शुक्रवार, अप्रैल 22, 2011

अब तू औरत नहीं चुङैल है । 5

टीकम सिंह के लिये अगले दस मिनट  बेहद संशय में गुजरे । अचानक उस सुन्दर गुङिया सी लङकी को क्या हो गया था । ये सोचकर वह बेहद दुखी था । पर जेनी निर्विकार भाव से बैठी थी ।
प्रसून ने अल्ला के ऊपर से कामिनी का आवेश हटा दिया था । और फ़िर उसके सर पर हाथ फ़िराता हुआ । प्यार से उसके गाल थपथपा कर वह बोला - ओ के डियर !
अल्ला ने मिचमिचाकर आँखे खोल दीं । जेनी ने मशीनी अन्दाज में जूस का गिलास उसको थमा दिया ।
माई बाप ! टीकम सिंह दुखी सा उत्सुकता से बोला - इन्हें अचानक क्या हो गया था ?
वैसे प्रसून किसी और परिस्थिति में इस सवाल का जबाब न देता । पर उसे मालूम था कि जेनी के मन में भी यही उत्सुकता थी ।
अतः वह बेहद सामान्य स्वर में बोला - खुश्की । प्रेत आवेश के दौरान होने वाली खुश्की ।
अब प्रसून कुछ अलग ही सोच रहा था । क्या बाकी आवेश भी अल्ला के माध्यम से ही कराये । अभी खेल शुरू ही हुआ था । और अल्ला मात्र एक बच्ची थी । अतः शरीर क्षमता के अनुसार वह कितना प्रभावित हो सकती है । इसका क्या पता ? लेकिन अगर वह अल्ला को माध्यम नहीं बनाता । तो वहाँ सिर्फ़ जेनी ही बचती थी । तो फ़िर बीच बीच में अन्य सहयोग के लिये वहाँ कौन होगा । अल्ला माध्यम तो बन सकती थी । पर अन्य सहयोग शायद न कर सके । टीकम सिंह किसी मतलब का न था । उसको यदि बेहद तिकङम से माध्यम बना भी दिया जाय । तो फ़िर संभावित प्रेतवार्ता समझौता आदि के लिये मुद्दई कौन होगा । दूसरे जब वह यह सब प्रत्यक्ष रूप से देखेगा । इसमें शामिल रहेगा । तभी मामला बनेगा । अतः कुल मिलाकर अल्ला ही बचती थी ।
एक और बङी वजह भी थी । प्रसून अल्ला को इस खेल का कुशल खिलाङी बनाने का इच्छुक था । जो कि जेनी की भी इच्छा थी । अतः उसने फ़िर से अल्ला को ही माध्यम बनाने का फ़ैसला किया । और जेनी से बोला - ग्लुकोन C ।
जेनी ने तुरन्त आदेश का पालन किया । और अल्ला फ़िर से दो गिलास भरपूर ग्लूकोन C  पीकर एक नयी ऊर्जा के साथ तैयार हो गयी ।
अल्ला की सुन्दर कंजी आँखे फ़िर से उसी टेबल लेम्प पर स्थिर हो गयी । और वह बोली - लेकिन पंचायत होने की बात ही खत्म हो गयी । गाँव के बुजुर्ग औरत आदमियों सज्जन लोगों ने तय किया । अब गलती हुयी सो हुयी । कामिनी के भी छोटे बच्चे हैं । कल को वह भी कुछ उल्टा सुल्टा कर ले । इससे क्या लाभ ? अतः वह बात वहीं के वहीं खत्म करके मुझे समझा दिया गया । अगले कुछ दिनों में सब कुछ सामान्य हो गया । और मैं फ़िर से पशु चराने जाने लगी । इस घटना के बाद कामवासना का भूत मेरे सर से एकदम ही गायब हो गया ।
लेकिन मेरी और सभी गाँव वालों की यह बङी भारी भूल थी कि सब कुछ सामान्य हो चुका है । बूङी का शाप फ़िजा में अब भी तैर रहा था ।
एक दिन जून की तपती दोपहरी में जब मैं नहर के किनारे पेङ की ठन्डी छाँव में खङी पशु चरा रही थी । मुझे अपने पीछे से कुछ लोगों के भागने की आवाज सुनाई दी । मैंने पीछे मुङकर देखा । और मेरे होश उङ गये । अपने पशुओं का ख्याल छोङकर मैं तेजी से गाँव की तरफ़ भागी । पर मैं गाँव से 4 किमी दूर थी । और ये भी जानती थी कि मेरे भागने की कोशिश व्यर्थ है । पर मौत को सामने देखकर आदमी हर सूरत में खुद को बचाने की कोशिश करता है ।
बचाओ..अरे कोई बचाओ । चिल्लाती हुयी जब मैं कुछ ही दूर भाग पायी थी । हवा में सनसनाता हुआ एक अद्धा ( आधी ईंट ) जोरदार तरीके से मेरी पीठ में लगा । और मैं लहराती हुयी गर्म जमीन पर गिर पङी ।
दरअसल..बांके के मरने के बाद उसकी पत्नी लीला अर्धविक्षिप्त हो गयी थी । और नहाने धोने आदि का त्याग कर देने के कारण वह जिन्दा चुङैल लगती थी । उसके मिट्टी भरे रूखे उलझे बाल उसे और भी खतरनाक बना देते थे । अपनी बरबादी का कारण वह मुझे ही समझती थी । उसका पुत्र जग्गीलाल जो जगिया के नाम से प्रसिद्ध था । वह भी मुझे ही दोषी मानता था । ये दोनों अक्सर मुझे धमकाते भी रहते थे । पर उनकी धमकी सुनने के अलावा मेरे पास और चारा भी क्या था । लेकिन ये कोई नहीं जानता था कि वे मेरी हत्या भी कर सकते हैं ।
मेरे जमीन पर गिरते ही लीला ने मुझे दबोच लिया । और मेरी छाती पर सबार होकर बैठ गयी ।
मार इस कुतिया को । मार अम्मा ..। मुझे जगिया की आवाज सुनाई दे रही थी ।
लीला ने मेरा ब्लाउज फ़ाङ डाला । और सीने पर प्रहार करने लगी । गर्म जमीन । ईंट की चोट । और सीने पर बैठी बजनीली औरत । मेरी चेतना डूबने लगी । और मैं बेहोश हो गयी ।
लीला ने मेरे साथ आगे क्या क्या किया ? मुझे नहीं मालूम ।
दोबारा कितने समय बाद । कितने दिन बाद । या कितने महीने बाद । मैं जागृत हुयी । मुझे नहीं पता । इस बीच के समय में मैं कहाँ रही । मुझे नहीं पता ।
खैर..दोबारा जागृत होने पर मुझे पता चला कि मैं गन्दे बदबूदार एक कीचयुक्त गढ्ढे में लेटी हुयी थी । एकदम चौंककर मैं असमंजस से उठ बैठी । मैं एकदम नंगी थी । मैंने कुछ बोलना चाहा । पर मेरी आवाज ही नहीं निकली ।
..धीरे धीरे मुझे सब कुछ याद आने लगा । लीला । मेरे पशु । मेरा गाँव । मेरे ईंट मारना । और मैं एकदम चिल्लाने को हुयी । अबकी बार आवाज तो निकली । पर जैसे कोई मच्छर भिनभिना रहा हो । मुझे ये सब कुछ बङा अजीव सा लगने लगा । मैं समझ नहीं पा रही थी कि आखिर मेरे साथ हुआ क्या है ?
प्रसून के कमरे में गजब का सन्नाटा छाया हुआ था । उसने घङी पर निगाह डाली । शाम के सात बज चुके थे ।
उसने जेनी की ओर देखा । तो उसे बस ऐसा लगा । मानों वह कोई दिलचस्प हारर मूवी देख रही हो । कमाल की जिगरावाली है । प्रसून ने सोचा । लेकिन टीकम सिंह की हालत खराब थी । वह महीनों से खाट तोङती अपनी पत्नी को भूल ही चुका था । और उल्लुओं की तरह आँखे झपकाता हुआ । हर नई परिस्थिति को देख रहा था ।
बेङा गर्क..भूतो तुम्हारा । प्रसून फ़ीके स्वर में बोला - आज का डिनर ही चौपट कर दिया ।
फ़िर उसने मोबाइल निकाला । और डायलिंग के बाद बोला - यस ! चार लोगों के लिये पिज्जा । बट  डिलीवरी टाइम नाइन पी एम ।
ओ तो ठीक है.. सर जी ! दूसरी तरफ़ से आवाज आई । पर डिलीवरी कौन से शमसान या कब्रिस्तान पर होनी है । आज भूतों को पार्टी दी है क्या ?
 कोई और समय होता । तो नीलेश के इस मुँह लगे दोस्त को प्रसून एक ही बात कहता - ओह शटअप । लेकिन आज उसका मूड खुश था । इसलिये बोला -  आज भूत घर पर ही आ गये ।
सर जी ! दूसरी तरफ़ वाला घिघियाया - मैंनू बी किसी सुन्दर भूतनी सूतनी से मिलवाओ ना । सुना है ..।
शटअप ! कहकर उसने फ़ोन काट दिया ।
कृमशः ।

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