शुक्रवार, अप्रैल 22, 2011

अब तू औरत नहीं चुङैल है । 3

कुछ देर तक कमरे में मदहोश करने वाली मधुर ध्वनिलहरी गूंजती रही । प्रसून ने सिगरेट सुलगायी । और अकारण ही मेज पर गोल गोल उंगली घुमाते हुये मानों वृत सा बनाने लगा । अब तक के इस कार्यक्रम का उद्देश्य दरअसल अल्ला को सशक्त माध्यम के तौर पर तैयार करना था । हालांकि जेनी ऐसी बातों की पूर्व अभ्यस्त थी । पर वह फ़िर भी माहौल को हल्का ही रहने देना चाहता था । जब एक चुङैल की मौजूदगी के बाद भी माहौल कतई असामान्य नहीं हुआ । तब उसने मेज के नीचे फ़िक्स एक इलेक्ट्रिक हीट प्लेट पर मौजूद बर्तन में लोबान मिक्स कुछ सुगन्धित पदार्थ डाल दिये । और स्विच आन कर दिया । कुछ ही क्षणों में कमरे में अजीब गन्ध वाला धुँआ फ़ैलने लगा ।
ओके । फ़िर वह अल्ला से मु्खातिब होकर बोला - कामिनी जी..अब बताईये । मैं आपके बारे में जानना चाहता हूँ । आप वहाँ कबसे हैं ? क्यों है आदि आदि ?
जो आग्या योगीराज । कामिनी बोली - ये 82 साल पहले की बात है । उस समय मेरी आयु 31 साल की थी । और मैं अपने पाँच बच्चों और पति के साथ इसी हवेलीनुमा मकान में सुख से रहती थी । काफ़ी बङे इस मकान में मेरे तीन देवर । उनकी पत्नियाँ । बच्चे । और मेरे सास ससुर आदि भी रहते थे । हमारी जिंदगी मजे से कट रही थी ।
मेरे एक देवर का नाम रोशनलाल था । रोशनलाल अक्सर हफ़्ते पन्द्रह दिन बाद सोने चांदी के जेवरात लाता था । और मुझे चुपचाप रखने के लिये दे देता था । ये बात न उसकी पत्नी को मालूम थी । न मेरे पति को । न अन्य किसी को । और इसकी वजह यह थी कि रोशनलाल की पत्नी सु्खदेवी मुँहफ़ट थी । अगर रोशन जेवर उसे देता । तो वह अवश्य पङोस आदि में इसका जिक्र कर देती । एक दो सेर सोने के जेवर उस समय के खाते पीते घर में होना कोई बङी बात नहीं थी । अक्सर कई लोगों के घर होते ही थे ।
पर रोशनलाल का मामला और ही था । वह एक महीने में ही आधा सेर सोना चाँदी जेवरात के रूप में ले आता था । और मेरे पूछने पर कहता कि वह जेवरात गाहने ( गिरवी )  रखने का काम करता है ।
मेरे कमरे में आलमारी के नीचे एक गुप्त स्थान था । जिसमें एक बक्सा फ़िट करके रखा हुआ था । मैं जेवरों को उसी बक्से में डाल देती थी ।
कहते हैं । किसी की हाय कभी न कभी असर दिखा ही जाती है । एक रात हम सब लोग सोये हुये थे । कि अचानक शोरगुल की आवाज पर मैं चौंककर उठ बैठी । हमारे घर में डाकू घुस आये थे । और डयौङी में सास ससुर के पास खङे थे । वे कह रहे थे । तुम्हें पता है । रोशनलाल को हमने मार डाला है । शायद तुम लोग न जानते हो । रोशन एक डाकू था । और हमारा साथी था ।
अभी कुछ दिनों पहले हमने एक शादी वाले घर में डाका डाला था । जिसकी खबर रोशन के मुखबिर से ही मिली थी । लेकिन जब हम डाका डाल रहे थे । तभी एक बुढिया ने सरदार के पैर पकङ लिये । और बोली । अगर हम लोगों ने उसे लूट लिया । तो उसकी इकलौती नातिनी की शादी कभी नहीं हो पायेगी । जिसका कन्यादान मरने से पहले लेने की उसकी बेहद इच्छा है ।
जब यह सब चल ही रहा था । तो अन्दर से चीखने की जोरदार आवाज आई । अन्दर  डकैती डालने गये रोशनलाल ने लङकी के छोटे भाई के गले पर कटार रखते हुये जब सब जेवर निकलवाकर कब्जे में कर लिये । तो उसका छोटा भाई यह कहते हुये.. मैं अपनी जीजी के गहने तुझे नहीं ले जाने दूँगा ..उससे लिपट गया । और वह गलती से रोशनलाल के द्वारा मारा गया । रोशनलाल तेजी से छत पर जाकर नीचे उतरकर घोङे से भाग गया । उसे लङकी की दादी और सरदार के बीच हुयी बात का कुछ पता नहीं था ।
..जेनी बङी दिलचस्पी से यह स्टोरी सुन रही थी । टीकम सिंह तो हैरत के मारे भौचक्का ही हो रहा था । कमरे के वातावरण में कभी कभी प्रसून की गहरी सांस लेने की आवाज ही सुनायी देती थी ।
दाता । वह भावुक होकर बोला । रंग न्यारे । तेरे खेल न्यारे ।
मुखबिर की सूचना गलत थी । अल्ला फ़िर से बोली - बङी मुश्किल से सीता ( विवाह वाली कन्या ) का दहेज जमा हुआ था । और वह परिवार इस इकलौती कन्या के विवाह के चक्कर में कर्जदार हो चुका था ।
सरदार जैसा कट्टरदिल डाकू बुढिया की कहानी सुनकर पसीज गया । लेकिन तब तक होनी अपना खेल दिखा चुकी थी । सीता का भाई गला कट जाने से मर गया था ।
बुङिया को जैसे ही ये पता चला । तो उसने हाय हाय करते हुये - इस नासमिटे का सत्यानाश हो जाय । कहते हुये वहीं दम तोङ दिया । सरदार हतप्रभ रह गया । अच्छा खासा खुशी बधाईयों वाला घर मातम में बदल गया ।
सरदार तेजी से कुछ सोचता हुआ अन्य डाकुओं के साथ घोङों पर नहर के उस स्थान पर पहुँचा । जहाँ रोशनलाल से उसे मिलना था । उसे रोशनलाल पर बेहद गुस्सा था । डाकुओं के कानून के अनुसार औरतों बूढों बच्चों को मारना सरासर गलत था । रोशनलाल मिला तो । पर बेहद घबराया हुआ था । उसके अनुसार वह सोच रहा था कि वे लोग ( उसके दल के ) पीछे से आ रहे होंगे । पर पीछे कोई नहीं था ।
तब उस पर दूसरे गिरोह ने हमला करके उसका सारा माल छीन लिया । उसने किसी तरह भागकर जान बचाई ।
इस दूसरी नयी बात से तो सरदार का खून ही खौल उठा । उसे यह भी लगा कि रोशन शायद झूठ बोल रहा हो । वहीं दोनों में तकरार बङ गयी । और सरदार ने रोशन को काटकर नहर में डाल दिया । इसके बाद तीसरे दिन रात को जब सरदार चुपके से दूसरे जेवर लेकर सीता के घर पहुँचा । तो उसने पेङ से लटककर फ़ाँसी लगा ली थी । दुखी मन से सरदार लौट आया ।
तबसे सरदार बहुत दुखी रहने लगा । वह इस पाप और बुङिया का शाप अपनी आत्मा पर बोझ की तरह महसूस करने लगा था । तब किसी साधु आत्मा ने उसे परामर्श दिया कि जो होना था । वह तो हो गया । अब अगर वह दस गरीब कन्याओं का विवाह धूमधाम से करवा दे । तो इस पाप का असर ना के बराबर रह जायेगा ।
क्रमशः ।

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