढाई ( साधना ) भी पूरी करनी है.
क्योंकि ग्यानीजन अच्छी तरह जानते हैं कि ये मानव देह हमें चार प्रकार की (अण्डज , पिण्डज , ऊश्मज ,स्थावर ) चौरासी लाख योनियों को जो कि लगभग साढे बारह लाख
साल में भोगी जाती है ,के बाद मिलता है .इतने कष्टों और इतने समय बाद मिले उस मानव शरीर को जिसके लिये देवता भी तरसते हैं . किस्से कहानियां लिखने पढने ,चैटिंग सेटिंग करने , भोग विलास के रास्ते तलाशने , आलोचना समालोचना करने , मन और देह की आवश्यकता् पूर्ति (जो कभी पूरी नहीं होती ) हेतु लगाये रखना मेरे ख्याल से तो बुद्धिमानी नहीं है . सो इस हेतु क्योंकि ज्यादातर बुद्धिजीवी आत्माओं का अब इन्टरनेटी संस्करण और सम्पर्क ही उपलब्ध है और एक दूसरे का समय नष्ट किये बिना , चाय नाश्ते का कष्ट दिये बिना , सम्पर्क का इससे बेहतर साधन अभी तो कोई नहीं है . अपने इसी प्रयोजन हेतु मैंने कुछ प्रोफ़ाइल विभिन्न साइट
पर डाल दिये . पर इसके रिस्पाँस का जिक्र भी करना अखण्ड ब्रह्मचर्य को खतरे में डाल सकता है . सो हे अन्तर्जाल चक्रव्यूह के निपुण द्रोणाचार्यों मेरी मदद करो कि इस जाल पर उन लोगों का केम्प कहाँ लगा है जो सादा जीवन उच्च विचार , परमार्थ मुक्ति . ग्यान ,आत्मा ,परमात्मा जैसी बातों में भी दिलचस्पी रखते हैं . भला कर भला होगा को चरितार्थ करते हुये आप इतना तो कर ही सकते हैं . धन्यवाद email -golu224@ yahoo.com
या फ़िर satguru-satykikhoj.blogspot.com पर चिपका दें तो मेरे जैसे अन्य तलाशक भटकने से बच जांय .

सोमवार, अप्रैल 05, 2010

सौ साल का नरक ...एक घंटे में..??

एक बार मीरा के ससुराल वाले उसे बुलाने आये क्योंकि ससुराल पक्ष से विभिन्न कारणों से मीरा परेशान थी और ससुराल नहीं जाना चाहती थी इसलिते भागकर रैदास जी के घर आ गयी और बोली गुरुजी जल्दी से मुझे छिपने का स्थान बता दें..मैं ससुराल नहीं जाना चाहती.. रैदास जी ने एक मरे हुये ऊँट का पिंजर सूख रहा था उसकी तरफ़ इशारा करते हुये कहा कि जाकर उसमें छुप जाओ हङबङाहट में मीरा उसमें छुप गयी..एक घन्टे बाद रैदास जी ने उससे निकल आने को कहा..बाहर निकल कर मीरा बोली कि गुरु जी आज तो आपने मार डाला बदबू के मारे मेरा जीना मुश्किल हो गया..वहाँ छुपने के लिये आपने क्यों कहा ?
रैदास जी ने कहा कि तेरा सौ साल का नरक एक घन्टे में कट गया..तब मीरा इस बात का रहस्य समझी . सभी जानते हैं कि संत रैदास जी चर्मकार कुल में हुये थे और जूते गांठने ,बनाने का कार्य करते थे और उनकी शिष्या मीरा का सम्बन्ध महलों से था . इस बात को लेकर
सब मीरा की हँसी बनाते थे और कहते थे कि तेरा गुरु जूते गांठता है . तब परेशान होकर मीरा ने एक बहुमूल्य हीरा लिया और गुरु जी से जाकर कहा कि गुरुजी आप इस हीरे को बेचकर अपनी स्थिति सुधार लें .सब लोग मेरी काफ़ी हँसी बनाते हैं मुझसे आपकी बेइज्जती बरदाश्त नहीं होती रैदास जी ने हँसकर कहा कि संतों की रहनी अलग ही होती
है उन्हें हीरे मोती से कोई मतलब नहीं होता है . इसलिये जो कहता है उसको कहने दो और तुम कोई चिन्ता न करते हुये नाम की कमाई करो . यही मनुष्य की वास्तविक दौलत है .
विशेष- एक संत ने भी रैदास जी की कमजोर आर्थिक दशा देखते हुये पन्द्रह दिन के लिये पारस पत्थर दे दिया लेकिन रैदास जी ने उसका कोई उपयोग नहीं किया .ये घटना मेरे किसी ब्लाग में आपको मिल जायेगी .
कोई तो तन मन दुखी ,कोई चित्त उदास ..एक एक दुख सभन को सुखी संत का दास
भीखा भूखा कोई नहीं सबकी गठरी लाल ..गिरह खोल न जानही ताते भये कंगाल
नीच नीच सब तर गये संत चरन लौलीन ...जातहि के अभिमान से डूबे बहुत कुलीन .

जो मैं ऐसा जानती..?

मोहे गुरु मिले रैदास बलम घर ना जाऊँ .
एक बेली के दोऊ तोमा ,एक ही उनकी जात .
एक गलिन में लुढकत डोलत ,एक संत के हाथ .
एक माटी के दोऊ भांङे .एक ही उनकी जात .
एक में रक्खे माखन मिश्री , एक धोवी के हाथ .
मोहे गुरु मिले रैदास , बलम घर ना जाँऊ .
जो मैं ऐसा जानती, भगति करे दुख होय .
नगर ढिंढोरा पीटती ,भगति न करियो कोय .
नाम लेयु और नाम न होय , सभी सयाने लेंय .
मीरा सुत जायो नहीं , शिष्य न मुंङयो कोय .
सबहिं सयाने एक मत ,पहुँचे का मत एक .
बीच में जो रहे , उनके मते अनेक .
पायो जी मैंने नाम रतन धन पायो .
वस्तु अमोलक दयी मेरे गुरु ने दिन दिन बङत सवायो .
आमतौर पर कम ही लोंगों को ये बात पता है कि मीराबाई सहजयोग राजयोग ,सुर्ति शब्द योग (तीनों का एक ही मतलब है ) की महान साधिका थी . मीरा जी जब छोटी थी तो उनकी गली में एक बारात आई उनसे कुछ बङी लङकियां बात कर रही थी कि देख दूल्हा वो है . देख दूल्हा वो है . मीरा ने घर आकर पूछा . माँ ये दूल्हा क्या होता है और मेरा दूल्हा कौन है . उनकी माँ ने बालिका मीरा को बहलाने के लिये श्रीकृष्ण की मूर्ति की तरफ़ इशारा कर के कह दिया कि तेरा दूल्हा ये है . इस बात ने मीरा के मन पर गहरा असर डाला और वो श्रीकृष्ण को ही अपना पति मानने लगीं और काफ़ी समय तक उन्होंने श्रीकृष्ण की भक्ति की .
एक दिन की बात है कि उनकी एक कामवाली देर से काम पर आयी तो मीरा की माँ ने देर से आने का कारण पूछा . तब उसने कहा कि उसके घर पर उसके गुरु महाराज जी ( संत रैदास जी ) आये हुये हैं . मीरा ने उत्सुकता से पूछा कि ये गुरु क्या होते हैं ? कामबाली ने बताया कि गुरु हमें भगवान का दर्शन कराते हैं . मीरा ने उत्सुकता से पूछा कि क्या वे उसे श्रीकृष्ण का दर्शन करा सकते हैं उसने कहा . हाँ गुरु ऐसा कराने में समर्थ होते हैं . यह सुनतेही मीरा दौङी दौङी रैदास जी के पास गयी . तब रैदास जी ने उसे आत्मकल्याण का एकमात्र हेतुक नाम ( ढाई अक्षर का महामन्त्र ) दिया और वास्तविक सत्य का बोध कराया..??
पायो जी मैंने नाम रतन धन पायो..??
मीरा का नाम आज नामभक्ति से ही अमर है . मीरा ने कोई शिष्य नहीं बनाया था और न हीं उनके कोई संतान हुयी थी जो आगे चलकर उनका नाम चलाती . मीरा ने संतो की संगति के बारे में कहा है कि एक ही बेल पर दोंनों तोमे
(कङवी लौकी जिसका महात्मा कमन्डल बना लेते है ) लगते हैं पर महात्मा के हाथ में पहुँच जाने पर उसकी इज्जत बढ जाती है . अन्यथा कङवी होने से वह गलियों में पङी रहती है . एक ही मिट्टी से बने दोंनों बर्तन होते हैं लेकिन संगति के अनुसार एक में माखन मिश्री रखे होते हैं और दूसरे में धोवी के घर गन्दे कपङे भीग रहे होते हैं

दोंनों जूते एक ही पैर के हैं भाई..??

श्री महाराज जी के प्रवचन से...
एक आदमी की जूतों की दुकान थी .उसकी दुकान पर एक
नौकर काम करता था . एक बार जब वह आदमी नहीं था .
नौकर ने एक जोङी जूते बेच दिये .कुछ देर बाद दुकान का
मालिक आया और अपने पीछे हुयी बिक्री के बारे में पूछा
नौकर ने कहा कि एक जोङी जूता बिका है .चार सौ रुपये
का जूता था परन्तु ग्राहक दोसो रुपये दे गया और दोसो रुपये उधार कर गया है . मालिक ने कहा कि तुम उसे जानते हो .इस पर नौकर ने कहा कि नहीं मैं नहीं जानता .तब मालिक ने कहा क्या पता वो शेष रुपये देने आये या ना आये . इस पर नौकर ने बेहद विश्वास से कहा कि रुपये देने वह जरूर आयेगा . तब मालिक ने कहा कि ये बात तुम इतने विश्वास से कैसे कह सकते हो . नौकर ने रहस्यमय मुस्कान के साथ कहा क्योंकि मैंने उसको दोंनों जूते एक ही पैर के बांध दिये है..
आप लोग सोच रहें होंगे कि इस कहानी का अध्यात्म से क्या सम्बन्ध है . विचार करें प्रत्येक इंसान का इससे बेहद गहरा सम्बन्ध है . जब तुम परमात्मा से बिछुङे थे तो उसे भलीभांति मालूम था कि तुम वासना की मायारूपी भूलभुलैया में अपना सब कुछ गंवा दोगे और भले ही दीन हीन की जिन्दगी बसर करो लेकिन फ़िर भी अपने आप पर गर्वित होते रहोगे और यहाँ तक कि अपनी वास्तविक पहचान ही भुला दोगे इसलिये उस परम पिता ने तुम्हें सुख (भौतिक ) तो दिया लेकिन शांति नहीं दी .
आज भले ही कोई धन कुबेर के समान हो अथवा रंक हो शांति के मामले में दोंनों का ही खाता जीरो बैलेंस में है .आप दुनिया का कोई भी एक आदमी ले आयें जो ये कह दे कि वह शांति काअनुभव करता है . हाँ कुछ लोग जो अभी धन दौलत स्त्री पुत्र बंगला कोठी मान सम्मान में सुख महसूस करते हैं और व्यस्तता में बेसुध हैं उनके लिये शांति का कोई अर्थ नहीं है पर जो इनसे ऊपर जा चुके हैं उनसे पूछिये कि आप को सब कुछ पा लेने के बाद शांति मिली या नहीं ..ये बात उसी तरह से है कि एक आदमी को रास्ते में पत्थर से ठोकर लग गयी तो आवश्यक नहीं कि दूसरा भी ठोकर खाकर ही सचेत हो . अगर तुम्हें लगता है कि भविष्य में तुम ऐसा कर लोगे वैसा कर लोगे तो इसका सबसे अच्छा तरीका ये है कि उस स्थिति से गुजर चुके बहुत लोग तुम्हारे आसपास ही होंगे तुम उनके अनुभव का फ़ायदा ले सकते हो जीवित और सफ़ल लोंगो के अनुभव तुम्हे बतायेंगे कि जिस के पीछे तुम भाग रहे हो वहाँ एक जादुई माया के अतिरिक्त कुछ नहीं है मृग मरीचिका की स्थिति में शांति की तलाश व्यर्थ है .अगर शांति की प्यास है तो शांति को पाकर ही दूर होगी .
ये शांति तुम्हें अपने घर जाकर ही प्राप्त होगी . जिस प्रकार कि हम किसी के घर जाते हैं और कितनी ही अच्छी हमारी खुशामद हो पर हम अशांति और बेगानापन महसूस करते है और अपने घर आकर हम अच्छा महसूस करते हैं इसलिये ये आत्मा जहाँ से बिछुङा है जब तक वहाँ पहुँच न जाय ये शांति नहीं पा सकता . यही एक पाँव
का जूता है . सभी रसायन हम करी नहि नाम सम कोय.. रंचक घट में संचरे सब तन कंचन होय
नाम नाम सब कहत है नाम न पाया कोय..नाम न पाया कोय नाम की गति है न्यारी..वही सकस को मिले जिन्होने आसा मारी
एक दिल लाखों तमन्ना ,उस पे और ज्यादा हविस ..फ़िर ठिकाना है कहाँ उसके ठिकाने के लिये ??

चाय दूध दोऊ रखे..कैसे पियोगे चाय..

दूध जो पियन मैं चला ,दूध न मिलया मोय
जो मैं चाही चाय पीऊँ, चाय हर तरफ़ होय
यारो प्याला चाय का ,मत तोरो चटकाय
टूट के फ़िर ना जुरे, कैसे पियोगे चाय
कल खाय सो आजु खा, आज खाय सो अब .
खाते ही रह जाओगे, तो चाय पियोगे कब .
चाय दूध दोऊ रखे ,काको पहले पांय
बलिहारी जा चाय की, सुस्ती देय भगाय
यह ऐसा संसार है जैसे सेमल फ़ूल
चार दिना की जिन्दगी ,चाय पियन न भूल
सुस्ती में सब चा पिये ,चुस्ती पिया ना कोय
जो चुस्ती में पी लेतो, सुस्ती कबहुँ न होय .
चा बनाये की विधि , है बच्चा बच्च ग्यानी .
पत्ती चीनी अदरक ,खौलाओ दूध ओ पानी
गुलकंद चीज क्या है ,आप पान लीजिये .
बन गयी है चाय बस , छान लीजिये .
दिल के अरमां आंसुओं मे वह गये .
ढेरों कपङे धो दिये ,फ़िर भी बाकी रह गये .
मेरा जीवन कोरा कागज ,कोरा ही रह गया ...बिल्ली दूध पी गयी , कटोरा रह गया .??

एक के बजाय दो ले ले..??

आज से लगभग अस्सी बरस पहले की बात है . सिन्ध प्रान्त में जो अब पाकिस्तान में है .एक बेहद प्रसिद्ध सांई बाबा हुये हैं . भारत में ज्यादातर लोग शिरडी वाले सांई को ही जानते हैं और ऐसा समझते हैं कि सांई उनका नाम है . अर्थात सांई नाम के वे अकेले ही है . दरअसल सांई एक उपाधि है जो एक मत को मानने से होती है .मेरे एक परिचित ने मुझे सांई शब्द का अर्थ साक्षात ईश्वर बताया .यह (उनके अनुसार ) सा (साक्षात ) ई (ईश्वर ) इस तरह था . मैंने कहा महाराज गौर करें सा नही सां है . फ़िर उन्हें कोई जबाब नहीं सूझा .लेकिन मैं इस बात से अबश्य सहमत हूँ कि कुछ ऐसी साधनांए अबश्य हैं . जिनमें ईश्वर से (ध्यानवस्था ) में बात की जा सकती है . पर भारत की बात निराली है .यहाँ आप किसी से कुछ चमत्कारिक बात कह दो लोग अंधभक्ति (धर्म के मामले में ) ही करते हैं और बात समझने का प्रयत्न नहीं करते हैं .ये मामला सिंध के एक सांई का है जिनकी बेहद प्रतिष्ठा थी और शाम से देर रात तक उनका दरवार लगता था . उसी गाँव में सलमा नाम की एक औरत रहती थी .
सलमा की शादी को काफ़ी समय हो चुका था पर उसको कोई औलाद नहीं हुयी थी .इलाज इत्यादि के बाद वह पीर फ़कीरों के दरवाजे पर भी मन्नत माँगने गयी परन्तु उसको कोई लाभ नहीं हुआ . तब किसी ने उसे इन सांई के बारे में बताया..औलाद की आस में सलमा सांई के दरवार में जाने लगी . वह रोजाना प्रसाद के रूप में कुछ न कुछ ले जाती थी करीब दो महीने बाद सांई बाबा का ध्यान उसकी तरफ़ गया और उन्होने पूछा कि तुम किसलिये दरवार में सेवा करती हो . तुम्हारी आरजू क्या है अगर में तुम्हारे लिये कुछ कर सका तो मुझे खुशी होगी सलमा के आँसू निकल आये और उसने कहा बाबा शादी के बीस साल बाद भी मुझे कोई औलाद नहीं हैं . बाबा ने कहा कि बेटी रात को ध्यान के वक्त मैं ईश्वर से तुम्हारी फ़रियाद अवश्य पहुँचाऊंगा . सलमा खुशी खुशी घर चली गयी अब उसे अपनी मुराद पूरी होती लग रही थी .
दूसरे दिन सलमा ने बङिया बिरियानी तैयार की और समय पर बाबा के दरबार में पहुँची जैसे ही वह बिरियानी रखने लगी . बाबा ने उसे रोक दिया . रुक जा बेटी हम तेरी सेवा के हकदार नहीं हैं .सलमा हकबकाकर उनका मुँह देखने लगी . बाबा ने उदास स्वर में कहा कि कल मैंने ईश्वर से तेरे बारे में बात की थी उसने कहा कि तेरे भाग्य में औलाद नहीं है . बाबा ने उसकी बिरियानी भी स्वीकार नहीं की . वहाँ से निराश सलमा जब लौट रही थी उसे रास्ते में एक फ़क्कङ मिला . जो अजीव वेशभूषा में घूमता रहता था और स्थानीय लोग उसे पागल कहते थे . उसने सुबकती हुयी लौट रही सलमा को देखकर कहा क्यों रोती है मूरख .जब सबकी सुनने वाला ऊपर बैठा हुआ है . उसने सलमा के पास आकर कहा तेरे हाथ में क्या है मुझे भूख लगी है . दुखी सलमा ने उसे बिरियानी खाने को दे दी . तब बाबा ने खाते खाते पूछा कहाँ गयी थी और क्यों रो रही है सलमा ने सब बता दिया .पागल ने कहा . बस इतनी सी बात है जिसके लिये रोती है . चल तू एक बच्चा माँगने गयी थी . मैं तुझे दो देता हूँ . हालांकि तू अभी पागल जानकर अभी मेरी बात का विश्वास नहीं करेगी पर ऐसा ही होगा . वास्तव मैं सलमा को उसकी बात पर विश्वास नहीं हुआ .जब सांई जैसे प्रतिष्ठित बाबा ने मना कर दिया तो ये तो सबको मालूम था कि पागल है लेकिन समय आने पर सलमा गर्भवती हो गयी और फ़िर ये बात चारों तरफ़ फ़ैल गयी और सांई के कानों तक जा पहुँची .बेहद हैरत से सांई सलमा से मिलने आये और सारी बात पूछी . सलमा ने उन्हें पूरी बात बता दी . सांई ने अत्यंत आश्वर्य से ध्यान में ईश्वर से सारी बात पूछी ईश्वर ने उत्तर दिया कि जिनका ये आदेश था उनका आदेश काटने की शक्ति किसी में नहीं है . बेचैन होकर सांई उस पागल बाबा को खोजते फ़िरे पर उनका कहीं कोई पता नहीं था . समय आने पर सलमा ने दो स्वस्थ पुत्रों को जन्म दिया . पागल बाबा का पता लगाने की बहुत कोशिश की गयी पर वो किसी को नही मिला .

रविवार, अप्रैल 04, 2010

आध्यात्मिक मंच

" जय जय श्री गुरुदेव "
प्रातः स्मरणीय सतगुरु श्री शिवानन्द जी महाराज " परमहँस "परमानन्द शोध संस्थान आगरा (उ .प्र .) भारत Parmanand Research Institute Agra (u.p ) India
मुख्यालय- सतगुरु आश्रम , ,आगरा Head office-satguru aashram agra
सम्पर्क- (0) 98373 64129
blog- satguru-satykikhoj.blogspot.com shrishivanandjimaharaj.blogspot.com
निवेदन- समस्त विश्व समुदाय के भाई बहनों से निवेदन है कि हम विश्व स्तर पर एक "आध्यात्मिक मंच " का गठन करना चाहते हैं .जिसमें विश्व का कोई भी नागरिक अपनी भागीदारी कर सकता है .यह पूर्णतया निशुल्क और गैर लाभ उद्देश्य की "आपस में भाईचारा और आध्यात्मिक विचारों का आदान प्रदान " करने हेतु प्रारम्भ की गयी एक सीधी और सरल योजना है .
उद्देश्य- आज के समय में विश्व में अनेकों मत और धर्म प्रचलित है .लेकिन अधिकतर लोग असन्तुष्ट हैं .प्रत्येक को
अपने धर्म में अच्छाई और बुराई दोनों ही नजर आती है..लेकिन हमें इससे कोई लेना देना नहीं हैं.एक मनुष्य होने
के नाते हमारे कर्तव्य हमारे अपने विचार क्या हैं..ये महत्वपूर्ण हैं .वास्तव में मनुष्य के रूप में हम एक ही है और
सबकी आत्मा का एक ही धर्म है "सनातन धर्म " आज अगर समाज के अंदर से बुराईयों का समूल नाश करना है तो इस विचार से ही , इस भावना से ही हो सकता है कि हम एक ही मालिक की संतान है क्या आप मुझसे सहमत हैं . यदि हाँ तो हम अपनी आध्यात्मिक उन्नति के लिये क्या कर रहें हैं .हमारे ग्यान का अन्य को क्या लाभ है और क्या लाभ हो सकता है .इस पर एक "साझामंच " बनाने में हमारी यथासंभव मदद करें . यदि आप सहमत हैं तो क्रपया निम्न जानकारी भरकर भेंजे और इसके अतिरिक्त आप कोई अन्य उत्तम विचार रखते हों तो क्रपया अवश्य बतायें .
आप का नाम...............................................माता /पिता का नाम..........................................
लिंग-स्त्री /पुरुष....................आयु................धर्म- यदि बताना चाहें............................................
विवाहित /अविवाहित /विधवा / विधुर .................................................................................
शहर /ग्राम...........................जिला.......................राज्य......................देश.......................
स्थायी पता .....................................................................................................................
वर्तमानपता.....................................................................................................................
कार्य /नौकरी / व्यवसाय....................................फ़ोन नम्बर,std कोड सहित.............................
मोबायल नम्बर...............................................
क्या आपने गुरुदीक्षा ली हैं......................यदि हाँ तो किस से....................................................
( अधिक गुरुओं से दीक्षा ली होने पर पाँच गुरुओं तक के नाम बताएं , जो आपको श्रेष्ठ लगे हों .)
1-.........................................................2-....................................................................
3-..........................................................4-...................................................................
5-...........................................................6-..................................................................
( क्षमा करें पर हमें और आपको भी ऐसे कई लोगों से वास्ता पङा होगा जो कई गुरुओं की शरण में जा चुके हैं और ये सच है कि जब तक सच्चे संत सच्चे गुरु न मिल जायं , हमें अपनी तलाश जारी रहनी चाहिये कार्तिकेय जी ने कई गुरु किये थे , जब हम ग्यान को अक्सर थोङा ही समझते हैं तो अक्सर साधारण बाबा पुजारी आदि को गुरु बना लेते हैं और फ़िर अधिक समझ आने पर ऊँचा या पहुँचा हुआ गुरु बनाते हैं..ये उसी तरह है जब तक बीमारी कट न जाय हम डाक्टर बदलते रहते हैं.इस सम्बन्ध में अधिक जाननें के लिये ब्लाग देखें / फ़ोन करें /व्यक्तिगत मिलें .
आपके गुरु ने जो मन्त्र दिया , उसमें अक्षरों की संख्या (गिनती ) कितनी थी. (मन्त्र न बताएं ).................
.......................यदि इस प्रश्न का उत्तर न देना चाहें तो कोई बात नहीं .
विशेष-इस प्रश्न का उद्देश्य मात्र इतना ही है कि आप उस महामन्त्र को जानते हैं जो सिर्फ़ ढाई अक्षर का है और मुक्ति और आत्मकल्याण का इकलौता मन्त्र है और सतगुरु द्वारा दिये जाने पर बहुत जल्द प्रभाव दिखाता है..कबीर ,मीरा ,दादू, पलटू , हनुमा्नजी ,बुद्ध, शंकरजी ,रामक्रष्ण परमहँस , तुलसीदास ,नानक वाल्मीक आदि ने जिसको जपा है और वर्तमान में भी कई संत जिसका उपदेश कर रहें है आप को उस मन्त्र का ग्यान है या नहीं .
निम्न प्रश्नों का उत्तर हाँ या ना में ही दे , यदि नही देना चाहते तो भी कोई बात नहीं..हमारा उद्देश्य आपकोवास्तविक ग्यान से परिचय कराना ही है
1-दीक्षा के बाद आपको कोई अलौकिक अनुभव हुआ .हाँ /नहीं .............................
2-कितने दिन में हुआ..हाँ / नहीं.....................................................................
3-आपने सूक्ष्म लोकों या लोक लोकांतरों के भ्रमण का अनुभव किया या नहीं..हाँ /नहीं................
4-आपको प्रकाश दिखता है या नहीं...हाँ / नहीं...................................
5-आप मानते हैं मुक्ति जीते जी ही होती है मरने के बाद नही..हाँ / नही..................
6-आपको चेतन समाधि का अनुभव हुआ ..हाँ / नहीं ...................................
7-आपका ध्यान कितनी देर तक लग जाता है.. 1 घन्टे 2 घन्टे 3 घन्टे........................................
8- अन्य कोई अनुभव, यदि हो-......................................................................................
..................................................................................................................................
9-आपका कोई सुझाव-...................................................................................................
...............................................................................................................................
................................................................................................................................
10-जो बात इस संदेश में आपको पसंद न आयी हो-...............................................................
................................................................................................................................
विनीत-
समस्त परमानन्द शोध संस्थान साधक संघ
विशेष- हमारा उद्देश्य न तो किसी प्रकार का विवाद फ़ैलाना है और न ही किसी व्यक्ति या धर्म को ठेस पहुचाँना है
बल्कि हमारा उद्देश्य ऐसे व्यक्तियों और साधकों से परिचय तथा संवाद करना है जो हमारी जैसी सोच रखते है तथा
आत्मकल्याण हेतु सुरती शब्द साधना ,सहज योग या राजयोग साधना कर रहें और अन्य जीवों को चेताने में विश्वास रखते हैं ..फ़िर भी यदि किसी को कोई बात आपत्तिजनक लगती हो तो क्रपया हमें Email satguru555@yahoo.com करें . हम आपकी भावनाओं का सम्मान करते हुये अपनी कमीं अवश्य दूर करेंगे .
बुरा जो देखन में चलया , बुरा न मिलया कोय .जो दिल खोजा आपना मुझसे बुरा न कोय .
कबीर सब ते हम बुरे, हम ते भले सब कोय . जिन ऐसा कर बूझिया मित्र हमारा सोय
धन्यवाद

जो करेगा सो भगवान करेगा

एक नये नये महात्मा हुये थे उन्होने अपने जीवन में एक शिक्षा ग्रहण कर ली थी कि जो करता है सो भगवान ही करता है .इसलिये हमें अन्य का सहारा लेने की आस छोङ देनी चाहिये.दैववशात एक बार महात्मा जी नदी के किनारे ध्यानमग्न थे कि अचानक नदी के पानी का जलस्तर बढने लगा .आसपास घूम रहे लोगों ने महात्मा जी को हिलाकर सचेत किया . महात्माजी नदी का जलस्तर बढ रहा है आप किसी अन्य स्थान पर चले जांय . महात्मा जी झिङककर बोले
चल तू कौन है मुझे बताने बाला या उठाने बाला वो स्वयं आकर मुझे उठायेगा .
तब तक पानी महात्मा जी के पैरों के आसपास तक बङ गया और फ़िर उनकी कमर तक आ गया . फ़िर कुछ लोगों ने कहा
महात्मा जी जलस्तर तेजी से बढ रहा है आप स्थान बदल लें
महात्मा जी ने फ़िर झिङक दिया . तुम कौन हो मुझे उठाने वाले वो स्वयं आकर वचायेगा .
अब पानी उनकी कमर तक आ गया और ऊपर बढने लगा तब कुछ लोग नाव पर आये और बोले . महात्माजी नाव पर आ जाइये आप डूब जाँयेगे .पहले की तरह महात्मा जी ने उसे भी झिङक दिया .
इस तरह कई लोगों ने उनको बचाने का प्रयत्न किया पर महात्माजी ने किसी की नहीं सुनी और नदी का जलस्तर उनकी गर्दन तक आ गया . तब एक हेलीकाप्टर वाले ने उनको रस्सी फ़ेंककर आवाज दी कि आप रस्सी पकङकर ऊपर आ जांय अन्यथा डूब जायेंगे .
महात्मा जी ने उसे भी झिङक दिया .तुम कौन होते हो बचाने वाले भगवान स्वयं बचायेंगे .
इस तरह महात्मा जी ने किसी की सहायता नहीं ली और डूब जाने से उनकी म्रत्यु हो गयी . फ़िर जब वे भगवान के सामने पहुँचे तो उन्होंने कहा . ओहो भगवान मैंने तुम पर कितना विश्वास किया पर तुमने मेरी कोई सहायता नहीं की और डूबकर मेरी म्रत्यु हो गयी
भगवान हँस कर बोले .जब तुम थोङे ही डूबे थे तो जो तुम्हें बताने वाला पहुँचा वो मैं ही था ..फ़िर कई बार मैंने अलग अलग रूपों में तुम्हें चेतावनी दी पर तुमने कोई ध्यान ही नहीं दिया और अंत में मैं हेलीकाप्टर लेकर पहुँचा फ़िर भी तुमने मेरी बात नहीं मानी तब महात्मा को अपनी गलती का अहसास हुआ
वास्तव में हमें बात का मतलब समझना चाहिये न कि बात ही पकङ लेनी चाहिये अन्यथा पछताने के सिवा कुछ भी हाथ नहीं आता ??
राम बुलावा भेजिया , दिया कबीरा रोय ...जो सुख है सत्संग में , सो बैकुन्ठ न होय .?
कोई न काहू सुख दुख कर दाता ,निज करि करम भोग सब भ्राता .

इन्द्र चींटा बना....??.

एक बार महात्मा श्रीकृष्ण आराम कर रहे थे और राधाजी
उनके पास बैठी हुयीं थी अचानक श्रीकृष्ण जमींन की और
देखकर मुस्कराने लगे..तब राधाजी ने पूछा कि प्रभो आप
क्यों हँस रहे हैं . श्रीकृष्ण ने कहा रहने दो तुम जान कर क्या
करोगी..इस पर राधाजी ने जिद करते हुये कहा कि आपको
बताना होगा..तब श्रीकृष्ण ने कहा कि नीचे जो ये चींटा जा
रहा है ये सोलह बार इन्द्र की पदवी प्राप्त कर चुका हैं और
अपने करमों के कारण इस दशा को प्राप्त हुआ है .
बहुत से लोग ये समझते हैं कि देवी देवता आदि के पद बेहद
महत्वपूर्ण होतें हैं किन्तु यदि आप धर्मग्रन्थों का अध्ययन करें तो ये बात सामने आती हैं कि अपने पुण्यकर्मों और तपस्या आदि से तमाम पदों की प्राप्ति होती है और परमात्मा के कानून में चींटी से लेकर हाथी तक सबको समान महत्व दिया है. परन्तु एक बात सर्बथा भिन्न है कि समस्त योनियों में मानव शरीर सर्वश्रेष्ठ है..इसका कारण बेहद गूढ है और वही लोग जानते हैं जो संतमत का सतसंग सुनते रहते हैं .दरअसल यही वो एकमात्र शरीर है जिसमें मुक्ति का द्वार है . जिसे आत्मग्यान की भाषा में दसवां द्वार भी कहते हैं .मेरी बात पङकर बहुत लोग मेरी हँसी उङा सकते हैं क्योकि आजकल प्रायः सतसंग में यह बात बतायी जाती है फ़िर भी मेरा सतसंगी अनुभव कहता है अभी भी करोङों की संख्या में ऐसे लोग हैं जो इस बात को नहीं जानते और जो जानते भी हैं उनमें मुश्किल से कुछ ही ऐसे होंगे जो इस का वास्तविक रहस्य जानते होंगे..जैसे उदाहरण के तौर पर आप किसी से भी कहिये कि आप अमेरिका को जानते हैं तो कोई
आप को ही पागल समझेगा..आप फ़िर से गहरायी से कहिये सोच के देखो तुम वास्तव में जानते हो ..सच ये है कि आमतौर पर जो कह रहा है वो भी नहीं जानता और जिससे कहा जा रहा है वो भी नहीं जानता क्योंकि दोनों ने केवल अमेरिका के बारे में सुना ही है गया कोई नहीं यही स्थिति अध्यात्म में भी है कहने सुनने वाले बहुत है जाने वाला..? कोई कोई ही होता है .
देह धरे के दन्ड को भोगत है हर कोय ...ग्यानी भोगे ग्यान से मूरख भोगे रोय .
गुरुआ तो घर घर फ़िरें कन्ठी माला लेय ..सरगे जाओ या नरके जाओ मोय रुपैया देयु

भोग और योग ??

आये थे हरि भजन को..करो नरक को ठौर ??
रज्जब जी एक महान संत हुये हैं .कहते हैं कि इनकी बारात जा रही थी .तब रास्ते में इनको दादू जी मिले .सब लोगों ने विवाह से पूर्व संत का आशीर्वाद लेना उचित समझा . रज्जब जी ने दादू को प्रणाम किया तो दादू जी ने कहा
"रज्जब तें गज्जब करो ,बाँधो सिर पर मौर .
आओ थो हरि भजन को करो नरक को ठौर ..??
यह बात रज्जब जी पर इस कदर असर कर गयी कि उन्होनें शादी न करने का निर्णय ले लिया.इस पर साथ के लोगो को बङी चिन्ता हुई कि शादी नही करेगा तो इसका जीवन बेकार हो जायेगा .उन्होने दादू जी पर दबाब डाला कि आपने
इसका मन शादी से हटा दिया है अब आप ही इसको समझाये . तब दादू जी ने उनको बेहद समझाया कि अभी तुम क्षणिक भावना के बहाव में ऐसा कह रहे हो बाद में तुमको कामभावना आकर्षित करेगी और तुम संसार और औरत के फ़ेर में आ जाओगे . इससे अच्छा यही है कि पहले ही अपनी इच्छाओ को पूरा कर लो जिससे बाद में साधना में भटकाव न हो (ऐसा अक्सर ही होता है .कहते हैं कि एक महात्मा ने तप से इतनी ऊँची स्थिति प्राप्त कर ली थी कि वे जल के अंदर बैठकर
साधनारत रहते थे .अचानक एक दिन साधना से आँखे खोलते ही उन्होने मैथुनरत मच्छयुगल को देखा और उनके मन में कामवासना जाग उठी और उन्होने किसी के साथ जाकर भोग कर लिया और उसी समय उनका संचित तप नष्ट हो गया
ये सत्य है कि भोग और योग एक जगह नही..एक साथ नही हो सकते हैं ) रज्जब जी ने जबाब दिया.
रज्जब घर घरणी तजी ,पर घरणी न सुहाय ..अहि तजि अपनी केंचुरी काको पहिरों जाय
जब मैंने अपनी होने वाली पत्नी की ही इच्छा त्याग दी तो मुझे अन्य स्त्रियों से क्या प्रयोजन..जिस प्रकार सर्प अपनी केंचुली को उतारकर फ़ेंकने के बाद दुबारा धारण नहीं करता . वैसे ही मैंने अपनी समस्त वासनाओं को उतारकर फ़ेंक दिया हैं और अब मैं पूरी तरह से हरिभजन कर अपनी मुक्ति का मार्ग तलाशूँगा .

एक दिल लाखों तमन्ना ,उस पे और ज्यादा हविस ..फ़िर ठिकाना है कहाँ उसके ठिकाने के लिये
कई जनम भये कीट पतंगा कई जनमगज मीन कुरंगाकई जनम पंखी सरप होइओ , कई जनम हैवर ब्रिख जोईओ
मिलु जगदीस मिलन की बरीआ ,चिरंकाल यह देह संजरीआ
कबीर मानुस जनमु दुर्लभ है होय ना बारे बार..जिउ फ़ल पाके भुइ गिरे बहुर न लागे डार

भगवान मुझे बचाओ..??.

एक बार महात्मा श्रीकृष्ण भोजन कर रहे थे अचानक ही
भोजन छोङकर बाहर की तरफ़ चल दिये .अभी उनकी पत्नी कुछ पूछ पाती इससे पहले ही फ़िर से बैठकर भोजन करने लगे..तब उनकी पत्नी से न रहा गया और उन्होंने पूछा आप अच्छे खासे भोजन कर रहे थे फ़िर बीच में छोङकर चल दिये और फ़िर बैठकर भोजन करने लगे..इसका क्या रहस्य है
श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया कि मेरे एक भक्त को कुछ लोग मार
रहे थे तब वह सहायता के लिये मुझे पुकार रहा था इसलिये
में खाना छोङकर उसे बचाने दौङा..फ़िर कुछ ही देर में उसने मुझे पुकारना बन्द कर दिया और खुद ही संघर्ष करने लगा..तब में फ़िर से खाना खाने बैठ गया .
वास्तव में इस दृष्टांत को ठीक से समझने के लिये हमें द्रोपदी
और गज ग्राह की घटना को समझना होगा..द्रोपदी जब तक
ये देखती रही कि मेरे बलबान पति मुझे बचायेंगे..फ़िर भीष्म
पितामह और अन्य लोंगो की तरफ़ उसका ध्यान गया और फ़िर सब तरफ़ से निराश हो जाने पर वह श्रीकृष्ण को पुकारने लगी .और उन्होंने उसकी रक्षा की . गज भी पहले अपनी शक्ति से लङा और फ़िर उसने भगवान को पुकारा .तब उसकी रक्षा हुयी . हम कहीं न कहीं इस अभिमान में जीते हैं कि अभी हम जो हैं वो स्वयं ही समर्थ है इसी अभिमान में हम भक्ति को
पाखंड कह कर उससे किनारा कर लेते हैं पर भक्ति करने वाले
लोग जानतें है कि यह बङे काम की चीज है .
सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा ..जिम हरि शरण न एकहु व्याधा
कबिरा मन निर्मल भया जैसे गंगा नीर ..पीछे पीछे हरि फ़िरे कहत कबीर कबीर

नारद की दीक्षा.|.

गुरु का और गुरुदीक्षा का कितना महत्व है ये आप इस को पढकर जान सकते है . नारद प्रायः देवताओं की सभा में जाते थे और चले आते थे .एक दिन ऐसा हुआ कि सभा से चले आये नारद को दुबारा वहाँ जाने की आवश्यकता पङ गयी..तब नारद ने देखा कि जिस स्थान पर वह बैठे थे उस स्थान पर गढ्ढा खोदकर वहाँ की मिट्टी हटायी जा रही है . उन्होंने कहा कि आप लोग ये क्या कर रहे है . तब उन्हें जबाब मिला कि ये तो तुम्हारी वजह से हमें रोज ही करना पङता है क्योंकि तुम निगुरा (जिसका कोई गुरु ना हो ) हो अतः तुम्हारे बैठने से स्थान अपवित्र हो
जाता हैं नारद जी ने कहा कि गुरु का इतना महत्व है और मैं इस सत्य से अनजान था . फ़िर उन्होंने सलाह ली कि किसे गुरु बनाया जाय . तब देवताओं ने कहा कि सुबह सब
से पहले जो मिले उसी को गुरु बना लेना . नारद जी सहमत हो गये . दूसरे दिन विष्णु धीवर (मछ्ली पकङने वाला ) के वेश में उनको सबसे पहले मिल गये और न चाहते हुये भी अपने वचन की मर्यादा हेतु नारद को उन्हें उस धीवर को गुरु बनाना पङा . दूसरे दिन देवताओं ने पूछा कि नारद तुमने गुरु बना लिया तो नारद को सकुचाते हुये बताना पङा कि गुरु तो बना लिया लेकिन..(वह धीवर है ) अभी वह लेकिन ही कह पाये थे कि सबने कहा , नारद जी तुमने अनर्थ कर दिया गुरु में लेकिन ..लगाने से अब तुम्हें लख चौरासी भोगनी होगी , गुरु जैसा भी हो उसमें लेकिन किन्तु परन्तु नहीं करते . नारद ने चिंतित होकर कहा . अब कैसे इस गलती से बचूँ सबने कहा कि इसका उपाय भी तुम्हें गुरु ही बतायेंगे नारद धीवर के पास पहुँचे और अपनी समस्या बतायी तब नारद के गुरु ने कहा . बस इतनी सी बात है और उपाय बता दिया .

गुरु के बताये अनुसार नारद भगवान के पास पहुँचे और बोले कि भगवान ये लख चौरासी बार बार सुनी है ये होती क्या है ??
भगवान उनको समझाने लगे और नारद गुरु के बताये अनुसार सब समझते हुये भी न समझने का नाटक करते रहे और अंत में बोले . प्रभो ठीक से समझाने के लिये आप चित्र बनाकर दिखा दें . भगवान ने जमीन पर चौरासी का चित्र बना दिया और नारद ने गुरु के बताये अनुसार चित्र पर लोटपोट कर चित्र मिटा दिया . भगवान ने कहा कि नारद ये क्या कर रहे हो ? नारद ने कहा कि आपकी चौरासी भोग रहा हूँ . जो गुरु में नीचा भाव रखने से बन गयी थी .
कबीर गुरु की भगति बिनु नारि कूकरी होय..गली गली भूँसति फ़िरे टूक न डारे कोय ?
कबीर गुरु की भगति बिनु राजा बिरखभ होय ..माटी लदे कुम्हार की , घास न डारे कोय
उज्जवल पहिरे कापङे , पान सुपारी खाहिं ..सो एक गुरु की भगति बिनु ,बाँधे जमपुर जाहिं
गुरु बिनु माला फ़ेरता , गुरु बिनु करता दान ..गुरु बिनु सब निस्फ़ल गया , बूझो वेद पुरान
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