रविवार, मई 30, 2010

काली चिङिया का रहस्य - नगर कालका black bird - nagar kalka

दोपहर के एक बजे का समय था । मैं मोतिया बगीची के सामने बने शिव मन्दिर की दीवाल से पीठ टिकाये सिगरेट के कश लगा रहा था । इस समय मेरे दिमाग में जेनी को लेकर भारी उठापटक चल रही थी । जेनी आस्ट्रेलिया की रहने वाली थी और एक कार दुर्घटना में मारी गयी थी । हम दोनों में तीन साल तक अच्छी मित्रता रही थी । आज सुबह ही जेनी की एक अन्य फ़्रेंड एकेट्रीना ने मुझे फ़ोन पर यह दुखद समाचार सुनाया था ।
मरना जीना जिंदगी का अभिन्न अंग है । इससे कोई बच नहीं सकता । जिसने जन्म लिया है । उसे मरना भी होगा । पर यहाँ  बात कुछ अलग थी । जेनी स्वाभाविक मौत नहीं मरी थी । उसकी अकाल मृत्यु हुयी थी । परालौकिक विग्यान के मेरे शोध अनुभव के अनुसार ऐसी मृत जीवात्माओं के सूक्ष्म शरीर को यमदूत लेने नहीं आते । और न ही समय से पहले यम दरबार में उसकी पेशी होती है ।और इस तरह वो नरक या अन्य पशुवत योनियों में भी नहीं जा सकता । जब तक कि उसकी आयु का समय पूरा नहीं हो जाता ।
ऐसी हालत में दो ही रास्ते बचते हैं । या तो जेनी अपने सूक्ष्म शरीर के साथ भटकेगी । और अपने जुङे संस्कार के अनुसार किसी ऐसी गर्भवती महिला की तलाश में होगी । जिसे गर्भधारण किये पाँचवा महीना चल रहा हो । तो वो ईश्वरीय नियम के अनुसार उस गर्भ में  प्रवेश कर जायेगी । लेकिन इसके लिये भी उसका मनोबल मजबूत होना चाहिये ।

दूसरे वो उन प्रेतों के चंगुल में भी फ़ँस सकती है । जो ऐसी ही मृतात्माओं की तलाश में रहते हैं । जिनकी अकाल मृत्यु हुयी हो । तब वे उसे डरा धमकाकर लोभ लालच  से उसमें प्रेत भाव प्रविष्ट कर देते हैं । और फ़िर वह जीवात्मा दस से लेकर बीस हजार सालों तक प्रेत जीवन जीने पर मजबूर हो सकती है ।
मेरे दिमाग में जो उठापटक चल रही थी । उसकी वजह ये थी कि जेनी की मृत्यु को बीस दिन हो चुके थे । और मैं लाख कोशिशों के बाद भी उससे कनेक्टिविटी नहीं जोङ पा रहा था । बाबाजी इस समय अपने एक अनुष्ठान में लगे हुये थे । और वैसे भी उनका कहना था कि सच्चे साधक को कभी भी प्रकृति के कामों में दखल नहीं देना चाहिये । इससे ईश्वरीय नियम की अवहेलना होती है ।
लिहाजा मैं  इस तरह की हरेक बात को लेकर बाबाजी के पास जाने लगा । तो वो रुष्ट भी हो सकते थे । लेकिन क्योंकि जेनी की बात अलग थी । वह मेरी मित्र थी । इसलिये मैं बार बार उससे कनेक्टिविटी जोङने की कोशिश कर रहा था । और इस कोशिश में नाकामयाव था । इसका सीधा सा मगर मेरे लिये हैरतअंगेज मतलब था कि जेनी प्रथ्वी के अलावा किसी दूसरे लोक में थी ।
और ये इस बात का संकेत भी था कि वो किन्ही मक्कार किस्म के प्रेतों के चंगुल में भी हो सकती है ।अपने इसी प्रकार के विचारों में मैं खोया हुआ था कि मेरे सेलफ़ोन की घन्टी बजी
दूसरी तरफ़ से कोई रेनू नामक महिला बोल रही थी । जो अर्जेंट ही मुझसे मिलना चाहती थी । मेरे बारे
में उसे किसी उसके ही  परिचित ने बताया था । मैं मन्दिर के सामने बनी संगमरमर की सोफ़ानुमा कुर्सियों पर पेङ की छाया में बैठ गया । और सिगरेट सुलगाकर हल्के हल्के कश लेने लगा ।
कोई दस मिनट बाद ही मेरे सामने ई बाइक पर एक शानदार जानदार युवती आयी । उसने काले गोल शीशों का

खूबसूरत चश्मा पहन रखा था । और उसके गोद में बेल्ट के सहारे टिका हुआ लगभग तीन साल का बच्चा था । उसने एहतियात के तौर पर अपना सेलफ़ोन हाथ में लेकर एक नम्बर डायल किया । तुरन्त मेरे फ़ोन की घन्टी बज उठी । उसके चेहरे पर सुकून के भाव आये ।
वह मुझे देखकर औपचारिकता से मुस्करायी । और हाथ बङाती हुयी बोली - हेलो मि. प्रसून ! आय एम रेनू । क्या मैं यहाँ बैठ सकती हूँ ?
- फ़रमाईये  रेनू जी !  उसे बैठने का इशारा करते हुये मैंने कहा ।
रेनू की उस डौल सी बच्ची का नाम डौली था । रेनू उस बच्चे को लेकर ही परेशान थी । दरअसल पिछले छह महीने से डौली एक अजीव व्यवहार करती थी । वह आम बच्चों की तरह खेलने कूदने के बजाय यन्त्रवत उस काली चिङिया को देखती रहती थी । जो हर समय उसके इर्द गिर्द ही रहती थी ।
रेनू एक तरह से उस काली चिङिया से बेहद आतंकित थी । उसने कई बार उस चिङिया को भगाने और मारने की भी कोशिश की थी । पर सफ़ल नहीं हो पायी थी । फ़िर किसी के कहने पर उसने एक दो ओझा तान्त्रिक से भी सम्पर्क करके इस समस्या से निजात पाने की कोशिश की थी ।
लेकिन बाद में स्वयँ रेनू को लगा कि ओझाओं  के पास जाने से उसकी समस्या और भी खराब हो गयी थी । बच्ची पहले की अपेक्षा अधिक कमजोर और सुस्त रहने लगी थी । रेनू ने आसपास देखते हुये इशारे से बताया कि यही वो दुष्ट चिङिया है । जिसने मेरा जीना हराम कर रखा है । मेरी बच्ची कहीं भी क्यों न जाय । ये साये की तरह साथ ही रहती है । उसकी बङी बङी काली आँखो से आँसू बह निकले ।

मैंने रेनू से ध्यान हटाकर चिङिया को देखा । चिङिया निकट के ही एक पेङ की डाल पर बैठी थी । और आमतौर पर जंगलों में पायी जाने वाली काली चिङिया की नस्ल की थी । डौली यन्त्रचालित सी चिङिया की तरफ़ घूम गयी थी और उसे ही देख रही थी ।
मैंने एक कंकङ उछालकर चिङिया की तरफ़ फ़ेंका । पर चिङिया अपने स्थान से हिली तक नहीं ।
निश्चय ही ये एक गम्भीर मामला था । और मेरे गणित के अनुसार तो एक बच्चे की जिंदगी ही दाव पर लगी थी । वो चिङिया दरअसल चिङिया थी ही नहीं । किसी चिङिया के मृत पिण्ड को उपयोग करने वाली कोई प्रेतात्मा थी । और जिसका किसी प्रकार से रेनू या डौली से कोई भावनात्मक या बदला लेने का उद्देश्य लगता था ।
अगर मैं उस पहले से ही मरी हुयी चिङिया को मार भी देता । तो क्या फ़र्क पङना था । प्रेतात्मा फ़िर किसी मृतक पिंड का इस्तेमाल कर लेती । और समस्या ज्यों की त्यों ही रहती ।
मैंने उस प्रेतात्मा से कनेक्टिविटी की कोशिश की । पर सफ़लता नहीं मिली । दुबारा अधिक प्रयास करने पर चिङिया थोङी सी विचलित लगी । फ़िर उसने आसमान की तरफ़ चोंच उठाकर इस तरह खोली । बन्द की । मानों पानी की बूँद पी रही हो । मेरा ये पहले से बङा प्रयास भी विफ़ल हो गया ।
- नगर कालका ।  मेरे मुँह से स्वत ही निकल गया ।
- क्या ?  रेनू अचकचा कर बोली ।
- कुछ नहीं । प्लीज कुछ अपने बारे में । कुछ अपने पति के बारे में बताईये । और साफ़ साफ़ बताईये । छुपाने की चेष्टा ना करें ।
- मेरे बारे में मैं क्या बताऊँ । मेरे पति सुरेश बंगलौर में एक साफ़्टवेयर कम्पनी में काम करते हैं । और मैं
यहीं पास के शहर भीमनगर की रहने वाली हूँ । और यहाँ अपने पति के पुश्तैनी मकान में रहती हूँ । मैं और मेरी बच्ची के अलावा उस घर में कोई नहीं रहता..और हाँ..। वह कुछ सकुचाते हुये बोली - मेरी लव मैरिज हुयी है ।
- लव मैरिज को कितना समय हुआ है ?
- यही कोई आठ महीने ।  उसके मुँह से निकल गया । फ़िर उसे अपनी गलती का अहसास हुआ । और वो नजरें झुकाकर जमीन की तरफ़ देखने लगी ।
- मैंने आपसे पहले ही कहा था कि प्लीज साफ़ साफ़ बताना । यदि मेरे द्वारा सहायता प्राप्त करना चाहती हो ।
- वो दरअसल....।  और फ़िर वह बिना रुके सब बताती चली गयी ।
अब आधा रहस्य मैं समझ चुका था । मेरी निगाह स्वत ही चिङिया की तरफ़ चली गयी । वह मिट्टी के खिलौने की भाँति पेङ पर स्थिर बैठी थी । रेनू एक तरह से सुरेश की दूसरी पत्नी थी । सुरेश की पहली


पत्नी का नाम पूर्णिमा नैय्यर था । आज से कोई दस महीने पहले जब पूर्णिमा गर्भवती थी । और प्रसव का समय बेहद नजदीक था । सुरेश और पूर्णिमा में रेनू को लेकर झगङा हुआ था । सुरेश पिछले पाँच सालों से रेनू को बतौर प्रेमिका की हैसियत से रखता था । और उनके सवा दो साल की डौली नाम की एक बच्ची भी थी । इस झगङे में सुरेश ने पूर्णिमा को धक्का मार दिया । जिससे पूर्णिमा जमीन पर गिर पङी । और उसे अत्यधिक रक्तस्राव होने लगा । यह देखकर सुरेश घबरा गया । और आनन फ़ानन पूर्णिमा को अस्पताल में भर्ती कराया गया । जहाँ एक मृत पुत्र को जन्म देकर पूर्णिमा स्वयँ भी चल बसी । लेकिन मरने से पूर्व उसे यही बताया गया कि उसको एक बेटा हुआ है । और उसकी तसल्ली हेतु दूसरे शिशु को उसे दिखाया भी गया ।
- आप अभी । मैंने रेनू से कहा - सुरेश को फ़ोन करके पूछिये कि पूर्णिमा की शव यात्रा के समय उसकी अर्थी के पीछे पीछे सरसों के दाने शमशान तक फ़ैलाये गये थे । या नहीं । मेरा ख्याल है । ऐसा नहीं किया गया । और मि. सुरेश ने बेहद लापरवाही का परिचय देते हुये पूर्णिमा की आत्मिक शान्ति हेतु भी कोई प्रयास नहीं किया ।
रेनू फ़ोन डायल करने लगी । और दस मिनट बाद सिर उठाकर उसने मेरी तरफ़ देखा । उसके चेहरे पर निराशा के भाव थे । वह झुँझलाई हुयी सी और घबराई हुयी सी थी ।
रेनू ने जबाब मेरी अपेक्षा के अनुसार ही दिया था । सुरेश इस तरह की बातों को दकियानूसी और अंधविश्वासी मानता था । और दरअसल क्योंकि ज्यादातर वह बाहर ही रहता था । इसलिये उसके यहाँ ज्यादा परिचित भी नहीं थे । दूसरे किसी ने भी इस तरफ़ उसका ध्यान नहीं दिलाया था । साफ़ साफ़ बात थी कि शवयात्रा के समय इस तरह की जानकारी वाला कोई पुरुष या महिला वहाँ  मौजूद नहीं थी ।
और इस छोटी सी गलती ने पूर्णिमा नैय्यर को बहुत लम्बे समय तक " खतरनाक पिशाचनी " के समकक्ष " नगर कालका " प्रेतनी बना दिया था । अब मौका चूक जाने के बाद क्या हो सकता था ।
नगर कालका प्रेतनी दरअसल वह जीवात्मा होती है । जिसकी गर्भिणी अवस्था में मृत्यु हुयी हो । यह प्रेतात्मा क्योंकि शिशु के अत्यधिक मोह में प्राण त्यागती है । इसलिये यदि इसकी आत्मिक शान्ति हेतु समुचित प्रयास न किये जाँय । तो यह खतरनाक नगर कालका बन जाती है । और अपने घर के आसपास ही खन्डहर या पुराने वृक्षों पर निवास करती है ।
इसकी सबसे बङी पहचान ये होती है कि आसपास के वासी अनोखी घटनाओं का शिकार होने लगते है । जैसे किसी के द्वारा मामूली बात पर फ़ाँसी लगाकर । जहर खाकर या खुद को जलाकर सुसाइड कर लेना । अचानक अकारण लोगों में ऐसा झगङा होना कि गोली चलने की नौबत आ जाये । बच्चे अनोखी बीमारियों का शिकार होने लगते हैं । उनका व्यवहार भी अजीव हो जाता है । ये विवाहित या नव विवाहित युवतियों पर सबसे ज्यादा अटैक करती है । और उसकी वजह से वे युवतियाँ निर्लज्ज वैश्या के समान व्यवहार करने लगती हैं ।
वे अपने स्तनों या योनि का ( कभी कभी खुले आम भी देखने में आया है ) भोंङा प्रदर्शन करती है । और उनका पति या कोई अनजाना अग्यानवश आकर्षित होकर उनसे सम्भोग करे । तो वे उस वक्त एक बलात्कारी महिला का सा व्यवहार करती हैं । ऐसा अनुभव होता है । मानों कोई शक्तिशाली हस्तिनी औरत पुरुष से बलात्कार कर रही हो ।
अक्सर इसकी शिकार औरतें खुले आम अपना ब्लाउज आदि फ़ाङ देती हैं और अन्य अधोवस्त्रों के भी चिथङे चिथङे कर डालती है । अत्यधिक गम्भीर हालत होने पर उनको रस्सियों से बाँधकर रखना पङता है । और लोग इस समस्या की असली वजह नहीं जान पाते ।

इसकी वजह ये है कि इस तरह के पारलौकिक ग्यान के जानने वाले अक्सर निर्जन स्थानों पर रहना पसन्द करते हैं । और आम लोग उन्हें कम ही जानते हैं । तब ऐसी अवस्था में मरीज को अस्पताल लाया जाता है । जहाँ नींद के इंजेक्शनों और ग्लुकोज की वोतलों द्वारा समस्या को हल करने की कोशिश की जाती है । और वास्तव में अभी तक के चिकित्सा विग्यान के पास इससे ज्यादा हल है भी नहीं । और ये कामयाब भी हो जाता है । क्योंकि मरीज को चार छह महीने तक नशीली दवाओं से लगभग बेहोशी की हालत में निष्क्रिय रखा जाता है । और नगर कालका ऐसी हालत में उससे काम नहीं ले सकती । अतः वह उस शरीर को छोङकर अन्य को आवेशित करना शुरू कर देती है । और उसके छोङते ही प्रभावित युवती स्वस्थ होने लगती है । उसके परिवार के लोग समझते हैं कि ये डाक्टरी इलाज से ठीक हो गयी । डाक्टर इस तरह की परेशानियों को दमित यौन इच्छाओं से हुआ रोग हिस्टीरिया बताते हैं ।
इसके अतिरिक्त पक्षी भी बिना कारण मर जाते हैं । और नगर कालका के क्षेत्र में कुत्ते बेहद दुखित होकर रोते हैं । यानी मामला काफ़ी गम्भीर था ।
- मेरी फ़ीस ।  मैंने अपलक अपनी और देखती हुयी रेनू से कहा - एक लाख रुपये होगी । और किसी बच्चे की जिन्दगी के सामने एक लाख रुपये का कोई महत्व नहीं..यू नो..?
उसके चेहरे पर एक आह सी नजर आयी । उसने कसमसा कर पहलू बदला । और विचलित होकर बोली - लेकिन इस समय मेरे पास तीस हजार से अधिक नहीं हैं । सुरेश इस बात पर विश्वास नहीं करेगा । और मेरे पास पैसे प्राप्त करने का और कोई जरिया भी तो नहीं है ।
मैंने जानबूझकर उसके शर्ट से बाहर झाँकते अधखुले गोरे स्तनों को निहारा । और कहा - तुम दूसरे तरीके से भी पेमेंट कर सकती हो । यदि तुम चाहो तो ...?
मेरी बात समझकर वह पाँच मिनट के लिये विचलित हो गयी । उसने एक निगाह काली चिङिया को देखा । फ़िर अपनी फ़ूल सी प्यारी बच्ची डौली को देखा । और इसके बाद ऊपर से नीचे तक मुझे देखा । और फ़िर उसके चेहरे पर बेबसी के बाद कठोर निर्णय के भाव आये । और वह फ़ैसला करती हुयी बोली - ओ  के  मैं तैयार हूँ ।
- नगर कालका ।  मेरे मुँह से स्वतः ही निकला । वह फ़िर असमंजस से मुझे देखने लगी ।
दरअसल उससे सम्भोग करने का मेरा कैसा भी और कोई भी इरादा नहीं था । लेकिन जबसे रेनू मेरे सामने आयी थी । मुझे एक ही बात की हैरत थी कि वह दिमागी स्तर पर एकदम सचेत रहती थी । इतने समय में तीन बार मैंने चुपचाप उसका दिमाग रीड करने की कोशिश की । लेकिन उसके सचेत रहने के स्वभाव के कारण नहीं कर पाया ।
किसी के दिमाग पर अधिकार जमाने के लिये या प्रविष्टि करने के लिये उसका विचलित या अस्थिर होना आवश्यक होता है ।
इस तरह जब मेरे तीन प्रयास विफ़ल हो गये । तो मैंने ये आलवेज सफ़ल फ़ार्मूला अपनाया । जो कामयाब रहा । मैं उसके दिमाग से पिछले दस बरसों का प्रिंट लेने में कामयाब हो गया ।
इस सम्बन्ध में एक पौराणिक बात याद आती है । श्रीराम जब रावण का बध कर रहे थे । तो सबको आश्चर्य था कि राम रावण के ह्रदय को लक्ष्य करके बाण क्यों नहीं मारते । तब राम ने इसका रहस्य बताया था कि रावण के दिल में सीता बसी हुयी है । और सीता के ह्रदय में स्वयँ मैं । इस तरह बाण मारने पर राबण के वध के साथ साथ पूरी सृष्टि का ही विनाश हो जाता । इसलिये राम बार बार उसके सिर काटकर उसे विचलित और अस्थिर करने की कोशिश कर रहे थे । ताकि सीता की तरफ़ से उसका ध्यान हट जाय । और राम की यही युक्ति काम आयी थी ।
इसी तरह बेहद सचेत रहने वाली रेनू भी मेरे द्वारा एकाएक सेक्स की बात पर विचलित हो ही गयी । अब मेरी समझ में यह बात भी आ रही थी कि नगर कालका ने अपनी असली दुश्मन रेनू के बजाय मासूम डौली को क्यों निशाना बनाया था । रेनू के हर समय सचेत रहने के स्वभाव के कारण ही वह उसे प्रेत भाव से प्रभावित नहीं कर सकी । अगर उसने ज्यादा कोशिश भी की होगी । तो रेनू को अधिक अधिक से अधिक अपना सिर भारी भारी लगा होगा । जिसे उसने चाय काफ़ी आदि गर्म पेय पीकर दुरुस्त कर लिया होगा । और बार बार के प्रयास से हारकर नगर कालका ने अपनी सौतन के बजाय डौली को अपने कहर का शिकार बना लिया ।
अब मुझे रेनू की सहायता करने में बेहद समस्या नजर आ रही थी । दरअसल इस किस्म के केसों में मैं बाबाजी की कोई मदद नहीं ले सकता था । बाबाजी इस तरह के साधारण भूत प्रेतों के मामले से बेहद चिङते थे । उन्हें केवल सूक्ष्म लोकों की यात्रा और आत्मग्यान के रहस्यों को खोजना पसन्द था ।
क्योंकि भूत प्रेतों के मामलों से संसार भरा पङा है । इसलिये ये साधारण ओझाओं तान्त्रिकों का काम था । मैं भी इस मामले से पल्ला झाङ लेना चाहता था कि तभी मेरा ध्यान मासूम डौली पर चला जाता था । जो पूरी तरह से आवेशित होकर नगर कालका के कब्जे में थी । और इस हालात में मेरे गणित के अनुसार दो महीने से लेकर अधिकतम दो साल तक ही और जी सकती थी ।
इस बात में एक और रहस्य था । जो इतने बीच में मुझे पता चल चुका था । जिस तान्त्रिक से रेनू ने डौली का इलाज कराया था । उसने रेनू के साथ धोखा करते हुये उल्टे बच्ची को एक धीमी और अनजानी मौत की और धकेल दिया था । और इसकी वजह ये थी कि वो वेचारा नहीं जानता था कि जिसे साधारण भूतनी समझकर वो डौली का इलाज कर रहा था । वो वास्तव में नगर कालका थी । और नगर कालका को डील करना उस साधारण से तान्त्रिक के बस की बात नहीं थी ।
उस पर नगर कालका स्वयँ तान्त्रिक की पत्नी पर आवेशित हो गयी । और तान्त्रिक से अमानवीय सहवास करते हुये उसने तान्त्रिक को वेताल सिद्धि में सहायता करने का आश्वाशन दिया । और इस तरह रक्षक ही भक्षक बन गया । और वह डौली को कोई लाभ पहुँचाने के स्थान पर उल्टे नगर कालका की सहायता करने लगा ।
यकायक मैंने डौली को बचाने का निर्णय ले लिया । मैंने रेनू की तरफ़ देखा । वह इस ऊहापोह से गुजर रही थी कि मेरा अगला कदम क्या होगा । और वह भारी असमंजस में थी । वास्तव में मेरा अगला कदम और पहला कदम नगर कालका से तान्त्रिक का सम्बन्ध तोङना था । जो उसे बाहरी तौर पर सहायता दे रहा था । फ़िर उस बच्ची के ऊपर से वह तन्त्र हटाना था । जो उसे निरन्तर मौत के मुँह में ढकेल रहा था । फ़िर आखिरी काम उस नगर कालका से इस परिवार का पीछा छुङाना था । जिनमें पहले दो काम में यहीं कर देना चाहता था । मैंने देखा कि मन्दिर के आसपास दूर दूर तक कोई नहीं था ।
डौली यन्त्रवत सी चिङिया को देख रही थी । रेनू बेहद परेशानी से मेरी तरफ़ देख रही थी ।
मैंने एक नयी सिगरेट सुलगायी । और रेनू को अपने पास आने का इशारा करते हुये कहा - प्लीज कम
हियर ..।
वह अचकचाती सी मेरे पास आकर बैठ गयी । मैंने उसे एक इशारा किया । और बोला - प्लीज ..।
- लेकिन यहाँ ..?  फ़िर उसके चेहरे के भाव कठोर हो गये । और उसने अपनी शर्ट के तीन बटन खोल दिये । ऊपर के दो पहले से ही खुले हुये थे । हाथ पीठ पर ले जाकर उसने ब्रा निकाली । और जींस की जेव में डाल ली । उसके आगे बङने से पहले ही मैंने उसे रोक दिया । और सिगरेट का धुँआ उसके मुँह और स्तनों पर फ़ेंकने लगा । उसकी गर्दन सख्त होकर अकङने लगी ।
वह बार बार अपने ही हाथों से अपने गालों को मसलने लगी । और बीच बीच मैं अपने सीने पर स्वयँ घूँसा भी मारती । उसका चेहरा एकदम वीभत्स हो उठा । करीब तीन मिनट बाद वह निढाल होकर गिर पङी ।
मैंने उसके स्तनों को छुये बिना उसकी शर्ट के बटन लगाने की कोशिश की । जिसे मैं बङी मुश्किल से अंजाम दे सका । क्योंकि वो बहुत टाइट शर्ट पहने थी । मैं मन्दिर के नल के पास पहुँचा । और एक बाल्टी ठंडा पानी लाया । फ़िर बिना किसी बात की परवाह किये मैंने वो वाल्टी रेनू के ऊपर उङेल दी । और एक सिगरेट सुलगाकर पेङ पर बैठी काली चिङिया को देखने लगा ।
फ़िर मैंने एक निगाह डौली को देखा । और मुस्कराया । मेरे दो काम बिना किसी खास अङचन के समाप्त हो गये थे ।
लगभग छह मिनट बाद रेनू हङबङाकर उठी । उसने तेजी से डौली की तरफ़ देखा । फ़िर अपने भीगे बदन को देखा । और फ़िर मुझे देखा । लेकिन बोली कुछ नहीं । वह अजीब सा महसूस कर रही थी । मैं ज्यादा देर उसे अभी अभी प्राप्त हुयी खुशी से दूर नहीं रखना चाहता था । सो मैंने उसे मन्दिर में लगे ढेरों गेंदा के फ़ूलों में से कुछ फ़ूल तोङकर लाने को कहा । वह यन्त्रचालित सी फ़ूल तोङ लायी और मुझे दे दिये ।
मैंने एक फ़ूल डौली की तरफ़ फ़ेंका । वह तुरन्त आकर्षित होकर फ़ूल की तरफ़ मुङी । मैंने एक और फ़ूल फ़ेंका । डौली उस तरफ़ भी देखने लगी । मैंने उसका नाम लेकर पुकारा । तो वह मेरी तरफ़ देखने लगी । रेनू अपने आप को रोक न सकी । और फ़ूट फ़ूटकर रोते हुये उसने डौली को उठाकर अपने सीने से भींच लिया । अब डौली साधारण बच्चों की तरह व्यवहार कर रही थी । और काली चिङिया की तरफ़ उसका कोई ध्यान न था ।
रेनू का चेहरा खुशी से दमक रहा था । उसकी आँखों में मेरे लिये गहन कृत्यग्यता के भाव थे । दरअसल वह सोच रही थी कि इस अनजानी आफ़त से उसका छुटकारा हो चुका है ।
- नगर कालका ।  मेरे मुह से स्वतः ही निकला ।
रेनू ने फ़िर से भयभीत होकर मेरी तरफ़ देखा ।
- जब तक ये पहले से मरी हुयी काली चिङिया दुबारा से नहीं मर जाती । तुम वहीं की वहीं रहोगी बेबे । इस मुसीबत से तुम्हें अभी अस्थायी रूप से छुटकारा मिला है । नगर कालका इतनी आसानी से पिंड नहीं छोङती ।
- अब ।  वह व्यग्रता से बोली - क्या करना होगा ?
अब तो खुद मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या होगा और कैसे होगा । दरअसल अब जो काम मुझे करना था । उसके लिये रेनू के किसी परिबार वाले का होना आवश्यक था । जो कि था ही नहीं । बात ये थी कि बच्ची पर तो नगर कालका को आवेशित करने का प्रश्न ही नहीं था । उसकी संतुष्टि के लिये बालिग और सम्भोग की अभ्यस्त जवान औरत की आवश्यकता थी । अब या तो ये काम स्वयँ रेनू करती । या फ़िर उसकी तरफ़ से कोई और बलि की बकरी पेश की जाती । दूसरे ये काम दिन में नही हो सकता था । एक तो दिन का माहौल प्रेतों को पहले ही रास नहीं आता ।
दूसरे क्योंकि नगर कालका एक चिङिया के शरीर का सहारा ले रही थी । इस हेतु ये काम ऐसे खुले स्थान पर होना था । जहाँ नगर कालका चिङिया के शरीर से निकलकर आवेशित महिला के शरीर में प्रवेश कर जाय । और चिङिया को स्वयँ अपने हाथों से मार डाले । चिङिया तो नगर कालका के निकलते ही मरी समझो । पर जरूरी ये था कि नगर कालका स्वयँ अपने हाथों से उसके टुकङे टुकङे कर दे । अब चिङिया बन्द स्थान में कैसे खिंचकर आ पायेगी । ये दिक्कत थी ।
चिङिया के मरते ही पचहत्तर प्रतिशत काम हो जाना था । फ़िर आवेशित महिला के माध्यम से नगर कालका को धमकाना , पटाना या जो भी वो माँग करे । जो भी स्थिति बने उससे निपटना था ।
अब जब रेनू स्वयँ आवेशित होने वाली थी । तो फ़िर मेरी सहायता कौन करता । दूसरे मैं रेनू को आगे क्या होने वाला है । इस बारे में कुछ नहीं समझा सकता था । क्योंकि इससे वो चिंतित हो जाती । और किसी प्रेत के आवाहन के लिये ये कतई उचित नहीं था । और क्योंकि ये नगर कालका का मामला था । इसलिये इसका " माध्यम " औरत ऐसी होनी चाहिये थी । जो बरसो से काम की आग में जल रही हो । तो ये आवेशित क्रिया एकदम गुड रिजल्ट देने वाली होती ।
इसकी वजह ये थी कि जब किसी औरत प्रेतात्मा को इस तरह के माध्यम पर आवेशित किया जाता । तो उस औरत के भाव और प्रेतात्मा के भाव आपस में संयुक्त हो जाते । और प्रेतात्मा बहुत सी बातों को भूलकर कामातुर नारी के समान व्यवहार करती । और आसानी से काबू में आ जाती । और तान्त्रिक यदि उसके मनोनुकूल बात करे । तो वह समर्पण की मुद्रा में हो जाती थी ।
अब मान लो । मैं ये सब बात पहले ही रेनू को बता देता । तो उसका जो व्यवहार होता । वो बनाबटी हो जाता । और हो सकता है कि बना बनाया खेल ही बिगङ जाता । या वही काम दुबारा से करना पङता । इसलिये मुझे रेनू में पूरी कामवासना जगाते हुये सारे कार्यक्रम को साबधानी से करना था । और अकेले ही करना था । और उसे बिना बताये करना था
मैंने रेनू से बात की । तो स्थान की समस्या तो हल हो गयी । उसके घर में ऊपर छत पर एक सेपरेट पोर्शन था । उसी के पार गली में पीपल का वह बूङा वृक्ष था । जिस पर वह काली चिङिया रहती थी । उस वृक्ष की डाली रेनू की छत पर आती थी ।
शाम के पाँच बज चुके थे । जब हम मन्दिर से रवाना हुये । रेनू बाइक चला रही । डौली को उसने बेल्ट के साथ आगे कर लिया था । मैं उसके पीछे जानबूझ कर सटकर बैठ गया और बेझिझक हाथ उसकी कमर में डाल दिये । जिसका उसने कोई विरोध नहीं किया ।
दरअसल मुझे रात नौ बजे से कार्यक्रम आरम्भ कर देना था । और चार घन्टे के इस समय में मुझे रेनू को बेहद उत्तेजित अवस्था में पहुँचाना भी था । और प्रेत आवाहन के अन्य कार्यक्रम भी निर्विघ्न सम्पन्न करने थे । मैने मन ही मन तय कर लिया था कि आज नगर कालका का चक्कर ही खत्म कर दूँगा । चाहे इसके लिये नगर कालका की माँग पर मुझे आवेशित माध्यम रेनू से सम्भोग ही क्यों न करना पङे । रेनू से सम्भोग का तो कोई प्रश्न ही न था ।
ठीक छह बजे मैं रेनू और डौली छत पर थे । डौली का अब कोई काम न था । सो मेरे कहे अनुसार रेनू ने उसे दूध पिलाकर सुला दिया था । बीच में किसी कारण से डौली जागकर डिस्टर्ब न करे । इस हेतु मैं पहले ही हल्के असर बाली नींद की गोली ले आया था । जो उसके दूध में डाल दी थी । मैनें एक सिगरेट सुलगायी । और काली चिङिया की तरफ़ देखा । वह पीपल की डाली पर मिट्टी की निर्जीव चिङिया की भांति बैठी थी ।

- नगर कालका ।  स्वतः ही मेरे मुँह से निकल गया ।
रेनू जल्दी से दो कप काफ़ी बना लायी । मेरा दिमाग तेजी से काम कर रहा था । रेनू काफ़ी लेकर मेरे सामने बाले सोफ़े पर बैठ गयी । समय बहुत कम था । मैंने उसे इशारा किया । मेरा इशारा समझकर वह मेरे पास आकर बैठ गयी । मैंने उसकी कमर में हाथ डाला । और गोद में कर लिया । उसने अपनी शर्ट के सारे बटन खोल दिये । मुझे लगा कि वह पिछले माहौल का प्रभाव भूलकर उत्तेजित होने लगी है ।
मैंने उसे समझाया कि मुझे क्या पसन्द है । मैंने उसे ढंग से नहाकर पूरे शरीर पर परफ़्यूम लगाने को कहा । और ऐसे कपङे पहनने को कहा । मानों वास्तव में वह अपने प्रेमी को पूर्ण संतुष्टि देना चाहती हो ।
ये सब उल्टा था । दरअसल रेनू सोच रही थी कि मैं अपनी फ़ीस के लिये ऐसा कर रहा हूँ । और वास्तव में मैं चाहता भी यही था कि वो मानसिक रूप से इस बात के लिये तैयार हो जाय कि थोङी देर बाद उसे सम्भोग नायिका की भूमिका निभानी है । अपने इसी प्रयास हेतु मैं रास्ते में उसको सहलाता रहा था । और उसका असर भी नजर आ रहा था ।
दूसरे तान्त्रिक का टोना तोङने हेतु जब मैंने उसके वक्षों को अनावृत कराया था । उसका भी असर था ।
दरअसल ज्यादातर औरतों में यह खास बात होती है कि एक बार किसी के लिये , किसी भी वजह से उसकी हया का परदा गिर जाता है । तो बाकी समर्पण भी वह शीघ्र और स्वेच्छा से कर देती है । इसका प्रमाण तब मिला । जब वह बाथरूम से नहाकर सिर्फ़ एक छोटा टावल लपेटे बाहर आयी । और बाल आदि संवारने के क्रम में उसका टावल भी खुल गया । जिसकी उसने कोई परवाह न की । और पूर्ववत अपना श्रंगार करती रही ।
वास्तव में वह यही सोच रही थी कि अगले कुछ ही क्षणों में मैं उसके साथ सम्भोग करने वाला हूँ । और वह इसके लिये मानसिक रूप से तैयार भी हो चुकी थी । या कहना चाहिये । मेरी योजना एकदम सटीक जा रही थी । और वह सब कुछ भूलकर उत्तेजना महसूस कर रही थी । इसके अंतिम निरीक्षण हेतु मैं उसके पास पहुँचा । वह एकदम उठकर मेरे से चिपक गयी । मैंने उसके बदन पर हाथ फ़िरा कर देखा । वह एक तरह से तप रही थी । यह प्रेतनी के आवाहन के लिये एकदम उत्तम स्थिति थी । मैंने उसे कपङे पहनने को कहा । तो उसने आश्चर्य से मेरी तरफ़ देखा ।
अब मैं अचकचा गया । एक बार के लिये मैंने सोचा कि ऐसे ही आवाहन कर देते हैं । पर तभी मुझे ध्यान आया कि नगर कालका आवेशित औरत अक्सर कपङे फ़ाङती है । और कपङे न होने की दशा में वह माध्यम के शरीर को किसी अन्य तरह से नुकसान पहुँचा सकती हैं । वास्तव में कपङे प्रेतनी का मनोरंजन और ध्यान बटाने का कार्य भी करते है ।
इसलिये रेनू मेरे मनोभाव से उलझन में न पङे । मैंने उसके स्तनों को सहला दिया । और पेङ की तरफ़ मुङते हुये सिगरेट सुलगा ली । वह हैरानी से घांघरा चोली पहनने लगी । मेरा ध्यान फ़िर चिङिया की तरफ़ गया । वह उसी तरह पीपल की डाली पर शान्त और खिलौना सी बैठी थी ।
- नगर कालका ।  मेरे मुँह से स्वतः ही निकला ।
ठीक नौ बजे प्रेत अनुष्ठान आरम्भ हो गया । इस हेतु मुझे बहुत कोशिश करनी पङी थी कि रेनू अंतिम क्षणों  तक यही समझे कि मैं बस उससे अब सहवास करने वाला ही हूँ । मैंने एक स्टील के बङे कटोरे में आग जलाकर धूप

लोबान जैसी आवश्यक वस्तुयें डाल दी थी । उनकी भयंकर खुशबू उङ रही थी ।
और ऊपर से रेनू ने मेरी बात का गलत ( पर वास्तव में सही ) मतलब समझते हुये परफ़्यूम की पूरी शीशी ही अपने बदन पर उङेल ली थी । यह सब चीजें लगभग ठीक थी । बस एक चीज की कमी थी ।
वह ये कि प्रेत को आवेशित करते समय एक नली टायप से माध्यम महिला के शरीर पर सुगन्धित धुँआ फ़ेंकना होता है । उसका कोई रास्ता मुझे न सूझा था । और फ़िर विकल्प के तौर पर पूर्व की भांति ही मैंने सिगरेट का इस्तेमाल ही उचित समझा । रही खुशबू की बात । वो रेनू के परफ़्यूम से इस कदर आ रही थी कि किसी प्रेतात्मा ने शायद ही ऐसी खुशबू सूँघी हो ।
मैंने रेनू को आसन पर बैठा दिया । और स्वयँ उसके ठीक सामने बैठकर सिगरेट सुलगा ली । और बस न चाहते हुये भी यहीं पर गङबङ हो गयी । रेनू समझ गयी कि मैं सहवास के बजाय और कुछ करने जा रहा हूँ ।
उसका दिमाग नयी स्थिति की तरफ़ आकर्षित होने लगा । और ये पूरा मामला चौपट होने जैसा था । स्थिति को भांपकर मैं तेजी से उठा । और असमंजस में डूबी हुयी रेनू को मैंने एक झटके से खङा कर दिया । और उसकी चोली में हाथ डालकर उसके स्तनों को सहलाने लगा । मैं नहीं चाहता था कि एन मौके पर काम बिगङ जाय । रेनू भी मेरे शरीर को टटोलने लगी ।
मैंने उससे झूठ बोला कि दरअसल में शाम को पूजा करने के बाद ही कुछ करता हूँ । अतः दस मिनट पूजा करने के बाद मैं उससे सम्भोग करूँगा । और तदुपरान्त रात बारह बजे से नगर कालका अनुष्ठान करूँगा । ये तीर एकदम निशाने पर लगा । और वह स्थिति को समझते हुये पूरा सहयोग करने लगी । मैं मन ही मन मुस्कराया । दस मिनट तो बहुत होते हैं । पाँच मिनट में ही नगर कालका खेल रही होगी ।
वह फ़िर से आसन पर बैठ गयी । मैं फ़िर से उसके सामने वाले स्थान पर बैठ गया । और दो मिनट तक उसकी आँखो में देखते हुये मैंने सिगरेट का भरपूर धुँआ उसके चेहरे पर फ़ेंका । और बेहद सधी आवाज में बोला - नगर कालका ।
रेनू का शरीर अकङने लगा । उसकी आँखे सुर्ख हो उठी । वह बेदर्दी से अपने गालों को मसलने लगी । उसने इतनी तेजी से सिर हिलाया कि उसके लम्बे बाल उसके चेहरे पर आ गये । उसने लाल लाल आँखों से मुझे घूरा । और जोर जोर से नागिन के समान फ़ुसकार मारने लगी । वह इतनी तेजी से हाँफ़ रही थी कि उसके मुँह से थूक निकल निकल कर आगे गिर रहा था ।
मैंने फ़िर से सिगरेट का धुँआ उसके चेहरे पर फ़ेंका । अब वह भद्दी भद्दी गालियाँ देने लगी । और अश्लील वाक्य बोलने लगी । मैंने कमरे के दरवाजे से बाहर देखा । काली चिङिया पेङ से छत पर उतर आयी थी । और खिलौने की भांति छत पर बैठी थी । कुछ ही देर मैं रेनू का भक्क सफ़ेद रंग एकदम से काला पङ गया । और वो वीनस की प्रतिमा की जगह भयँकर पिशाचनी नजर आने लगी ।
मैंने फ़िर से सिगरेट का धुँआ उसके चेहरे पर फ़ेंका । और मेरी कल्पना के विपरीत वह कामातुर नारी की जगह साक्षात पिशाचनी नजर आने लगी । भयंकर रौद्र रूप पिशाचिनी । उसने शायद मेरी चालाकी भांप ली थी । और मानों मेरे लक्ष्य का उपहास करते हुये उसने घाँघरा फ़ाङ कर फ़ेंक दिया । और बेहद उदंडता से बोली - मुँह पर क्या मारता है । यहाँ मार । नपुंसक मानव ।
मैंने उसके व्यंग्य की कोई परवाह न करते हुये धुँआ योनि पर फ़ेंका । वह पीङा से दोहरी होने लगी । और मेरी आशा के अनुरूप ही उसने चोली भी फ़ाङ दी । और इस तरह के भद्दे भद्दे वाक्य बोलने लगी । जैसे कामातुर हस्तिनी स्त्री व्यवहार करती है ।
काली चिङिया कमरे के दरबाजे तक आ पहुँची थी । अब लगभग क्लाइमेक्स का समय था । और जरा सी चूक बेहद गङबङ कर सकती थी ।
मैंने जल्दी से कटोरे में जलती हुयी आग से ही एक नयी सिगरेट सुलगायी । और उठकर पूर्ण नग्न नगर कालका को दबोच लिया । मैंने उसके झूलते हुये स्तनों को पकङा । और एक बलात्कारी की भाँति व्यवहार करने लगा । मैंने जलती हुयी सिगरेट उसकी हथेली से छुआ दी । वह हाँफ़ती हुयी ढीली पङ गयी । और लगभग मेरी बाहों में झूल गयी । मैंने फ़िर से उसे बैठाया । फ़िर से उसके आसन के सामने बैठा । और फ़िर से धुँआ उसके वक्षों पर फ़ेंका । उसका सीना तेज तेज सांस लेने से ऊपर नीचे हो रहा था ।
अब  काली चिङिया बिना किसी भय के यन्त्रवत चलती हुयी जलते कटोरे के पास आकर रुक गयी । नगर कालका ने एक बार फ़िर मेरी तरफ़ वासना की नजर से देखा । और इस तरह से इशारा करने लगी । मानों पूछ रही हो कि अभी अभी जो मैंने उससे सम्भोग आदि का वादा किया । वो पक्का है । या नहीं । मैंने सिर हिलाकर समर्थन में इशारा कर दिया ।
नगर कालका ने हिकारत से काली चिङिया को देखा । और उसकी गरदन मरोङते हुये चिथङे चिथङे कर कटोरे की जलती हुयी आग में डाल दिया ।
रात के ठीक दो बजे नगर कालका ने रेनू को , उस घर को मेरे कहने पर हमेशा के लिये छोङ दिया । पर ज्यादातर घटनायें मेरे अनुमान के विपरीत ही हुयी । जैसे मैं सोच रहा था कि नगर कालका को छल से निकालूँगा । इसके विपरीत अंतिम समय में मेरी उससे मित्रता हो गयी । जिसमें मेरा एक निजी स्वार्थ भी था । प्रेत लोकों और प्रेतों से मेरा अक्सर सम्पर्क रहता था । तो हर हालत में ये मित्रता मेरे लिये फ़ायदे का सौदा थी ।
दूसरे मैं सोच रहा था कि नगर कालका से किसी भी हालत में सम्भोग नहीं करूँगा । पर वो भी मुझे करना पङा । क्योंकि नगर कालका ने फ़िर कभी इस परिवार को न सताने का वादा किया था । और इसके एवज में मैंने भी उसकी शर्तें मानने का वादा किया था । अतः वादे से मुकरने में किसी तरफ़ से कोई फ़ायदा तो न था । हाँ नुकसान अवश्य थे ।
रेनू पूर्व अवस्था में आ चुकी थी । उसका रंग पहले के समान गोरा हो गया था । और मुख आदि पहले की भाँति ही सामान्य हो गये थे । पर वह अब भी अचेत पङी थी । रात के तीन बजने बाले थे । मैंने रेनू के शरीर पर एक बाल्टी भरा पानी डाल दिया । और सिगरेट सुलगाकर उसके चेतन होने का इंतजार करने लगा ।

शुक्रवार, मई 21, 2010

गंगा का रहस्यमय दिव्य कंगन..ganga ka rahasymay divy kangan


रैदास जी का नाम आत्मग्यान के उच्चकोटि के संत के रूप में इतिहास में दर्ज है ये कबीर के समकालीन थे और दिखावे के लिये उनके गुरुभाई भी थे पर वास्तविकता कुछ और ही थी ये कबीर जी को हमेशा " कबीर साहब " के आदरपूर्ण सम्बोधन से पुकारते थे और उन्हे गुरु के समान ही मानते थे । दुनिया की नजरों में कबीर और रैदास तथा कुछ अन्य साधकों की टोली रामानन्द के शिष्य के रूप में जानी जाती थी..पर हकीकत एकदम अलग ही थी । एक बार रामानन्द को भगवान ने कबीर की वास्तविकता दिखायी उससे प्रभावित होकर रामानन्द ने कबीर को साधक मन्डली का शिरमौर नियुक्त कर दिया..आगे चलकर इन्ही रामानन्द ने
धर्मदास के रूप में जन्म लिया तब कबीर ने इन्हें वास्तविक सच याने आत्मग्यान की सही शिक्षा दी और जन्म मरण के आवागमन से मुक्त कराया..लेकिन मैं बात रैदास जी की कर रहा था..बहुत कम लोग इस बात को जानते है कि कृष्ण भक्त के रूप में प्रसिद्ध परमभक्त मीराबाई संत रैदास की प्रिय और उच्चकोटि की साधक शिष्या थी । मीरा ने सुरतीशब्द साधना की थी और सारशब्द का ग्यान प्राप्त किया था " नाम लेयु ओ नाम न होय , सभी सयाने लेय । मीरा
सुत जायो नहीं , शिष्य न मुँड्यो कोय ।।रैदास जी भले ही दलित कुल में पैदा हुये थे पर आत्मग्यानी संत होने के कारण राजा महाराजा उनके आगे सर झुकाकर प्रणाम करते थे और उनके शिष्य भी थे । जो मन चंगा तो कठौती में गंगा..ये प्रसिद्ध कहावत रैदास जी के द्वारा ही प्रचलन में आयी थी इसके पीछे बङी ही रोचक कहानी है जो मात्र किवदंती न होकर सत्य घटना है । अविश्वसनीय सी लगने वाली इस घटना पर वे लोग सहज ही विश्वास कर सकते हैं जो संतो की महिमा से थोङे भी परिचित हैं । हाँ जनसामान्य को ऐसी घटनाओं पर विश्वास दिलाना कठिन होता है क्योंकि वे अद्रश्य और अलौकिकग्यान की a b c d भी नहीं जानते हैं । रैदास जी प्राय घर पर ही रहकर पनही ( जूते ) बनाने आदि का कार्य करते थे । कबीर की तरह इनके घर पर भी ज्यादातर साधुसंतो का आवागमन लगा रहता था इस वजह से सीमित आय होने के कारण ये घर का खर्च मुश्किल से चला पाते थे और इस हेतु उन्हें अधिक समय तक कार्य करना होता था । रैदास जी जूते बनाते और भजन ( एक विशेष प्रकार का ध्यान जिसको कार्य करते हुये आसानी से किया जा सकता है ) में पूरा पूरा मन लगाते थे " भाय कुभाय अनख आलस हू , नाम जपत मंगल सब दिस हू । सबहि सुलभ सब दिन सब देसा , सेवत सादर शमन कलेशा ।
आज की तरह उन दिनों भी लोगों में पाप धोने के लिये गंगा स्नान का बङा चाव रहता था इस हेतु वे चलते समय रैदास से भी गंगा स्नान करने के लिये चलने का आग्रह करते थे पर रैदास जी आत्मग्यानी होने के कारण भलीभाँति जानते थे कि वास्तविक गंगा स्नान क्या है और कैसे होता है ? ये बात आपको बेहद अटपटी लगेगी पर आप कुछ ऐसे छोटे महत्व के ही धर्मग्रन्थों में इसका प्रमाण देख सकते हैं जिनमें नाङीशोधन , प्राणायाम योगासन या कुन्डलिनी चक्रों के बारे में बताया गया हो । आज भारत से आत्मग्यान की परम्परा प्राय लुप्त सी हो जाने के कारण ये कुन्डलिनी आदि ग्यान जाने कितना महान मालूम होता है पर न तो ये आत्मग्यान है और न ही ज्यादा महान है । आत्मग्यान की किताब में यह एक प्रस्तावना जैसी हैसियत ही रखता है..तो भी जब आप ऐसे ग्रन्थों का अध्ययन करेंगे तो उसमें इडा पिंगला सुषमना आदि नाङियों का वर्णन मिलेगा..यही वास्तविक गंगा जमुना सरस्वती है नाक छिद्र से इनकी धाराओं का प्रवाहन होता है और भ्रूमध्य में इनके मिलन को वास्तविक कुम्भस्नान कहते हैं ..हाँलाकि इसका ये अर्थ नहीं निकालना चाहिये कि धरती पर बहने वाली गंगा का कोई महत्व ही नहीं है पर संत जिस गंगा में स्नान करते है वो हिमालय की न होकर यही है...इस हेतु रैदास जी बहस से बचने के लिये प्राय बहाना बना देते कि आज काम अधिक है इसलिये मैं नहीं जा पाऊँगा..
पर एक दिन रैदास जी को मौज आ ही गयी और उसी मौज में जब गंगास्नान जाने वालों ने एक तरह से उन्हें चिङाते हुये स्नान के लिये चलने का आग्रह किया तो रैदास जी बोले कि स्नान करने तो नहीं जा पाऊँगा लेकिन ये लो दो पैसे..मेरा परसाद लेकर गंगा में अवश्य अर्पित कर देना...परचित लोगों ने सोचा कि चलो कुछ तो अक्ल आयी ? तभी रैदास जी ने कहा कि सुनो गंगा ने परसाद स्वीकार किया या नहीं ये कैसे पता चलेगा इसके लिये तुम गंगा से कहना कि रैदास ने परसाद भेजा है और बदले में तुम क्या देती हो..लोगों ने सोचा कि रैदास की बुद्धि खराब हो गयी है । हम सालों से स्नान कर रहें है गंगा ने आज तक हमें कुछ नहीं दिया तो इसको क्या देगी...उनके संशय और उपहास मुद्रा को समझते हुये रैदास ने कहा कि तुम इतनी बात कह देना आगे गंगा की मरजी कि वो क्या करती है ? लोगों ने मन में सोचा कि इसने अपना उपहास कराने का मौका स्वयँ ही दे दिया । खैर वे गंगा पहुँचे स्नान किया और रैदास की बात याद आते ही उन्हें हँसी आ गयी फ़िर भी उन्होनें परसाद का दोना गंगा की तरफ़ करते हुये कहा कि " गंगा मैया ये परसाद रैदास ने आपके लिये भेजा है.." तुरन्त गंगा की धारा में से देवी गंगा का हाथ प्रकट हुआ और बेहद श्रद्धा से उसने प्रसाद को ग्रहण किया...हाँ कुछ गुप्त वजहों से उन लोगों को गंगा की शेष आकृति दिखायी न दी..इसके बाद उस हाथ में एक अनूठी आभा वाला दिव्य कंगन प्रकट हुआ और साथ ही गंगा की मधुर आवाज सुनायी दी " हे भक्तजन ये मेरी तरफ़ से प्रभु ( रैदास ) को दे देना " उन लोगों की " काटो तो खून नहीं " जैसी स्थिति हो गयी पर प्रत्यक्ष को कैसे झुठला सकते थे । हक्की बक्की अवस्था में उन्होनें कंगन लाकर रैदास को दे दिया..दरअसल कुछ कहने के लिये उनके पास शब्द ही नहीं थे...खैर रैदास ने वो कंगन अपनी पत्नी को दे दिया जिसे उसने बक्से में डाल दिया..कुछ समय के अंतराल के बाद रैदास को पैसों की समस्या आ गयी पर कंगन की उन्हें याद तक नहीं थी..तब पत्नी के द्वारा याद दिलाने पर रैदास ने पत्नी से कह दिया कि वो कंगन को किसी सुनार के यहाँ बेच दे । इस तरह ये दिव्य कंगन रैदास के बक्से से निकलकर सुनार की दुकान पर पहुँच गया जिसे उसने बङे जतन से सजाकर रख दिया..सुनार उस कंगन को देखकर भौंचक्का था..कंगन एक अनूठी आभा से हमेशा दमकता रहता था और इस तरह का सोना सुनार ने अपने जीवन में कभी नहीं देखा था..यही नहीं उसने कंगन के डिजायन का नकल करते हुये दूसरा कंगन बनाने की लाख चेष्टा की पर कभी सफ़ल नहीं हुआ । उसे इस बात की भी हैरत थी कि रैदास के पास ऐसा कंगन कहाँ से आया ?
खैर साहब..कुछ ही दिनों में राजकुमारी सुनार की दुकान पर आभूषण खरीदने आयी और पहली ही निगाह में उसने वो दिव्य कंगन पसंद कर लिया..और सुनार से उसका दूसरा जोङा निकालने को कहा ..सुनार की साँस मानो गले में ही अटक गयी..उसने राजकुमारी को बहुतेरा समझाया कि इस तरह का एक ही कंगन उसके पास है पर कंगन के अति आकर्षण से मोहित राजकुमारी उसकी कोई बात सुनने को तैयार न हुयी..और पन्द्रह दिन के अन्दर दूसरा कंगन राजमहल में पहुँचा देने का शाही आदेश करके चली गयी..वह सुनार भलीभाँति इस आदेश का मतलब जानता था..यदि राजकुमारी का मूड बिगङ गया तो राजाग्या उसे फ़ाँसी के फ़ंदे पर पहुँचा दे ये भी कोई ज्यादा बङी बात नहीं थी..सो वह अपना तमाम धन्धापानी छोङकर दूसरे कंगन की तलाश में लग गया और तलाश की मंजिले तय करता हुआ रैदास जी के पास पहुँच गया । उसने रैदास जी के सामने अपनी परेशानी रखी । रैदास जी ने कहा कि वो कंगन उन्हें इस इस तरह से देवी गंगा ने दिया है और उस तरह का दूसरा कंगन भला कैसे मिल सकता है । सुनार उनके पैरों पर गिर पङा और बोला कि रैदास जी किसी तरह मेरी जान इस जंजाल से छुटा दो । आपकी कृपा से मेरा जीवन बच सकता है...आप गंगा के पास चलिये और जिस तरह से उन्होंने आपको ये कंगन दिया है उसी तरह से गंगा आपको इसका दूसरा कंगन भी दे देगीं । रैदास जी उसकी परेशानी पर मुस्कराये और बोले कितुम्हारी बात ठीक है लेकिन इसके लिये गंगा जाने की क्या जरूरत है..सुनार भौंचक्का सा उनका मुँह देखने लगा..रैदास ने उसकी परेशानी दूर करते हुये कहा कि अरे भाई " जो मन चंगा तो कठौते में गंगा " और चमङा भिगोने वाले कठौते में हाथ डालकर दूसरा कंगन निकालकर दे दिया..बेहद आश्चर्यचकित सुनार उनके पैरों में गिर पङा ।

रविवार, मई 16, 2010

इस हमाम में सब नंगे हैं.. ?

मैं सदियों से दवी कुचली शोषित नारी के उत्थान का पक्षधर हमेशा ही रहा हूँ लेकिन
जिस तरह का नारी उत्थान आज देखने को मिल रहा है . मैं उसका हिमायती हरगिज
नही हूँ स्त्री हो या पुरुष ये समाज के नियत और धार्मिक मर्यादाओं से अधिक शोभा पाते
हैं और मर्यादा च्युत होने पर हम ही लोग उन्हें धिक्कारते भी हैं . ऐसी स्थिति में क्या ये नहीं लगता कि कहीं न कहीं कोई त्रुटि अवश्य है..आपने उत्तर प्रदेश में प्रचलित एक
कहावत शायद सुनी हो " रांड रंडापा तब काटे जब रडुआ काटन देंय " इसका अर्थ जो
लोग न समझ पाय उनके लिये अर्थ बता रहा हूँ..कोई औरत जब विधवा हो जाती है तो
उसके लिये रांड शब्द का प्रयोग करते हैं..इस कहाबत का आशय यही है कि यदि विधवा
औरत अपने मृतक पति की याद के सहारे ही शालीनता से अपना जीवन काटना चाहे
तो आसपास के रंडवे या अन्य कामभ्रष्ट लोग उसको खाली पङे प्लाट की तरह कब्जाने की कोशिश करते है और तरह तरह के उपायों से उसकी यौनेच्छा या कामपिपासा भङका ही देते हैं..अंत में वो हथियार डाल देती है और फ़िर खुलकर उन्मुक्त यौन जीवन जीती है
ये नई अवतरित हुयी नगरवधू न सिर्फ़ आसपास की विवाहित और अविवाहित युवतियों के लिये उन्मुक्त यौन सम्बन्धों के प्रेरणा रूपी अध्याय खोल देती है..वरन ये अकेली मछली पूरा तालाब ही गन्दा कर देती हैं..क्योंकि.".जानत सब सबकी.. कहे को किनकी.".इस नियम में हमारा वर्तमान समाज जी रहा है अतः ऐसी नगरवधू समाज से बहिष्कारित होने के बजाय ठाठ से हमारे मुहल्ले में हमारी कालोनी में ही रहती है...हमारे घरों में उसका उठना बैठना होता है..और वह आसानी से अपने विचार हाव भाव हमारे घर की महिलाओं पुरुषों..जवान लङकों में सम्प्रेषण कर पतन के नये अध्याय खोलने में कामयाब हो जाती है .श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है कि युद्ध के परिणाम अच्छे नहीं होंगे जो सैनिक मारे जायेंगे उनकी पत्नियों के आचरण से वर्णसंकरता पैदा होगी..अब प्रश्न यह है कि विधवा होना किसी औरत का निजी दोष तो नहीं है..और फ़िर दोहरी मानसिकता में जीते समाज के लोग एक तरफ़ तो उसका भरपूर उपयोग करना चाहते हैं दूसरी तरफ़ समाज के तेजी से होते नैतिक पतन पर विचार
गोष्ठियां करते हैं . आजकल तो इस खुली बेशर्मी को भी आधुनिकता का नाम दिया जाता है लेकिन मुझे किसी पुराने कवि की पक्तिंयों का अर्थ याद आता है जिसमें उसने कहा था कि नारी के स्तन आदि यदि कुछ कुछ झलकते हों तो नारी की शोभा कई गुना बङ जाती है..
यानी सौन्दर्य की झलक मर्यादा में हो..तुलसीदास ने भी कहा है कि ..विधुबदनी सब भांति संवारी..सोहे न बसन बिना बरु नारी..यानी औरत कितनी भी खूबसूरत क्यों न हो बस्त्रों के बिना शोभा नहीं पाती..इस सम्बन्ध में विषयांतर करते हुये एक मजेदार मगर बेकार बात आपसे शेयर कर रहा हूँ..अभी बहुत सालों के अंतराल के बाद जब दुबारा लेपटाप लिया तो एक email बना कर सब दोस्तों को सूचना दी कि दुबारा मैदान-ए-जंग में आ गया हूँ ..उफ़ ..तब मुझे नहीं मालूम था कि वे मेरी क्या गत बनाने वाले हैं..मेरे दोस्त जानते हैं कि मैं singal हूँ..सो उन्होनें मेरे email का दुरुपयोग करते हुये कई adult और dating साइटस पर मेरा रजिस्ट्रेशन कर दिया..और अगले दिन से ही रीना, मीना ,रागिनी, निशा आदि के मेसेज आने लगे जिनमें लिखा होता था कि (अरे बेबकूफ़) माउस पर ही उंगलिया घुमाता रहेगा या...?...मैं हैरान ..परेशान..यार मैं इतना पापुलर हूँ कि कुछ ही दिनों में इतनी सुन्दरियां मुझे जान गयी और बङी अजीव अजीव भाषा में "इनवाइट" भी कर रही हैं "विन्क" शब्द का अर्थ भी मुझे इन्ही इंटरनेट देवियों द्वारा ही ग्यात हुआ..अब जैसे ही सुबह email खोलता इन अनेक अनदेखी प्रेमिकाओं के प्रेमपत्रों से मेरा इनबोक्स भरा मिलता ...हद हो गयी यार..लेकिन काजर की कोठरी में कैसो हू सयानो जाय..मन नहीं माना
सोचा एक बार इनके घर ( सायट पर) जाकर देखते हैं कि ये कौन से अर्थ earth के लोग हैं वहाँ जाकर तो बुद्धी ही घूम गयी साहब..हमसे कहा गया कि दस सदस्य आपको पसन्द करते हैं किससे मिलेंगे ? रीना को चुन लिया..हसरत हुयी कि इसका चाँद सा मुखङा देखते है...लेकिन गजब..वो वास्तव में दूसरे earth की थी हमारे यहाँ जैसा सुन्दरियों का वक्ष होता है ..वैसा तो उसका मुख था..रागिनी तो उससे भी हटकर अलग ग्रह की थी..उसका मुख बिलकुल नितम्ब जैसा था..अन्य मुखों की बात करना हमारी भारतीय परम्परा के अनुकूल नहीं है..
हमारे जैसे मुख वाले मुख बहुत कम देखने को मिले..क्योंकि बहुत दिनों से टी. वी. नही देखा और न्यूजपेपर भी ठीक से नहीं पढ पाया..इसलिये लगा कि nasa ने कोई नया ग्रह खोज ही लिया या udan tastari वाले प्राणियों ने vasundhara पर धावा बोल दिया..सही बात क्या है ये google की नाली में कीवर्ड टायप कर करके जानने की कोशिश कर रहा हूँ .दरअसल कामवासनाओं के अजीव मायाजाल की बहस का कभी भी और कहीं भी कोई अंत नहीं हो सकता मैं अपने दोस्तों में अक्सर इसी बात को लेकर आलोचना का पात्र बन जाता था क्योंकि मेरा मानना था कि अगर तुम दूसरी लङकियों को देखकर सीटी बजाते हो छींटाकसी करते हो तो तुम्हें इस बात के प्रति भी सहनशील होना चाहिये कि दूसरे लङके भी तुम्हारी बहन के साथ यही व्यवहार करेंगे...इस सम्बन्ध में एक बेहद दिलचस्प किस्सा याद आता है..
एक लङका हमारे ग्रुप में नया नया दोस्त बना था और पूरा heman था . हम लोग अक्सर घूमने जाते और बालाओं को देखकर (जिनमें मैं कभी शामिल नहीं होता था दरअसल मेरी जिन्दगी की कहानी ही अलग तरह की है ) छींटाकसी करते थे जिनमें वह लङका भी शामिल होता था..एक दिन हम सब लोग जा रहे थे हमारे काफ़ी आगे एक लङकी जा रही थी सब लोग लङकी पर छींटाकसी करने लगे..उस लङके पर जिसका नाम योगी ( योगेश ) था किसी का ध्यान नहीं था..मैंने देखा वह असमंजस और अजीव पेशोपश में था और चुप था जैसे समझ न पा रहा हो कि क्या करे..तभी एक लङके राहुल ने सारी मर्यादाएं लांघते हुये एक गन्दा कमेंट किया और योगी ने झपटकर उसका कालर पकङते हुये जोरदार मुक्का उसके मुँह पर मारा और दाँत पीसकर बोला stupid..she's my sister..सारे लङकों पर मानों घङों पानी पङ गया किसी को कुछ न सूझा..कि क्या करे और क्या कहे...ये तो अच्छा था कि नेहा (राहुल की बहन) ने कमेंट की कोई परवाह न करते हुये पलटकर नहीं देखा था वरना वो ऐसे लङके की बहन थी
जिसे दादा या don भी कहते हैं और don हमारे साथ ही था इस तरह एक बङी ( मगर आधी ) शरमिंदगी से हम लोग बच गये..और लङकों ने इस गलती के प्रायश्चित स्वरूप बाद में नेहा के पैर छुये..(ताकि राहुल के दिल में कोई मलाल न रहे ये इस बात का भी प्रमाण था कि योगी की बहन उनकी अपनी बहन जैसी ही है)हालांकि नेहा को इस बङी और शर्मनाक घटना का कभी कोई कैसा भी पता न चला .उस दिन से योगी मेरा बहुत आदर करने लगा क्योंकि उसके सामने या आगे पीछे मैं इस तरह के कृत्यों से हमेशा दूर रहता हूँ यह बात वह भली भांति जानता था.. अब चलते चलते एक बात और..एक भारत का संत एक बार विदेश भ्रमण पर गया वहाँ उसने देखा कि एक युवती एक कब्र पर पंखे से हवा कर रही है..पूछने पर उसने बताया कि यह कब्र उसके हसबेंड की है..संत का ह्रदय अत्यंत प्रसन्न हो गया..ओ हो देवी तुम्हारा पतिप्रेम धन्य है..ह्रदय गदगद हो गया तुम्हारे दर्शन पाकर...मैं तो समझता था कि सीता सावित्री जैसी नारियां पवित्र भारतभूमि पर ही हैं...वो ऐसा है स्वामी जी " युवती ने कहा " कि दरअसल भावावेश में मैं अपने मृत पति को वचन दे बैठी कि जब तक उसकी कब्र की मिट्टी नहीं सूख जायेगी ..तब तक मैं दूसरा विवाह न करूँगी...? हमने अच्छा जानकर तुमसे करली क्या दो बात..आपने समझा हो गयी बिन बादल बरसात ये तो..हद कर दी आपने..?

गुरुवार, मई 13, 2010

पिया लाये परायी नारि..चार मूर्ख कवि

आम जिंदगी में तो भगवान को कोसने वालों की कोई कमी है ही नहीं . ब्लाग जगतभी इससे अछूता नहीं है . अगर आप इस बात को ठीक से समझ नहीं पाये हों तो कुछ उदाहरण हैं..मान लीजिये किसी जवान स्त्री का पति..या जवान आदमी की
पत्नी जिनके छोटे छोटे बच्चे भी है..इनमें से कोई एक मर जाता है तो ब्लाग जगत की तरह भगवान के ब्लाग पर लोग अक्सर इस तरह के कमेंट देते हैं ..अरे ईश्वरबङा अन्यायी है..ये भी नहीं देखा कि छोटे बच्चे थे..भरी जवानी में विधवा हुयी..
अब क्या होगा आदि..ये तो अनर्थ ही है..आदि...मेरा अध्ययन ये कहता है कि नीचे पव्लिक की तमाम परेशानियों(भौतिक ) की जिम्मेदार सरकार है..और देहिक और दैविक तमाम परेशानियों का जिम्मेदार भगवान है..भगवान सुनता नहीं ..भगवान मेरी सुन लो..वृद्ध जो शरीर की जर्जरता आदि से परेशान है..अरे अब उठा ले मुझे आदि कमेंट करते हैं..इस तरह के प्रायः हजारों कमेंट हमने सुने होंगे..और वास्तव में मेरे मन में भी कहीं न कहीं ये बात अवश्य (पर अब नहीं ) थी कि सिस्टम (भगवान के ) में कोई न कोई गङबङी अवश्य हो सकती है..तमाम अनसुलझे अन्य प्रश्नों की तरह ये प्रश्न भी मेरी प्रश्नावली में प्रमुख था . ग्यान के द्वैत मार्गीय विचारधारा के सम्पर्क में मैं 1990 to 2005 तक रहा इनके पास मेरे प्रश्नो का उत्तर नहीं था ..यदि था भी तो इस तरह का कि एक प्रश्न का
उत्तर मिले और बीस नये प्रश्न पैदा हो जांय..इसलिये क्योंकि उत्तर से संतुष्टि नहीं होती थी मैंने उस उत्तर से अपने को कनेक्ट ही नहीं किया..तब जब 2005 to 2010 में मैं अद्वैत ग्यानियों के सम्पर्क में आया मुझे कई प्रश्नों के सटीक उत्तर मिलने लगे..जिनके बाद कोई प्रश्न ही नहीं बन सकता..अद्वैत ग्यान की एक विशेषता है कि यदि प्रश्नकर्ता आप हैं तो उत्तर देने वाले भी आप ही होंगे..वे महान लोग तो आपको उस धारा से सिर्फ़ जोङते हैं जहाँ अनसुलझे प्रश्नों के उत्तर झिलमिला रहें हैं कहने का अर्थ ये उत्तर मौखिक नहीं होते . इसी सम्बन्ध में कबीर ने कहा है..जब तक न देखो नैनी तब तक न मानों कहनी तो मैंने ऐसे ही प्रश्नों की एक लङी जिसका मूल स्वर ये था कि संसार में तमाम विषमताएं..तमाम तरह की उलझनें..और परेशानियां क्या ये सिद्ध नहीं करती कि या तो कोई भगवान है ही नहीं और यदि है भी तो उससे संविधान बनाने में भूल हुयी है..या फ़िर वो आततायी की तरह मनमानी करने वाला है .
परम स्वतंत्र न सिर पे कोई . भावहि मनहि ,करो तुम सोई ..या तो भगवान इस तरह का मस्तमौला है जैसे अपन लोग कहते हैं कि अपना काम बनता भाङ में जाय जनता..आदि . इस तरह की तमाम बातें रखते हुये मैंने जोरदार लहजे में कहा कि ..निसंदेह यह भूल है..? तब उन संत ने कहा..कि ये भूल नहीं रूल है..तेरी सत्ता के बिना हिले न पत्ता.. खिले न एक हू फ़ूल ..हे मंगल मूल..बेटा कमी भगवान या उसके संविधान में नहीं है तुझमें है.. तू स्वय से स्वयं को देख...आप यकीन नहीं करेगें मात्र इतने वचनों से ही मेरा अग्यानवत भ्रम रूपी किला किसी जर्जर भवन की तरह ढह गया . इसी से मिलता जुलता एक प्रसंग याद आ गया जो आपसे शेयर कर रहा हूँ .
चार बिलकुल निकम्मा इंसान थे जिन्हें कोई काम करना पसंद ही नहीं था..बस मुफ़्त की खाने को मिले और पङे रहो यही उनकी जिंदगी का परमलक्ष्य था . किसी सुयोगवश वे घूमते फ़िरते एक दयालु ह्रदय महात्मा की कुटिया पर पहुँचकर कुछ दिन रहे और चन्दन विष व्यापे नहीं लपटे...वाली बात चरितार्थ करते हुये महात्मा ने उन्हें कुछ ग्यान रूपी शीतलता प्रदान की . कुछ दिन रहने के बाद महात्मा जी उन्हें दीक्षा दी और इस तरह वे उनके शिष्य बन गये . इसके कुछ दिन बाद वे पुनः भ्रमण पर निकल गये और चलते चलते एक ऐसे राजा के राज्य में पहुँच गये जिसे कविता , कवि और कवि सम्मेलन करवाने में बेहद आनन्द आता था . राज्य का पूरा माहौल ही राजा की वजह से कवित्वमय था . ये चारों जब राज्य में पहुँचे तो राजा के इस अनोखे शौक के बारे में पता चला और ये भी पता चला कि यदि कोई कवित्व योग्यता रखता है तो इस राज्य में उसकी जीवन भर मौज ही मौज है..बस राजा को कविता सुनाओ और मुफ़्त में हर तरह के शाही मजे लूटो..ये मूरखमती तो थे ही बिना सोचे विचारे राजा के
दरवार में हाजिर हो गये और अपना परिचय एक अनाम गुमनाम राजा (जिसका वास्तव में कोई अस्तित्व ही न था ) के राजकवि के रूप में दिया . ये कहना ही था कि चारों की शाही खातिरदारी शुरु हो गयी..चारो एक दूसरे को देखकर मुस्कराये..ये खूब उल्लू मिला..तीन दिन बाद राजदरवार में कविता पाठ का आयोजन हुआ तो चारो की सिट्टी पिट्टी गुम हो गयी क्योंकि वे कविता करना जानते ही नहीं थे..जबकि राजा इन नये "राजकवियों" का कविता पाठ सुनने को बेहद उत्सुक था . तब चारों ने एक सलाह बनाई और महीना भर तक मौज उङाने का प्लान तैयार करते हुये राजा को बताया कि राजन हम इस समय देवी सरस्वती की एक विशेष साधना में लगे हुये हैं इसलिये महीना भर तक कविता पाठ नहीं कर सकतेउसके बाद हम आपको दिव्य कविता सुनायेंगे..तब तक हमें किसी प्रकार डिस्टर्ब न किया जाय .
राजा और भी प्रभावित हो गया उसने चारों के लिये बङिया इन्तजाम के आदेश दिये...ये चारों मन में ये विचार बनाये हुये थे कि पचीस दिन मौज उङाओ और उसके बाद चुपचाप खिसक लेंगे ये राजा वैसे भी एक नम्बर का उल्लू है ...इस तरह बीस दिन गुजर गये..राजा इनका बेहद ध्यान रखता था तब मन्त्री आदि कुछ दरवारियों ने राजा से शंका जाहिर की महाराज ये किसी भी एंगिल से कवि नहीं लगते हाँ हरामखाऊ बिना प्रयत्न के ही लगते हैं..राजा को ये बात जमी और उसने उन पर निगरानी बैठा दी कि अगर ये भागने की कोशिश करें तो तुरन्त गिरफ़्तार कर लिया जाय और अगर ये झूठे निकले तो इन्हें फ़ांसी पर लटका दिया जाय..विद्वान मन्त्री ने कूटनीति का सहारा लेते हुये ये बात दस दिन पहले ही चारों तरफ़ चर्चा के रूप में फ़ैला दी जो एक दूसरे के मुँह से होते हुये इन चारों के कान तक जा पहुँची अब तो चारों को काटो तो खून नहीं बाली बात हो गयी मौज की जगह हर वक्त फ़ांसी का फ़ंदा नजर आने लगा..क्या करें क्या न करें..निगरानी करते हुये सैनिक यमदूत से नजर आते..आखिरी दिन वे टहलने गये..फ़ांसी स्पष्ट नजर आ रही थी..तब उनमें से एक ने सुझाव दिया आओ कविता खोजने की कोशिश करते हैं चारों बस्ती से बाहर एक सङक पर टहल रहे थे और कविता खोजने की कोशिश कर रहे थे..तब उनमें से एक चिल्लाया मुझे मिल गयी.. मुझे कविता मिल गयी..तीनों ने उसकी ओर देखा तो उसने एक औरत की तरफ़ इशारा किया जो अपने सिर पर पीपल काट कर ले जा रही थी और बोला . कविता है..."पीपर लाये नारि.."
तब तक दूसरा चिल्लाया मुझे भी मिल गयी. उसने जामुन का वृक्ष जो फ़लों से लदा था उसकी और उंगली दिखाते हुये कहा.." जामन लगी अपार " अब तीसरा भी चिल्लाया . मुझे भी मिल गयी .उसने एक गूलर के वृक्ष की तरफ़ इशारा किया..." ऊमर कबहु थिर न रहे "
(गूलर के अनेक नामों में से उसका एक नाम " ऊमर " भी होता है . गूलर की एक खासियत होती है यदि आप कभी इस पेढ के नीचे या पास खङे हुये होंगे तो आपने देखा होगा कि प्रत्येक दो सेकेन्ड में एक दो या तीन चार गूलर टप टप गिरते रहतें हैं यह क्रम हमेशा चलता रहता है . इसी हेतु उसने कहा कि गूलर में थिरता नहीं होती ) तभी चौथा भी बोला..मुझे भी कविता प्राप्त हो गयी.." तापर बङ गयी रार " उसने तापर वृक्ष पर लिपटी हुयी ढेरों रार ( अमरबेल ) की तरफ़ इशारा किया .
( तापर भी एक वृक्ष होता है..और " रार " अमरबेल को कहते हैं इसको रार इसलिये कहते हैं क्योंकि ये झगङे की तरह थोङे से सहारे में बङती ही चली जाती है . इसकी अपनी कोई जङ नहीं होती..पत्ते आदि नही होते बस चाऊमीन जैसे लम्बे लम्बे पीले धागे पेढों पर लिपटे रहते है और फ़ैलते ही चले जाते हैं..यधपि इसके औषधीय उपयोग बहुत हैं परन्तु दैनिक जीवन में इसका सामान्य उपयोग एक भी नहीं है..(जो लोग स्टीम बाथ के शौकीन हैं वे यदि पानी में इसको लगभग तीन सौ ग्राम डाल दें और फ़िर चेहरे को छोङकर अन्य शरीर पर इसकी भाप लें तो ये नस नाङियों को स्वच्छ कर देती है रक्त का प्रवाह बेहतर करती है..कई लोगों का इससे रंग भी निखर कर गोरा हो जाता है..त्वचा की समस्याओं में भी लाभप्रद है..स्टीम बाथ के बारे में कई लोगों की धारणा है कि इसको घर पर साधारण
तरीके से नही ले सकते . ऐसा नहीं है आप एक छोटे स्टूल या छिद्रयुक्त कुर्सी पर केवल चढ्ढी पहनकर या चाहे तो वो भी न पहनें..एक बङा कपङा ओङकर बैठ जाये..और उसी में भाप का बर्तन रखकर उसका मुँह थोङा ही खोलें ये स्नान कमाल का फ़ायदेमंद है..हाँ इसको करते समय सिर पर कपङा बांधना न भूले.)..खैर संभवतः तभी किसी ने चिढ में इसका नाम रार (झगङा) रख दिया होगा .
इस तरह हमारे चारों कवि भाईयों को कविता मिल गयी और वे आश्वस्त हो गये कि अब तो बच ही जायेंगे . नियत समय पर चारों ने कविता सुनायी .
एक - पीपर लाये नारि
दो - जामन लगी अपार
तीन - ऊमर कबहु थिर न रहे
चार - तापर बङ गयी रार
कविता सुनकर सब हँसने लगे..तब राजा ने कहा प्रिय कवियो इस का अर्थ भी स्पष्ट करें..अब चारों एक दूसरे का मुँह ताकने लगे अर्थ बताने की समस्या आ सकती है इसकी तो उन्होनें कल्पना भी नहीं की थी..वे सिर झुकाकर लज्जित से नीचे देखने लगे..कुछ ही देर में राजा ने उन्हें फ़ांसी पर लटकाने का आदेश कर दिया..आदेशानुसार फ़ांसी कल दिन में होनी थी..उन्हें गिरफ़्तार करके जेल में डाल दिया गया...चारों जेल में फ़ांसी के फ़न्दे पर लटकने की कई तरह से कल्पना कर रहे थे..तभी अंतिम समय में उन्हें उस महात्मा याने अपने गुरु के वचन याद हो आये ..जब कहीं कोई उम्मीद न हो ऐसी मरने के समान स्थिति में भी गुरु ऐसे बचा लेते हैं जैसे कोई बेहद मामूली बात हो ..उस समय तो उन्हें ये बात हास्यापद लगी पर अब जाने क्यों महत्वपूर्ण लगने लगी और वे एकटक होकर गुरु को याद करने लगे और प्रार्थना करने लगे कि गुरु कैसे ही उन्हें फ़ांसी से बचा लें..इस समय उनकी स्थिति चीर हरित द्रोपदी और ग्राह के चंगुल में फ़ंसे गजराज जैसी थी..आस वास दुविधा सब खोई..सुरति एक कमल दल होई..इसका अर्थ ये है कि उनकी समस्त आशा इस बिन्दु पर आकर केन्द्रित हो गयी कि अब उन्हें कोई अगर बचा
सकता है तो वे गुरु महाराज ही हैं .
नियत समय पर जैसे ही फ़ांसी का वक्त आया..वास्तव में उनकी प्रार्थना कामयाव हो गयी..एन वक्त पर महात्मा प्रकट हो गये (आ गये ) और हाथ उठाकर कहा .ठहरो.. राजन इन्हें किस अपराध में मत्युदन्ड दिया जा रहा है..?
राजा ने उनके झूठ के बारे में बताया...महात्मा ने कहा...राजन इनकी कविता के भाव बेहद गहराई युक्त है और इसका प्रसंग भी धार्मिक है...राजा ने चौंककर महात्मा को देखा..
महात्मा ने कहा ..राजन कविता और उसका मर्म सुनिये .
पी पर लाये नारि . जा मन लगी अपार . ऊमर कबहु थिर न रहे . तापर बढ गयी रार
सुनिये राजन...ये मंदोदरी और रावण के बीच का प्रसंग है..पी पर लाये नारि यानी पिया परायी औरत घर ले आये...जा मन लगी अपार...अर्थात सीता उसके मन में बसी हुयी थी ऊमर कबहु थिर न रहे..अर्थात जिंदगी का कोई भरोसा नहीं..यौवन शीघ्र ही विदा हो जाता है...तापर बङ गयी रार..मंदोदरी बोली हे पिया एक औरत के पीछे इतना बङा युद्ध उचित नहीं हैं..राजा संतुष्ट हो गया . चारों को छोङ दिया गया..लेकिन आगे के लिये राजा के रोकने पर भी चारों नहीं रुके और गुरु के साथ ही निकल आये..राजा ने उन्हें ससम्मान भेंट देकर विदा किया|
कबिरा हरि के रूठते गुरु के शरणे जाय..कह कबीर गुरु रूठते हरि नहि होत सहाय .
कबिरा वे नर अन्ध हैं गुरु को कहते और ..हरि के रूठे ठौर है गुरु रूठे नहीं ठौर .
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