गुरुवार, अप्रैल 21, 2011

अब तू औरत नहीं चुङैल है । 8

आफ़्टर 10 मन्थ । यानी दस महीने बाद ।
नीलेश का शानदार आशियाना । मानसी विला ।
 सुबह के आठ बजे थे । इत्तफ़ाकन इस वक्त मानसी विला में प्रसून नीलेश और मानसी तीनों ही मौजूद थे ।
प्रसून बाथरूम में था । और नीलेश वाचिंग टीवी । मानसी इन द होम ।
कुछ ही क्षणों में मानसी उबासियाँ सी लेती हुयी उसी कक्ष में आयी । उसने पेट पर हाथ फ़िराया । और एक लम्बी नकली डकार मारी - आ.आ.आ.ड ।
ये क्या है ? नीलेश झुँझलाकर बोला ।
ये क्या नहीं हैं । वह लट को पीछे फ़ेंककर बोली - बल्कि इसको " राग डकार " बोलते हैं । तुम साले मर्द अपनी महबूबा को इतना केला खिलाते हो । डकार नहीं मारेगी । तो बेचारी क्या करेगी ?
मुझे ! वह बुरा सा मुँह बनाकर बोला - " राग पाद " बजाना बहुत अच्छी तरह आता है । तुझे सुनाऊँ क्या ?
..ओ.भाई..भाई..भाई..प्रसून को टावल से बाल रगङते हुये आता देखकर दोनों एक दूसरे को मुँह पर उँगली रखकर चुप रहने का इशारा करने लगे ।
तभी फ़ोन की घन्टी बजी । नीलेश ने फ़ोन रिसीव किया । और फ़िर प्रसून की तरफ़ बङाता हुआ बोला - भाई जेनी का फ़ोन । प्रसून हूँ हाँ..यस ..या.. करता हुआ फ़ोन सुनता रहा ।
दूसरी तरफ़ फ़ोन पर आगे की बात टीकम सिंह ने की थी ।
वह प्रसून की कोठी पर आया हुआ था ।
प्रसून ने उसी रात.. उसकी सभी समस्याओं का हल कर दिया था । कामिनी से..फ़िर से बात करके ..उसने कुछ दिनों बाद वो जेवरातों का बकसा निकलवा दिया था । अपने सोर्स का इस्तेमाल करते हुये । उसने सीता के पैत्रक गहने छोङकर..वाकी सभी गहनों को मनी में कनवर्ट करवा दिया था ।
उसकी सलाह के अनुसार टीकम सिंह ने अपना घर और वो पुरानी हवेली { कामिनी की रजामन्दी से } तुङवाकर दोनों की जगह एक कामिनी पब्लिक स्कूल बनवा दिया था । उस स्कूल से दस कदम दूर उसने एक छोटा सा घर खरीद लिया था ।  टीकम सिंह की पत्नी अब पूरी तरह से स्वस्थ थी । उनके कोई सन्तान हो सके । इसके लिये भी प्रसून ने उन्हें कुछ साधुओं के बारे में बताते हुये सुझाव दिये थे ।
कामिनी पब्लिक स्कूल की तिमंजिला छत पर एक बङा हालनुमा कमरा बना हुआ था । जिसमें अब कामिनी रहती थी । उसमें एक सजे बेड से लेकर खास जरूरत की हर चीज मौजूद थी ।
बन्द हो चुके कब्रिस्तान की तरफ़ एक बङी दीवाल बना दी गयी थी । इसके अलावा उस इलाके में टीकम सिंह ने कुछ छायादार वृक्ष और इंडिया मार्का नल भी लगवाये थे ।
और कहने की आवश्यकता नहीं । ये सब लगभग अनपढ टीकम सिंह भलीभांति वन एन्ड ओनली प्रसून के सहयोग से ही कर सका था । आज ये सब कार्य पूरा हो चुका था । और स्कूल का उदघाटन था । जिसके लिये ही टीकम सिंह प्रसून के घर उसको बुलाने आया था ।
फ़ोन रखने के बाद प्रसून ने संक्षिप्त में नीलेश और मानसी को सब बात बतायी । और फ़ौरन दोनों को तैयार होने को कहा ।
हुर्रे..मानसी खुशी से उछलकर बोली । नीलेश ने प्रसून की निगाह बचाते हुये उसकी कमर में चुटकी भरी ।
आउच..वह चिहुँकी ।
शी..भाई..भाई..भाई..। कहते हुये दोनों ने एक दूसरे के होठों पर उँगली रखी ।
समाप्त ।

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