मंगलवार, जुलाई 26, 2011

डायन THE WITCH 1

हरेक इंसान की जिन्दगी इतनी खुशनसीब नहीं होती कि वह एक अच्छे संपन्न घर कुल खानदान में पैदा हो । पढाई लिखाई करके प्रतिष्ठित इंसान बने । प्यारी सी बीबी और दुलारे से बच्चे हों । और जिन्दगी को हँसी खुशी भोगता हुआ परलोक रवाना हो जाय ।
पर क्यों नहीं होती ऐसी जिन्दगी ? क्यों हैं जीवन के अलग अलग विभिन्न रंग । कोई सुखी । कोई दुखी । कोई हताश । कोई निराश क्यों है ? यह प्रश्न ठीक गौतम बुद्ध स्टायल में नीलेश के मन में उठा ।
पर इसका कोई जबाब उसके पास दूर दूर तक नहीं था । नीलेश की तुलना मैंने गौतम बुद्ध से इसलिये की । क्योंकि चाँदी की थाली और सोने की चम्मच में पहला निवाला खाने वाला नीलेश एक बेहद सम्पन्न घराने का स्वस्थ सुन्दर होनहार युवा था । जीवन के दुखों कष्टों से उसका दूर दूर तक वास्ता न था । जिस चीज पर बालापन से ही उसकी नजर उत्सुकतावश भी गयी । वो चीज तुरन्त उसको हाजिर की जाती थी । आज की तारीख में ढाई तीन लाख रुपया महज जिसका पाकेट मनी ही था । महँगी महँगी गाङिया वह सिर्फ़ ट्रायल बतौर खरीदता था । और बहुतों को रिजेक्ट भी कर देता था ।


वह नीलेश ! नीलेश द ग्रेट ! जब अपने जीवन में इस प्रश्न से परेशान हुआ । तो महज 10 वीं क्लास में था ।
और राजकुमार सरीखा ये बच्चा अनगिनत दोस्तों से सिर्फ़ इसीलिये घिरा रहता था कि उसकी छोटी सी जेव से रुपया कागज की तरह उङता था । लङकियाँ तो उसकी हर अदा की दीवानी थी ।
पर ढेरों दोस्तों से घिरे नीलेश को उस कालेज में दो ही लोग आकर्षित करते थे । दादा प्रसून और मानसी ।
उससे दो क्लास आगे प्रसून नाम का वो लङका । अक्सर उसे किसी पेङ की ऊँची टहनी पर बैठा हुआ नजर आता । 


और मानसी जो शायद अमीरों के इस कालेज में सबसे कम हैसियत वाली थी । और किसी भी तरह से ले देकर इस प्रतिष्ठित कालेज में पढ पा रही थी । इसी बात को लेकर झेंपी झेंपी सी रहती थी ।
तब नीलेश का खिंचाव इन दोनों से स्वाभाविक ही हुआ । क्योंकि कालेज के इस एकमात्र हीरो की तरफ़ इन दोनों की कोई तबज्जो ही नहीं थी ।
मानसी की बात अभी छोङते हैं । नीलेश ने डरते डरते गम्भीर और शान्त प्रसून से बमुश्किल अपना परिचय बङाया । और तब उसे बेहद हैरत हुयी कि उसके एक मुख्य प्रश्न के ही नहीं बल्कि बहुत से उन प्रश्नों के जबाब भी प्रसून के पास मौजूद थे । जो सवाल दरअसल उसके जीवन में अभी पैदा भी नहीं हुये थे ।
- दादा ! यू आर ग्रेट ! वह बेहद भावुकता से ख्यालों में बोला - आपका मुझे मिलना । मेरे जीवन की सबसे बङी उपलब्धि थी ।

तभी अचानक उसके मोबायल की घन्टी बजी । उसने रिसीव करते हुये कहा - यस ।
- सर ! दूसरी तरफ़ से आवाज आयी - हम लोग लाडू धर्मशाला के पास आ गये हैं । अब प्लीज आगे की लोकेशन बतायें ।
उसने बताया । और अपनी कीमती रिस्टवाच पर दृष्टिपात किया । फ़िर वह बुदबुदाया - लाडू धर्मशाला .. इसका मतलब गड्डी से भी आधा घन्टा लगना था । और शाम के चार बजने जा रहे थे ।
वह लगभग टहलता हुआ सा मन्दिर की खिङकी के पास आ गया । और नीचे दूर दूर तक फ़ैले खेत और उसके बाद घाटी और पहाङी को निहारने लगा । इस वक्त वह किशोरीपुर के वनखन्ड स्थित शिवालय में मौजूद था । और पिछले दो दिन से यहाँ था । वनखन्डी बाबा के नाम से प्रसिद्ध ये मन्दिर किशोरीपुर से बारह किमी दूर एकदम सुनसान स्थान पर था । और कुछ प्रमुख पर्वों पर ही लोग यहाँ पूजा आदि करने आते थे । जिन लोगों की मन्नत मान्यतायें इस मन्दिर से जुङी थी । वे भी गाहे बगाहे आ जाते थे ।


इस मन्दिर का पुजारी बदरी बाबा नाम का 62 साल का बाबा था । जो पिछले 20 सालों से इसी मन्दिर में रह रहा था । इसके अतिरिक्त चरस गांजे के शौकीन चरसी गंजेङी बाबा भी इस मन्दिर पर डेरा डाले रहते थे । और कभी कोई । कभी कोई के आवागमन के कृम में नागा । वैष्णव । नाथ । गिरी । अघोरी आदि विभिन्न मत के 15 -20 साधु हमेशा डेरा डाले ही रहते थे । विभिन्न वेशभू्षाओं में सजे इन खतरनाक बाबाओं को शाम के अंधेरे में चिलम पीता देखकर मजबूत जिगरवाला भी भय से कांप सकता था ।
पर बदरी बाबा एक मामले में बङा सख्त था । किसी भी मत का बाबा क्यों न आ जाय । वह मन्दिर के अन्दर बाहर शराब पीने और गोश्त खाने की इजाजत नहीं देता था । हाँ गाँजे की चिलम और अफ़ीम का नशा करने की खुली छूट थी । खुद बदरी बाबा भी इन नशों का शौकीन था ।
इस समय भी मन्दिर पर बदरी और नीलेश के अलावा ग्यारह अन्य साधु मौजूद थे । जिनमें एक अघोरी और दो नागा भी आये हुये थे । नीलेश इन सबसे अलग मन्दिर के रिहायशी हिस्से की तिमंजिला छत पर मौजूद था । यह स्थान भी उसके गुप्त साधना स्थलों में से एक था । बदरी प्रसून का तो भगवान के समान आदर करता था ।
- कहाँ होगा इसका अंत ? नीलेश फ़िर से सोचने लगा - बङी विचित्र है । ये द्वैत की साधना । एक चीज में से हजार 


चीज निकलती है । जब भाई और बाबाजी ही निरंतर खोज में हैं । तो वह तो अभी बच्चा ही है । पुरुष और प्रकृति । और जीव और भगवान..द्वैत को लोगों ने अपनी अपनी तरह से बयान किया है । फ़िर भी इसका रहस्य ज्यों का त्यों सा लगता है । दरअसल इसकी जङ कहाँ है ?
ऐसे ही विचारों के बीच उसने सिगरेट सुलगायी । और टहलता हुआ सा मंदिर वाले हिस्से की तरफ़ आया । बदरी बाबा चूल्हे पर चाय चङा रहा था ।
तभी उसे दूर मंदिर की टेङी मेङी पगडंडी नुमा सङक पर एक बुलेरो आती दिखायी दी । नीचे बाबा लोग गोरख मत की किसी बात को लेकर झगङा करने के अन्दाज में बहस कर रहे थे ।
कुछ ही मिनटों में बुलेरो मंदिर के प्रांगण में आकर रुक गयी । और उससे चार लोग बाहर निकले । जिनमें दो अधेङ । एक वृद्ध और एक युवा था । वे बदरी बाबा से कुछ पूछने लगे ।
तब बदरी बाबा ने मंदिर की सीङियों की तरफ़ इशारा किया ।

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