गुरुवार, अप्रैल 21, 2011

अब तू औरत नहीं चुङैल है । 7

जब प्रसून वापस दोबारा अपने कक्ष में पहुँचा । तो उस वक्त तक कमरे से लोबान आदि बूटियों की कसैली गंध खत्म हो चुकी थी । और कमरा किसी इलेक्ट्रिक क्वाइल से भीनी भीनी खुशबू से महक रहा था । वह कमरे के बीचोंबीच पदमासन में बैठ गया । और उसके मुँह से निकलने लगा - अलख बाबा अलख..अलख बाबा अलख..अलख बाबा अलख..।
करीब आठ मिनट बाद उसके कानों में गैव आवाज सुनायी दी ।..तेरा कल्याण हो ।
प्रणाम गुरुदेव..! वह बोला ।
आयुष्मान भव । कीर्तिमान भव । बाबाजी की आवाज सुनाई दी ।..बताओ वत्स...?
इसके बाद प्रसून करीब 15 मिनट बाबाजी से बात करता रहा । और फ़िर अन्त में प्रणाम करके कमरे से बाहर आ गया । टीकम सिंह मानों बेकरारी से उसका ही इंतजार कर रहा था । वह एक ही बात सोच रहा था । बस पता नहीं कितने देर में मिलेगी ?
प्रसून ने फ़िर रहस्यमय अन्दाज में जेनी से कुछ बात की । और टीकम सिंह के साथ बाहर खङी स्कोडा के पास आ गया । उसे टीकम सिंह के मन के भाव पता लग चुके थे ।
अतः बोला - भूत बहुत बङा वाला है । मेरे से वश में नहीं हो रहा ।..लेकिन चलिये । आपको आपके शहर तक छोङ दूँ । बिकाज मुझे भी उसी रास्ते आगे जाना है ।
टीकम सिंह बहुत खुश हुआ । उसका बस का किराया जो बचने वाला था । वह पहली बार ऐसी शानदार गाङी में बैठने वाला था । जरूर दो लाख से कम नहीं आयी होगी ? उसने मन में सोचा ।
प्रसून जैसे ही गाङी का डोर बन्द करने वाला था । उसे डिलीवरी ब्वाय की आवाज सुनायी दी - सर जी हाट पिज्जा ।
अपने ख्यालों में उलझा प्रसून चौंका । फ़िर उसने रिस्टवाच पर दृष्टिपात किया । और बोला - नौ बजकर तीन मिनट । यानी तीन मिनट लेट । यही है तुम्हारी सर्विस ।
डिलीबरी ब्वाय ही ही करके हँसा ।
- हँसता क्यूँ है ?
- सर जी आप बङे क्यूट हो । शादी क्यों नहीं कर लेते ।
- बाइक अन्दर खङी कर । और मेरे साथ चल । आज तेरी शादी कराता हूँ । क्या नाम है तेरा ?
अगले पन्द्रह मिनट में वह तीनों गाङी में बैठे टीकम सिंह के घर जा रहे थे । भानु नाम के उस डिलीवरी ब्वाय को प्रसून ने उसके मालिक को फ़ोन करके अपने साथ ले जाने को कह दिया था ।  वहाँ की किसी आवश्यकता और वापसी में वह प्रसून के साथ रहने वाला था । भानु वैसे प्रसून से झेंपता था । लेकिन नीलेश के मजाकिया स्वभाव से सभी उससे हँस बोल लेते थे ।
शहर के ट्रेफ़िक से उलझने में आधा घन्टा लग गया । और इसके बाद अगले आधे घन्टे से भी कम समय में प्रसून भानु के साथ टीकम सिंह के घर में मौजूद था । टीकम सिंह को तो यूँ लग रहा था । मानों वह अविश्वसनीय तरीके से हवा में उङकर आया हो ।
दरअसल बाबाजी से हुयी बातचीत में उसे इस कहानी का अजीब रहस्य पता लगा था । सीता ने ही मरने के बाद अपनी शेष आयु के चलते टीकम सिंह की पत्नी के रूप में जन्म लिया था । और वह अपनी शादी की ख्वाहिशों के चलते ही मरी थी । इसलिये टीकम सिंह की ही पत्नी बनी । लेकिन टीकम सिंह उसकी ख्वाहिश पूरी करने दोबारा मनुष्य कैसे बन गया ? इस बात की प्रसून को हैरानी थी ।
तब बाबाजी ने बताया । टीकम सिंह भी सीता के मरने के कुछ ही दिनों बाद हैजे से अकाल मौत मर गया । वास्तव में अभी उसके कर्म संस्कार और सृष्टाजोङी इसी समय के लिये सीता से ही बँधे { लिखे } थे । अतः मरने के बाद । कुछ समय तक इधर उधर भटकने के बाद । दोनों ने फ़िर से जन्म लिया । और समय आने पर पति पत्नी बन गये ।
सीता की एक इच्छा तो पूरी हो गयी । पर उसे अपने लुटे हुये गहनों की बात दिल से नहीं निकली । जिनसे सज संवरकर वह दुल्हन बनी डोली में बैठने की इच्छुक थी । उसी कर्म संस्कार के चलते वह उसी हवेली के पास आ गयी । जहाँ उसके गहने मौजूद थे । उस गहनों से जुङी हुयी माया की वजह से ही वह बीमार थी । और ठीक नहीं हो रही थी । जब भी वह भेंस के काम से हवेली जाती । तो उसे ऐसा क्यों लगता । यहाँ इस हवेली से उसका कोई नाता है । वह टीकम सिंह के बाहर जाने  के बाद घन्टों हवेली में घूमती रहती ।  यह बात खुद टीकम सिंह को भी पता नहीं थी ।
अब टीकम सिंह की पत्नी के ठीक होने का एक ही रास्ता था । वे गहने जिसमें उसकी चेतना उलझी हुयी है । उसे मिल जाते । दूसरे इसमें उसकी बूङी दादी की उसे अपने पैत्रक गहने पहनाकर डोली में विदा करने की इच्छा भी आग में घी डाल रही थी ।
अतः प्रसून उँगली में फ़ँसे हुये छल्ले को घुमाता हुआ भानु और टीकम सिंह के साथ उसी भुतहा हवेली में घुस गया ।
कृमशः

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