शुक्रवार, जुलाई 30, 2010

किस करम का कौन सा नरक ..?

सभी नरक यम के राज्य में स्थिति हैं । इन नरकों की स्थिति प्रथ्वीलोक से नीचे मानी गयी है । गौ हत्या । भ्रूण हत्या । आग लगाने वाला रोध नामक नरक में जाता है । ब्रह्मघाती । शराबी । सोने की चोरी करने वाला । सूकर नरक में जाता है । क्षत्रिय । वैश्य की हत्या करने वाला ताल नरक में जाता है । ब्रह्महत्या । गुरुपत्नी या बहन के साथ सहवास करने वाला असत्य भाषण करने वाला राजपुरुष तप्तकुम्भ में जाता है । निषिद्ध पदार्थ बेचने वाला । शराब बेचने वाला । तथा स्वामिभक्त सेवक को त्यागने वाला तप्तलौह में जाता है । कन्या या पुत्रवधू के साथ सहवास करने वाला । वेद विक्रेता । वेद निंदक । महाज्वाल नरक में जाता है । गुरु का अपमान करने वाला । व्यंग्य करने वाला । अगम्य स्त्री के साथ सहवास करने
वाला शबल नामक नरक में जाता है । मर्यादा त्यागने वाला वीर विमोहन नरक में । दूसरे का अनिष्ट करने वाला कृमिभक्ष में । देवता । ब्राह्मण से द्वेश रखने वाला लालाभक्ष में । परायी धरोहर हडपने वाला । बाग बगीचे में आग लगाने वाला । विषज्जन नरक में जाता है । असत पात्र से दान लेने वाला । असत प्रतिग्रह लेने वाला । अयाज्य याचक । और नक्षत्र से जीविका चलाने वाला अधःशिर नरक में जाता है । मदिरा । मांस का विक्रेता पूयवह नरक में । मुर्गा । बिल्ली । सूअर । पक्षी । हिरन । भेड को बांधने वाला भी पूयवह में जाता है । घर जलाने वाला । विष देने वाला । कुण्डाशी । शराब विक्रेता । शराबी । मास खाने वाला । पशु मारने वाला । रुधिरान्ध नरक में जाता है । शहद निकालने वाला वैतरणी । क्रोधी मूत्रसंग्यक नरक में । अपवित्र और क्रोधी असिपत्रवन में । हिरन का शिकार करने वाला अग्निज्वाल ।
यग्यकर्म में दीक्षित लेकिन वृत का पालन न करने वाला संदंश । स्वप्न में भी स्खलित होने वाला संयासी
या ब्रह्मचारी अभोजन नरक में । सबसे ऊपर भयंकर गर्मी वाला रौरव । उसके नीचे महारौरव । उसके नीचे शीतल । उसके नीचे तामस । इसके बाद अन्य नरक क्रम से नीचे स्थित हैं । इन नरकों में एक दिन सौ वर्ष के समान होता है । इन नरकों में भोग भोगने के बाद पापी तिर्यक योनि में जाता है । इसके बाद कृमि । कीट । पतंगा ।
स्थावर । एक खुर वाले गधे की योनि प्राप्त होती है । इसके बाद जंगली हाथी आदि की योनि में जाकर गौ की योनि में पहुचता है । गधा । घोडा । खच्चर । हिरन । शरभ । चमरी । ये छह योनियां एक खुर वाली हैं । इसके अतिरिक्त बहुत सी अन्य योनिंयो को भोगकर प्राणी मनुष्य योनि में आता है । और कुबडा । कुत्सित । बौना । चान्डाल आदि योनि में जाता है । अवशिष्ट पाप पुण्य से समन्वित जीव बार बार गर्भ में जाते हैं और मृत्यु को प्राप्त होते है । सब पापों के समाप्त हो जाने के बाद शूद्र । वैश्य । क्षत्रिय आदि होता हुआ क्रम से आरोहण को प्राप्त करता है । इसी में सत्कर्मी होने से ब्राह्मण । देव और इन्द्र के पद पर भी जाता है । मृत्यु लोक में जन्म लेने वाले का मरना निश्चित है । पापियों का जीव अधोमार्ग से निकलता है । यमद्वार पहुचने के लिये जो मार्ग बताये गये हैं । वे अत्यन्त दुर्गन्धदायक मवाद । रक्त से भरा हुआ है । इस मार्ग में स्थित वैतरणी को पार करने के लिये वैतरणी गौ का दान
करना चाहिये । जो गौ पूरी तरह काली हो । स्तन भी काले हों । वह वैतरणी गौ होती है । यमलोक का मार्ग भीषण ताप से युक्त है । अतः छत्रदान करने से मार्ग में छाया प्राप्त होती है । यमराज के दूत महाक्रोधी और भयंकर है । उदारता पूर्वक दान करने वाले को कष्ट देने का विधान नहीं है ।
मनुष्य का यह शरीर केले के वृक्ष के समान सारहीन एवं जल के बुदबुदे के समान क्षणभंगुर है । इसमें जो सार देखता है । मानता है । वह महामूर्ख है ।पंचतत्वों से बना यह शरीर पुनः अपने किये हुये कर्मों के अनुसार उन्हीं पंचतत्वों में जाकर विलीन हो जाता है । अतः उसके लिये रोना क्या ? जब प्रथ्वी । सागर । देवलोक तक नष्ट होते हैं । तो यह मर्त्यलोक तो जल के फ़ेन के समान है ।
मनुष्य के शरीर में साढे तीन करोढ रोंये होते है । कहा जाता है । जो स्त्री ( स्वेच्छा से ) सती होती है । वह इतने ही समय तक पति का उद्धार करती हुयी सुखपूर्वक स्वर्ग में वास करती है और यह अवधि चौदह इन्द्रों के बराबर है । यानी स्वर्ग में चौदह इन्द्र बदल जाते हैं । गर्भवती स्त्री और छोटे बच्चों वाली स्त्री के लिये सती होने का विधान नहीं हैं ।

गुरुवार, जुलाई 22, 2010

प्रेतनी का मायाजाल 1

लेखकीय -- प्रेत जगत पर आधारित मेरी कहानी " प्रेतनी का मायाजाल " आठ भागों में है । जो एक साथ ही प्रकाशित है । ये कहानी पाठकों की बेहद मांग पर लिखी गयी है ।
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शाम के सात बजकर चवालीस मिनट हो चुके थे । वातावरण में हल्का हल्का अंधेरा फ़ैल चुका था । मैं इस समय कलियारी कुटी नामक एक गुप्त स्थान पर मौजूद था । कलियारी कुटी के आसपास का लगभग सौ किलोमीटर इलाका निर्जन वन था । सिर्फ़ उसकी एक साइड को छोडकर । जो यहां से तीन किलोमीटर दूर कलियारी विलेज के नाम से जाना जाता था । इस को इस तरह से समझें । कि सौ किलोमीटर व्यास का एक वृत बनायें और उसमें बीस डिग्री का हिस्सा काट दिया जाय । यही बीस डिग्री का हिस्सा इंसानों के सम्पर्क वाला था । शेष हिस्सा एकदम निर्जन रहता था । कलियारी कुटी को साधना स्थली के रूप में
मुझे मेरे गुरु " बाबाजी " ने प्रदान किया था । और तबसे इस स्थान पर मैं कई बार सशरीर और अशरीर आ चुका था । अपनी पहली अंतरिक्ष यात्रा मैंने इसी स्थान से अशरीर की थी । कलियारी कुटी के छह किलोमीटर के दायरे में किसी तपस्वी पुरुष की " आन " लगी हुयी थी । वो तपस्वी पुरुष कौन था । इसकी जानकारी मुझे नहीं थी । और न ही बाबाजी ने मुझे कभी बताया था । मेरी कुटी के निकट ही पहाडी श्रंखला से एक झरना निकलता था । जिसमें पत्थरों के टकराने से साफ़ हुआ पानी उजले कांच के समान चमकता था । ये इतना स्वच्छ और बेहतरीन जल था कि कोई भी इसको आराम से पी सकता था । कुटी से चार फ़र्लांग दूर वो पहाडी थी जिस पर इस वक्त मैं मौजूद था । इस पहाडी पर चार फ़ुट चौडी और दस फ़ुट लम्बी दो फ़ुट मोटी दो पत्थर की शिलाएं एक घने वृक्ष के नीचे बिछी हुयी थी । इस तरह यह एक शानदार प्राकृतिक डबल बेड था । कलियारी विलेज से साडे तीन किलोमीटर की दूरी पर और इस पहाडी से आधा किलोमीटर की दूरी पर एक पुराना शमशान स्थल था । इसके एक साइड का दो किलोमीटर का इलाका किसी नीच शक्ति ने " बांध " रखा था । कभी कभी मुझे हैरत होती थी कि एक ही स्थान पर दो विपरीत शक्तिंयां यानी सात्विक और तामसिक अगल बगल ही मौजूद थी जो एक तरह से असंभव जैसा था । मैंने एक सिगरेट सुलगायी और कलियारी विलेज की और देखने लगा । जहां बहुत हल्के प्रकाश के रूप में जीवन चिह्न नजर आ रहे थे । एक तरफ़ साधना के लिये इंसानी जीवन से दूर निर्जन में भागना और दूसरी तरफ़ लगभग अपरिचित से इस जनजीवन को दूर से देखना एक अजीव सी सुखद अनुभूति देता था । मैं पहाडी पर टहलते हुये अपने घर के बारे में सोचने लगा । नीलेश अपनी गर्लफ़्रेंड मानसी के साथ उसके घर मारीशस गया हुआ था । बाबाजी किसी अग्यात स्थान पर थे और इस वक्त मेरे सम्पर्क में नहीं थे । मैंने अंतरिक्ष की और देखा । जहां धीरे धीरे जवान होती रात के साथ असंख्य तारे नजर आने लगे थे । ऐसा दिल कर रहा था । कलियारी कुटी में अशरीर होकर सूक्ष्म लोकों की यात्रा पर निकल जाऊं । जो इन्ही तारों के बीच अंतरिक्ष में हर ओर फ़ैले हुये थे । परबाबाजी के आदेशानुसार मुझे बीस दिन का समय इसी कलियारी कुटी में एक विशेष साधना करते हुये बिताना था ।
" दाता । " मेरे मुख से आह निकली , " तेरी लीला अजीव है । अपरम्पार है । "
मैंने रिस्टवाच की लाइट आन कर समय देखा । रात के नौ बजने वाले थे । कि तभी मुझे आसपास एक विचित्र अहसास होने लगा । हत्या..कुसुम..हत्या..कुसुम..ये शब्द बार बार मेरे जेहन पर दस्तक देने लगे । इसका सीधा सा मतलब था । कि आसपास कोई सामान्य आदमी मौजूद है । जिसके दिमाग में इस तरह के विचारों का अंधड चल रहा था । इस आन लगे हुये और दूसरी साइड पर बांधे गये स्थान पर एक सामान्य आदमी का मौजूद होना । और वो भी किसी हत्या के इरादे से । एक अजूबे से कम नहीं था । तपस्वी की " आन " लगा हुआ स्थान इंटरनेट के उस " वाइ फ़ाइ " स्थान के समान होता है । जिसमें आम जिंदगी की बात दूर से ही बिना प्रयास के कैच होने लगती है । और इसी आन के प्रभाव से " जीव " श्रेणी में आने वाली आत्मायें एक अग्यात प्रभाव से उस स्थान से अनजाने ही दूर रहती हैं । मैं इस नयी हलचल के बारे में सोच ही रहा था कि शमशान स्थल की तरफ़ एक रोशनी हुयी । और कुछ ही देर में बुझ गयी । क्या माजरा था ? मैं पूर्ण सचेतन होकर उसी तरफ़ । उस अनजान जीव की तरफ़
एकाग्र हो गया । क्या मैं उसके पास जाकर देखूं । मैंने सोचा । या यहीं से उसका " माइंड रीड " करूं । अपना यही विचार मुझे सही लगा । और मैंने उसके दिमाग से " कनेक्टिविटी " जोड दी । वह एक आदमी था । जिसके पास इस समय एक भरी हुयी रिवाल्वर थी । और वह कुसुम नाम की किसी औरत की हत्या कर देना चाहता था । इससे ज्यादा इस वक्त उसके दिमाग में और कुछ नहीं था । जो मैं रीड करता । उसकी जिन्दगी के और पिछ्ले पन्ने मैंने खोलने की कोशिश की । जिसमें मैं उस वक्त पूर्णतया असफ़ल रहा । इसकी बेहद ठोस वजह ये थी । कि इस वक्त वह आदमी पूरी एकाग्रता से इसी विचार पर केन्द्रित था । और उसकी जिन्दगी के अन्य अध्याय बैंक के किसी मजबूत सेफ़ वाल्ट की तरह लाक्ड थे । कुसुम नाम की औरत कौन थी और इस वक्त यहां क्योंकर आयेगी । ये मेरे लिये एक अजीव गुत्थी थी । अब मेरे लिये एक बडा सवाल ये था कि मैं उससे कैसे बात करूं ? करूं या न करूं । मैं उससे कैसे पूछूंगा कि वो यहां क्यों है ? यही सवाल वो मुझसे करेगा तो मैं क्या जबाब दूंगा ?
" मालको । " मैंने आह भरी । " अजव में अजव खेल है तेरे । "
फ़िर मुझे एक उपाय सूझा । पहल उसी की तरफ़ से हो तो अच्छा था । मैंने कमर में बंधी बेल्ट से लटकती टार्च निकाली और जलाकर तीन चार बार सर्चलाइट की तरह इस तरह घुमाया । मानों सरकस वाले शो प्रारम्भ होने पर घुमा रहे हों । परिणाम मेरी आशा के अनुरूप ही निकला । वह मेरी यानी किसी की उपस्थित जान गया था । और इसकी एक ही वजह थी । उस समय उसका बेहद चौंकन्ना होना । वह इस नयी स्थिति पर कुछ देर तक खडा खडा सोचता रहा और फ़िर मानो एक निर्णय के साथ मेरी ओर आने लगा । मैंने उसे अपनी और भी सही पोजीशन जताने के लिये आठ दस बार लाइटर इस तरह जलाया बुझाया । मानों सिगरेट जलाने में किसी तरह की दिक्कत हो रही हो । दस मिनट बाद ही वह पहाडी से नीचे एक वृक्ष के पास आकर खडा हो गया । पर उसने मेरे पास आने या मुझे पुकारने की कोई कोशिश नहीं की । उल्टे उसने मेरा फ़ार्मूला मुझी पर आजमाते हुये सिगरेट बीडी में से कुछ मुंह से लगाकर तीन बार माचिस को जलाया । अब वह मुझसे लगभग दो सौ कदम दूर पहाडी के नीचे कुछ हटकर मौजूद था । हम दोनों ही कशमकश में थे । कि एक दूसरे के बारे में कैसे जाना जाय ? तब उसने मानों निरुद्देश्य ही टार्च की रोशनी अपने ऊपर पेड पर फ़ेंकी और स्वाभाविक ही मेरे मुख से तेज आवाज में निकला ।
" ए वहां पर कौन है ? "
" मैं हूं । " वह तेज आवाज में चिल्लाया । " दयाराम । "
अगले कुछ ही मिनटों में वह मेरे पास पत्थर की शिला पर बैठा था और मुझे उस निर्जन और वीराने स्थान में अकेला देखकर बेहद हैरान था । उसकी ये हैरानी और तीव्र जिग्यासा मेरा अत्यधिक नुकसान कर सकती थी । इसलिये मैंने उसे बताया कि मैं बायोलोजी का स्टूडेंट हूं । और मेरा कार्य कुछ अलग किस्म के जीव जन्तुओं पर शोध करना है । जो प्रायः इस क्षेत्र में मिलते है । मैंने जानबूझकर आधी अंग्रेजी और बेहद कठिन शब्दों का प्रयोग किया था । ताकि मेरी बात भले ही उसकी समझ में न आये । पर वह मेरे यहां होने के बारे में अधिक संदेह न करे । और कुछ समझता हुआ । कुछ न समझता हुआ संतुष्ट जाय । वही हुआ । लेकिन इसमें मेरी चपल बातों से ज्यादा इस वक्त उसकी मानसिक स्थिति सहयोग कर रही थी । जिसके लिये वह इस लगभग भुतहा और डरावने स्थान पर रात के इस समय मौजूद था । कुछ देर में संयत हो जाने के बाद उसने मेरा नाम पूछा । मैंने सहज भाव से बताया ।
" प्रसून जी । " वह आसमान की तरफ़ देखता हुआ बोला । " आपकी शादी हो चुकी है ? "
" नहीं । " मैंने जंगली क्षेत्र में लगे घने पेडों की तरफ़ देखते हुये कहा । " दरअसल कोई लडकी मुझे पसन्द नहीं करती । आप की निगाह में कोई सीधी साधी लडकी हो तो बताना । "
" तुम खुशकिस्मत हो दोस्त । " उसने एक गहरी सांस ली । " इस सृष्टि में औरत से ज्यादा खतरनाक कोई चीज नहीं है ? "
वह कुछ देर तक सोच में डूबा रहा । फ़िर उसने चरस से भरी हुयी सिगरेट निकालकर सुलगायी और एक दूसरी सिगरेट मुझे आफ़र की । लेकिन मेरे मना करने के बाद वह सिगरेट के कश लगाता हुआ मानों अतीत में कहीं खो गया । और मेरी उपस्थिति को भी भूल गया । मैंने एक सादा सिगरेट सुलगायी और रिस्टवाच पर नजर डाली । रात के दस बजने वाले थे । चरस की सिगरेट की अजीव और कसैली महक वातावरण में तेजी से फ़ैल रही थी । दयाराम हल्के नशे में मालूम होता था । इसका सीधा सा अर्थ था कि मेरे पास आने से पूर्व ही वह एक दो सिगरेट और भी पी चुका था । यह मेरे लिये बिना प्रयास फ़ायदे का सौदा था । सच्चाई जानने के लिये मुझे उसके दिमाग से ज्यादा छेडछाड नहीं करनी थी । बल्कि उस गम के मारे ने खुद ही रो रोकर मुझे अफ़साना ए जिन्दगी सुनाना था ।
( क्रमशः )

प्रेतनी का मायाजाल 2

लेखकीय -- प्रेत जगत पर आधारित मेरी कहानी " प्रेतनी का मायाजाल " आठ भागों में है । जो एक साथ ही प्रकाशित है । ये कहानी पाठकों की बेहद मांग पर लिखी गयी है ।
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कोई बीस मिनट तक वह चरसी सिगरेट के सुट्टे लगाता रहा । फ़िर उसने शमशान की तरफ़ निगाह डाली । मानों वह बडी बेकरारी से किसी की प्रतीक्षा कर रहा हो । मुझे उसकी इस हरकत पर हैरत हो रही थी । अंधेरे में भला वह कैसे अपने लक्ष्य को देख सकता था । हांलाकि चन्द्रमा की रोशनी से गहरा अंधेरा तो नहीं था । फ़िर भी वह इतना पर्याप्त नही था कि यहां से आधा किलोमीटर दूर स्थित
वह किसी को देख सके । उसने दो तीन बार माचिस जलाकर बहाने से मेरा चेहरा मोहरा देखकर ये अन्दाजा लगाने की कोशिश की । कि मैं विश्वास करने योग्य हूं या नही । मैं अच्छी तरह समझ रहा था कि वो बार बार यही सोच रहा है कि अपना राज मुझे बताये या ना बताये । " तुम । " वह बोला । " सोच रहे होगे । कि आखिर मैं कौन हूं । यहां क्यों आया हूं । सच तो ये है प्रसून । मैं अपनी बीबी की हत्या करने आया हूं । वो बीबी जो मेरी बीबी है । पर जो मेरी बीबी नहीं है । " बात के बीच में ही वो अचानक हंसा । फ़िर जोर से हंसा । और अट्टहास करने लगा । " उफ़ है न कमाल ।
बीबी है । पर बीबी नहीं है । तो सबाल ये है प्रसून कि बीबी आखिर कहां गयी ? है वही । पर वो नही है । तो फ़िर कुसुम कहां गयी । अगर मेरे साथ चार साल से रह रही औरत एक प्रेतनी है । तो फ़िर कुसुम कहां है ? तो क्या कुसुम लडकी नहीं एक प्रेत है ? कौन यकीन करेगा इस पर ? " " तुम । तुम । " वह मुझे लक्ष्य करता हुआ बोला । " तुम शायद यकीन कर लो । और तुम यकीन करो या ना करो । पर इस वीराने में तुम्हें अपनी दास्तान बताकर मेरे सीने का ये बोझ हल्का हो जायेगा...? "
दयाराम परतापुर का रहने वाला था । उसकी तीन शादिंया हो चुकी थी । पर शायद उसकी किस्मत में पत्नी का सुख नहीं था । दयाराम की पहली शादी पच्चीस बरस की आयु में राजदेवी के साथ हुयी थी । नौ साल तक उसका साथ निभाने के बाद राजदेवी का देहान्त हो गया । मरने से पूर्व सात साल तक राजदेवी गम्भीर रूप से बीमार ही रही थी और इसी बीमारी के चलते अंततः उसका देहान्त हो गया । राजदेवी के कोई संतान नहीं हुयी थी । पैंतीस बरस की आयु में दयाराम का दूसरा विवाह शारदा के साथ हुआ । शारदा से दयाराम को तीन बच्चों का बाप बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ । उनकी ग्रहस्थी मजे से चल रही थी कि एक दिन चौदह साल बाद शारदा भी बिजली के करेंट से चिपक कर मर गयी ।
जिस दिन शारदा मरी । उसका सबसे छोटा बच्चा दो साल का था । बीच का आठ साल का । और बडा ग्यारह साल का । दयाराम के सामने बच्चों के पालन पोषण की बेहद समस्या आ गयी । उसके घर में ऐसा कोई नहीं था । जो इस जिम्मेदारी को संभाल लेता । तब दयाराम की सास ने अपने धेवतों का मुख देखते हुये अपनी तीस साल की लडकी कुसुम जो शादी के सात साल बाद विधवा हो गयी थी । उसकी शादी फ़िर से दयाराम के साथ कर दी । यहीं से दयाराम की जिंदगी में अजीव भूचाल आना शुरू हो गया ?
विवाह के बाद दयाराम कुसुम को पहली बार जब बुलाने गया । तो मोटर साइकिल से गया था ।। उसके घर और ससुराल के बीच में लगभग एक सौ साठ किलोमीटर का फ़ासला था । लगभग सौ किलोमीटर का फ़ासला तय करते करते दोपहर हो गयी । दयाराम ने सुस्ताने और खाना खाने के विचार से मोटर साइकिल एक बगिया में रोक दी । घने वृक्षों से युक्त इस बगिया में एक कूंआ था । जिस पर एक रस्सी बाल्टी राहगीरों को पानी उपलब्ध कराने के लिये हर समय रखी रहती थी । बगिया से कुछ ही दूर पर बडे बडे तीन गड्डे थे । और कुछ ही आगे एक विशाल पीपल के पेड के पास एक बडी पोखर थी । थकान सा अनुभव करते हुये दयाराम का ध्यान इस विचित्र और रहस्यमय बगिया के रहस्यमय वातावरण की ओर नहीं गया । अलबत्ता खेतों हारों बाग बगीचों में ही अधिक घूमने वाली कुसुम को जाने क्यों ये बगिया बडी रहस्यमय सी लग रही थी । बगिया एक अजीब सा रहस्यमय सन्नाटा ओडे हुये जान पडती थी । उसके पेडों पर बैठे उल्लू और खुसटिया जैसे पक्षी मानों एकटक कुसुम को ही देख रहे थे । दयाराम खाना खाकर आराम करने के लिये लेट गया था । लेकिन कुसुम कई सालों बाद एक आदमी की निकटता पाकर शीघ्र सम्भोग के लिये उत्सुक हो रही थी । जब दयाराम ने बगिया में मोटर साइकिल रोकी थी । तभी उसने सोचा था । कि दयाराम ने ये निर्जन स्थान इसीलिये चुना है कि वो भी कुसुम के साथ सहवास की
इच्छा रखता है । क्योंकि बगिया के आसपास दूर तक गांव नहीं थे । और न ही वहां कोई पशु चराने वाले थे । अपने पति के मरने के बाद कुसुम सम्भोग सुख से वंचित रही थी । इसलिये आज दयाराम को दूसरे पति के रूप में पाकर उसकी सम्भोग की वह इच्छा स्वाभाविक ही बलबती हो उठी ।
पर उसकी इच्छा के विपरीत दयाराम लेटते ही सो गया और जल्दी ही खर्राटे लेने लगा । हालांकि कुसुम भी कुछ थकान महसूस कर रही थी । पर कामवासना के कीडे उसके अन्दर कुलुबुला रहे थे । जिनके चलते वह बैचेनी महसूस कर रही थी । अभी वह दयाराम से इतनी खुली नहीं थी कि उसे जगाकर सम्भोग का प्रस्ताव कर देती । उसने एक आह भरी और सूनी बगिया के चारों तरफ़ देखा ।
फ़िर हारकर वह एक पेड से टिककर बैठ गयी । और उसकी निगाह वृक्षों पर घूमने लगी । तब अचानक ही उसके शरीर में जोर की झुरझुरी हुयी और उसके समस्त शरीर के रोंगटे खडे हो गये । उल्लू जैसे वो छोटे छोटे पक्षी कुसुम को ही एकटक देख रहे थे । उनकी मुखाकृति ऐसी थी । मानों हंस रहे हों । उसने अन्य वृक्षों पर नजर डाली । वहां भी उसे एक भी सामान्य पक्षी नजर नहीं आया । सभी गोल मुंह वाले थे और एकटक उसी को देख रहे थे । पहली बार कुसुम को अहसास हुआ कि क्यों वो बगिया उसे रहस्यमय लग रही थी । वहां अदृश्य में भी किसी के होने का अहसास था । कोई था जो उसके आसपास था । बेहद पास । भयभीत होकर उसने दयाराम को पुकारा । पर वह जैसे मायावी नींद में सो रहा था । तभी कुसुम ने अपने स्तनों पर किसी का स्पर्श महसूस किया । वह बेहद घबरा गयी । अभी वह कुछ समझ पाती कि उसकी योनि को किसी ने छुआ । वह चिल्लायी । बचाओ । पर उसके मुंह से आवाज न निकली । तब उसका सिर चकराने लगा । और कोई उसे जोहड की तरफ़ खेंचकर ले जाने लगा । कुसुम की चेतना गहन अंधकार की गहराईयों में डूबती चली गयी ।
" फ़ंगत । " मेरे मुंह से अचानक निकल गया । " लोखटा ? "
दयाराम ने चौंककर मेरी तरफ़ देखा । वह अतीत से बाहर आ गया था । उसका नशा हल्का होने लगा था । मैंने एक सिगरेट जलायी और सिगरेट केस उसकी तरफ़ बडाया । सिगरेट सुलगाने के बाद उसने फ़िर एक निगाह शमशान पर डाली । पर वहां कोई नहीं था । पेंट में घुसी हुयी रिवाल्वर से उसे परेशानी हो रही थी । उसने रिवाल्वर निकालकर शिला पर रख दी । और सिगरेट के कश लगाता हुआ टहलने लगा । फ़िर मानों उसे कुछ याद आया । और वह बोला , " अभी अभी तुमने क्या कहा था । लोखटा ? "
यह एक तरह से मुझसे गलती हो गयी थी । मैं दयाराम को अपनी प्रेत जगत आदि की जानकारी का परिचय नहीं देना चाहता था । क्योंकि ऐसा होने पर वह उत्सुकता से अनेकों सवाल करता और सबसे बडी बात कलियारी कुटी वाला गुप्त स्थान जो इस पहाडी से महज चार फ़र्लांग दूर था । उस तरफ़ उसका ध्यान जा सकता था । और उस स्थिति में मुझे विशेष उपाय करने होते । अतः मैंने बात को घुमाते हुये कहा , " कुछ नहीं अभी अभी मुझे एक दुर्लभ जीव पास ही नजर आया था । पर मेरा ध्यान तुम्हारी बातों पर लगा था । खैर कोई बात नहीं जाने दो । फ़िर आयेगा । "
** फ़ंगत या लोखटा प्रेत की वो किस्म होती है । जो किसी अभिशप्त स्थान पर या इस्तेमाल न किये जाने वाले शमशान स्थल के आसपास ही रहती है । अब तक दयाराम की संगत में मैं बहुत कुछ जान गया था । कुछ घटना वह अपने दिमाग से अपनी जानकारी के अनुसार सुना अवश्य रहा था । पर कुछ रहस्य इसमें ऐसा भी था । जिसके बारे में दयाराम नहीं जानता था । दरअसल ना जानकारी में दयाराम एक अभिशप्त बगिया और अभिशप्त स्थान पर रुक गया था । जहां प्रेतवासा था । और पचास साठ या अस्सी साल पहले उस स्थान को शमशान के रूप में प्रयोग किया जाता होगा । बाद में कुछ घटनाएं ऐसी घटी होंगी । जिससे वो स्थान अभिशप्त या अछूत समझा जाने लगा होगा । इसी वजह से उसके आसपास आवादी नहीं थी । और इसी वजह से वहां पशु आदि चराने वाले नहीं थे । क्योंकि जो लोग प्रेतवासा के बारे में जानते होंगे । वह जानबूझकर आफ़त क्यों मोल लेंगे । इस तरह धीरे धीरे मनुष्य के दूर होते चले जाने से उस स्थान पर प्रेतों का कब्जा पक्का होता चला गया । और दयाराम कुसुम जैसे व्यक्ति अग्यानता में उसमें फ़ंसने लगे ।
पर मेरे दिमाग में और भी बहुत से सवाल थे । कुसुम पर प्रेत का आवेश हो जाना कोई बडी बात नहीं थी । लेकिन चार साल में उसने या प्रेत ने ऐसा क्या किया था जो दयाराम उसे मारने पर आमादा था । दयाराम को कैसे मालूम पडा कि कुसुम पर प्रेत था । उसने क्या इलाज कराया । और सबसे बडा सबाल दयाराम उसको मारना ही चाहता था तो घर पर आसानी से मार सकता था । वह इस वीराने में क्यों आया ? चार साल तक प्रेतनी का एक आदमी के साथ रहना मामूली बात नहीं थी । आखिर प्रेतनी कौन थी और क्या चाहती थी ? अगर प्रेतनी पूरी तरह कुसुम के शरीर का इस्तेमाल कर रही थी तो कुसुम इस वक्त कहां थी और किस हालत में थी ? ये ऐसे कई सवाल थे । जिनका उत्तर दयाराम और सही उत्तर कुसुम के पास था । पर कुसुम इस वक्त कहां थी ? ( क्रमशः )

प्रेतनी का मायाजाल 3

लेखकीय -- प्रेत जगत पर आधारित मेरी कहानी " प्रेतनी का मायाजाल " आठ भागों में है । जो एक साथ ही प्रकाशित है । ये कहानी पाठकों की बेहद मांग पर लिखी गयी है ।
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बेहद सुहानी मगर बेहद रहस्यमय हो उठी रात धीरे धीरे अपना सफ़र तय कर रही थी । मैंने कलियारी कुटी की तरफ़ देखा । अगर दयाराम न आया होता तो मैं क्या कर रहा होता ? दयाराम अब भी टहल रहा था । उसने उत्सुकतावश शिला पर रखी टार्च की रोशनी पेड पर डाली । पेड नीबू और बेर के मिले
जुले आकार वाले फ़लों से लदा पडा था । ये गूदेदार मीठा फ़ल था । जो अक्सर मैं भूख लगने पर खा लिया करता था । कलियारी कुटी से पांच सौ मीटर दूर ऐसा ही एक अन्य वृक्ष था । जिस पर जामुन के समान लाल और बेंगनी चित्तेदार फ़ल लगते थे । ये फ़ल भी खाने में स्वादिष्ट थे । पर ये एक चमत्कार की तरह कलियारी विलेज और अन्य गांव वालों से बचे हुये थे । क्योंकि पहाडी के नीचे का इलाका किसी प्रेत शक्ति ने बांध रखा था । और कलियारी कुटी को किसी तपस्वी की आन लगी हुयी थी । ऐसी हालत में सामान्य मनुष्य यदि इधर आने की कोशिश करता तो उसे डरावने मायावी अनुभव हो सकते थे । जैसे अचानक बडे अजगर का दिखाई दे जाना । अचानक किसी हिंसक जन्तु का प्रकट हो जाना । अचानक कोई रहस्यमयी आकृति का दिखाई देना । वर्जित क्षेत्र में कदम रखने वाले को तेज चक्कर आने लगना । आदि जैसे कई प्रभाव हो सकते थे । जिससे आदमी घबरा जाता है और ऐसी जगहों पर आना छोड देता है । ये वास्तविकता दयाराम भी नहीं जानता था कि वो मेरे होने से इतनी देर यहां टिक सका था । वरना शिकारी खुद ही शिकार हो जाना था । प्रेतों के लिये रिवाल्वर का भला क्या महत्व था ? अचानक दयाराम चौकन्ना हो उठा । मैं रहस्यमय अन्दाज में मुस्कराया । दयाराम ने फ़ुर्ती से रिवाल्वर उठा ली और सतर्कता से इधर उधर देखने लगा । मैं जानता था कि उसके रोंगटे खडे हो चुके हैं । और निकट ही वह किसी की प्रेत की उपस्थिति महसूस कर रहा है । जिसका कि चार साल के अनुभव में वह अभ्यस्त हो चुका था । वास्तव में उस वक्त वहां दो प्रेत पहाडी के नीचे मौजूद थे । जो मुझे स्पष्ट दिखाई दे रहे थे । उनमें से एक औरत अंगी था । जो शायद कुसुम थी । और दूसरा पुरुष अंगी था । हालांकि मैं " कवर्ड " स्थिति में था फ़िर भी वे ऊपर नहीं आ रहे थे । इसके दो कारण थे । एक तो ऊपर वाला इलाका लगभग आन के क्षेत्र में आता था । जहां प्रेत क्या यक्ष
किन्नर गंधर्ब डाकिनी शाकिनी जैसी शक्तियां भी घुसने से पहले सौ बार सोचती । दूसरे मैं भले ही कवर्ड ( उच्च स्तर के तान्त्रिक साधक अपने को एक ऐसे अदृष्य कवच में बन्द कर लेते हैं जिससे उनकी असलियत का पता नहीं चलता । उच्च स्तर के महात्मा साधु संत प्रायः इस तरीके को अपनाते हैं जो किन्ही अग्यात कारणोंवश बेहद आवश्यक होता है । ) था । पर उस स्थिति में भी वे एक अनजाना भय महसूस कर रहे थे । उन्हें खतरे की बू आ रही थी । मैं दयाराम को और अधिक डिस्टर्ब नहीं होने देना चाहता था । इस तरह मेरा कीमती समय नष्ट हो सकता था । मैंने उसकी निगाह बचाते हुये एक ढेला उठाया । और फ़ूंक मारकर प्रेतों की और उछाल दिया । मुझे इसकी प्रतिक्रिया पहले ही पता थी । प्रेत अपने अंगो में जबरदस्त खुजली महसूस करते हुये तेजी से वहां से भागे । उनका अनुमान सही था । पहाडी पर उनके लिये खतरा मौजूद था । और वे अब लौटकर आने वाले नहीं थे । कुछ ही देर में दयाराम सामान्य स्थिति में आ गया । वह फ़िर से पत्थर की शिला पर बैठ गया । और बैचेनी से अपनी उंगलिया
चटका रहा था । एक खुशहाली की खातिर । अपने बच्चों की सही परवरिश की खातिर उसने तीसरी बार शादी की थी और उस शादी ने उसके पूरे जीवन में आग लगा दी थी । पर वह कुछ भी तो नहीं कर सका । क्या करता बेचारा ?
" फ़िर । " उसका ध्यान अपनी तरफ़ आकर्षित करते हुये मैंने पूछा , " उसके बाद क्या हुआ ? "
बगिया में सोया हुआ दयाराम अचानक हडबडाकर उठा । उसने कलाई घडी पर नजर डाली तो तीन बजने वाले थे । यानी ढाई घन्टे वह एक तरह से घोडे बेचकर सोया था । उसे हैरत थी । ऐसी चमत्कारी नींद अचानक उसे कैसे आ गयी थी ? वह तो महज आधा घन्टा आराम करने के उद्देश्य से लेट गया था । मगर लेटते ही उसकी चेतना ऐसे लुप्त हुयी । मानों किसी नशे के कारण बेहोशी आयी हो । पर वह नींद में भी नहीं था ? अपनी उसी अचेतन अवस्था में वह एक घनघोर भयानक जंगल में भागा चला जा रहा था । जंगल में रहस्यमयी पीला काला अंधकार छाया हुआ था । आसमान और उजाला कहीं नजर नहीं आ रहा था । चारों तरफ़ वृक्ष ही वृक्ष थे । उन वृक्षों के बीच में छोटे छोटे मंदिर बने हुये थे । दयाराम को ऐसा लग रहा था कि कुछ अग्यात लोग उसके पीछे पडे हुये हैं । जो उसको मार डालना चाहते हैं । बस उन्हीं से बचने को वह भाग रहा था । अचानक भागते में ही वह एक पेड की झुकी डाली से टकराया और गिर पडा । बस इसके बाद उसे कुछ याद नहीं रहा । दयाराम ने एक बैचेन दृष्टि कुसुम की तलाश में इधर उधर दौडाई । वह गुमसुम सी एक पेड के नीचे बैठी थी । मानों औरत के स्थान पर एक जिंदा लाश हो ? वह अपलक आंखो से कुंए की ओर देख रही थी । दयाराम ने उसे पुकारा और आगे की यात्रा के लिये तैयार हो गया । वह मशीनी अन्दाज में मोटर साइकिल की सीट पर बैठ गयी ।
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दयाराम के तीनों बच्चे मौसी को मां के रूप में पाकर बेहद खुश थे । दयाराम अपने लम्बे चौडे घर में अकेला ही रहता था । शारदा के मरने के बाद उसने एक नौकर रख लिया था । जो उसके तीनों बच्चों और गाय बकरी आदि पशुओं की देखभाल करता था । दयाराम का यह पुश्तैनी मकान काफ़ी बडी जगह में बना हुआ था । जिसमें बडे बडे बाईस कमरे थे । इसके अतिरिक्त बाहर गली पार करके पशुओं के लिये एक अहाता था । और बारह कमरों का एक स्कूल बना हुआ था । जो अब बन्द था लेकिन दयाराम की सम्पत्ति था । दयाराम के एकदम बगल वाला घर किसी व्यवसायी का था । जिसे वह गोदाम के रूप में इस्तेमाल करता था । और उसमें कोई रहता नहीं था । इसी तरह दूसरी साइड में भी लगभग आठ सौ मीटर की जगह खाली पडी थी । कुल मिलाकर दयाराम की वह विशाल हवेली आवादी के लिहाज से लगभग अकेली ही थी । कुसुम के शादी के बाद घर में पहली बार पैर रखते ही एक अजीव सा रहस्यमय वातावरण सृजित हो गया । जिस पर अनजाने में ही दयाराम का ध्यान नहीं गया । उस रात ही पहली बार दयाराम ने जब कुसुम से सम्भोग किया तो उसे कुसुम में एक अजीव सी ताकत का अहसास हुआ । वह पहले ही सम्भोग में शरमाने के बजाय निर्लज्ज सा व्यवहार कर रही थी । दो तीन बार उसने दयाराम को वहशी की तरह
दबोच लिया था । दयाराम ने सोचा । कुसुम साली होने के नाते खुली हुयी है और अपनी ताकत दिखा रही है । उसे कुछ अजीव सा तो लगा पर तत्काल ही कोई बात उसकी समझ में नहीं आयी । अगली सुबह सब कुछ सामान्य था । कुसुम ने बडी दक्षता से घर संभाल लिया था और चुहलबाजी करती हुयी एक नयी पत्नी की तरह व्यवहार कर रही थी । दयाराम ने राहत की सांस ली । उसकी उजडी ग्रहस्थी फ़िर से बस चुकी थी ?
दयाराम ज्यादातर दिन भर घर से बाहर खेतो पर ही रहता था । इसलिये अगले ढाई साल तक वह अपने घर में फ़ैल चुके मायाजाल को नहीं जान सका था । हालाकि उसे कुछ था जो अजीव लगता था । पर वो कुछ क्या था । यह उसकी समझ से बाहर था । इन ढाई सालों में कुसुम के दो बच्चे हुये जो तीन चार महीने की अवस्था होते ही रहस्यमय तरीके से मर गये । कुसुम का व्यवहार अजीव था । इसका जिक्र उसके दोनों बडे बच्चों ने और उसके नौकर रूपलाल ने भी किया था । बच्चों के स्कूल जाते ही घर अकेला होते ही वह एकदम नंगी हो जाती थी और ज्यादातर नंगी ही रहती थी । उसे पानी के सम्पर्क में रहना बहुत अच्छा लगता था । गर्मियों में वह चार बार तक और सर्दियों में दो बार नहाती थी । दयाराम उससे सम्भोग करे या ना करे । वह रात में निर्वस्त्र ही रहती थी । दयाराम के पूछने पर उसने कहा कि कपडों में वह घुटन महसूस करती है । एक अजीव बात जिसने दयाराम को सबसे ज्यादा चौंकाया था । कि उसने अपने बच्चों को स्तनपान नहीं कराया । इसका कारण उसने यह बताया कि उसकी छातिंयो में दूध उतरता नहीं है । रूपलाल के इशारा करने पर दयाराम ने गौर किया कि वह पलक नहीं झपकाती । अर्थात उसकी आंखे किसी पत्थर की मूर्ति की तरह अपलक ही रहती हैं । रूपलाल ने यह भी बताया कि
कभी वो गलती से उसकी नंगी हालत में घर में आ गया तो भी उसने कपडे पहनने या कमरे में जाने की कोशिश नहीं की । रूपलाल बाहर स्कूल में रहता था इसलिये काम पडने पर ही घर में आता जाता था । ढाई साल बाद इस तरह के अजीव समाचार सुनकर दयाराम मानों सोते से जागा । जिन बातों को वह अब तक नजर अन्दाज कर रहा था । उनके पीछे कोई खतरनाक रहस्य छिपा हुआ था । यानी पानी सिर से ऊपर जा रहा था । वह अपने बच्चों की खातिर चिंतित हो उठा । जाने क्यों उसे अपनी ये हवेली रहस्यमय और खतरनाक लगने लगी । उसे एक अदृश्य मायाजाल का अहसास होने लगा । यही सोच विचार करते हुये उसने घर में अधिक समय बिताने का निश्चय किया । और तब उसने दो स्पष्ट प्रमाण देखे ।
पहला जब वह बाथरूम के शीशे के सामने शेव कर रहा था । सुमन उसके ठीक पीछे आकर खडी हो गयी । उसके पुष्ट उरोज दयाराम की पीठ से सटे हुये थे । और उसके दोनों हाथ दयाराम के " अंग " को खोज रहे थे । पर ..? पर शीशे में उसकी कोई आकृति नहीं थी जो कि उस बडे आकार के शीशे में निश्चित होनी चाहिये थी । दयाराम इस रहस्य को अपने दिल में ही छुपा गया । उसने कुसुम से कुछ नहीं कहा । लेकिन अब वह कुसुम से मन ही मन भयभीत रहने लगा । खास तौर पर वह अपने छोटे छोटे बच्चों के लिये चिंतित हो उठा था ।
दूसरा प्रमाण भी उसे जल्दी ही मिल गया । वह दोपहर के टाइम छत पर था । जब सुमन सूखे कपडे उतारने छत पर आयी । दयाराम और कुसुम एक ही स्थिति में खडे थे । लेकिन सूर्य की रोशनी में छाया सिर्फ़ दयाराम की बन रही थी । कुसुम किसी भी कोण से खडी हो । उसकी छाया नहीं बन रही थी । उफ़ ! दयाराम के पूरे शरीर में अग्यात भय की सिहरन हो उठी । उसके जैसा हिम्मती जिगरवाला भी कांप उठा । " भूतनी..? " कुसुम तो औरत के रूप में प्रेत थी ? वह अब तक एक प्रेतनी के साथ रह रहा था । कुसुम नीचे चली गयी । तो दयाराम कुसुम के साथ गुजारे अपने जिंदगी के क्षणों में वह रहस्य खोजने की कोशिश करने लगा । जब जब उसने कुसुम में कोई अजीब बात देखी हो । एक हिसाव से सभी बातें अजीव थी लेकिन उन्हें किसी औरत का विशेष स्वभाव मानों तो कुछ भी अजीव नहीं था ।
" हे भगवन । " उसने असमंजस में माथा रगडा , " तेरे खेल कितने अजीव हैं । तेरे खेल कितने न्यारे हैं । इसको भला तेरे अलावा कौन समझ सकता है ? "
( क्रमशः )

प्रेतनी का मायाजाल 4

लेखकीय -- प्रेत जगत पर आधारित मेरी कहानी " प्रेतनी का मायाजाल " आठ भागों में है । जो एक साथ ही प्रकाशित है । ये कहानी पाठकों की बेहद मांग पर लिखी गयी है ।
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धीरे धीरे रात के बारह बज गये । दयाराम की बात सच थी । मुझे अपनी कहानी सुनाते सुनाते वह अपने आपको काफ़ी हल्का महसूस कर रहा था । और लगभग भूल ही गया था । कि वह यहां किस उद्देश्य से आया था ? अब वह बार बार चरस की भरी सिगरेट भी नहीं पी रहा था । रिवाल्वर की तरफ़ तो उसका ध्यान ही नहीं था । ये शायद चार सालों से उसके मन में भरा हुआ गुबार निकलने से हुआ था । ठंडी रात और खुला आसमान भी उसको राहत पहुंचा रहे थे । उसकी आधी कहानी मेरी समझ में आ रही थी । आधी को लेकर मैं भी उलझन में था । भूतिया किस्सों में चित्र विचित्र घटनाओं का होना कोई मायने नहीं रखता । पर एक आदमी के लिये वह एक अदभुत तिलिस्म से कम नहीं होता । वास्तव में वह एक तिलिस्म ही होता है । मायाजाल । ये भी एक मायाजाल था । एक प्रेतनी का मायाजाल ।
" फ़िर । " मैंने उत्सुकता से पूछा , " उसके बाद तुमने क्या किया । जब तुम्हें यह पता चला कि बीबी के नाम पर तुम्हारे साथ रह रही औरत कुसुम नहीं बल्कि एक प्रेत है ? "
" मैं क्या करता । " वह अजीब भाव से बोला , " मैं तो अभी ये ही तय नहीं कर पाया था कि वो कौन है ? उसका रहस्य क्या है । कुसुम कहां चली गयी । ये कहना भी बेबकूफ़ी थी क्योंकि थी तो वो कुसुम के शरीर में ही । आखिर वो प्रेतनी कौन थी क्या चाहती थी । ये अनेकों प्रश्न प्रसून मेरे सामने थे । पर इनका जबाब कौन देता ? कहां से लाता मैं इनका जबाब । पर नहीं । ये गलत है । हर प्रश्न का उत्तर है । हर समस्या का समाधान है । वो अगर दर्द देता है तो दवा भी देता है । वो अगर मुसीवत भेजता है । तो हल भी भेजता है । और फ़िर एक दिन " दवा " आयी । "
कुसुम के प्रेत होने के दो प्रमाण मिल जाने के बाद एक दिन सुबह दस बजे दयाराम अपने बन्द स्कूल के सामने बरगद के पेड के नीचे कुर्सी डालकर बैठा था । अब उसके दिमाग में यही द्वंद चलता रहता था । कि इस नयी स्थिति में क्या किया जाय । क्या न किया जाय । वह अपनी समस्या को लेकर तीन अलग अलग तान्त्रिकों से भी कुसुम से छिपाकर मिल चुका था । उन्होंने कुछ गंडा ताबीज बना दिये थे । और कुछ उपाय बताये थे । कि कुसुम के ऊपर सोते में यह भभूत छिडक देना । प्रसाद के बहाने पेडे में उसको यह " विशेष लोंग " खिला देना । यहां अगरबत्ती लगाना । वहां ये धागा बांधना । पर इन उपायों से कोई लाभ नहीं हुआ । तब चिंतित दयाराम रूपलाल के बताये अनुसार हनुमान जी की विशेष पूजा करने लगा । इससे वह अपनी मानसिक स्थिति में कुछ शांति तो महसूस करता पर कुसुम में कोई परिवर्तन नहीं हुआ । तब मानों एक दिन भगवान ने उसकी सुनी । कुर्सी पर बैठा हुआ दयाराम उस समय चौंका । जब गली से गुजरता हुआ एक जटाधारी बाबा उसकी हवेली के सामने रुक गया । और बडे चकित भाव से उसकी हवेली को ऊपर से नीचे तक बार बार देखने लगा । दयाराम ने उसको रोकने टोकने का कोई यत्न नहीं किया । वह बेहद दिलचस्पी से जटाधारी को देख रहा था । जटाधारी ने थैले में से कुछ बीज से निकाले और एक बार गली में इधर उधर देखा । दयाराम शीघ्रता से बरगद के मोटे तने के पीछे छुप गया । गली को एकदम सूना पाकर जटाधारी ने उन बीजों को मुठ्ठी बांधकर मन्त्र सा पडते हुये फ़ूंका । और हवेली के गेट की तरफ़ उछाल दिया ।
आश्चर्यजनक रूप से दो मिनट के अन्दर कुसुम हवेली के गेट पर आकर खडी हो गयी । उसके ब्लाउज के सभी हुक खुले हुये थे और ब्रा तो वह पहनती ही नही थी । उसकी आंखे छोटे बल्ब के समान चमक रहीं थी । वह जलती हुयी आंखों से जटाधारी को घूर रही थी । दयाराम ने सुना । जटाधारी कह रहा था । तो तू है । पूरा अड्डा है प्रेतों का । ए कुलटा तेरा आदमी कहां है ? कुसुम ने भडाक से दरबाजा बन्द कर दिया । मानों जटाधारी के मुंह पर मारा हो । जटाधारी हो हो करके हंसने लगा । और कुछ सोचता हुआ सा आगे बड गया ।
उसके थोडा आगे बडते ही दयाराम बरगद के पीछे से निकलकर दौडते हुये जटाधारी के सामने पहुंचा और हाथ जोडकर खडा हो गया । दयाराम ने बताया कि वह हवेली का मालिक है । और फ़िर संक्षिप्त में बात बताने के बाद वह जटाधारी को स्कूल के अन्दर ले गया । यहां कुसुम कभी नही आती थी । फ़िर भी एतिहयात बरतते हुये उसने अन्दर से दरबाजा बन्द कर लिया । रहस्यमय जटाधारी कुर्सी पर बैठ गया । और स्कूल में नजर घुमाने लगा । दयाराम आगे की बात । कुसुम का रहस्य जानने को बैचेन था । उसने जटाधारी को पूरी बात शूरू से आखीर तक बतायी और फ़िर हाथ जोडकर बोला , " महाराज ये सब क्या घनचक्कर है ? मैं तो तंग आ गया । "
जटाधारी मध्यम स्तर का तान्त्रिक था । और सबसे अच्छी बात थी कि वह स्वभाव का एकदम सच्चा था । वह फ़रुर्खाबाद के निकट कायमगंज का रहने वाला था । और इस वक्त चम्बल के बीहडों में काली नदी के किनारे एक गुप्त स्थान पर साधना कर रहा था । वह बाबा मूलचन्द के नाम से जाना जाता था । और बस्ती में बहुत कम आता जाता था । उसने दयाराम को बताया कि हवेली में तीन प्रेत रहते हैं । जो कुसुम पर आवेशित रहते हैं । लेकिन लगभग तीन साल से तीन प्रेतों से आवेशित वह औरत कैसे जिंदा है । यह उसके लिये भी हैरत की बात थी । उन प्रेतों से उसको बचाना उसके लिये संभव न था । उसकी तान्त्रिक शक्ति अभी उस स्तर पर नहीं पहुंची थी । यह काम उसके गुरु कर सकते थे । पर उसके गुरु उससे आसाम जाने की कहकर गये थे । और तबसे उनका कोई पता नहीं था । ये भी निश्चित नहीं था कि वो कब लौटेंगे । हां उसने तत्काल ही पांच अभिमन्त्रित ताबीज भरे । जो उसके तीन बच्चों के लिये । एक उसके लिये । एक रूपलाल के लिये था । इन ताबीजों से प्रेत उन लोगों का कोई विशेष अहित नहीं कर सकते थे । यह बात बाद में सच साबित हुयी । उसने कुछ और उपाय । कुछ और जरूरी
बातें दयाराम को बतायी । और वहां से विदा हो गया । जटाधारी बाबा से एक तरह से उसे कोई राहत नहीं मिली थी । और एक तरह से बहुत कुछ मिला था । उसकी समस्या ज्यों की त्यों मौजूद थी । पर वह और उसके बच्चे प्रेत के प्रभाव से रक्षित हो गये थे । यही बहुत बडी बात थी । जटाधारी उसका और कुछ भला भले ही न कर सका हो । पर उसे एक विशेष कवच बनाकर दे गया । जिसके होते कोई भी बडी से बडी प्रेत शक्ति न उसको डरा सकती थी और न ही हमला कर सकती थी । ( अब मुझे उसके निडरता से इस स्थान पर होने और प्रेतों से लडने के हौसले का राज पता चल गया । ये बात किसी हद तक तो सच थी । लेकिन पूरी तरह नहीं । मूलचन्द बाबा शायद उसको ये साबधान करना भूल गया । कि ये कवच बस्ती जैसे स्थानों पर ही कारगर होता है । प्रेतों के क्षेत्र में पहुंचकर " अछूत " जगह की वजह से कवच की शक्ति मामूली रह जाती है । और किसी गलती के हो जाने पर कवच
खन्डित भी हो सकता था । और ऐसी हालत में दयाराम की मौत भी हो सकती थी । पर किसी उलझी हुयी समस्या से लगातार परेशान आदमी का दिमाग प्रतिशोध की अवस्था में पहुंच जाता है । और वह मरने मारने पर उतारू हो जाता है । )
पर यह कैसा प्रतिशोध था । और किससे था । यह ठीक से उसकी भी समझ में नहीं आ रहा था । और अदृश्य़ की इस लडाई को लडते हुये दयाराम को कुसु्म की शादी के बाद के तीन साल गुजर गये । और तब कुसुम की आदतों में नये बदलाब होने लगे । वह साधारण औरत से मदमस्त औरत में बदल गयी । दयाराम ने कभी जिक्र नहीं किया था कि वह जानता है कि वो औरत न होकर एक प्रेतनी है । इस तरह के जिक्र से उसे क्या लाभ होना था ? और ढाई साल के बाद तो वह इस हकीकत से ठीक से वाकिफ़ ही हुआ था । अगले छह महीने उसने समाधान खोजने और क्या करना चाहिये । क्या नहीं करना चाहिये । जैसी कशमकश में गुजारे थे । और अब अपनी एक रिश्ते की ताई के सुझाव अनुसार कुसुम को किसी तरह से बालाजी ले जाने की फ़िराक में था । कहते हैं न ऊंट खो जाता है तो परेशान आदमी उसको लोटे में भी खोजने की कोशिश करता है ।
लेकिन दयाराम उसको बालाजी ले जा पाय । उससे पहले ही वह एक मदमस्त हस्तिनी औरत की भांति बेकाबू हो उठी । कामवासना को लेकर उसमें जबरदस्त चेंज हुआ और वह हर वक्त कामातुर सी रहने लगी । वह रात में सोते हुये दयाराम को जबरन ही उठा लेती और बलपूर्वक सम्भोग का आदेश सा देती । हैरत की बात थी कि उस वक्त उसके आदेश में जाने क्या सम्मोहन होता कि दयाराम उसका आदेश पालन करने पर विवश हो जाता । और इस तरह वह एक एक रात में चार बार सम्भोग मांग करने लगी । दूसरी बात ये हुयी कि अच्छे खाने पीने से बना दयाराम का हट्टा कट्टा शरीर तेजी से कमजोर होने लगा । अब दयाराम भी धीरे धीरे प्रेत भाव से आवेशित हो रहा था । लेकिन मामला यहीं पर शांत नहीं हुआ । कुसुम एक नया खेल खेलने लगी । वह अक्सर रात को ग्यारह बारह बजे उठती और दरबाजा खोलकर अहाता पार करते हुये दूसरी गली में छलांग लगाकर कूद जाती और उस रास्ते पर तेजी से दौड लगा देती । जहां " मिंयां भीका " नाम का कब्रिस्तान था । यह बात दयाराम को उस दिन
पता चली । जब रात में कुसुम अपने बिस्तर से गायब थी । उसने चारों तरफ़ देखा । पर उसका कोई पता नहीं था । बैचेनी से सिगरेट फ़ूंकता हुआ वह उसके लौटने का इंतजार करता रहा । इंतजार करने क अलावा वह कर भी क्या सकता था ? उस रात कुसुम साडे तीन बजे लौटी और चुपचाप लेटकर सो गयी ।
दयाराम के लिये ये नया टेंशन था कि कुसुम आखिर रात को कहां जाती है । वह समझ नहीं पा रहा था कि ऐसे अजीव हालातों में उसे क्या करना चाहिये ? उपाय पूछे तो किससे पूछे । और इसका उपाय भला क्या हो सकता था । आखिर में उसने कुसुम का पीछा करने का निश्चय किया । और इस खेल को खत्म करने का निश्चय किया । उसने बरसों से बेकार रखा रिवाल्वर निकालकर चेक किया और गोलियां डालकर फ़ायर आदि करके संतुष्ट हो गया । अब उसे इस बात का इंतजार था कि कुसुम रात मे किसी सुनसान स्थान पर पहुंचे । जहां वो गोली मारकर उसकी हत्या कर दे और लाश ठिकाने लगा दे । उफ़ ।
पागलपन में आदमी पता नहीं क्या क्या सोचता है । जो भी हो वह इस औरत से तंग आ गया था । यह प्रेतनी हो । या कुसुम हो । या कोई भी हो । हर हालत में उससे छुटकारा पाना था । तभी वह चैन की जिंदगी जी सकता था । आखिर उसने कुसुम की हत्या का पक्का निश्चय कर लिया । ( क्रमशः )

प्रेतनी का मायाजाल 5

लेखकीय -- प्रेत जगत पर आधारित मेरी कहानी " प्रेतनी का मायाजाल " आठ भागों में है । जो एक साथ ही प्रकाशित है । ये कहानी पाठकों की बेहद मांग पर लिखी गयी है ।
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रात और अधिक गहरा चली थी । अपनी कहानी सुनाते सुनाते दयाराम भावुक हो उठा था । जिंदगी की अजीव और रहस्यमय परिस्थियों ने इस धनी सम्पन्न और जीवट इंसान को लगभग तोडकर रख दिया था । वह अपने मासूम बच्चों का मुंह देखकर हार जाता था । वरना तो वह गोली मारकर कब का इस भूतनी का खेल खत्म कर चुका होता । पर उसके सामने और भी सवाल थे । वह अपनी सास को क्या बताता । वह समाज को क्या बताता । दूसरे उसे खुद यह रहस्य मारे डाल रहा था कि अच्छी भली कुसुम आखिर प्रेत कैसे बन गयी ? वह जब अपनी ससुराल जाता था । वो एक सामान्य औरत की तरह व्यवहार करती । उससे जीजा जीजा कहकर खूब हंसी मजाक करती । उस समय उसमें ऐसी कोई बात नहीं थी । पहली विदा के समय बगिया में जो अजीव स्वप्न सा उसने देखा था । उसका क्या रहस्य था । ये कुछ ऐसे सवाल थे । जो उसे जीने पर मजबूर कर रहे थे । लडने पर मजबूर कर रहे थे । वरना तो ऐसी जिंदगी से वह अब मर जाना ही चाहता था । इस प्रेतनी का उद्देश्य क्या था । और ये कौन थी । जिसने उसकी हंसते खेलते घर को आग लगाकर रख दी थी ।
***आखिर दयाराम ने रात में उसका पीछा करने का निश्चय किया । और भरी हुयी रिवाल्वर के साथ वह इंतजार करने लगा कि कब वह रात को बाहर जाय । इंतजार की आवश्यकता ही न पडी । कुसुम लगभग हर रात ही बाहर जाती थी । रात के बारह बजते ही कुसुम उठी । और दयाराम पर एक दृष्टि डालकर घर से बाहर निकल गयी । दयाराम बेहद फ़ुर्ती से उठा । उसने रिवाल्वर खोंसा । और अहाते में आ गया । जहां कुसुम बाउंड्रीबाल के पास खडी सडक की तरफ़ देख रही थी । मानों किसी का इंतजार कर रही हो । और फ़िर वह बेहद फ़ुर्ती से दीवाल पर चडकर लहराई और सडक पर कूद गयी । दयाराम अपनी पूर्ण शक्ति से उसका पीछा कर रहा था । लेकिन वह मानों चल न रही हो । हवा में उड रही हो । दयाराम के लिये उसका पीछा करना मुश्किल हो रहा था । कुछ ही देर में उसने बस्ती छोडकर पीपराघाट का रास्ता पकड लिया । और दयाराम एकदम चकरा गया । उस सडक पर जो पीपराघाट से नदी के पार वीरान टेकरी पर ले जाती थी । उसकी गति और भी बड गयी । और फ़िर मानों वह उडन छू हो गयी ।
दयाराम को दूर दूर तक वह नजर नहीं आयी । दाता क्या माजरा था । उसकी अच्छी तरह से समझ में आ गया था । कि उसकी चाल इंसानी चाल हरगिज नहीं थी । और कोई भी इंसान इंसानी गति से उसे कभी नहीं पकड सकता था । उसका ये मन्सूबा भी फ़ेल हो गया था । कि आखिर ये कहां जाती है और क्या करती है । दयाराम का मन हुआ कि इन अजीब परिस्थितियों में अपने बाल नोच ले ।
आखिरकार दयाराम को इस समस्या का हल भी मिल गया । मंगलवार की शाम जब वह हनुमान मन्दिर पर प्रसाद चडाने गया । उसे मन्दिर के बाहर दो बुजुर्ग आदमी बात करते हुये मिले जो किसी पिलुआ वाले सिद्ध अघोरी की बात कर रहे थे । जो यमुना के खादरों में रहता था और रात के दस बजे के बाद ही मिलता था । दयाराम ने उन आदमियों से पिलुआ का सही पता पूछा और उसी रात पिलुआ पहुंचा । यह अच्छा था कि खादर होने के बाद भी मोटर साइकिल आराम से वहां तक जाती थी । पिलुआ पहुंचकर दयाराम को बेहद आश्चर्य हुआ । वो जानता था कि अकेला वही प्रेत समस्या से जूझ रहा है । जबकि वहां इस तरह की समस्या और अन्य समस्याओं वाले लगभग चालीस लोग मौजूद थे । जिनमें आठ महिलाएं भी थी । दयाराम का नम्बर रात दो बजे सबके बाद आया । अघोरी ने बडे शान्त होकर उसकी बात सुनी । वह थोडा चिंतित भी दिख रहा था । फ़िर अघोरी ने अपनी विधा का उपयोग करते हुये बताया कि कुसुम रात को अक्सर तीन स्थानों पर ही जाती है । काली टेकरी । पलेवा मन्दिर जो खन्डित हो चुका था और कलियारी शमशान । जिसमें कलियारी शमशान वह अधिक जाती थी । अघोरी ने बताया कि कुसुम पूरी तरह प्रेत ग्रस्त हो चुकी है । और यदि वह यहां गद्दी पर आ जाय तो वह उसकी कुछ सहायता करसकता था । वरना वह घर में नहीं जा सकता था । दयाराम ने बहुत उसके हाथ पैर जोडे । पर अघोरी ने कहा कि वह मजबूर है । दूसरे अघोरी ने एकरहस्यमय बात ये भी कही कि कुसुम के प्रेत बाधा से मुक्त हो जाने पर भी कोई लाभ नहीं होने वाला था क्योंकि.....?
पिलुआ पहुंचने का एक सबसे बडा लाभ दयाराम को ये हुआ कि अघोरी के पास किसी श्रद्धालु का दिया हुआ मोबायल फ़ोन था । जिसके जरिये वह कभी भी अघोरी से बात कर सकता था और इसका खास फ़ायदा उसे ये मिलने वाला था । कि अघोरी बाबा उसे एन टाइम पर बता सकता था । कि कुसुम उस वक्त कहां है ? उसने कुसुम का फ़ोटो बाबा के पास जमा कर दिया । उसे अघोरी की रहस्यमय बातें समझ में नहीं आ रही थी । अघोरी ने उसे प्रेत बाधा से मुक्त कराने में कुछ खास रुचि नहीं दिखाई थी । अघोरी को ऐसा क्या राज पता चला । जिसके बाद वह कुसुम के मामले से उदासीन हो गया था । दयाराम पागल सा होने लगा । गुत्थी सुलझने के बजाय दिन पर दिन उलझती ही जा रही थी । फ़िर अगले मौके पर दयाराम ने जो देखा । उससे उसका दिमाग ही घूमकर रह गया । अघोरी ने फ़ोन पर बताया कि आज रात एक बजे कुसुम काली टेकरी पर जायेगी । बाबा की बात आजमाने
के उद्देश्य से दयाराम कुसुम का पीछा करने के स्थान पर काली टेकरी से पहले ही एक स्थान पर जाकर छुप गया । उस समय रात के बारह बजने वाले थे । दयाराम सशंकित ह्रदय से कुसुम का इंतजार कर रहा था । ठीक पौन बजे कुसुम एक हवा के झोंके के समान आयी । वह एकदम नंगी थी । कुछ देर तक इधर उधर देखने के बाद वह चिता जलने के स्थान पर लोटने लगी । दयाराम के दिमाग में मानों भयंकर विस्फ़ोट हुआ । कुसुम गायब हो गयी थी और अब उसके स्थान पर एक लोमडी और सियार के मिले जुले रूप वाला छोटा जानवर नजर आ रहा था । दयाराम का दिमाग इस दृश्य को देखते ही मानों आसमान में चक्कर काटने लगा । अब वह सोचने समझने की स्थिति में नहीं था । उसने रिवाल्वर निकाला और जानवर को लक्ष्य करके फ़ायर कर दिया । मगर जानवर तो अपने स्थान से गायब हो चुका था ।
मैं ( प्रसून ) एक झटके से उठकर खडा हो गया । ये आदमी वाकई मुसीवत में था । मेरे अनुमान से ज्यादा मुसीवत । अब मैं समझ गया कि अघोरी ने उसकी सहायता से क्यों इंकार कर दिया था ? शिव के नाम की बात करने वाले अक्सर अघोरी वास्तव में " मसान " पूजक होते है । और ये आसानी से मसान को सिद्ध कर छोटे मोटे चमत्कार दिखाते हैं । दयाराम ने कुसुम के द्वारा जो रूप बदलने की बात कही थी और जिस तरह रूप बदलने की बात कही थी । वह मसान का ही काम था । इस तरह अघोरी मसान से प्रभावित उस परिवार को नहीं छुडा सकता था । क्योंकि वे खुद ही ज्यादातर मसान से काम लेते हैं और ऐसी स्थिति में मामला बिगड सकता था । अतः यह अघोरी के बस का मामला था ही नहीं । और इसीलिये जटाधारी जैसा छोटा साधक कोई भी " पंगा " लिये बिना ही निकल गया ।
" कंकाल कालिनी विधा " और " हाकिनी विधा " ये दो विधा या एक तरह से सिद्धियां होती हैं । कंकाल कालिनी में अकाल मृत्यु को प्राप्त लोगों की आयु को साधक अपनी या किसी की आयु में बदल सकता है । इसी की निकटवर्ती हाकिनी विध्या होती है । जिसमें हजारों मील दूर की बात जानी जा सकती है । हजारों मील दूर बैठे व्यक्ति को बुलाया जा सकता है । आम आदमी को ये जादू जैसे चमत्कार करने वाली विध्याएं बहुत आकर्षित करती हैं । पर इनका मोल बहुत चुकाना होता है और इनका अंत तो निश्चय ही पतनकारक होता है । मेरे दृष्टिकोण से साधारण मन्दिरों में की जाने वाली भक्ति इससे कहीं ज्यादा अच्छी होती है । द्वैत की सही साधनाओं में इन विध्याओं का कोई महत्व नहीं होता । अब मुझे दयाराम की कहानी सुनने में कोई रुचि नहीं थी । पूरा खेल मेरी समझ में आ चुका था । लेकिन इसके साथ ही कई सवाल भी उठ खडे हुये थे । जिनका कोई उचित तरीका मुझे नहीं सूझ रहा था । मैं आखिर दयाराम की सहायता करूं तो कैसे करूं ? क्या कुसुम अभी जीवित थी । मेरे ख्याल से नहीं । कुसुम की लाश जो अभी चल फ़िर रही थी । उसका क्या किया जाय । और सबसे बडी बात दयाराम को कैसे समझाया जाय कि मैं इस केस को हल करना चाहता हूं ?
ऐसे और भी अनेको प्रश्न थे । जिनका उस वक्त कोई सही हल मुझे नहीं सूझ रहा था । सुबह के चार बजने वाले थे । पूरब दिशा में रोशनी धीरे धीरे बडती जा रही थी । मैंने एक सिगरेट सुलगाया और कलियारी कुटी को देखते हुये आगे के कदम के बारे में सोचने लगा । साथ ही ये विचार भी स्वतः ही मेरे दिमाग में आ रहे थे कि इसी प्रथ्वी पर किसी किसी के लिये जीवन कितना रहस्यमय हो जाता है । ऐसे मकडजाल में फ़ंसा आदमी या कोई परिवार ये तय नहीं कर पाता कि करे तो आखिर क्या करे ? जाय तो किसके पास जाय । अक्सर लोग डर की वजह से ऐसी स्थिति का जिक्र भी अपने परिचय वालों से नहीं करते क्योंकि दूसरे लोग भयभीत हो जाते हैं । और भूत प्रभावित परिवार से सम्पर्क ही खत्म कर देते हैं कि कहीं भूत उन पर हावी न हो जाय । मुख्य इसी कारण की बजह से जो भी प्रेत घटनायें होती हैं वो लोगों की निगाह में नहीं आ पाती ।
दयाराम पत्थर की शिला पर लेटा हुआ निर्विकार भाव से आसमान की ओर देख रहा था । उसे थोडी देर इंतजार करने की कहकर मैं कलियारी कुटी की तरफ़ निगाह बचाकर चला गया ।( क्रमशः )

प्रेतनी का मायाजाल 6

लेखकीय -- प्रेत जगत पर आधारित मेरी कहानी " प्रेतनी का मायाजाल " आठ भागों में है । जो एक साथ ही प्रकाशित है । ये कहानी पाठकों की बेहद मांग पर लिखी गयी है ।
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मैं जब थोडी देर बाद लौटा तो दयाराम अपने स्थान पर नहीं था । अभी मैं पत्ते टहनिंया आदि जलाकर चाय बना ही रहा था कि दयाराम अंगोछे से हाथ पोंछता हुआ लौट आया । उसने बताया कि दिशा मैदान
( शौच निवृति ) हेतु चला गया था । इस स्थान पर गर्म चाय के साथ बिस्कुट देखकर उसे बेहद आश्चर्य हुआ । चाय की चुस्कियों के बीच मैंने उससे पूछा कि उसने कभी हनुमान बीसा का नाम सुना है ? उसने बेहद आश्चर्य से कहा कि हनुमान चालीसा तो उसने सुना है । हनुमान बीसा आज तक नहीं सुना । मैंने
कहा हनुमान बीसा एक गुप्त विध्या है । गुप्त बीसा है । जो बीस भूतों तक को भगा देता है । इसके बारे में मैं
कुछ थोडा बहुत जानता हूं । यदि उसके घर में भूतों की संख्या बीस या उससे कम हुयी तो शायद मेरा फ़ार्मूला काम कर जाय । अन्यथा देख लेने में क्या हर्ज था ? वास्तव में मैं मजाक कर रहा था । पर मजाक के अन्दाज में नहीं । मैं चाहता था कि दयाराम का काम भी हो जाय । और दयाराम मेरी असलियत भी न जान सके । दयाराम ने मेरी बात पर तो विश्चास नहीं किया । पर मेरे द्वारा उसके घर चलने की बात उसे स्वाभाविक पसन्द आयी । बीती रात में अपनी आपबीती सुनाते सुनाते वह मुझसे एक तरह की निकटता महसूस करने लगा था ।
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सुबह दस बजे हम दोनों उसके घर में मौजूद थे । हम जब घर में घुसे कुसुम बाथरूम में नहा रही थी । रूपलाल ने हमारे चाय नाश्ते का प्रबन्ध किया । दयाराम के बच्चे स्कूल जा चुके थे । कुसुम जब बाथरूम से बाहर आयी । उसने एक अजनवी की तरह मुझे देखा । मैंने दयाराम की निगाह बचाते हुये अश्लील भाव से उसे देखा । उसकी भूखी आंखों में एक अजीब चमक उभरी । स्पष्ट था कलियारी शमशान में हमारी भेंट के बाबजूद भी वो मुझे पहचान नहीं सकी थी । क्योंकि उस वक्त उसका पूरा ध्यान दयाराम पर ही रहा होगा । और उन्हें आशा भी नहीं होगी कि दयाराम कलियारी भी पहुंच सकता है । इस तरह वो दयाराम ही था या नहीं । ये भी वो पता नहीं कर पाये । क्योंकि आन लगे हुये क्षेत्र में न तो उनकी कोई विध्या काम कर सकती है । और न ही वो घुस सकते हैं । यदि रात में कुसुम और उसके साथी प्रेत को हमारे बारे में जानकारी हो जाती । तो शायद कुसुम कई दिन न लौटती । शायद कभी भी न लौटती । इस तरह रहस्य का रहस्य ही रहता ? और फ़िर उसका उद्देश्य क्या था । वह दयाराम परिवार से क्या चाहती थी । और कब तक उसके परिवार पर काबिज बना रहना चाहती थी ? इन सारे प्रश्नों का उत्तर मिलना संभव ही नहीं था ।
अब मेरे सामने तीन तरीके थे । कुसुम को बांध दिया जाय और घर का अस्थायी कीलन कर दिया जाय । इससे कुसुम घर से बाहर नहीं जा पायेगी । और घर में कोई प्रेत घुस नहीं पायेगा । इस स्थिति में कुसुम और दयाराम दोनों मेरी असलियत जान जायेंगे । दूसरी । कुसुम को पहले की ही तरह " फ़ील्ड " में खेलने दिया जाय । और उसी स्थिति में उसका शिकार किया जाय । इसमें मेरा काम आसान और गुप्त रूप से हो सकता था । मैं अपना काम भी करता रहता और किसी को पता भी नहीं चलता । तीसरा स्थिति को ज्यों का त्यों रहने दिया जाय । यानी प्रेतों को भी भरपूर रूप से आने दिया जाय और खुला खेल खेला जाय ।
ऐसा होता तो मुझे मजा आने वाला था । इन तीनों तरीकों को जरूरत के अनुसार अलग अलग रूप में भी लागू किया जा सकता था । पर सबसे बडी बात थी कि दयाराम की इस खेल में भूमिका कैसे शामिल करूं । और मैं अकेला ही काम करता हूं । तो दयाराम क्या सोचेगा ? वो मुझे क्या समझ रहा है और कितना विश्वास कर रहा है । ये सब समस्याएं थी । जिनका बडी साबधानी से मैंने हल निकालना था । और जितना हो सके । शान्त तरीके से इस खेल को खत्म करना था । तब मुझे एक ही तरीका फ़िलहाल उचित लगा । मैंने कुसुम को घर में बांध ( मन्त्र से ) दिया । और घर में प्रेतों का प्रवेश रोक दिया । और खाना खाने के बाद घोडे बेचकर सो गया । दयाराम भी सो रहा था ।
हम दोनों पूरी रात के जागे हुये थे । और आगे भी हमें जागना था ? दूसरी सबसे बडी बात थी कि बांधे जाने पर और प्रेतों के न आने पर कुसुम और प्रेतों का क्या रियेक्शन होना था । ये मैं देखना भी चाहता था । और मजा भी लेना चाहता था । मुझे केवल एक ही बात का डर था कि कुसुम एंड प्रेत पार्टी में कोई भी लग्गड ( ताकतवर ) प्रेत मेरे परिचय का निकल आया । तो प्रेत पार्टी मैदान छोडकर भाग जायेगी । और फ़िर मुझे मिशन कुसुम के लिये खामखां के अतिरिक्त प्रयास करने होंगे । जिनमें समय भी अधिक लगेगा । और दयाराम मेरी वास्तविकता निश्चय जान जायेगा । जिससे में यथासंभव बचना चाहता था ।
शाम छह बजे मैं उठा तो एकदम तरोताजा महसूस कर रहा था । दयाराम मुझसे पहले ही उठ चुका था । और मेरे जागने का इंतजार कर रहा था । शाम की चाय के बीच मैंने कहा । चरस के सुट्टे ही लगाते हो । या पीना पिलाना भी होता है । दयाराम मेरा आशय समझ गया । उसने बताया । सब इंतजाम है । दरअसल मैंने एक योजना बना ली थी । उस योजना के तहत पूरी रात मुझे कुसुम से ही काम लेना था । दयाराम की उसमें कोई भूमिका नहीं होनी थी । इसलिये मैं नशे में उसे इतना ओवर कर देना चाहता था । कि वो मेरे काम में कोई दखलन्दाजी न कर सके । और बेसुध सोता ही रहे । रूपलाल गली के पार स्कूल में सोता था । और बच्चों का अलग पोर्शन था । इसलिये दयाराम के धुत होते ही मैदान साफ़ हो जाना था । और मुझे इसी का इंतजार था । मैंने कुसुम का जायजा लिया । मेरी आशा के अनुरूप ही वह गडबड महसूस कर रही थी । और बेहद बैचेन थी । वह बार बार मुझे ही देख रही थी और सोच रही थी । कि इन बदली परिस्थितियों में मेरा कितना हाथ हो सकता है । और मैं कौन हूं । वह कंकाल कालिनी विध्या जानने वाली शक्तिशाली प्रेतनी मुझे हर एंगल से तौलने की कौशिश कर रही थी । और आश्चर्य से अपने को असमर्थ महसूस कर रही थी । क्योंकि उस वक्त मैं " कवर्ड " स्थिति में था । और साधारण था । ठीक वैसा ही हुआ । रात दस बजे तक । खाने और पीने के दौर में थोडी और । थोडी और करते हुये मैंने दयाराम को न सिर्फ़ काफ़ी पिला दी । बल्कि नशे के ही क्षणों में दो नींद की गोलियां उसकी दारू में मिला दी । अब मेरे गणित के अनुसार वह सुबह ही उठने वाला था । और इस तरह मेरे लिये मैदान एकदम साफ़ था । फ़िर भी मुझे एक विचार आया । और इसी विचार के तहत मैं ऊपर जाकर छत पर लेट गया ।
दयाराम नशे में धुत नीचे कमरे में ही सो गया था । अब मुझे सिर्फ़ प्रेतनी का इंतजार था । कुसुम का इंतजार था । कुसुम कहां हो सकती है ? ऐसे ही विचारों में खोया हुआ मैं आसमान के उन असंख्य तारों को देख रहा था । जिनके बीच लाखों करोडों प्रेत लोक थे । देव लोक थे । तान्त्रिक लोक थे । अन्धेरे लोक थे । अच्छे लोक थे । बुरे लोक थे । हर लोक का अपना एक अलग अन्दाज था । एक अलग रवैया था ।
मुझे एकान्त होते ही बाबाजी की याद हो आयी । नीलेश की याद हो आयी । नीलेश की कितनी इच्छा होती थी कि वो अधिकाधिक समय मेरे साथ गुजारे । बाबाजी के साथ गुजारे । पर ऐसा संभव नहीं हो पाता था । बाबाजी इन्हीं किन्हीं लोकों में हो सकते थे । या इस ब्रह्मांड के पार अन्य सृष्टि में भी हो सकते थे । चारों तरफ़ माया का अदभुत खेल फ़ैला हुआ था ।
तभी मेरी विचार श्रंखला को झटका लगा । मुझे किसी के ऊपर आने की आहट हुयी । और कुछ ही मिनट बाद कुसुम मेरे सामने थी । कैसा अदभुत खेल था । दयाराम पहले उसे प्रेत होने के बाबजूद पत्नी समझते हुये व्यवहार करता रहा । फ़िर वह जान गया कि पत्नी के रूप में कुसुम प्रेतनी है । फ़िर भी वह कुछ नहीं कर सका और उसे व्यवहार करना पडा । मैं पहले से ही जानता हूं कि मेरे पास खडी औरत प्रेतनी है । फ़िर भी मैं उससे व्यवहार करूंगा । ये अदभुत खेल नहीं तो और क्या था ?
कुसुम के पास आते ही मैंने बहाना करते हुये । चौंकते हुये । कौन है कहकर टार्च की रोशनी उसके ऊपर फ़ेंकी । जबकि आसपास जलती हुयी स्ट्रीट लाइट का हलका उजाला मौजूद था । कुसुम अपने पूरे बदन पर मात्र एक झीनी साडी पहने हुयी थी । उसके शरीर का प्रत्येक कटाव स्पष्ट झलक रहा था ।
" आइये कुसुम जी । " मैंने कोहनी और तकिये के सहारे अधलेटा होकर कहा , " नींद नहीं आ रही थी क्या ? जवान रातों में अक्सर जवान लोगों को नींद न आना एक आम बात है । तब जवान लोग किसी जवान लोग के पास किसी न किसी बहाने से पहुंच ही जाते है ? "
अंधेरे में उसकी आंखे किसी बिल्ली की तरह चमकी । उसने मेरी द्विअर्थी बात और अश्लील संकेत का कोई नोटिस नहीं लिया । वह तखत पर मेरे पास बैठ गयी । और कुछ निर्णय सा करते हुये बोली , " सच सच बताओ । तुम कौन हो ? मैंने तुम्हें पहले तो कभी नहीं देखा । "
" मैं एक चलता फ़िरता प्रेत हूं । " मैंने सीधे सीधे लाइन पर आते हुये कहा , " और जहां तेरी जैसी प्रेतनी जवानी की आग में जल रही होती है । उसको खोजकर पहुंच जाता हूं । "
" तुम प्रेत नहीं हो । " वह लगभग गुर्राकर बोली । " तुम एक तान्त्रिक हो । और मैं जानती हूं । तुमने ही मुझे बांधा है । तुमने इस घर को भी बांध दिया है । "
" अब तू जान ही गयी है । जानेमन । " मैंने ढीटता से कहा । तो मैं कर भी क्या सकता हूं । "
फ़िर मेरी आशा के अनुरूप ही उसने साडी उतारकर फ़ेंक दी । और एकदम निर्वस्त्र हो गयी । उसने अपने लम्बे बालों को हिलाते हुये रूप बदलने की असफ़ल को्शिश की । जिसमें वह नाकामयाब रही । और थोडी ही देर में हांफ़ने लगी ।
" जब तू । " मैंने हंसते हुये कहा । " जानती है कि बंधी हुयी है । फ़िर क्यों हाथ पांव मार रही है । "
वह जलती आंखो से मुझे घूरने लगी । और हथियार डालते हुये बोली , " आखिर तुम चाहते क्या हो "
" अब आयी न लाइन पर । " मैंने सिगरेट सुलगाते हुये कहा , " चल चुपचाप बैठ जा । प्रेतों से आग बुझाने का शौक है तुझे । इस हट्टे कट्टे आदमी में क्या तुझे कांटे नजर आ रहें है ? "
( क्रमशः )

प्रेतनी का मायाजाल 7

लेखकीय -- प्रेत जगत पर आधारित मेरी कहानी " प्रेतनी का मायाजाल " आठ भागों में है । जो एक साथ ही प्रकाशित है । ये कहानी पाठकों की बेहद मांग पर लिखी गयी है ।
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कोई आधा घन्टे तक मैं निर्विकार उससे बिना बोले लेटा रहा । इस बीच कुसुम ने मेरी परवाह न करते हुये अपने स्तनों पर स्वतः ही हाथ फ़िराया । और बार बार जीभ सेअपने सूखे होंठो को चाटने लगी । इसकीवजह थी । उसकी प्रेतक गतिविधियों का ज्यों ज्यों समय होता जा रहा था । वह बैचेनी महसूस कर रही थी । एक पुरुष का सामीप्य उसे और भी ज्यादा बैचेन कर रहा था । और वास्तव में मेरा उद्देश्य ही उसके अन्दर के प्रेतत्व को पूरी तरह जगाना था । मेरे पास पहले से तैयार पीपल की पत्तों युक्त टहनी थी । जिससे
मैं बीच बीच में उसके बदन पर बहुत हल्का प्रहार सा कर देता था । आखिरकार वो वक्त आ ही गया । जव वो पूरे प्रेत आवेश में हो गयी । मैंने बैठते हुये एक सिगरेट सुलगायी । और भरपूर धुंआ उसके मुंह पर फ़ेंका । उसके वक्षों पर फ़ेंका । और अन्यत्र उसके बदन पर फ़ेंका । वह एक कामुक अंगडाई लेती हुयी बेशर्मी से हंसने लगी । और मेरे बदन पर चडने की कोशिश करने लगी । वह बार बार मेरे अंग को छूने की चेष्टा करती । तब अंत में मैंने उसकी गंदले मटमैले रंग की मुर्दा आंखों में आंखे डाल दी । वह जोर जोर से झूमने लगी और अपने गालों छातियों पर प्रहार करने लगी । फ़िर मुझे गन्दी गन्दी गालियां देने लगी । गालियां देते हुये सम्भोग के लिये उकसाने लगी । पर मैंने उसकी किसी बात पर ध्यान नहीं दिया ।जैसे ही वह खडी हुयी । मैंने अभिमंत्रित पीपल की टहनी के भरपूर वार उसके शरीर पर किये और बोला , " अब बता । असली कहानी क्या है । और तू है कौन ? "
" मैं शारदा हूं । " वह सिसकियों के बीच बोली , " कुसुम की बडी बहन ? "
उसने जो बताया । वह मेरे लिये आश्चर्यजनक नहीं था । मुझे बहुत कुछ पहले से ही मालूम था । बस उस पर प्रेतनी की स्वीकारोक्ति का ठप्पा लगना था । जो वह लगा चुकी थी ।
शारदा युवावस्था से ही मनचले स्वभाव की थी और राजेश नाम के एक लडके को प्यार करती थी । उन दोनों के बीच शारीरिक सम्बन्ध भी थे । जो दयाराम से शादी से पहले और शादी के बाद भी बदस्तूर जारी रहे थे । दयाराम के साथ शादी का इतना लम्बा वक्त गुजर जाने के बाद । तीन बच्चे हो जाने के बाद भी । उसके दिल में राजेश ही बसता था । वह अपने पहले प्यार को कभी भुला न सकी थी । फ़िर दोनों की अलग अलग शादियां हो गयीं । इसके बाद भी राजेश गांव के नाम पर शारदा के घर आता रहा । और दयाराम के अधिकतर घर पर न रहने के कारण उनकी कामलीला निर्विघ्न चलती रही । लेकिन यह इश्क चौदह साल बाद खुल ही गया । जब दयाराम ने अचानक उनको सम्भोगरत देख लिया । इसके बाद भी घर बिगडने का ख्याल करते हुये उसने शारदा से तत्काल कुछ नहीं कहा और गुमसुम रहने लगा । पति से खुद की बेबफ़ाई और गलती के अपराधबोध से ग्रस्त होकर शारदा ने बिजली के तार से चिपककर जान दे दी । जिसे कि दयाराम दुर्घटना समझ बैठा था । इस अकाल मौत के बाद जब
वह लोखटा प्रेतों में भटक रही थी । दुर्गा सिंह नामक एक मसान पूजक तान्त्रिक ने उसकी शेष आयु
कंकाल कालिनी विध्या का उपयोग करते हुये किसी अपने की खातिर निकाल ली । और वह तिलमिलाकर रह गयी । सूक्ष्म शरीर में पहुंचने पर उसे ग्यात हुआ कि अभी वह गलती मानें । पश्चाताप करे तो शेष आयु के लिये फ़िर से जन्म ले सकती है । पर उसकी शेष आयु तो वो कमीना तान्त्रिक खत्म कर चुका था । अब प्रेत होकर भटकने के अलावा और कोई चारा नहीं था । तभी प्रेतो मे लपका नाम से प्रसिद्ध कामभोग का रसिया मसान उसे पकड ले गया और रखैल की तरह रखने लगा । वहीं उसने जाना कि दुबारा वह फ़िर से शरीर प्राप्त कर सकती है । पर इसके लिये उसे किसी जीवित औरत को उसके शरीर से निकालना होगा । शारदा प्रेत के रूप में अक्सर हवेली पर आती रहती थी । उसे अपने बच्चों और घर से भी मोह था । जो उसने मरने के बाद जाना । उसने सोचा कि किसी तरह वह दोबारा ही इस घर में आ सके तो कितना अच्छा हो । लेकिन प्रेत जिंदगी में होने के कारण प्रेतों के गुण भी उसके अन्दर तेजी से आ रहे थे । तभी उसे पता चला कि दयाराम दुबारा से कुसुम से शादी कर रहा है । उसके मन में एक खतरनाक योजना आयी । उसने लपका के सहयोग से कुसुम के शरीर को प्राप्त करने का निश्चय
किया । पर लपका किसी भी हालत में उसे बिलकुल छोडने को तैयार नहीं था । तब शारदा ने कहा कि वह दयाराम के घर को भ्रष्ट कर देगी और इस हालत में प्रेत आराम से हवेली में आ जा सकेंगे । और कुछ समय बाद वह भी रात में शमशान में आने लगेगी । क्योंकि वह भी प्रेत जीवन की अभ्यस्त हो चुकी थी । लपका राजी हो गया । और उसे कंकाल कालिनी के तरीके बताने लगा । आखिरकार वह दिन आ ही गया । जब दयाराम कुसुम को विदा कराकर ला रहा था । प्रेतवासा की अभिशप्त बगिया से पहले ही लपका ने दयाराम का दिमाग फ़ेर दिया और दयाराम मोटर साइकिल बगिया में ले आया और कुछ ही देर में रहस्यमय नींद में चला गया । तब प्रेतों ने कुसुम के दिमाग पर कब्जा करना शुरू किया । और उसे जोहड के पानी में डुबोकर मार डाला । शारदा लपका के सहयोग से कुसुम के शरीर में घुस गयी ।
" लेकिन । " मैंने कहा , " कुसुम कहां गयी ? "
कुसुम काली टेकरी के आसपास रहती है । और सच्चाई जानने के बाद मुझसे नफ़रत करती है । पर हम प्रेतों में नफ़रत मुहब्बत की बाते मायने नहीं रखती । यहां सब जायज है । वाला खेल चलता है । प्रेतों और इंसानी रिश्तों के बीच इसी तरह के सम्बन्ध रहते हैं । यह इंसानो को अजीव लग सकता है । पर प्रेतों को नहीं । इसके बाबजूद भी प्रेतों में अच्छी आत्माएं भी होती हैं जो किसी का बुरा नहीं करती । दरअसल मरने से पहले जो स्वभाब मनुष्य का होता है । प्रेत बनने के बाद उसमें और भी दुर्गुण समा जाते हैं । पेट की भूख और योनि की भूख जब इंसान से क्या क्या नहीं कराती ? तो प्रेतों के तो साधन फ़िर भी सीमित होते हैं । पेट की भूख के लिये प्रेत भोजन से उडने वाली खुशबू को आहार के रूप में ग्रहण करते हैं । और योनि की भूख हेतु अनेको उपाय होते हैं । "
" अगर । " मैंने जानते हुये भी बीच में ही उसे टोकते हुये कहा , " जो खेल तूने कुसुम के साथ लपका के सहयोग से मिलकर खेला । वही खेल दुबारा से कुसुम खेलना चाहे । तो वापस अपने शरीर को प्राप्त कर सकती है ? "
" हां । " वह बोली , " पर वह शरीर इंसानी शरीर नहीं होगा । बल्कि एक मुर्दा शरीर में प्रेतात्मा ही होगी । इस तरह के शरीर के नियम कायदे बेहद अलग हैं । उसे इंसान और प्रेतों दोनों से वास्ता रखना होगा । शुरुआती अवस्था में ऐसे औरत शरीर से सम्भोग करने पर उसके बच्चे तो हो जाते हैं । पर वे जीवित नहीं रहते । ये बडी विचित्र बात है कि वह शरीर जिंदा भी होता है और नहीं भी होता । जैसे इस वक्त कुसुम का ये शरीर महज एक लाश है । इसकी पहचान ये है कि यदि इसको छेदकर यदि खून निकाला जाय । तो पीले मटमैले रंग का द्रव निकलेगा । "
" वास्तव में । " वह सिसकती हुयी बोली , " इंसानी शरीर की चाहत ने मुझे अन्धा कर दिया था । जिसके चलते मैंने अपनी निर्दोष बहन के साथ धोखा किया । जबकि ये शरीर मामूली और कामचलाऊ उपयोग का ही होता है । एक प्रेत को इससे भोजन और सहवास की पूर्ति अवश्य मिलती है । लेकिन इस शरीर के साथ बरताव करने की परेशानियां भी कम नहीं हैं ...यह असल जिन्दगी जैसा नहीं है । मैंने अपनी बहन का घर और जिंदगी भी बरबाद की और मुझे वो लाभ भी नहीं मिला जो मैं समझ रही थी । "
" अब । आखिरी सबाल । " मैंने उसके स्तन को टहनी से छूते हुये कहा , " इस घर को कैसे छोडेगी ? "
वह अचानक क्रुद्ध होकर मुझ पर झपटी । मैंने एक झन्नाटेदार थप्पड उसके मुंह पर मारा और टहलता हुआ छत की बाउंड्री के पास आ गया । मैंने सडक के पार स्कूल के सामने खडे बरगद पर निगाह डाली । जिस पर तीन प्रेत मौजूद थे । और आश्चर्य से हवेली की ओर बार बार देखते थे । पर हवेली बंधी होने के कारण वह न तो हवेली के अन्दर आ सकते थे और न ही देख सकते थे । यही हालत हवेली के अन्दर कुसुम ( शारदा ) की थी ।
शारदा बार बार मुझसे मुक्त करने के लिये गिडगिडा रही थी । और विश्वास दिला रही थी कि जल्दी ही लौट आयेगी । मैंने रहस्यमय अन्दाज में कहा । कल में हमेशा के लिये उसे मुक्त कर दूंगा । उसके बाद तखत को सीमारेखा में बांधकर मैं निश्चिंत होकर सो गया । अब शारदा मुझे किसी प्रकार से डिस्टर्ब नहीं कर सकती थी । और घर से बाहर भी नहीं जा सकती थी । वह क्या सोच रही थी । इससे मुझे कोई लेना देना नहीं था । मेरी पूरी सहानुभूति कुसुम के साथ थी । जो सूक्ष्म शरीर के असह्य कष्ट भोग रही थी । पर इसमें स्थायी रूप से कोई भी तान्त्रिक शक्ति किसी प्रकार का बदलाब नहीं कर सकती थी ।

प्रेतनी का मायाजाल 8

लेखकीय -- प्रेत जगत पर आधारित मेरी कहानी " प्रेतनी का मायाजाल " आठ भागों में है । जो एक साथ ही प्रकाशित है । ये कहानी पाठकों की बेहद मांग पर लिखी गयी है ।
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दूसरे दिन दयाराम के जगाने पर मेरी नींद खुली । वह चाय की प्याली के साथ मेरे सिरहाने मौजूद था । और मेरे ऊपर आकर लेटने पर आश्चर्य महसूस कर रहा था । चाय पीने के बाद मैंने सिगरेट सुलगायी ।और आने वाली रात में उसकी प्रेत समस्या को जड से खत्म करने का निश्चय कर लिया । अब सारा काम आसान ही था । आज शाम को मैं शारदा को मुक्त करता । और फ़िर किसी बहाने से रिवाल्वर के साथ
दयाराम को काली टेकरी ले जाता । शारदा जो कि मेरी कैद में थी । उसको मानसिक आदेश देकर बुलाता । और उसे रूप बदलने पर विवश करता । इसके बाद दयाराम उस अनोखे जानवर को गोली मार देता । जो कि उस दिन उडन छू नहीं हो सकता था और....?
दयाराम उस दिन अपने आपको बेहद प्रसन्नचित्त महसूस कर रहा था । इसका कारण वह स्वयं भी नहीं जानता था । पर मैं जानता था । एक तो वह जब से मेरे साथ था । प्रेत के प्रभाव से प्रभावित नहीं हुआ था । दूसरे वह सालों बाद गहरी नींद सोया था । जिसमें शराब और नींद की गोली की महत्वपूर्ण भूमिका थी । एक क्षण के लिये तो ऐसा लग रहा था । उसे किसी प्रकार की कोई परेशानी है ही नहीं । उसको और अधिक टेंशन फ़्री करने के लिये मैं घुमाने के बहाने नदी के किनारे ले गया । जहां मुझे कुछ आवश्यक कार्य करने थे । दयाराम स्वभाव अनुसार अपने बारे में बताता रहा । जिसको मैं नकली हूं हां करते हुये सुनने का बहाना करता रहा । और अपने कार्य में लगा रहा । दयाराम इस बात से अनभिग्य ही रहा कि मैं कर क्या रहा हूं । एक तो वह अपनी बातों में मस्त था । दूसरे मुझे जमीन आदि पर नुकीली लकडी द्वारा रेखायें खींचते और तन्त्र आदि बनाते हुये देखकर उसने यही सोचा कि मैं जीव जन्तुओं की खोज से सम्बन्धित कोई कार्य कर रहा हूं । वास्तव में तो वह अन्दाजा भी नहीं लगा सकता था कि
उसका कितना बडा काम हो चुका था और कितना होने बाला था । कोई एक बजे मेरा पूरा कार्य खत्म हो गया । लपका मसान इस स्थान पर आज रात के लिये बंध चुका था और काली टेकरी पर वह मुझे या खासतौर पर दयाराम को डिस्टर्ब नहीं कर सकता था । ऐसा मुझे इसलिये करना पडा क्योंकि कल रात कुसुम के बाहर न जाने से लपका को दाल में काला लग सकता था और हवेली के बंधे होने पर तो उसका पक्का यकीन ही हो गया होगा । इसलिये शाम को जब में कुसुम रूपी शारदा को मुक्त करता तो लपका उस समय खामखाम में फ़टे में टांग अडाता । और तब मुझे खुलकर लडाई लडनी पडती । और इस तरह एक फ़ालतू का बखेडा होता । जिससे मैं बचना चाहता था । और दूसरे इस रात का पूरा पूरा समय मैं कुसुम की खातिर खर्च करना चाहता था । जिससे मुझे पूरी सहानुभूति थी ।
वहां से निपटने के बाद मैं दयाराम के साथ बाजार गया । और हनुमान बीसा ? का चमत्कार दिखाने का बहाना करते हुये मैंने कुछ जरूरी सामान खरीदा । दयाराम मेरी बातों पर हंस रहा था पर न जाने किस भावना से प्रेरित होकर मेरा कहना मान रहा था । उसे दरअसल दिलचस्पी थी कि आखिर मैं क्या करने वाला हूं ?
शाम को पांच बजे के लगभग मैंने शारदा पर से बंध हटा लिया । वह नौ बजे तक बैचेन होकर इधर उधर घूमती रही और फ़िर अहाते में जाकर उसकी बाउंड्री कूदकर गायब हो गयी । मैं एक रहस्यमय अन्दाज में मुस्कराया । और वापस कमरे में आकर दयाराम के पास बैठ गया । जो टी. वी के सामने दारू की बोतल खोले मेरा इंतजार करता हुआ टी. वी. देख रहा था । मैंने मना कर दिया । पूजा की वजह से न आज मैं पियूंगा । और न ही वो पियेगा ।
ठीक ग्यारह बजे मैं दयाराम के साथ काली टेकरी पर मौजूद था । कुसुम अपने सूक्ष्म शरीर के साथ गुमसुम सी आम की डाली पर बैठी थी और न जाने कब से भूखी थी । मैं उसको देख सकता था । वह भी मुझे देख सकती थी । लेकिन ये नही जान सकती थी कि मै उसको देख रहा हू । पर दयाराम इस रहस्य को नहीं जान सकता था । कुसुम की उस दशा पर मेरी भी आंखो में आंसू आ गये । मैंने उसी डाली के नीचे देशी घी में चाबल आदि खाद्ध पदार्थ भरपूर मात्रा में मिलाकर आग जलाकर एक कटोरे में रख दिये । दयाराम हैरत से मेरी कार्यवाही देख रहा था । कुछ ही देर में सुगन्धित धुंआ खुशबू के साथ उडकर कुसुम के पास जाने लगा । उसे बेहद आश्चर्य हुआ । पर भूख से व्याकुल होने की वजह से वह इस तरफ़ से ध्यान हटाकर प्रेत आहार ग्रहण करने लगी । मैंने दयाराम की आंख बचाकर अपनी नम आंखों को पोंछा । पौने बारह बज चुके थे । अब मुझे शारदा का इंतजार था । मैंने मानसिक आदेश उसको दिया । लगभग दस मिनट बाद ही एक नंगी औरत लगभग उडने के अन्दाज में काली टेकरी पहुंची । मैंने अभी अभी दयाराम से लिया हुआ रिवाल्वर साबधानी से पकड लिया । और एक निगाह भोजन से त्रप्त होकर
बैठी हुयी कुसुम पर डालकर मन ही मन कहा । कुसुम चार साल से भटकती और तडपती तेरी आत्मा आज निश्चय ही शान्ति को प्राप्त होगी । जब तू अपनी कमीनी बहन का अन्जाम अपने आंखों से देखेगी । हे निर्दोष आत्मा तू नहीं जानती । इतना सारा खेल मैंने तेरी आंखों के सामने ही करने के लिये इतना बडा नाटक रचा । वरना शारदा जैसी कुतिया तो कलियारी कुटी से ही दफ़ा हो जानी थी । मैं उसी वक्त समझ गया था कि दयाराम से ज्यादा तू भुगत रही है । मैं तेरे लिये जितना मुझसे बन पडेगा । करूंगा । शाय़द ऐसा ही होना हो । शायद ऐसा ही लिखा हो । शायद वो मुझे निमित्त बनाकर ऐसा ही चाहता हो ...।
अगला दृश्य दयाराम के लिये पूर्व परिचित था । नंगी मुर्दा औरत चिता वाले स्थान पर लोटने लगी । और लोमडी और सियार की मुखाकृति वाले छोटे जीव में बदलने लगी । मैंने रिवाल्वर वाला हाथ सीधा किया । मेरे मुंह से निकला । अलविदा शारदा । और मैंने घोडा दबा दिया । गोली की आवाज सन्नाटे को चीरती चली गयी । मायावी जानवर की कांय कांय मुश्किल से आधा मिनट हुयी । और फ़िर वहां कुसुम की निश्चल लाश नजर आने लगी । दयाराम हैरत से मुंह फ़ाडे मेरी तरफ़ देखता रह गया । मैंने आम की डाली पर बैठी कुसुम पर नजर डाली । पर वो वहां नहीं थी । मैंने मुडकर देखा । वह दूसरी तरफ़ खडी थी । उसके चेहरे पर गहन संतुष्टि के भाव थे । और वह अजीब नजरों से मुझे देख रही थी ।
खुद दयाराम का यही हाल था । वो हक्का बक्का होकर मुझे देख रहा था । पर मेरे पास ऐसी बातों के लिये वक्त नहीं था । अभी बहुत काम करने थे । मैंने दयाराम के सहयोग से कुसुम की लाश उठाई और पहले से ही सूखी पत्तियों और टहनी से भरे एक गड्डे में पत्तों के बीच दबा दी । इसके साथ ही मैंने मोटर साइकिल पर थैले में बंधे सामान से दस किलो देशी घी गडडे में डाल दिया । और माचिस से एक पलीता जलाता हुआ दयाराम को देकर बोला , " अपनी पत्नी का अंतिम संस्कार करो दयाराम । "
दयाराम ने आंसू बहाते हुये पत्तों को आग लगा दी । मैंने टेकरी के पास पडी दो मोटी पिंडियों को दयाराम के सहयोग से उठाकर गड्डे में डाल दिया । लगभग चार साल पहले मृत्य को प्राप्त हुआ मुर्दा धू धू कर जलने लगा ।
******
अगली सुबह कलियारी कुटी जाने के स्थान पर मैं चेन्नई के लिये रवाना हो गया । अपनी साधना को कुछ दिनों हेतु टालना जरूरी हो गया था । दयाराम निश्चित ही मेरी खोज में दुबारा वहां जाता । जो कि मैं किसी कीमत पर नही चाहता था । कुसुम का मैं पक्का इंतजाम कर चुका था । उससे सम्पर्क करके मैंने उसे अपनी असलियत बता दी थी । और उसके किसी शान्त प्रेत लोक में पहुंचाने का वादा कर दिया था । जहां उसे कोई परेशान नहीं करता । जहां उसके भोजन की कोई समस्या नहीं होती । लेकिन जब तक ऐसा नहीं होता । तब तक के लिये मैंने उसे कुछ तरीके बताये । जिनसे वह आराम से रह सकती थी । कुसुम के अचानक गायब होने का उपाय दयाराम को मैंने ये बताया था कि उसके घर फ़ोन कर देना कि घर से लडकर चली आयी है । फ़िर उसके गायब होने की रिपोर्ट लिखा देना । और उसके बाद अखवार में गुमशुदा की खोज । इसके कुछ ही दिनों में मामला समाप्त । शारदा से मुझे कोई सहानुभूति नहीं थी । उसने मुझसे पूछा । मैं क्या करूं ? मैंने कहा । भाड में जाओ ।
दयाराम न चाहते हुये भी बहुत कुछ समझ चुका था । वह मेरा फ़ोन न . और घर का पता जानने की बार बार जिद कर रहा था । जिसे मैंने अगली बार बताने का वादा किया । वह अगली बार कभी नहीं आनी थी । आखिर में बेहद रिकवेस्ट करते हुये उसने पूछा , " कम से कम इतना तो बता ही दो कि आखिर तुम हो कौन ? "
" आय एम प्रसून । ओनली प्रसून । " मैंने हंसते हुये कहा । और गाडी आगे बडा दी ।( समाप्त )

सोमवार, जुलाई 12, 2010

बदला । बदला ।

अगर किसी भी चरित्र के एक ही पक्ष का मूल्यांकन करें । तो फ़िर तो कोई बात नहीं । जैसा उसके बारे में कहा गया होगा । वैसा ही प्रतीत होगा । लेकिन अगर हम सामाजिक मर्यादा और उच्च आदर्शों के नियम से उसकी तुलना करें । तो बहुत कुछ अलग होगा । अब रामायण को लें । राम । लक्ष्मण । भरत । आदि चरित्रों की बात करते ही हमारे अन्दर भरी गयी रेडीमेड श्रद्धा जाग उठती है । और हम नतमस्तक होने लगते हैं । पर इन चरित्रों ने ऐसा कौन सा बङा तीर मारा । जो एक सज्जन आदमी नहीं करता । हमें ये विचार नहीं आता । क्योंकि भक्ति और भगवान हमारे अन्दर इस तरह ठूंस
ठूंसकर भरे गये हैं । कि जैसी तोता रटन्त हमें सिखायी गयी है । उससे परे जाकर हम नहीं सोच पाते । अब " मर्यादा पुरुषोत्तम " कहलाये राम को लें । राम के चक्कर में पूरे खानदान की तारीफ़ स्वतः हो जाती है । कैकयी द्वारा वनवास केवल राम के लिये माँगा गया था । सीता जी चौदह वर्ष पति से अलग कैसे रहूँगी ? यह सोचकर । और विभिन्न प्रकार के तर्क और हठ कर राम के साथ ही चली गयीं । कुछ जद्दोजहद के बाद लक्ष्मण भी साथ हो गये । उर्मिला को किस बात का दन्ड मिला ? उसे भी ले जाते ।राम पिता की (आधी) आग्या मानकर सपत्नीक वन को चले गये । साथ में सेवा करने वाला भाई भी था । कैकयी तो सिर्फ़ राम का वनवास चाहती थी । तो माता की आग्या । का कोई अर्थ नहीं था ?
राम को कौशल्या । सुमित्रा । उर्मिला । और पूरी अयोध्या की जनता की भावनाओं से कोई लेना देना नहीं था । सिर्फ़ पिता की आग्या का ही महत्व था । और अपनी पत्नी तो साथ जा ही रही थी । अगर आग्या " पत्थर की लकीर " की तरह मानना था । तो अकेले जाना था । दशरथ । कौशल्या । सुमित्रा । और यहाँ तक कैकयी भी ये बात नहीं चाहती थी कि सीता वन को जाय । लेकिन ऐसा होता । तो राम को दिक्कत होती ? तो फ़िर ये निरी आग्या वाली बात कहाँ रह गयी । ये तो स्वेच्छा हुयी ।
भरत को वर के अनुसार राजगद्दी पर बैठना था । यह पिता का वचन था । और माता की इच्छा थी । भरत ने दोनों में से किसी का कहना नहीं माना । राम ने सिर्फ़ पिता की आग्या को महत्व दिया । जबकि बाद में दशरथ ने भी कह दिया कि तुम मेरी आग्या मानने से इंकार कर दो । पूरी अयोध्या नहीं चाहती थी कि राम वन को जाँय । लक्ष्मण ने कई स्थानों पर दशरथ को बूढा । कामी और सठियाया हुआ बताया है । भरत के प्रति भी लक्ष्मण के भाव अच्छे नहीं थे ( देखें वाल्मीक रामायण ) एक स्थान पर राम कह रहें हैं । बादल बरस रहें हैं । मुझे सीता की याद आ रही है..वो दिन कब होगा जब सीता जैसी सुन्दरी मेरे सीने से लगी होगी ? लक्ष्मण विचारे को उर्मिला की याद नहीं आती होगी ? बाली का प्रश्न देखिये कितना महत्वपूर्ण है । जिसका राम के पास जबाब ही नहीं था । मैं बैरी । सुग्रीव पियारा । कारण कवन । नाथ मोहि मारा । यानी राम तुम्हारे लिये तो सब समान है । फ़िर मुझे क्यों
मारा । और वो भी छुपकर ? अरे वो हम भाईयों का झगङा था । तुम्हें क्या मतलब । और मतलब था । तो मारने जैसा निर्णय सीधा सीधा ले लिया । मध्यस्थता करके भी तो मामला सुलझाया जा सकता था । निश्चित ही बाली अपने भाई को प्यार करता था । वो तो उसे महाबली दैत्य के चक्कर में कुछ गलतफ़हमी हो गयी थी ।आप गौर करें कि रावण से युद्ध के समय राम ने कितनी बार सुलह समझौते के लिये दूतों को भेजा । तो राम बाली से एक बार भी नहीं कह सकते थे कि भाई तुम दोनों भाईयों के बीच गलतफ़हमी हो गयी है ? यहाँ यह भी महत्वपूर्ण है । कि बाली जब दैत्य को मारकर लौटा तो सुग्रीब तारा को बाली को युद्ध में मरा बताकर अपने साथ रखने लगा था । और बाली की मृत्यु के बाद फ़िर से उसने तारा को अपने साथ रखा था ।उस समय की वानर जाति के लिये ये कोई
बहुत हल्ला मचने वाली बात नहीं थी । तब से लेकर आज तक करोङों ऐसे उदाहरण मिल जायेंगे । जब बङे भाई ने छोटे भाई की पत्नी को " पत्नी " के समान रखा । और छोटे भाई ने बङे भाई की पत्नी को " पत्नी " के समान रखा । किसी एक भाई के हमेशा के लिये चले जाने या मर जाने की बात छोङो ।
बहुत लोग तो आमने सामने मौजूद होते हुये ऐसा कर रहें हैं । उनका वध कौन करेगा ? राम ने बालि को मारने का कारण ये बताया था । अनुज वधू । भगिनी । सुत नारी । रे सठ । कन्या सम । ए चारी । इन्हें कुदृष्टि । विलोके जोई । ताहि हने । कछु पाप न होई । अर्थात छोटे भाई की पत्नी । बहिन ।और पुत्रवधू इनका कन्या के समान विचार किया गया है । इन्हें काम दृष्टि से देखने वाले को मारने पर पाप नहीं लगता । यहाँ राम ने अग्रज वधू यानी भाभी की बात नहीं कहीं । क्योंकि बालि ने तो सुग्रीव की पत्नी को पत्नी की तरह एक बदले के रूप में रखा था । सुग्रीव तो तारा को पहले ही रख चुका था । मजे की बात ये है कि राम ने एक बङे और समर्थ आदमी की तरह उस वक्त टाल
मटोल और तर्क वितर्क करके बात दबा अवश्य दी । पर " महाप्रभु " के विधान के अनुसार जैसे को तैसा मिलता अवश्य है । उस वक्त तो बाली उस प्राणघातिनी शक्ति से मर गया । अतः बदला नहीं ले सकता था । लेकिन " निरंजन " ने राम के बाद द्वापर में जब श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया । तो इसी बाली ने बहेलिया के रूप में जन्म लेकर कृष्ण को अंतिम समय में तीर मारकर बदला पूरा किया ।यहाँ कुछ लोग ये भी कहते हैं कि तीर के घाव से श्रीकृष्ण को गेंगरीन हो गया था । जिससे उनका देहत्यागन हुआ था । पर मैं इस बात से सहमत नहीं हूँ । और तुलसी रामायण ये कह रही है । कि राम के हाथों मरने के बाद बाली मोक्ष को प्राप्त हो गया । मोक्ष को प्राप्त होने के बाद भी बाली में बदले की भावना बनी ही रही । और उसने द्वापर में जन्म लेकर बदला चुकाया । ये कैसा मोक्ष था ?
राम के " बलप्रयोग " का एक और नमूना देखिये । जब समुद्र ने उन्हें लंका में जाने हेतु रास्ता नहीं दिया । तो राम समुद्र को शस्त्र विधा आदि से सुखाने पर आमादा हो गये । यहाँ भी निर्बल और जबर की सौदा थी । समुद्र राम के आगे कमजोर पङा । और उसे अपने ऊपर " सेतु " के निर्माण के लिये मंजूरी देनी पङी । यह समुद्र के आचरण और स्वभाव के विपरीत था । बंधने पर उसकी समुद्र वाली हैसियत समाप्त हो गयी । उस समय तो समुद्र दब गया पर समुद्र भी बदले की ताक में था । जब कोई मौका नहीं मिला तो उङीसा के राजा ( कलियुग में ) समुद्र के किनारे जगन्नाथ मन्दिर बनबाना चाहते थे । समुद्र राम से बहुत पहले का खार खाया बैठा था । उसने तीन बार आधे बन
चुके मन्दिर को अपनी ताकतवर लहरों से नष्ट कर दिया । राजा बेहद चिंतित हुआ । उसे कोई मार्ग नहीं सूझ रहा था । तभी कबीर साहब वहाँ पहुँच गये । राजा ने अपनी समस्या बतायी ।
तो कबीर ने समुद्र से बात की । समुद्र ने बताया कि राम से मैं त्रेता से ही चिङा बैठा हूँ । कबीर राजा को वचन दे चुके थे । अतः उन्होंने समुद्र को आग्या दी कि बदले के रूप में तुम द्वारिकापुरी को डुबो दो । पर मन्दिर बन जाने दो । समुद्र जानता था । कबीर का आदेश किसका आदेश है ? अतः उसने द्वारिका डुबोकर बदला पूरा किया । एक बात तो निश्चित है । थोङे समय के लिये किसी को दबा अवश्य लो । पर वो अपना बदला लिये बिना नहीं मानेगा ?
अब चलते चलते इसी संदर्भ में एक बात याद आ रही है । महाभारत के युद्ध के दौरान श्रीकृष्ण ने कहा कि युद्ध के परिणाम अच्छे नहीं होंगे । युद्ध में वीरगति को प्राप्त सैनिकों की विधवाएं वासना पूर्ति हेतु इधर उधर रुख करेंगी । तो इससे समाज में वर्ण संकरता आयेगी । उनके संतान भी अवैध होगी । वर्ण संकरता के सही मायने देखें । तो सबसे पहले श्रीकृष्ण ही वर्ण संकर थे । किसी ने जन्म दिया । किसी ने पाला । और पालने वाले को भी असलियत पता नहीं कि ये किसका बच्चा है ? इससे बङी वर्ण संकरता क्या होगी । ये सब कहने का मेरा अभिप्राय क्या है । कि राम कृष्ण कोई मामूली चीज थे ? या अपने स्तर पर गलत थे । हरगिज नहीं । मैं " रावण " को गलत नहीं मानता । तो राम इत्यादि तो बेहद अलग हैं ।
जरा सोचिये । इन चरित्रों के बारे में हम वाल्मीक रामायण या तुलसी रामायण से ही जानतें हैं । तो इनमें लिखी हुयी बात एक पक्षीय भी हो सकती है । इसलिये आँखे बन्दकर । ताली बजाते हुये । राम राम करते हुये । इन्हें पढने से कोई लाभ नहीं होने वाला । वाल्मीक और तुलसी भी तुम्हारी तरह आदमी ही थे । दूसरी बात जब आप वाल्मीक रामायण और तुलसी रामायण पढेंगे तो दोनों के भाव में खासा अंतर होगा । पर दिमाग की खिङकी खुली रखकर पढें तो ?

रविवार, जुलाई 11, 2010

क्या है । तैतीस करोङ देवताओं का रहस्य..?

आपने देखा होगा । हिंदू धर्म का उपहास एक बात के लिये विशेष तौर पर किया जाता है । वह है । इस धर्म में तैतीस करोङ देवताओं की मान्यता होना । जिसको प्रायः अन्य धर्म वाले तैतीस करोङ भगवान भी कह देते हैं । हैरत की बात है । स्वयं बहुसंख्यक हिंदू ही इसे पाखंड या पोपलीला कहते हैं । मुझसे कुछ " पाठकों " ने पूछा भी है । कि क्या मैं तैतीस करोङ भगवानों की पूजा करता हूँ ? वास्तव में तैतीस
करोङ देवता हरेक धर्म में हैं ? कैसे ये आगे पढकर आपकी समझ में आ जायेगा । पहली बात तो यही समझिये कि भगवान और देवता में बहुत अन्तर होता है । देवता का अर्थ देने वाला है । यानी सरलता से समझने के लिये ये भगवान का वो कर्मचारी है । जिसके जिम्मे अपने विभाग को सुचार रूप से चलाना है । जैसे जल देवता । आपने किसी को जल भगवान कहते सुना है ? जैसे वायु देवता । कोई वायु भगवान
कहता है ? जैसे सूर्य देवता । यहाँ थोङा फ़र्क है । सूर्य क्योंकि बङा देवता है । इसलिये इसे शास्त्रों में तथा कई स्थानों पर रिषी मुनियों आदि ने भगवान कहा है । गायत्री उपासक भी इसको महत्व देते हैं । आपने एक चीज देखी होगी । बाजार आदि में जब कभी हमारा पाला पुलिस वाले से पङता है । तो दीवान । हवलदार कांस्टेबल से अक्सर बहुत से लोग " दरोगा जी " कह देते हैं । तो क्या वो दरोगा हो जाता है ? अब मैं उन लोगों से एक बात पूछता हूँ । जो तैतीस करोङ देवताओं का रोना रोते हैं । कहाँ होती है । तैतीस करोङ देवताओं या तैतीस करोङ भगवानों की पूजा ? आप जानते हैं । तैतीस करोङ देवता कौन से हैं ? तैतीस लाख ही बता दीजिये ? चलिये हवा खराब हो गयी । तो तैतीस हजार ही बता दीजिये ? वास्तविकता ये है । कि तैतीस देवता बताने में भी आपको पूरे अक्ल के पेच घुमाने पङेंगे ? लेकिन यह अकाटय सत्य है । कि तैतीस करोङ देवता हैं ? और केवल हिंदू नहीं मुसलमान सिख ईसाई अमेरिकन से लेकर चूहा बिल्ली और आदि मानव तक के तैतीस करोङ देवता हैं । लगता है । आपके दिमाग में परमाणु बम का विस्फ़ोट हो गया । जो भी जीव है । देहधारी है । उसका वास्ता तैतीस करोङ देवताओं से पङना ही पङना है । अब मान लो हिंदू तो तैतीस करोङ देवताओं के लिये रजिस्टर्ड हैं ही । मुसलमान या अन्य धर्म के लोग इनसे कैसे जुङते हैं । एक मोटा उदाहरण मैं आपको बताता हूँ । ज्यादातर लोग ये समझते हैं कि मुसलमान सिर्फ़ अल्लाह या खुदा के अतिरिक्त किसी को नहीं मानते ।लेकिन जो लोग मुसलमानों को थोङा करीब से जानते हैं । उन्हें बखूबी मालूम है । कि मुसलमानों में भी सूर्य ( आफ़ताब ) चन्द्रमा ( माहताब ) का उतना ही महत्व है । जितना हिंदू या अन्य जातियों में । यहाँ मजे की एक बात और विचारणीय प्रश्न ये भी हैं कि ज्यादातर मुसलमान या यहूदी या संसार का कोई भी धर्म एक बात समबेत स्वर में कहता है । कि भगवान । अल्लाह या गाड वास्तव में एक ही है । और ये सब उसी की सत्ता है । और जब वह एक ही है । और उसी की सत्ता है । तो ये तैतीस करोङ उसके कर्मचारी हैं । अब तैतीस करोङ या तैतीस लाख को छोङकर थोङी देर के लिये तैतीस भगवान ही मान लेते हैं । और एक वो जो सबका है । इस तरह ये चौतींस हो गये । अगर चौतीस महाशक्तियाँ कार्यरत होती ? तो उनका सत्ता के लिये झगङा नेताओं के झगङे को भी पीछे छोङ देता । तैतीस करोङ देवता । वास्तव में तैतीस करोङ आवृतियाँ हैं । जिनका छोटा बङा देवता नियुक्त हैं । आपको जो उल्टी आती है । इसका भी देवता है । आपको डकार आती है । आपको पाद आता है । आपको जम्हाई आती है । आपके अन्दर " काम " जागता है । आपके अन्दर संगीत प्रेम जागता है । आपको कब्ज हो जाती है । आपको बुखार आ जाता है । आपको मामूली फ़ुंसी हो जाती हैं । आप दया करते हैं । आप क्रोध करते हैं ।इन सबका एक एक देवता नियुक्त है । ऐसी सब कुल मिलाकर प्रत्येक इंसान के अन्दर तैतीस करोङ आवृतियाँ बनती हैं । जिन्हें सरल भाषा में क्रिया भी कह सकते है । आप जो हाथ फ़ैलाते और सिकोङते हैं । इतनी ही बात के दो देवता है । इस तरह प्रत्येक इंसान तैतीस करोङ देवताओं को आश्रय दे रहा है । तैतीस करोङ देवताओं की पूजा या भोग की बात कैसे प्रचलन में आयी वो भी बताता हूँ । आपने धर्म शास्त्रों में यग्य और आहुति का जिक्र पढा या सुना होगा । यग्य पंचाग्नि जलाकर किया जाता है । और आहुति भोग सामग्री की दी जाती है । यग्य का अर्थ है । इसको जानना । यानी ये शरीर जो प्राप्त है । इसका असली रहस्य क्या है ? पंचाग्नि यानी जठराग्नि । मंदाग्नि । आदि पाँच अग्नि हमारे पेट में स्वतः प्रज्वलित है । आहुति । जो भोजन हम खाते है । यह यग्य की आहुति के रूप में हमारे शरीर पर आश्रित तैतीस करोङ देवताओं का पोषण करता हैं । यानी हमारे इस भोग से उनको त्रप्ति होती है । तो कभी किसी बात पर उपाय के रूप में । या हमारे अध्यात्म ग्यान के रूप में । या शरीर । आत्मा । मन । विषयक प्रश्नों की वजह से रिषी मुनियों ने यह सत्य बताया । कि तैतीस करोङ देवताओं को भोग देने से ही हमारे सभी कार्य सुचारु रूप से होंगे । और यह एकदम सत्य बात है । और प्रत्येक जाति के इंसान के लिये है । अब मान लो । किसी को फ़ोङा हो गया । तो पहले आजकल की तरह डाक्टर तो थे नहीं । आयुर्वेद ही था ।
जो निसंदेह वैदिक ग्यान परम्परा पर आधारित है । तो पहले के वैध अपने शब्दों में इस तरह कह देते थे । कि फ़लाना देवता बिगङ गया । इसे इस विधि या उपचार के द्वारा पुष्ट कर दो । और सही बात है । आपकी किसी असाबधानी से ही कोई परेशानी पैदा होती है । तो उसका उपचार कर दो । उसको पोषण दे दो । बात खत्म । इस तरह तैतीस करोङ देवताओं की बात प्रचलन में आ गयी । पर उल्टा हो गया । कबीर ने कहा है । कि " नय्या में नदिया डूबी जाय । " इसी तरह की बातों के ऊपर कहा है ।
वास्तव में यह तैतीस करोङ देवता हमारे आश्रित है । और हम समझने लगे कि हम इनके आश्रित हैं । अगर आप इन्द्रियों से काम न लो । तो इन देवताओं को पोषण नहीं मिलेगा । तो आप विचार करें । ऐसा कौन सा धर्म या जाति है । जो खाना नहीं खाती । पानी नहीं पीती । या कामभोग नहीं करती । या शरीर की अन्य क्रियायें नहीं करती । और यदि करती है । तो उसका सम्बन्ध तैतीस करोङ देवताओं से निश्चय ही है । लेकिन वास्तव में यह सिर्फ़ हिंदू धर्म नहीं है । बल्कि ये सनातन धर्म है । सना तन यानी शरीर से लिपटा या ओत प्रोत धर्म । और शरीर तो सभी का एक जैसा ही है । या अलग अलग है ?
इस तरह कुल तैतीस करोङ देवता है । जिनमें तैतीस प्रमुख हैं । ये तैतीस कौन हैं । शरीर की पच्चीस प्रकृतियों के पच्चीस देवता । शरीर के पाँच तत्व के पाँच देवता । जल । वायु । अग्नि । प्रथ्वी ।आकाश । इस प्रकार ये तीस हो गये । शेष तीन देवता । इन तैतीस में भी प्रमुख हैं । ये ब्रह्मा ( रजोगुण ) विष्णु ( सतोगुण ) शंकर ( तमोगुण ) हैं । सभी जानते हैं कि ये सृष्टि तीन गुणों पर कार्य करती हैं ।
तो इस तरह कौन सा ऐसा जीव है ? कौन सा ऐसा मनुष्य है ? कौन सी ऐसी जाति ? धर्म हैं जिसमें तैतीस करोङ देवता नहीं हैं ? पच्चीस प्रकृतियों और पाँच तत्वों के बारे में अधिक जानने के लिये अन्य लेख पढें ।
" जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । " " सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा । " विशेष--अगर आप किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं । और साधना मार्ग में कोई परेशानी आ रही है । या फ़िर आपके सामने कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको न मिला हो । या आप किसी विशेष उद्देश्य हेतु
कोई साधना करना चाहते हैं । और आपको ऐसा लगता है कि यहाँ आपके प्रश्नों का उत्तर मिल सकता है । तो आप निसंकोच सम्पर्क कर सकते हैं ।
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