रविवार, जून 27, 2010

सहज समाधि की ओर

जिस समय समाधि द्वारा आँखों की दोनों पुतलियाँ अन्दर की और उलटने लगती है । तो सबसे पहले अन्धकार में प्रकाश की कुछ किरणें दिखायी देती हैं । और फ़िर अलोप हो जाती हैं । बिजली जैसी चमक दिखाई देती है । दीपक जैसी ज्योति दिखाई देती है । पाँच तत्वों के रंग लाल , पीला , नीला हरा और सफ़ेद दिखाई देते हैं । इससे वृति अभ्यास में लीन होने लगती है । इसके बाद आसमान पर तारों जैसी चमक । दीपमाला जैसी झिलमिल दिखाई देगी । और चाँद जैसा प्रकाश और सूर्य जैसी किरणें दिखाई देंगी । जिस समय आँख बिलकुल भीतर की ओर उलट जायेगी । तब सुरती शरीर छोङकर ऊपर की ओर चङेगी । तो आकाश दिखाई देगा । जिसमें " सहस्त्रदल " कमल दिखाई देगा । उसके हजारों पत्ते अलग अलग त्रिलोकी का काम कर रहे हैं । अभ्यासी यह दृश्य देखकर बहुत खुश होता है । यहाँ उसे तीन लोक के मालिक का दर्शन होता है । बहुत से अभ्यासी इसी स्थान को पाकर इसको ही कुल का मालिक समझकर गुरु से आगे चलने का रास्ता नहीं पूछते । यहाँ का प्रकाश देखकर सुरति त्रप्त हो जाती है । इस प्रकाश के ऊपर एक " बारीक और झीना दरबाजा " अभ्यासी को चाहिये कि इस छिद्र में से सुरति को ऊपर प्रविष्ट करे । इसके आगे " बंक नाल " याने टेङा मार्ग है । जो कुछ दूर तक सीधा जाकरनीचे की ओर आता है । फ़िर ऊपर की ओर चला जाता है । इस नाल से पार होकर सुरति " दूसरे आकाश " पहुँची । यहाँ " त्रिकुटी स्थान " है । यह लगभग लाख योजन लम्बा और चौङा है । इसमें अनेक तरह के विचित्र तमाशे और लीलाएं हो रही हैं । हजारों सूर्य और चन्द्रमा इसके प्रकाश से लज्जित है । " ॐ" और " बादल की सी गरज " सुनाई देती है । जो बहुत सुहानी लगती है । तथा वह आठों पहर होती रहती है । इस स्थान को पाकर सुरती को बहुत आनन्द मिलता है । और वह सूक्ष्म और साफ़ हो जाती है । इस स्थान से अन्दर के गुप्त भेदों का पता चलने लगता है । कुछ दिन इस स्थान की सैर करके सुरती ऊपर की ओर चढने लगी । चढते चढते लगभग करोङ योजन ऊपर चङकर तीसरा परदा तोङकर वह " सुन्न " में पहुँची । यह स्थान अति प्रसंशनीय है । यहाँ सुरति बहुत खेल विलास आदि करती है । यहाँ " त्रिकुटी स्थान " से बारह गुणा अधिक प्रकाश है । यहाँ अमृत से भरे बहुत से " मानसरोवर " तालाब स्थित हैं । और बहुत सी अप्सरायें स्थान स्थान पर नृत्य कर रही हैं । इस आनन्द को वहाँ पहुँची हुयी सुरति ही जानती है । यह लेखनी या वाणी का विषय हरगिज नहीं है । यहाँ तरह तरह के अति स्वादिष्ट सूक्ष्म भोजन तैयार होते हैं । अनेको तरह के राग रंग नाना खेल हो रहे हैं । स्थान स्थान पर कलकल करते हुये झरने
बह रहे हैं । यहाँ की शोभा और सुन्दरता का वर्णन नहीं किया जा सकता । हीरे के चबूतरे । पन्ने की क्यारियाँ । तथा जवाहरात के वृक्ष आदि दिखाई दे रहे हैं । यहाँ अनन्त शीशमहल का निर्माण है । यहाँ अनेक जीवात्माएं अपने अपने मालिक के अनुसार अपने अपने स्थानों पर स्थित हैं । वे इस रंग विलास को देखती हैं । और दूसरों को भी दिखलाती हैं । इन जीवात्माओं को " हंस मंडली " भी कहा गया है । यहाँ स्थूल तथा जङता नहीं है । सर्वत्र चेतन ही चेतन है । शारीरिक स्थूलता और मलीनता भी नहीं हैं । इसको संतजन भली प्रकार जानते हैं । इस तरह के भेदों को अधिक खोलना उचित नहीं होता । सुरति चलते चलते पाँच अरब पचहत्तर करोङ योजन और ऊपर की ओर चली गयी । अब " महासुन्न " का नाका तोङकर वह आगे बङी । वहाँ दस योजन तक घना काला घोर अंधकार है । इस अत्यन्त तिमिर अंधकार को गहराई से वर्णित करना बेहद कठिन है ।
फ़िर लगभग खरब योजन का सफ़र तय करके सुरति नीचे उतरी । परन्तु फ़िर भी उसके हाथ कुछ न लगा । तब वह फ़िर और ऊपर को चङी । और जो चिह्न ? सदगुरुदेव ने बताया था । उसकी सीध लेकर सुरति उस मार्ग पर चली । इस यात्रा का और इस स्थान का सहज पार पाना बेहद मुश्किल कार्य है ।
सुरति और आगे चली तो महासुन्न का मैदान आया । इस जगह पर " चार शब्द और पाँच स्थान " अति गुप्त हैं । सच्चे दरबार के मालिक की अनन्त सुर्तियां यहाँ रहती हैं । उनके लिये बन्दी खाने बने हुये हैं । यहाँ पर उनको कोई कष्ट नहीं है । और अपने अपने प्रकाश में वे कार्य कर रहीं हैं । परन्तु वे अपने मालिक का दर्शन नहीं कर सकती हैं । दर्शन न होने के कारण वे व्याकुल अवश्य हैं । इनको क्षमा मिलने की एक युक्ति होती है । जिससे वे मालिक से मिल सकती हैं । जब कोई सन्त इस मार्ग से जाते हैं । तो जो सुरतियां नीचे संतो के द्वारा वहाँ जाती हैं । तब उन सुरतियों को उनका दर्शन होता है । फ़िर उन जीवात्माओं को ऊपर ले जाने से जो प्रसन्नता उन संतो को होती है । उसका वर्णन कैसे हो सकता है । सच्चे मालिक की करुणा और दया उन पर होती है । संतजन उन सुरतियों को क्षमा प्रदान करवाकर सच्चे मालिक के पास बुलबाते हैं ।
विशेष--अगर आप किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं । और साधना मार्ग में कोई परेशानी आ रही है । या फ़िर आपके सामने कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको न मिला हो । या आप किसी विशेष उद्देश्य हेतु कोई साधना करना चाहते हैं । और आपको ऐसा लगता है कि यहाँ आपके प्रश्नों का उत्तर मिल सकता है । तो आप निसंकोच सम्पर्क कर सकते हैं ।

सोमवार, जून 21, 2010

बन्दर ( बाबा ) क्या जाने अदरक ( बीबी ) का स्वाद ?

मैं सतसंग में जब भी योग या भक्ति की बात करता हूँ । तो प्रायः आम लोग अपनी पूर्व और बेहद मजबूत धारणा के चलते यही मानते हैं कि ये सब बातें या तो फ़ुरसतिया लोगों के लिये हैं ।
या फ़िर उन लोगों के लिये जो जीवन के कार्यों और जिम्मेदारियों से निवृत हो चुके हैं और घर के लोगों द्वारा उठाकर कूङे की तरह बाहर फ़ेंक दिये गयें हैं । अक्सर लोग मुझे अपने ग्यान का उदाहरण भी देते हैं -  नारि मरी गृह सम्पति नासी । मूङ मुङाय भये सन्यासी । यदि कुछ लोग इधर चलने का प्रयास भी करना चाहते हैं । तो वे मानते हैं कि योग भक्ति आदि बेहद कठिन कार्य है । और full time job है । 
कुछ ने यह भी कहा - बाबा आप नहीं जानते ? दिन भर का थका मांदा आदमी..वैल घोङे की तरह जुता आदमी..शाम को जब घर पहुँचता है । और दरबाजे पर नहा धोकर ..लिपिस्टिक.पाउडर से लैस अपनी चमाचम ..झमाझम बीबी को देखता है । तो सब भक्ति धरी रह जाती है । वो थकान बीबी ही दूर कर सकती है..? अपने प्यारे प्यारे बच्चे जब कूदकर गोद में बैठते है । तो भक्ति समझ में नहीं आती । पंजाबी में एक कहाबत है - ये जग मिठ्ठा वो कौन दिठ्ठा..? 
इसका अर्थ है । यहाँ पूरा मजा आ रहा है । स्वर्ग नरक पता नहीं है या नहीं ? भगवान है या नहीं ? किसने देखा ? बाबा हमारा मजा मत खराब कर..? बन्दर ( बाबा ) क्या जाने अदरक ( बीबी ) का स्वाद ?
सचमुच ! सही कहते हैं । हमारे ये भाई । बीबी का स्वाद तो मुझे नहीं मालूम..पर बिना अदरक डाले चाय मुझे भी अच्छी नहीं लगती । क्या बीबी अदरक जैसी तीखी होती है ..? 
जो लोग मेरे पुराने reader हैं । उन्हें मेरे इस सतसंग से कोई बैचेनी नहीं हो रही होगी । पर  बाबा  के नये reader अवश्य उलझन और असमंजस महसूस कर रहे होंगे । यह baba का style है । आप modern लोग समझते हैं कि baba modern नहीं हो सकता ।
खैर..इस तमाम सतसंग का निष्कर्ष यह है कि ज्यादातर ग्रहस्थ और नौकरीपेशा या उधोगपुरुषों का मानना होता है कि भक्ति और संसार का समागम नहीं होता - जगत भगत को बैर..बैर जैसे मूस बिलाई..।
आईये देखें । जगत के कार्य करते हुये भक्ति कैसे की जा सकती है ? इस प्रयोजन हेतु योग या भक्ति को तीन भागों में बाँटा गया है ।
1 - पहला " कर्म योग " है । मन बुद्धि चित्त अहम । पाँच ग्यानेन्द्रियाँ । पाँच कर्मेंन्द्रिया । ये संसार का कार्य करने के लिये हैं । तुम्हारा शरीर एक प्रकार की जेल है । जिसमें तुम्हारे पाप पुण्य के फ़लस्वरूप तुम्हें डाला गया है । अपने इस

शरीर के साथ जो भी अच्छा या बुरा जीवन तुम्हें कर्मफ़ल के रूप में मिला है । उसको भोगना ही होगा - देह धरे के दण्ड को भोगत है हर कोय । ग्यानी भोगे ग्यान से मूरख भोगे रोय ।
यानी - उसकी  रजा में रजा तो कट गयी सजा  ।
कर्म योग का आशय यही है । कि निजी वासनाओं से तुम जिस और जैसे शरीर को प्राप्त हुये हो । जिस और जैसी स्थिति को प्राप्त हुये हो । उसे निर्विकार भाव से भोगो
2 - दूसरा " ग्यान योग " है । ग्यान योग भी बेहद सरल है । इसका मुख्य सूत्र है । चेतना आत्मा के द्वारा गति कर रही है । शरीर और इंद्रियों से जगत के कार्य और व्यवहार करो । और चेतना को परमात्मा में लगा दो । इसी के लिये भगवान श्रीकृष्ण ने कहा था कि - हे अर्जुन तू युद्ध कर और निरंतर ध्यान कर " जो श्रीकृष्ण के इस वाक्य का अर्थ समझ लेगा । उसके लिये ग्यान योग अत्यन्त सरल हो जायेगा ।
3 - तीसरा " भक्ति योग " है । भक्त का अर्थ ही जुङ जाना है । भक्त का अर्थ ही समर्पण है । भक्त का अर्थ ही सुमरन है । भक्ति के लिये भक्त का मुख्य सूत्र है । यह सब परमात्मा की कृपा से हो रहा है । मैं तो केवल निमित्त मात्र हूँ । संसार एक रंगमंच के परदे की तरह है । जिस पर प्रभु की लीला हो रही है । अतः इस लीला का भरपूर आनन्द तो अवश्य लो । पर मेरा तेरा भूल जाओ । practical रूप में देखो तो । मेरा तेरा करने से आपको कुछ हासिल होता है क्या ? बस यह मानना ही असली भक्ति योग है ।
विशेष - ऊपर के तीनों योग जब विधिवत मिलकर एक हो जाते हैं । तब " हँस " के ग्यान वैराग्य भक्ति नाम के तीनों पंख जो तुम्हारी नादानी और गलतियों से टूट चुके हैं । या घायल हो गये हैं । फ़िर से स्वस्थ हो जातें हैं । और हँस अनन्त की यात्रा पर उङने को तैयार हो जाता है ।

बुधवार, जून 16, 2010

2012 में प्रलय की वास्तविकता

भारत में तो मैंने इतना नहीं देखा । पर 2012 को लेकर अमेरिका आदि कुछ विकसित देशों मे हल्ला मचा हुआ है । हाल ही में हुये मेरे एक परिचित स्नेहीजन त्रयम्बक उपाध्याय साफ़्टवेयर इंजीनियर ने अमेरिका ( से ) में 2012 को लेकर मची खलबली के बारे में बताया । उन्होनें इस सम्बन्ध में मेरे एक अन्य मित्र श्री विनोद दीक्षित द्वारा लिखी पोस्ट end of the world.. 2012 को भी पढा था । इस तरह की बातों में मेरा नजरिया थोङा अलग रहता है । मेरे द्रष्टिकोण के हिसाब से यह पोस्ट भ्रामक थी । लिहाजा इस ज्वलन्त मुद्दे को लेकर मेरे पास जब अधिक फ़ोन आने लगे ।तो मैंने वह पोस्ट ही हटा दी । पहले तो मेरे अनुसार यह उस तरह सच नहीं है । जैसा कि लोग या विनोद जी कह रहे हैं । दूसरे यदि इसमें कुछ सच्चाई है भी तो " डाक्टर भी मरणासन्न मरीज से ये कभी नहीं कहता कि तुम कुछ ही देर ( या दिनों ) के मेहमान हो " यदि हमारे पास किसी चीज का उपाय नहीं है । तो " कल " की चिन्ता में " आज "को क्यों खराब करें । यदि प्रलय होगी भी । तो होगी ही । उसको कौन रोक सकता है । जब हम " लैला " सुनामी " हैती " के आगे हाथ जोङ देते है । तो प्रलय तो बहुत बङी " चीज " है । लेकिन तीन दिन पहले जब मैं इस इंद्रजाल ( अंतर्जाल ) internet पर घूम रहा था । तो किसी passions साइट पर मैंने लगभग 40 साइट इसी विषय पर देखी । जिनमें " एलियन " द्वारा तीसरे विश्व युद्ध द्वारा आतंकवाद , प्राकृतिक आपदा ..आदि किसके द्वारा " प्रथ्वी " का अंत होगा । ऐसे प्रश्न सुझाव आदि थे । जो लोग मेरे बारे में जानते हैं और जिन्हें लगता है कि मैं " इस प्रश्न " का कोई संतुष्टि पूर्ण उत्तर दे सकता हूँ । ऐसे विभिन्न स्थानों से लगभग 90 फ़ोन काल मेरे पास आये । और मैंने उनका गोलमाल..टालमटोल..उत्तर दिया । इसकी वजह वे लोग बेहतर ढंग से समझ सकते हैं । जो किसी भी प्रकार की कुन्डलिनी या अलौकिक साधना में लगे हुये हैं । मान लीजिये कि किसी साधक ने इस प्रकार की साधना कर ली हो कि वह भविष्य के बारे में बता सके । और वह पहले से ही सबको सचेत करने लगे । तो ये साधना का दुरुपयोग और ईश्वरीय नियमों का उलंघन होगा । परिणामस्वरूप वह ग्यान साधक से अलौकिक शक्तियों द्वारा छीन लिया जायेगा । क्योंकि ये सीधा सीधा ईश्वरीय विधान और प्रकृति के कार्य में हस्तक्षेप होगा ।
हाँ इस या इन आपदाओं से बचने के उपाय अवश्य है । और वे किसी को भी सहर्ष बताये जा सकते हैं । पर यदि कोई माने तो ? क्योंकि जगत एक अग्यात नशे में चूर है । " झूठे सुख से सुखी हैं , मानत है मन मोद । जगत चबेना काल का कछू मुख में कछु गोद । " जीव वैसे ही काल के गाल में है । उसकी कौन सी उसे परवाह है । तो खबर नहीं पल की और बात करे कल की । वाला रवैया चारों तरफ़ नजर आता है । खैर..जगत व्यवहार और विचार से साधुओं को अधिक मतलब नहीं होता । फ़िर भी एक अति आग्रह रूपी दबाब में जब बार बार ये प्रश्न मुझसे किया गया । तो मुझे संकेत में इसका जबाब देना पङा ।
ये जबाब मैंने " श्री महाराज जी " और कुछ गुप्त संतो से प्राप्त किया था । अलौकिकता के " ग्यान काण्ड " और " बिग्यान काण्ड " में जिन साधुओं या साधकों की पहुँच होती है । वे इस चीज को देख सकते हैं । 2012 में प्रलय की वास्तविकता क्या है । आइये इसको जानें ।
" संवत 2000 के ऊपर ऐसा योग परे । के अति वर्षा के अति सूखा प्रजा बहुत मरे ।
अकाल मृत्यु व्यापे जग माहीं । हाहाकार नित काल करे । अकाल मृत्यु से वही बचेगा ।
जो नित " हँस " का ध्यान धरे । पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण । चहुँ दिस काल फ़िरे ।
ये हरि की लीला टारे नाहिं टरे ।
अब क्योंकि संवत 2000 चल ही रहा है । इसलिये प्रलय ( मगर आंशिक ) का काउंटडाउन शुरू हो चुका है । मैंने किसी पोस्ट में लिखा है कि गंगा यमुना कुछ ही सालों की मेहमान और है । 2010 to 2020 के बाद जो लोग इस प्रथ्वी पर रहने के " अधिकारी " होंगे । वो प्रकृति और प्रथ्वी को एक नये श्रंगार में देखने वाले गिने चुने भाग्यशाली लोग होंगे । और ये घटना डेढ साल बाद यानी 2012 में एकदम नहीं होने जा रही । बल्कि इसका असली प्रभाव 2014 to 2015 में देखने को मिलेगा । इस प्रथ्वी पर रहने का " हक " किसका है । ये रिजल्ट सन 2020 में घोषित किया जायेगा । यानी आपने सलामत 2020 को happy new year किया । तो आप 65 % का विनाश करने वाली इस प्रलय से बचने वालों में से एक होंगे । ऊपर जो " संतवाणी " मैंने लिखी है । उसमें ऐसी कोई कठिन बात नहीं है । जिसका अर्थ करना आवश्यक हो । सिवाय इस एक बात " अकाल मृत्यु से वही बचेगा । जो नित " हँस " का ध्यान धरे । " के । " हँस " ग्यान या ध्यान या भक्ति वही है । जो शंकर जी , हनुमान , राम , कृष्ण , कबीर , नानक रैदास , दादू , पलटू ..आदि ने की । यही एकमात्र " सनातन भक्ति " है । इसके बारे में मेरे सभी " ब्लाग्स " में बेहद विस्तार से लिखा है । अतः नये reader और जिग्यासु उसको आराम से देख सकते हैं । और कोई उलझन होने पर मुझे फ़ोन या ई मेल कर सकते हैं ।
लेकिन अभी भी बहुत से प्रश्न बाकी है । ऊपर का दोहा कोई विशेष संकेत नहीं कर रहा । ये सब तो अक्सर प्रथ्वी पर लगभग होता ही रहा है । तो खास क्या होगा और क्यों होगा ? ये अब भी एक बङा प्रश्न था । तो आप लोगों के अति आग्रह और दबाब पर मैंने " श्री महाराज जी " से विनम्रता पूर्वक निवेदन किया । और उत्तर में जो कुछ मेरी मोटी बुद्धि में फ़िट हुआ । वो आपको बता रहा हूँ ।
बाढ , सूखा , बीमारी , महामारी और कुछ प्राकृतिक आपदायें रौद्र रूप दिखलायेंगी । और जनमानस का झाङू लगाने के स्टायल में सफ़ाया करेंगी । लेकिन...? इससे भी प्रलय जैसा दृष्य नजर नहीं आयेगा । प्रलय लायेगा धुँआ..धुँआ..हाहाकारी...विनाशकारी..धुँआ..चारों दिशाओं से उठता हुआ घनघोर काला गाढा धुँआ..। और ये धुँआ मानवीय अत्याचारों से क्रुद्ध देवी प्रथ्वी के गर्भ से लगभग जहरीली गैस के रूप में बाहर आयेगा । यही नहीं प्रथ्वी के गर्भ में होने वाली ये विनाशकारी हलचल तमाम देशों को लीलकर उनका नामोंनिशान मिटा देगी । प्रथ्वी पर संचित तमाम तेल भंडार इसमें कोढ में खाज का काम करेंगे । और 9 / 11 को जैसा एक छोटा ट्रेलर हमने देखा था । वो जगह जगह नजर आयेगा । प्रथ्वी में आंतरिक विस्फ़ोटों से विकसित देशों की बहुमंजिला इमारते तिनकों की तरह ढह जायेगी । हाहाकार के साथ त्राहि त्राहि का दृष्य होगा । समुद्र में बनने वाले भवन और अन्य महत्वाकांक्षी परियोजनायें इस भयंकर जलजले में मानों " बरमूडा ट्रायएंगल " में जाकर गायब हो जायेगीं । nasa के सभी राकेट बिना लांच किये । विना तेल लिये । बिना बटन दबाये " अंतरिक्ष " में उङ जायेंगे । और वापस नहीं आयेंगे ।
और बेहद हैरत की बात ये है । कि इस विनाशकारी मंजर को देखने वाले भी होंगे । और इस से बच जाने वाले भी लाखों (हाँलाकि कुछ ही ) की तादाद में होंगे । और प्रथ्वी की आगे की व्यवस्था भी उन्हीं के हाथों होगी । इस भयानक महालीला के बाद प्रथ्वी के वायुमंडल में सुखदायी परिवर्तन होंगे । और आश्चर्य इस बात का कि जिन घटकों से ये तबाही आयेगी । वे ही घटक प्रथ्वी से बाहर आकर तबाही का खेल खेलने के बाद परिवर्तित होकर नये सृजन की रूप रेखा तैयार करेंगे ।
अब अंतिम सवाल । ये सब आखिर क्यों होगा ? तो इसका उत्तर है । डिसबैलेंस । यानी प्राकृतिक संतुलन का बिगङ जाना । ये बैलेंस बिगङा कैसे ? इसका आध्यात्मिक उत्तर और कारण बेहद अलग है । वो मैं न समझा पाऊँगा । और न आप इतनी आसानी से समझ पायेंगे । सबसे बङा जो मुख्य कारण है । वो है कई पशु पक्षियों की प्रजाति का लुप्त हो जाना । मनुष्य का अधिकाधिक प्राकृतिक स्रोतों का दोहन । और मनुष्य के द्वारा अपनी सीमा
छोङकर प्रकृति के कार्यों में हस्तक्षेप करना आदि ..?
अब एक आखिरी बात..पशु पक्षियों के लुप्त होने से प्रलय का क्या सम्बन्ध ? जो लोग अमेरिका आदि देशो के बारे में जानकारी रखते हैं । उन्हें एक बात पता होगी । कि एक बार जहरीले सांपो के काटने से आदमियों की मृत्यु हो जाने पर वहाँ सामूहिक रूप से सांपो की हत्या कर दी गयी । ताकि " आदमी " निर्विघ्न रूप से रात दिन विचरण कर सके । और कुछ स्थान एकदम सर्पहीन हो गये...कुछ ही समय बाद । वहाँ एक अग्यात रहस्यमय बीमारी फ़ैलने लगी । तब बेग्यानिकों को ये बात पता चली कि सर्प हमारे आसपास के वातावरण से जहरीले तत्वों को खींच लेते है । और वातावरण स्वच्छ रहता है । सर्प हीनता की स्थिति में वह विष वातावरण में ही रहा । और जनता उस अदृष्य विष की चपेट में आ गयी । ये सिर्फ़ एक घटित उदाहरण भर था । आज प्रथ्वी के वायुमंडल और
वातावरण से जरूरत की तमाम चीजें गायब हो चुकी हैं ? इसलिये प्रथ्वी पर मूव होने वाली इस साक्षात " मूवी " का मजा लेने के लिये तैयार हो जाये । और घबरा रहें हैं तो अभी भी मौज लेने enjoy करने के लिये आपके पास तीन साल तो हैं ही । तो डू मौज । डू एन्जोय । गाड ब्लेस यू ।

बुधवार, जून 09, 2010

एक गरीब की खुशनुमा शाम

शाम का समय था । मौसम का रुख ।अब दोपहर की अपेक्षा ।खुशनमा हो चला था । हाथ में सब्जी का थैला लटकाये मैं । मैं यानी राजकिशोर पाराशर, प्राइवेट मामूली क्लर्क , गौतम बुद्ध इंटर कालेज , बन्नाखेङा । वही आने वाले कल परसों की चिंता लिये ।उसे आज से , सदा से ढो रहा था । गधा खच्चर की तरह । जिन्दगी को ढोने के बाबजूद..जिन्दगी ने मुझे ।कलेशों की भरपूर सौगात दी थी । घर पर बीबी की कांय कांय..बच्चों की अन अफ़ोर्डेवल डिमांडस..कालेज के स्टाफ़ की तनातनी..ऊपर वालों की टेङी निगाह..जिन्दगी । एक भयानक जंगल । नजर आने लगी..जिसमें मैं ।मुझे एक निरीह चूहा..खरगोश केसमान ।नन्ही जान वाला महसूस होता । और आसपास ।खतरनाक शेर चीते नजर आते । मुझे मेरी गरदन उमेठने को तैयार..दिखने में मेरे ही जैसे..पर अन्य कोई..गैरों की क्या कहूँ । वक्त की मार ने । मेरे लिये मेरी निजी बीबी को । ऐसा बना दिया था । उसके अनुसरणकर्ता ।मेरे निजी बच्चे । मुझे सङे चूहे की भांति देखते थे । जिसकी वजह । सिर्फ़ इतनी थी । कि इन सबकी निगाहों में मैं मूरख । और एकदम फ़ेल आदमी था । मेरे गाल ।जिन्दगी के इस पतझङ ने । चालीस में ही पिचका दिये थे । मेरी कमर । वक्त के तूफ़ानों से ।अस्सी के समान झुक गयी थी । इस फ़ेलियरटी ने शायद ..मुझे नामर्द और नपुंसक भी । बना दिया था । तभी मेरी अङतीस की बीबी । मुझ चालीस के को त्यागकर । पङोस के बाइस के । जीतप्रकाश को हमेशा उपलब्ध थी । ऐसा मैं नहीं । मेरी कालोनी के यादव जी कहते । गुप्ता जी कहते । शर्मा जी कहते । वर्माजी...बस अखवार में नहीं निकली थी । टी.वी. में नहीं आयी थी । बेकार खबर थी । क्योंकि सब पहले से ही जानते थे । ऐसा मैं बेकार आदमी था । हफ़्ते भर का राशन थैले में था । सब्जी बाला । कुछ खराब सब्जियां । फ़ेंकने के छाँटता था । ये फ़ार्मूला । मुझे एक पाव भाजी वाले ने । दया करके बता दिया था ।वो भी उसी में से ।सब्जी लाता था । सब्जी बाला अब ।मेरी औकात जान गया था । मैं दस रुपये में पाँच किलो । सब्जी ले आता था । आज भगवान मेहरबान था । " उस ढेर " में शायद सब्जी बाले की गलती से । अच्छे अच्छे बेंगन मिल गये थे । मैं बङा खुश था । कि बीबी के निहोरे करके । किसी तरह आज भरंवा बेंगन । बनबा ही लूँगा । लेकिन भरंवा बेंगन की खुशी । मेरी छोटी सी उम्मीद भर थी । हो सकता है । बीबी घर पर न हो ।
जीतप्रकाश के साथ । घूमने गयी हो । सिनेमा गयी हो । इसलिये भविष्य से अग्यात । मेरे अरमानों का दिया । विचारों के तूफ़ान में ।अपनी मद्धिम लौ के साथ । फ़ङफ़ङा रहा था । मैं वास्तव में था ही । मूरख आदमी । जो आने वाले कल के । ऊजल सपने देखने के बजाय ।अतीत के कज्जल कोठार में । घुसा रहता । मैं जिन्दगी की रेल को । आगे ले जाने के बजाय । पीछे दौङाता । पीछे । पीछे । रेल । रेल नहीं कार....।
मुँह आगे की तरफ़ । सोच पीछे की तरफ़ । चल रहा था भरी सङक पर । ख्याल था घर का । ख्याल था भरंवा बेंगन का । असावधान कौन था । मैं । मैं यानी राजकिशोर पाराशर, प्राइवेट मामूली क्लर्क , गौतम बुद्ध इंटर कालेज , बन्नाखेङा । उन कार वाले साहब की । कोई गलती नहीं थी । सरासर मेरी गलती थी । इस गरीब पब्लिक को । मजा है..कार वालों को पकङने का । कार के बोनट की टक्कर मेरे कमर पर लगी थी । हाथ के थैले का राशन । मेरी इज्जत की तरह सङक पर फ़ैला पङा था । मेरे अरमानों के गोल गोल बेंगनी बेंगन । सङक पर दूर दूर तक बिखर गये थे । बाजारों में भीङ फ़ैलाते ठलुआ लुक्कों ने । घर गृहस्थी से बेजार । कुछ फ़ालतू फ़ुक्कों ने । कार वाले साहब और मेम साहब को घेर लिया था । और फ़ालतू में चिल्ला रहे थे । अमीरी मुर्दाबाद । साहब विना मांगे ही । मुझे " एक टक्कर " के दो हजार दे रहे थे । मैंने अपना टटोला टटूली एक्सरा किया । कोई हड्डी नहीं टूटी । कोई चीज नहीं फ़ूटी । सिर्फ़ दस रुपये की । आयोडेक्स के बराबर । नुकसान था । फ़िर दो हजार किस बात के । जिन्दगी ने तो इतनी टक्करें मारी । कभी कोई हरजाना नहीं दिया । जमाने ने तो इतनी ठोकरें मारी । कभी हालचाल भी नहीं पूछा । आप जाईये । साहब । बस एक और ठोकर ही तो लगी है । पर मैं सही हूँ ।
पर भाई साहब । आपका नुकसान भी तो हुआ है । मेम ने सहानभूति की । मेरा नुकसान । मैं अपने नुकसान का हिसाब किताब । अगर । जिन्दगी से लूँ । तो टाटा बिरला बन जाऊँ । क्या नुकसान हुआ । सामान सङक पर फ़ैल गया । बटोर लूँगा । बेंगन । सब्जी । पहले ही कूङे के ढेर से लाया हूँ । कीच में गिर गये । धो लूँगा । पर एक टक्कर का सौदा । क्या लालच से करूँ । क्षति हुयी ही नहीं । फ़िर क्यों क्षतिपूर्ति लूँ । शायद अभी ..मैं इतना नहीं गिरा । मैं । मैं । मैं यानी राजकिशोर पाराशर, प्राइवेट मामूली क्लर्क , गौतम बुद्ध इंटर कालेज , बन्नाखेङा ।
साहब कार ले के चला गया । भारत की जनता " पागल है..पागल है..। कहकर चली गयी । मैंने फ़िर से सारा सामान । कुशलता से थैले में समेट लिया । थैली फ़टने से सङक पर फ़ैल गयी । कुछ चीनी । मैंने अरोरकर । फ़ूँक मारकर । साफ़कर वहीं खा ली । सब्जियाँ नल पर धो ली । और गरम फ़ुलकों । भरंवा बेगन । का ख्याली चटकारा लेते हुये घर पहुँच गया । बीबी वन चेतना केन्द्र गयी थी । बच्चों के जीतप्रकाश अंकल के साथ । बच्चे पङोसी के दुत्कारने के बाबजूद । बेशर्म बने उसका टी.वी. देख रहे थे । क्योंकि उनके घर टी.वी. नहीं था । उनके बाप की औकात टी.वी. की नहीं थी ।
हल्का हल्का । अन्धेरा छाने लगा था । कार की टक्कर । अब जमकर । कसक रही थी । थैला जमीन पर रखकर । मैं अपने ही दरबाजे पर बैठ गया । क्योंकि घर का ताला बन्द था । और । थैले में से एक बेंगन निकालकर । भरंवा बेंगन । का स्वाद याद करते हुये खाने लगा । मैं । मैं यानी राजकिशोर पाराशर, प्राइवेट मामूली क्लर्क , गौतम बुद्ध इंटर कालेज , बन्नाखेङा । समाप्त ।

रविवार, जून 06, 2010

एक रात अघोरियों के साथ अघोरवासा

रात के बारह बज चुके थे । उस वातानुकूलित कमरे में मैं , नतालिया और सवेटा मौजूद थे । सवेटा नेट पर किसी फ़्रेंड से चैटिंग में व्यस्त थी ।
नतालिया बेड पर मेरे पास ही तीन तकियों के सहारे अधलेटी सी बैठी थी । हमने अभी अभी सेक्स किया था जिसमें सवेटा ने इच्छा न होने से भाग तो नही लिया था पर हमारे साथ उसने पूरा एन्जाय अवश्य किया था ।
नतालिया ने अभी भी वस्त्र नहीं पहने थे और पैरों पर एक चादर डाले वो एक पतली सी लम्वी विदेशी सिगरेट के कश लगा रही थी । मैंने प्रायः लेडीज सिगरेट का टेस्ट कम ही लिया है । सो उसके सिगरेट बाक्स से एक सिगरेट निकालकर मैंने भी सुलगा ली
नतालिया से मेरी पहचान दस महीने पहले नेट के ही जरिये हुयी थी । वह यू. के. के एक पब्लिकेशन के लिये सीनियर रिपोर्टर का कार्य करती थी और न्यूयार्क में रहती थी । नतालिया 32 की हो चुकी थी और उसके परिवार में उसकी एक छोटी बहन और माँ के अलावा कोई न था । उसके पिता जीवित थे पर उनका आपस में तलाक हो चुका था । नतालिया ने विवाह तो नही किया था पर छह साल तक मार्टिन के साथ रहने के बाद उनकी फ़्रेंडशिप में दरार पङ गयी और वे स्वेच्छा से अलग अलग रहने लगे । मार्टिन से नतालिया को एक चार साल का लङका भी था
नतालिया भारत में मेगजीन के काम से यानी भारत के अघोरी बाबाओं पर एक विस्त्रत रिपोर्ट तैयार करने के लिये आयी थी । जब ये काम एडीटर द्वारा उसे सोंपा गया तो नतालिया को स्वतः ही मेरा नाम याद आ गया और उसने फ़ोन पर अपने आने की सूचना दी । मैंने उसे समझाना चाहा कि अघोरियों की रिपोर्टिंग करना तुम्हारे बस की बात नहीं है । अपने एडीटर को बोलो कि इसके लिये किसी पुरुष रिपोर्टर को भेजे ।
तब उसने जबाब दिया कि एक तो वह इंडिया आना चाहती है और दूसरे उसकी निजी ख्वाहिश है कि वो अघोरियों को पास से देखे और इस तरह से घूमने में उसका एक भी पैसा खर्च नहीं होगा और रही बात पुरुष की तो उसके लिये तुम हो तो - माय डियर ही मेन ।

अब मेरे पास कोई जबाब नहीं रह गया था । तीसरे दिन नतालिया अपनी फ़्रेंड सवेटा के साथ इंडिया मैं , मेरे घर में , मेरे बेडरूम में साधिकार मौजूद थी । सिगरेट के कश लगाता हुआ मैं एक ही बात सोच रहा था कि औरत अभी कितनी तरक्की और करेगी । दो लगभग अनजान लङकियाँ मेरे अकेले के बेडरूम में कुछ देर की चुहलबाजी के बाद सेक्स करती हैं और बिना किसी औपचारिकता के इस तरह बर्ताब कर रही हैं । मानों हमारी जान पहचान कितनी पुरानी हो ।
- क्या सोच रहे हो नीलेश !  नतालिया ने मेरी तरफ़ देखते हुये अंग्रेजी में कहा ।
- मुसीबत कभी पहले से बताकर नहीं आती ।  मैंने अफ़सोस सा प्रकट करते हुये कहा । इसके साथ ही कमरा उन दोनों की मधुर खिलखिलाहट से गूँज उठा । सवेटा ने कम्प्यूटर आफ़ कर दिया था । उसने लाइट भी आफ़ कर दी और लगभग जम्पिंग स्टायल में बेड पर आ गयी । अब सवेटा सेक्स के लिये इच्छुक हो रही थी । पर मुझे और नतालिया को नींद आ रही थी । अतः हम गुडनाइट करके सो गये ।
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सुबह जब में नतालिया के साथ ब्रेकफ़ास्ट ले रहा था तो उसकी बात की गम्भीरता मुझे समझ में आयी ।दरअसल मेरे सहयोग से यदि नतालिया बेहतरीन रिपोर्टिंग करने में कामयाब हो जाती तो उस वीडियो से न सिर्फ़ वह ढेरों डालर कमा सकती थी बल्कि उसका कैरियर भी चमक सकता था ।

इसलिये जिस बात को मैं हल्के से ले रहा था यानी कि पास के कुछ घाटों पर मध्यम किस्म के अघोरियों का इंटरव्यू करवा देना । वो इरादा अब मैंने बदल दिया । अब मैं पूरा रिस्क उठाकर उसे " झूलीखार " के जंगलो में एक रात के लिये ले जाना चाहता था । जहाँ बेहद खतरनाक किस्म के अघोरी बाबाओं का जमावङा रहता था । मैंने अपने मित्र सुनील को फ़ोन किया कि अपनी स्पेशियो गाङी ड्राइवर के हाथों मेरे पास भिजबा दे ।
" झूलीखार " जंगल बसेरबा पुल से चालीस किलोमीटर अंदर था और कोई भी आदमी दिन में भी वहाँ जाने की हिम्मत नहीं करता था । बसेरबा पुल से पाँच किलोमीटर अन्दर चलकर एक शमशान था । बस वहीं तक पास के गाँवो के लोग पशु आदि चराने जाते थे । बल्कि वे शमशान के पास जाने में भी परहेज करते थे क्योंकि एक तो उसका माहौल ही बेहद डराबना था और दूसरे वहाँ से खतरनाक अघोरियों का इलाका शुरू हो जाता था ।
बसेरबा पुल से ही धङधङाकर बहती हुयी गंग नहर शमशान तक पहुँचते पहुँचते मानों रौद्र रूप धारण कर लेती हो । और उस पर जगह जगह घूमते काले भयानक अघोरी जो देह पर चिता की राख मले रहते थे । आम लोगों के दिलों में खौफ़ पैदा करने के लिये पर्याप्त थे । शमशान के बाद ही अक्सर उनके द्वारा खायी गयी मानव लाशों के सङे टुकङे किसी भी जिगरवाले का दिल हिला देने के लिये काफ़ी थे ।
झूलीखार का जंगल इतने घने वृक्षों से आच्छादित था कि दिन के समय में भी रात का आभास होता था और उसकी वजह यही थी कि अघोरियों के डर से कभी भी कोई लकङी या वृक्ष काटने नहीं जाता था । इससे पूर्व में मैं तीन बार झूलीखार जा चुका था पर इस बार जो हल्की सी घबराहट मुझे हो रही थी इससे पहले कभी नहीं हुयी थी और इसकी मुख्य वजह मेरे साथ जाने वाले वे मेरे विदेशी मेहमान थे ।
हालाँकि नतालिया और सवेटा अपनी तरफ़ से पूरी दिलेरी दिखा रही थी पर वास्तविकता मैं जानता था कि झूलीखार पहुँचते ही इनकी सिट्टीपिट्टी गुम हो जाने वाली है और वास्तव में अन्दर ही अन्दर मैं यह भी सोच रहा था कि इन्हें झूलीखार ले जाने का मेरा निर्णय सही है या गलत । पर मैं कोई निर्णय नहीं ले पा रहा था ।
दरअसल मैं झूलीखार लगभग चार साल बाद जा रहा था और इतने समय में नये अघोरी इकठ्ठे हो गये हों । मेरे परिचित अघोरी मिले या न मिले । अघोरी काफ़ी संख्या में हो सकते हैं और दो जवान युवतियों के साथ अकेला मैं । रात को अघोरी अक्सर कच्ची शराब पीकर उन्मत्त हो जाते हैं । हो सकता है उनका लङकियों को देखकर संयम टूट जाय । और वे लङकियों के साथ सामूहिक रूप से बलात्कार कर बैठें ।


ऐसी तमाम बातें क्रमश मेरे दिलोदिमाग में चक्कर काट रही थी । जब नतालिया ने मेरी आँखो के आगे हाथ हिलाते हुये हेलो..हेलो..कहकर मेरी तन्द्रा भंग की । तब मुझे सुनाई पङा कि बाहर स्पेशियो का हार्न बज रहा था । अचानक मेरे दिमाग में एक आयडिया आया और मैंने सुनील को फ़ोन लगाकर कहा कि अगर आज की रात मैं तेरा ड्राइबर भी साथ ले जाऊँ तो । सुनील ने पूछा । कोई विशेष बात है क्या ।
मैंने संक्षेप में मगर बात की गम्भीरता उसे पूरी तरह समझा दी । सुनील हमारे लिये चिन्तित हो गया और एक बार तो उसने न जाने की सलाह ही दे डाली । मगर बाद में मान गया । अब उसके ड्राइवर को समझाना था । झूलीखार का नाम सुनते ही उसने इस तरह मुझे देखा कि मानों मेरे सिर पर सींग निकल आये हो और मैं एकदम पागल होऊँ । उसका इलाज मैं अच्छी तरह से जानता था । वह इंकार करे इससे पहले ही मैंने दो बङे गान्धी उसकी आँखो के आगे लहराये और बोला - इतने ही लौटने के बाद ये एडवांस..रखो ।
एक महीने की तनखाह एक रात में । कैसे इनकार करता बेचारा ।
गाङी में जरूरत का सभी सामान रख लेने के बाद दोपहर दो बजे हम झूलीखार के लिये रवाना हो गये और ठीक चार बजे बसेरबा पुल पर पहुँच गये । नतालिया बीच बीच में गाङी रुकवाकर फ़ोटो लेती और शूटिंग भी करती । नतालिया जब अपने काम में व्यस्त थी मैं अपनी गोद में लेटी हुयी सवेटा से पूछ रहा था कि क्या उसे पिस्टल चलाना आता है ।
दरअसल सुरक्षा के लिहाज से मैंने तीन पिस्टल का इंतजाम करके रख लिया था । और अब तो ड्राइबर के साथ होने से मैं लगभग निश्चिंत था । क्योंकि अघोरी हो या कोई अन्य जान सबको प्यारी होती है । दो आदमी और दो पिस्टल चलाने में सक्षम युवतियाँ । अघोरी का बाप भी हमारा कुछ नहीं बिगाङ सकता था। 
हाँ एक आम आदमी को अघोरियों के कारनामों और उनकी छुपी शक्तियों के प्रति जैसा भय होता है । वैसा मुझे कतई नहीं था । उनकी किसी भी प्रकार की मान्त्रिक शक्ति मेरा कुछ नहीं बिगाङ सकती थी ।
बसेरबा पुल से शमशान तक का रास्ता तय करने में ही एक घन्टा और लग गया । हालाँकि शमशान तक पक्का खडंजा रोड था फ़िर भी किनारे पर उगी झाङियों और बीच बीच में बेहद पतली हो गयी रोड आदि दिक्कतों की वजह से गाङी स्लो ही चल पा रही थी । उस पर बार बार नतालिया फ़ोटोग्राफ़ी के लिये रोक देती । शमशान के परिसर में पहुँचकर स्पेशियो रुक गयी और हम चारों गाङी से बाहर निकल आये । दरअसल यहाँ गाङी मैंने जानबूझकर रुकवायी थी । मैं ड्राइवर और दोनों लङकियों पर उस जगह का रियेक्शन देखना चाहता था । ड्राइवर के चेहरे पर तो मुझे कुछ दहशत के भाव नजर आये 
पर सवेटा और नतालिया इस तरह प्रसन्न थी कि मानों शमशान में न होकर किसी पिकनिक स्पाट पर आयी हो । नतालिया बेहद तन्मयता से शमशान की वीडियोग्राफ़ी कर रही थी । मैंने एक सिगरेट सुलगा ली और शमशान की बाउन्ड्रीवाल पर बैठकर कश लगाने लगा ।उफ़ दुनिया के लिये डरावना लगने वाले इस स्थान पर कितनी घनघोर शान्ति थी ।
शाम के सवा पाँच बज चुके थे । और झूलीखार स्थिति " अघोरीवासा " अभी यहाँ से पैंतीस किलोमीटर दूर था । जबकि शमशान के आगे कोई खङंजा जैसी भी रोड नहीं थी । पर एक बात जो राहत देने वाली थी । वह ये कि शमशान के रास्ते की अपेक्षा वो कच्चा दङा अधिक चौङा और गाङी चलाने के लिये सुगम था । लगभग दो किलोमीटर आगे बङते ही इस तरह गाङा अन्धकार हो गया । मानो अमावस की काली रात हो । इसकी वजह बेहद घने वे पेङ थे । जो झूलीखार में बे तादाद थे । पर इससे बेखबर बोर महसूस करती हुयी नतालिया और सवेटा मानों मेरे साथ किस किस खेल रही हों । जबकि मैं आने वाली परस्थितियों को लेकर चिंतित था । और ये चिंता अगर मैं उन तीनों के सामने जाहिर कर देता । तो उनका मनोबल और भी टूट सकता था । मुझे प्रसून की याद आ रही थी । वो अगर साथ होता । तो मैं काफ़ी हद तक निश्चिंत रह सकता था । पर प्रसून बाबाजी के साथ तिब्बत गया था ।
अघोरीवासा से तीन किलोमीटर पहले ही निर्वस्त्र अघोरी और अघोरिंने नजर आने लगे । नतालिया वीडियो कैमरा लेकर तेजी से उन्हें शूट कर रही थी । और सवेटा के हाथ में स्टिल कैमरा था । हाँ ड्राइवर रतीराम अवश्य शक्ल से भयभीत था । अभी हम गाङी के अन्दर ही थे ।
तभी गाङी के इंजन की आवाज से आकर्षित होकर करीब पचीस अघोरियों का एक दल गाङी के सामने आ गया और स्पेशियो की खिङकी में जोरदार डंडा मारा । इस स्थिति के बारे में मैंने तीनों को पहले ही समझा दिया था ।
- पंगा ।  मेरे मुँह से निकला ।
मैंने प्रसून भाई की एक कूटनीति अपनाते हुये बेहद कामुकता से उन छह अघोरिनों को देखा । जो निर्वस्त्र होकर अघोरियों के बीच खङी थी । और स्पेशियो का द्वार खोलकर अकेला ही बाहर निकल आया । वे सब अजीव निगाहों से मुझे देख रहे थे । मैं लगभग टहलने के अन्दाज में उस अघोरी के पास पहुँचा । जो उनका लीडर मालूम होता था । और जिसने गाङी में डंडा मारा था । फ़र्स्ट इम्प्रेस इज द लास्ट इम्प्रेस ।
विना किसी चेताबनी । बिना कोई बात किये । मैंने एक भरपूर मुक्का उस तगङे अघोरी के मुँह पर मारा । और रिवाल्वर उसकी और तान दिया । साथ ही गाङी की तरफ़ इशारा किया । जहाँ खिङकी खोले खङी । दो विदेशी हसीनायें किसी फ़िल्मी पोस्टर की तरह उनकी तरफ़ पिस्टल ताने खङी थी । और न चाहते हुये भी उनकी वह मुद्रा देखकर उस परिस्थिति में भी मेरी हँसी निकल गयी ।
- इसकी गोली ।  मैं बेहद जहरीले स्वर में बोला - मन्त्र से पहले काम करती है..और वो ये नहीं देखती ..कि उसके द्वारा मरने वाला कौन है ?
ये तरीका काम कर गया और अघोरियों का वह दल चिल्लाता हुआ ..ऊ भाला..छू चा..आदि जैसे आदिवासियों की तरह शब्द निकालता हुआ अघोरीवासा की तरफ़ भागने लगा । हमारी गाङी उनके पीछे पीछे भागने लगी और तीन किलोमीटर का निर्विघ्न सफ़र तय करके अघोरीवासा पहुँच गयी ।
अघोरीवासा में पहले से ही कोहराम मचा हुआ था । और लगभग सत्तर अघोरियों का एक दल भाला , त्रिशूल , लाठी , आदि लेकर हमारे स्वागत के लिये तैयार था । दरअसल उन्हें मेरी निर्भयता को लेकर बेहद हैरानी हो रही थी ।
अगर अघोरियों की मान्त्रिक आदि ताकत को नजरन्दाज कर दिया जाय तो वे हमारी तरह ही आम आदमी होते हैं । वे कोई आसमान से नहीं टपकते । बल्कि स्त्री पुरुष के साधारण सम्भोग से पैदा होते हैं । नंगे होकर गर्म तेल चुपङकर , बदन पर चिता आदि की राख मल लेने , और जटाजूट बङा लेने से कोई आदमी शक्तिशाली नहीं हो जाता । उसका बाह्य रूप डरावना अवश्य हो जाता है । पर अन्दर से वह एक साधारण इंसान ही होता है । अब क्योंकि एक आम आदमी इस तरह के माहौल का , इस तरह की तान्त्रिक मान्त्रिक गतिविधियों का अभ्यस्त नहीं होता । इसी लिये वो इन्हें देखकर भयभीत हो जाता है । और ये मिट्टी के शेर इसी बात के अभ्यस्त होतें हैं कि प्रत्येक आदमी न सिर्फ़ उन्हें देखकर भयभीत हो । बल्कि दन्डवत भी करें । लेकिन यहाँ ठीक उल्टा हो रहा था । जैसा उनके जीवन में शायद कभी नहीं हुआ था । इसलिये वे अचम्भित से थे ।
रात को कच्ची शराब पीकर , बीसियों जंगली मुर्गा मुर्गी तीतर बटेर..आदि को उमेठ कर मार डालने वाले..फ़िर उनको आग पर भूनकर..उनकी हड्डियाँ माँस आदि चूसकर..हू हुल्ला जैसा हुङदंग करने वाले वे नंगधङंग अघोरी उन्मुक्त उन्मादी कामवासना का खेल खेलते..पर आज पूरा मामला ही बदल गया था और वे अपनी हीरोइनों के सामने खुद को बेइज्जत महसूस कर रहे थे और हम चारों को तुरन्त मार डालना चाहते थे । ताकि दो कोमलांगियों और दो हट्टे कट्टे पुरुषों का माँस खाकर वे अपने आप को त्रप्त कर सकें और जश्न मनायें ।
मैंने एक सिगरेट सुलगाया । और फ़िल्मी स्टायल में उंगलियों में रिवाल्वर घुमाता हुआ उनके सामने टहलता हुआ उनके अगले कदम की प्रतीक्षा करने लगा । मेरे मना करने के बाद भी नतालिया और सवेटा स्पेशियो से बाहर निकल आयी । पर रतीराम वहीं बैठा रहा । उसे अपनी जान प्यारी जो थी
अघोरीवासा का यह मेन अड्डा लगभग छह बीघा लम्बे चौङे फ़ील्ड के रूप में था । जिसमें स्थान स्थान पर कमरे और गुफ़ायें आदि बनी हुयी थी । जगह जगह छोटी छोटी होलियों जैसे अलाव बने हुये थे । दस बारह कुत्ते..कुछ सुअर..मुर्गे आदि पक्षियों के दङवे आदि भी वहाँ थे । फ़ील्ड के एक साइड में गंगा नहर कुछ कुछ गोलाई के आकार में बलखाती हुयी सी निकल जाती थी ।
मैं टहलते हुये कुछ कुछ आशंकित सा अगले पलों के बारे में सोच रहा था । दरअसल कोई भी बखेङा खङा करके पंगा करके यदि मैं हीरोगीरी का रुतबा जमाने में कामयाब भी हो जाता । तो इससे कोई फ़ायदा होने के बजाय मुझे नुकसान ही होता । इसीलिये मैं अघोरियों के उस झुन्ड में किसी परिचित चेहरे को ढूंढने की कोशिश कर रहा था कि तभी दौङकर आते हुये भौंकते कुत्तों ने मेरा काम आसान कर दिया । नतालिया और सवेटा चीखकर गाङी में चङ गयी । पर मैं कुत्तों को देखकर अजीव से अन्दाज में मुस्कराया । यानी आधा किला फ़तह ।
वही हुआ । कुत्ते पहले तो मुझ पर भौंके । फ़िर उनमें से कुछ कुत्ते पास आकर कूँ कूँ करते हुये मेरे पैर चाटने लगे । जाहिर था कुछ पुराने कुत्तों ने मुझे पहचान लिया था । अघोरियों का दल ये देखकर आश्चर्यचकित रह गया । तभी मुझे थोङी और राहत मिली । जब धन्ना और सुखवासी अघोरियों के उस झुन्ड से निकलकर मेरे पास आये और दुआ सलाम करने लगे ।
धन्ना और सुखवासी सात साल से अघोरपंथ में शामिल हुये थे । और उन्हें सिद्धि आदि में कोई उपलब्धि नहीं हुयी थी । जब में पिछली बार यहाँ आया था तब उनसे मेरी मुलाकात हुयी थी । और उस समय यहाँ का मेन बाबा मोरध्वज बाबा था । धन्ना ने बताया कि मोरध्वज बाबा चम्बा की तरफ़ चला गया है और इस समय यहाँ की गद्दी मुन्डा स्वामी संभाले हुये है । मुन्डा स्वामी उस समय धूनी पर बैठा हुआ था । हमें आपस में बात करते हुये देख नतालिया और सवेटा भी मेरे पास आ गयी । और आक्रमण करने को तैयार अघोरी भी कुछ समय के लिये रुककर हैरत से यह नजारा देख रहे थे ।
सुखवासी ने वापस अघोरियों के झुन्ड के पास जाकर उन्हें बताया कि मैं यहाँ का पुराना वाकिफ़ हूँ । और मोरध्वज का जानकार हूँ । इसे सुनकर अघोरियों के अस्त्र शस्त्र तो नीचे झुक गये । पर वे अभी भी बदले और अपमान की आग में जल रहे थे । धन्ना ने जोर देकर कहा कि - वह द्वैत का साधक है और तुम्हारी अघोर विधा उसके आगे काम नहीं करेगी । इस बात ने उन पर गहरा असर तो किया । पर मेरा हीरो स्टायल देखकर उनका दिल ये मानने को तैयार नहीं था कि कोई साधु ऐसा भी हो सकता है । 
तभी मुन्डास्वामी धूनी पर से उठकर गुफ़ा से बाहर आ गया । और एक विशाल चबूतरे पर पंचायत होने लगी । धन्ना और सुखवासी मेरा प्रतिनिधित्व कर रहे थे । एक घन्टे की लम्बी बातचीत के बाद सुलह समझौता हो गया । पर मुन्डा का अहंकार ये मानने को तैयार न था कि मैं एक अच्छा और उसकी तुलना में बङा साधक हो सकता हूँ । दूसरे उसकी नजरें बता रही थी कि वो नतालिया और सवेटा के प्रति क्या सोच रहा है ? वास्तव में यदि मेरे पास पिस्तोल और अलौकिक शक्ति न होती तो धन्ना के कहने के बाबजूद वे दोनों लङकियों पर टूट पङते ।
लेकिन इस सबके बाद भी अपने अहं से मजबूर मुन्डा ने चुपचाप तीन बार शक्तिशाली मन्त्र मुझ पर चलाने की कोशिश की । जो मैंने पलक झपकते ही निष्क्रिय कर दिये । तब मुन्डा के दिल में मेरे लिये स्वतः आदर और दोस्ताना जाग उठा । दरअसल वह मुझसे कुछ अलौकिक शक्तियों की प्राप्ति में सहायता हेतु इच्छुक था ।
रतीराम भी भय छोङकर बाहर निकल आया और चोर निगाहों से नंगी अघोरिनों को देखने लगा । मैंने उसे स्पेशियो में रखी देशी शराब का बङा थैला बाहर लाने को कहा । और फ़िर शराब के पाउच जमीन पर फ़ैला दिये । इसके साथ ही वहाँ दोस्ताना माहौल में जश्न शुरू हो गया और कुछ ही देर में नशे में लङखङाते हुये अघोरी उन्मुक्त हो उठे । वे मुर्गा तीतर आदि पक्षियों को पकङ कर हवा में उछालते और जीवित अवस्था में ही उसके पंख आदि नोचते । फ़िर अघोरी अघोरिनें उसको बाल की तरह एक दूसरे की तरफ़ उछालकर बालीबाल जैसा खेल खेलते । इसके बाद पक्षी को घायल अवस्था में ही जलती आग पर लटका देते ।
निर्दोष और असहाय पक्षियों का करुण कृन्दन सुनकर मुझे इतना गुस्सा आ रहा था कि एक एक गोली इन सबके सीने में उतार दूँ । पर मैं कहाँ कहाँ और कितनों को मार सकता था । इस अखिल सृष्टि में ऐसी लीला न जाने कितने अनगिनत स्थानों पर हो रही थी । मुझे एक दोहा याद हो आया - दया कौन पर कीजिये , निर्दय कासो होय । साई के सब जीव है , कीरी कुंजर दोय ।
अघोरी भले ही मुझसे डर गये थे और सहमें हुये थे । पर जाने क्यों मुझे ऐसा लग रहा था । कि मेरे सामने से हटते ही वे नतालिया और सवेटा के कपङे चीर फ़ाङकर अलग कर देंगे । इस सबसे बेखबर वे दोनों अपना अपना कैमरा संभाले तत्परता से काम कर रही थी । पक्षियों का भुना माँस नोचते..और शराब के घूँट भरते वे अघोरी अब उन्मुक्त हो उठे और पश्चिमी देशों की किसी हैलोवीन पार्टी की तरह सेक्स वर्ताव करने लगे ।
कुछ देर की उनकी शूटिंग के बाद हम चारों लोग मुन्डास्वामी और छह अन्य अघोरियों के साथ एकान्त में एक अलाव के सामने बैठ गये और उनका इंटरव्यू लेने लगे । मैं नतालिया के प्रश्न ट्रान्सलेट करता हुआ दुभाषिये का काम कर रहा था । रतीराम निर्लिप्त सा बैठा हुआ उत्सुकता से अघोरियों की कामक्रीङा को देख रहा था । ये पूरा अघोरी मिशन कवरेज होते होते सुबह के पाँच बज गये । अधिकांश अघोरी अब फ़ील्ड में ही निढाल होकर सो रहे थे ।मुन्डा की एक पर्सनल साध्वी हम लोगों के लिये चाय बना लायी ।
ठीक छह बजे हम पूरा पेकअप करके स्पेशियो में बैठ गये । मुन्डा , साध्वी , और अन्य कई अघोरियों ने वाकायदा विदा करते हुये हम सबका अभिवादन किया और मुन्डा ने कई बार आग्रह किया कि या तो मैं वहाँ जल्द ही आऊँ और खासतौर पर प्रसून जी को लेकर आऊँ । या फ़िर वो मुझसे मिलने मेरे घर आयेगा ।
गाङी वापस शहर की और चलने लगी । नतालिया और सवेटा अपनी जिंदगी की इस रोमांचक रात को लेकर बहुत एक्साइटेड थी । और रतीराम की परवाह किये बिना बार बार मुझे किस कर रही थी ।मैंने प्रसून के बारे में सोचते हुये एक सिगरेट सुलगायी और हौले हौले कश लगाने लगा ।
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