शुक्रवार, अप्रैल 22, 2011

अब तू औरत नहीं चुङैल है । 6

शाम गहराने लगी थी । जेनी ने उठकर उस रहस्यमय कमरे की खिङकियाँ खोल दीं । प्रसून ने एक नयी सिगरेट सुलगायी । और अल्ला की ओर देखकर सधे स्वर में बोला - आगे क्या हुआ । कामिनी जी ?
मैं ..। अल्ला भावहीन स्वर में बोली - गढ्ढे से बाहर आ गयी । और गाँव की तरफ़ चलते हुये अपने घर की तरफ़ जाने लगी । तब मैंने गौर से देखा कि वह मेरा गाँव नही था । बल्कि कोई और ही जगह थी । अब मैं कहाँ जाऊँ ? मैंने सोचा । दूसरे मुझे अपने नंगे होने पर शर्म आ रही थी । लेकिन मुझे आश्चर्य इस बात का था कि इस हालत में भी दो चार लोग जो आसपास से गुजर रहे थे । वे मुझे देखकर कुछ नहीं कह रहे थे । अभी मैं और कुछ सोच पाती कि हवा के तीन चार झोंके से सरसराते हुये मेरे पास आकर रुक गये । और मुझे भिनभिन जैसी दो आवाज सुनाई दीं । ये चुङैल यहाँ आ गयी ।..अब कहाँ जा रही है । कुतिया.. ( गाली )
अब तू औरत नहीं चुङैल है ।..इसके बाद..?
नो..अचानक प्रसून ने टोका - नो.. इसके बाद । अब सीधा तुम अपनी ससुराल वाली हवेली पर आ जाओ ।
वह जानता था । एक नयी प्रेतनी के साथ क्या क्या होता है ? कैसे उसकी रैगिंग होती है ? कैसे उसे नियम कायदे प्रेत जीवन आदि बताया जाता है ।
अल्ला मोहक अन्दाज में मुस्करायी । प्रेतों के स्वछन्द जीवन में इंसान के सामाजिक नियमों बन्दिशों का क्या काम ।
जी..। बह फ़िर बोली । प्रेतों से मुक्त होने के बाद.. । मुझे फ़िर से जेवरात के बक्से की याद आने लगी । मुझे खूब पता था कि अब वह मेरे किसी काम का नहीं है । पर एक औरत का गहनों के प्रति मोह । और किसी सुरक्षित घर का लालच मुझे फ़िर से हवेली ले गया । मैं अपना मायका बच्चे सब भूल चुकी थी । और अब मुझे अभिशप्त प्रेतभाव में रहना था । वो भी पता नहीं कब तक । कहकर वह चुप हो गयी ।
जेनी के मुँह से गहरी साँस निकली । उसने अपने सीने पर क्रास बनाया । प्रसून अल्ला के बोलने का इंतजार करता रहा । जब वह आगे बोली ही नहीं । तो प्रसून के मुँह से निकला - उसके बाद ?
जी ! अल्ला मानों उलझकर बोली , " उसके बाद । उसके बाद क्या ? तबसे मैं इसी हालत में प्रेत जीवन जीती हुयी अपनी हवेली में रह रही हूँ ।
रब्बा ! प्रसून ने गहरी सांस ली , " ये क्या बोल रही है ? मूवी का दी एन्ड हो गया । और सीता जी लंका में ही रह गयीं ।
अरे भाई ! वह बोला , " मेरा मतलब है । ये टीकम सिंह जी की वाइफ़ को क्यों परेशान कर रही हो । इसने तुम्हारा क्या बिगाङा है ?
क्या..? अल्ला के मुँह से कामिनी अजीब स्वर में बोली , " मैं भला उसे क्यों परेशान करूँगी । इन लोगों की वजह से तो मुझे अच्छा ही लगता है । उस खाली वीरान हवेली में इनको आते जाते देखते हुये मेरा समय भी कट जाता है । दूसरे ये लोग शाम को { भेंस की वजह से } हवेली में दिया बाती भी करते रहते हैं । मैं तो जितना मुझसे बनता है । इनकी सहायता ही करती हूँ ।
प्रसून के हाथों से मानों तोते उङ गये । इतने प्रेत आवेश का बस ये मतलब निकला था कि उसे हवेली की कहानी मालूम पङ गयी थी ।
उसने एक मिनट कुछ सोचा । फ़िर बोला - तो..ये ही बता दो । टीकम सिंह की पत्नी को कौन तंग कर रहा है ?
प्रसून की बात सुनकर अल्ला कुछ क्षण के लिये मौन हो गयी । फ़िर उसकी सांस तेज तेज चलने लगी । चेहरे की मांसपेशिया तनने लगी । और चेहरा फ़ूलने लगा । करीब दो मिनट उसकी यह स्थिति रही । फ़िर वह कुछ शांत होकर पहले की अपेक्षा भारी स्वर में बोली - मैंने पता किया है ..कोई भी नहीं ।
व्हाट ! बेहद आश्चर्य से प्रसून के मुँह से निकला ।
इससे पहले कि बह और आश्चर्य के सागर में गोते लगाता । अल्ला बोली - योगी जी आप समझते ही हो । मुझे अब जाना है । आपको यदि आवश्यकता हो । तो फ़िर से बुला लेना ।
बेहद हैरानी में डूबा प्रसून तुरन्त हाँ ना के बारे में कोई फ़ैसला न कर सका । और स्वतः ही उसके मुँह से निकल गया - ओ के..।
अल्ला फ़िर से इस तरह कुर्सी पर फ़ैल गयी । मानों गहरी नींद में हो । प्रसून ने जेनी को इशारा किया । जेनी ने उसे उठाकर विस्तर पर लिटा दिया ।
ओ माय गाड ! थका हुआ सा प्रसून बोला ।
उसने टीकम सिंह के चेहरे की तरफ़ देखा । उसके चेहरे पर भी उलझन के भाव मौजूद थे । जेनी अन्दर जा चुकी थी । प्रसून उठकर छत पर आ गया । और टहलने लगा । टीकम सिंह उसके साथ ही था ।
फ़िर कुछ देर बाद वह नीचे उतर आया । और ड्राइंग रूम में टीवी देखती हुयी जेनी के पास बैठ गया । टीकम सिंह भी झिझकता हुआ बैठ गया । अचानक प्रसून जेनी से इस तरह बोलने लगा । मानों चाइनीज भाषा में बात कर रहा हो चिंगा पो..इन्नी पां.हूचे जा ।
टीकम सिंह अकबकाया सा हैरानी से उसका मुँह देखने लगा । अपनी बात पूरी करने के बाद प्रसून वापस अपने विशेष कक्ष में आ गया । टीकम सिंह उसके पीछे पीछे आने को हुआ कि तभी जेनी ने उसे रोक दिया - आप यहीं रहिये । वह बेचारा मोम के पुतले की तरह फ़िर से बैठ गया । ये गङबङझाला उसके समझ के बाहर थी । अब उसे घर में बीमार पङी अकेली असहाय पत्नी की याद हो आयी । जिसे पानी देने वाला भी कोई नहीं था ।
रात का अंधेरा फ़ैल चुका था । साढे आठ के लगभग टाइम होने जा रहा था । उसकी समस्या तो हल हुयी नहीं । उल्टे यहाँ आकर वह फ़ँस और गया था । भगवान जाने उसकी पत्नी उस भूतिया जगह में किस हालत में होगी ?
बङा नाम सुना था । इस प्रसून का । पर ये तो एकदम बेकार ही निकला । उस बेचारी गुङिया सी सुन्दर लङकी को खामखाँ परेशान करता हुआ मोबायल ओबायल पर नोटंकी करता रहा । न भूत पकङ पाया । न कुछ । खामखाँ मैं इसके चक्कर में आ गया । शक्ल से भी तो बाबा नहीं लगता । कल का लङका ..ये जाने भूत बलाय क्या चीज होती है ? अच्छे अच्छों की टट्टी निकल जाती हैं । फ़िर भी भूत काबू में नहीं आते । मुझे नहीं लगता कि ये कुछ कर पायेगा ।
ऐसी ही तमाम बातें सोचता हुआ टीकम सिंह मन ही मन फ़ैसला कर रहा था कि आगे उसे क्या करना चाहिये । और उसने फ़ैसला कर भी लिया कि प्रसू्न के बाहर आते ही उससे विदा होकर वह सीधा अपने घर जायेगा । और कल सल किसी अच्छे बाबा की तलाश करेगा । पर न जाने कितनी देर में बाहर आयेगा । ये कमबख्त । जब तेरे वश का कुछ नहीं है । तो मुझे जाने दे भाई ।
कृमशः 

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