मंगलवार, जुलाई 26, 2011

डायन THE WITCH 10

दूसरा दिन ।
नीलेश सुबह मुँह अंधेरे ही उठ गया । और जलवा के साथ बाहर टहलने चला गया । क्या करे । क्या न करे । जैसा कोई सवाल उसके सामने नहीं था । वह डायनी महल से कुछ ही दूर बने खण्डहर किले के आसपास भी घूमता रहा । उसने वहाँ की मलिन बस्ती का भी जायजा लिया । उसे कहीं भी कैसा भी खौफ़ नहीं नजर आया । कोई उसे डायन की बात करता नहीं मिला । इसका मतलब डायन शायद उस बस्ती पर मेहरबान थी । उसका खौफ़ इस बस्ती से बाहर शहर के लोगों पर ही था
वह घूमता हुआ एक खाली मैदान में बने मन्दिर के पास से गुजरा । मौलश्री कुँए के पाट पर बैठी हुयी मुँह से मिट्टी उगल रही थी । गीली गीली पीली मिट्टी लार रूप में उसके मुँह से टपक रही थी । मौलश्री ने उसे नहीं देख पाया था । और उसने भी उसके सामने जाने की कोई कोशिश नहीं की ।
वह दूसरी गली से होकर घूमता हुआ निरुद्देश्य ही एक अन्य गली में आ गया । तब उसे कुछ कुछ बात समझ में 


आयी । वह गौर से प्रत्येक दरबाजे को देखने लगा । वहाँ हर दरबाजे पर तांत्रिक इंतजाम था । किसी ने अपने दरबाजे को कीलवाया हुआ था । किसी ने तन्त्र टाँगा हुआ था । किसी ने वास्तु आदि के द्वारा बुरी आत्माओं से बचने का इंतजाम किया हुआ था ।
अचानक उस स्थान का निरीक्षण करता हुआ नीलेश चौंका । और उस आवाज के सहारे बच्चे को देखने लगा । जो उसे अभी अभी सुनाई दी थी ।
- शक्तिमान.. शक्तिमान ! अपने घर की छत पर खङा वह बच्चा आसमान की तरफ़ देखता हुआ कह रहा था - हमें इस डायन से बचाओ । प्लीज शक्तिमान हमें इस डायन से बचाओ ।
नीलेश ने हैरत से जलवा की तरफ़ देखा । पर वह खुद उसी की तरफ़ देख रहा था ।
तब नीलेश ने बच्चे का ध्यान अपनी तरफ़ खींचने के लिये मुँह से सीटी बजायी । बच्चे ने चौंककर सहमकर उसकी तरफ़ देखा । नीलेश ने उसे नीचे आने का इशारा किया । पर बच्चा मुँह फ़ेरकर परे देखने लगा ।
- मैं ! नीलेश थोङा उच्च स्वर में बोला - शक्तिमान का दोस्त हूँ । क्या आप उससे मिलोगे ?
बच्चे ने चौंककर अविश्वसनीय भाव से उसकी तरफ़ देखा । और बोला - आप सच कह रहे हो अंकल ?
- हाँ बेटा ! नीलेश मुस्कराकर बोला - और तुम्हें चाकलेट भी दिलवाऊँगा ।
कुछ सोचता हुआ असमंजस के भाव में बच्चा नीचे आने को मुङा । और फ़िर तीन मिनट में नीलेश के सामने था । लगभग चार साल का यह बच्चा गोरा गोल मटोल तंदुरस्त और सुन्दर था । अभी वह उससे कुछ बात कर पाता कि तभी एक युवती उस तरफ़ आती दिखाई दी ।
उसने बच्चे को आवाज दी - मोनू क्या हो रहा है वहाँ ? और ये अंकल कौन है ?
आँखों पर काले रंग का बङे ग्लास वाला गागल लगाये वह शायद मन्दिर से वापिस आ रही थी । उसने मोनू की उंगली पकङी । और असमंजस से बोली - आप लोग ?
- जी मेरा नाम राजीव भाटिया है । नीलेश विनमृता से बोला - मेरी यहाँ नयी पोस्टिंग हुयी है । अभी कुँआरा हूँ । यहाँ रूम की तलाश में आया हूँ । पर...? उसने " कुँआरा " शब्द पर विशेष जोर देकर कहा ।

- दादा ! जलवा मन ही मन में बोला । सीधा अक्षय कुमार बोलते ना । नहीं तो अक्की ही बोल देते । वैसे ये कुङी भी ट्विंकल खन्ना से कम नहीं हैं ।
रूम की तलाश । और सरकारी आदमी । और उस पर कुँआरा भी । फ़िर फ़िल्मी हीरो सा हेंडसम । युवती के चेहरे पर तुरन्त अनोखी चमक पैदा हुयी । उसने ऊपर से नीचे तक नीलेश को " बकरा " अन्दाज में देखा । और बोली - प्लीज कम ।
- खेली खायी लगती है । जलवा अपने ही अन्दाज में उसके निर्वस्त्र शरीर की कल्पना करते हुये मन ही मन बोला
वे दोनों उसके पीछे पीछे चलते हुये उसके घर में घुस गये । अन्दर एक आदमी बैठा हुआ गाल फ़ुलाये शेव कर रहा था । उसके इशारे पर दोनों सोफ़े पर बैठ गये ।

- मेरा नाम रश्मि है । वह उसके सामने बैठती हुयी बोली - मैं भी एक क्लर्क हूँ । आपको रूम की तलाश है..?
- पर..रश्मि जी...पर..! वह शालीनता से बोला - लगता है । आपने मेरे " पर " पर ध्यान नहीं दिया । यहाँ मैं एक घन्टे से घूम रहा हूँ । और मैंने हर दरबाजे " पर " कुछ ना कुछ टोना टोटका गंडा ताबीज लटकता हुआ देखा है । ऐसा लगता है । यहाँ इंसान कम प्रेत बहुत ज्यादा रहते हों । और ऐक्चुअली मैं प्रेतों से बहुत डरता हूँ । ये सब क्या है ?
- और मेरी तो निकल ही पङती है । जलवा भयभीत सा बोला - आय मीन यूरिन ।
- ओफ़ ! राजीव जी ! रश्मि अदा से लट को झटकती हुयी बोली - आप भी पढे लिखे होकर इन मनगढंत अंधविश्वासों में यकीन करते हैं । भूत प्रेत नाम की कोई चीज दुनियाँ में नहीं होती । बल्कि दुनियाँ में छोङिये । मैं तो कहती हूँ । कहीं भी नहीं होती । ये सब ठगों और अग्यानी लोगों द्वारा फ़ैलायी गयी अफ़वाहें हैं । जिनमें कोई दम नहीं । आप मुझे कहिये राजीव जी । मैं आधी रात को आपके साथ कही भी.. चलने को तैयार हूँ । आधी रात को आप जो बतायें.. करने को तैयार हूँ । आप एक बार कह के.. तो देखिये ..?

उसके आदमी ने चौंककर घूरकर उसकी तरफ़ देखा । पर रश्मि ने उधर देखा तक नहीं ।
- सारे काम आधी रात को ही करती है क्या ? जलवा आदतानुसार मन में बोला ।
- बिलकुल जी बिलकुल । नीलेश उसका भरपूर समर्थन करता हुआ बोला - आपने तो मेरा आधा डर ही खत्म कर दिया । आधा क्या पूरा ही खत्म कर दिया । जो थोङा सा शेष है । वो आधी रात को ..? उसने जानबूझ कर बात अधूरी छोङ दी ।.. लेकिन कुछ अनपढ गंवार टायप लोग मुझसे कह रहे थे कि - यहाँ कमरा भूलकर मत लेना । यहाँ डायन का इलाका है ।
- मैं नहीं मानती । उसने मानों जिद की - वो एक बेचारी बूङी औरत है । जो अपने ससुराल पक्ष के मकान में रहती है । उसका दुनियाँ में कोई नहीं है । बेचारी भीख वगैरह मांगकर गुजर बसर करती है । अच्छी भली बूङी काकी को लोगों ने डायन बना दिया । मैं तो अक्सर

उसके घर भी हो आती हूँ । अब उसके पास खाने को कुछ नहीं है । तो वह रोटी प्याज माँग लेती है । आप बताईये । इसमें गलत क्या है ? और आप मीडिया के पढे लिखे लोगों की मानसिकता देखिये । उसे रोटी प्याज माँगने वाली डायन चुङैल के नाम से मशहूर कर दिया । राजीव जी..आप ही बताईये । प्याज के साथ रोटी खाना क्या चुङैल होने की निशानी है । मैं खुद प्याज के साथ रोटी खाती हूँ ।
- ना जी ना । नीलेश ने उसके समर्थन में ना ना करते हुये सिर हिलाया - मैं खुद रोटी के साथ प्याज खाता हूँ । ऐसे तो लोग फ़िर मुझे भी जिन्न बोलेंगे ।
-  राजीव जी ! आप बेशक मेरी बात पर विश्वास करिये । आप मेरे यहाँ रूम में रहिये । बतौर पेइंग गेस्ट रहिये । अगर डायन चुङैल आपके पास भी फ़टक जाये । तो आप जो कहें..?
- वो आप आधी रात को भी.. करने को तैयार हैं । जलवा ने मानों उसका समर्थन करते हुये बात पूरी की ।
- देखिये राजीव जी ! वह जलवा की बात को अनसुना करते हुये बोली - ये गंडा तन्त्र वगैरह मेरे दरवाजे पर भी बंधा है । आपको मोनू के हाथ पर और मेरे मिस्टर के हाथ पर भी बंधा दिखेगा । पर वह मेरे हसबेंड का ख्याल है । हम एक दूसरे की सोच का सम्मान करते हैं । वे मेरे " काम " में दखल नहीं देते । मैं उनके काम में । मेरी सोच है । इंसान ही इंसान के काम आता है । इसलिये जरूरत पङने पर आधी रात को..
- भी एक दूसरे के काम आना चाहिये । जलवा ने ग्यानियों के अन्दाज में बात पूरी की ।

नीलेश उठ खङा हुआ । और दो मिनट तक कमरा बाथरूम आदि देखने का बहाना करता रहा । रश्मि ने उसे लैट्रीन तक दिखायी । और काफ़ी जोर देकर बताया कि वह सफ़ाई में खास रुचि रखती है । उसे सफ़ाई बेहद पसन्द है । इस दौरान उसने नीलेश से सटने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने दिया ।
नीलेश ने मोनू को एक चाकलेट थमायी । और एक सप्ताह बाद आने को कहकर बाहर आ गया ।
- दादा ! जलवा फ़ुसफ़ुसाकर बोला - ये मेरे कू डायन से भी ज्यादा चुङैल लगती है । नहीं मानों तो आप देख लेना आधी रात को..?
नीलेश कुछ न बोला । अब तक का समय बेकार गया । कोई खास महत्व की बात पता नहीं चली । बात पता करनी भी नहीं थी । वह इस क्षेत्र पर डायन का प्रभाव भय और उससे हुयी हानि का आंकलन करना चाहता था ।

जब मोनू ने डायन से बचाने का जिक्र किया । तो उसे लगा कि यहाँ कुछ पता लगे । पर सब बेकार गया ।
अभी वह ऐसी ही सोचों में चला जा रहा था कि तभी पीछे से आवाज आयी - मि. राजीव ! रुकिये प्लीज ।
वह रुक गया । पीछे रश्मि का पति था । वह बिना स्टार्ट बाइक को तेजी से उसकी तरफ़ ला रहा था । पास आकर उसने दोनों को बाइक पर बैठने का इशारा किया । और बाइक स्टार्ट कर दौङा दी ।
करीब पन्द्रह मिनट बाद वे तीनों एक पार्क की बेंच पर बैठे हुये थे ।
उस आदमी का नाम नीलकांत था । नीलकांत समझदार था । पर गम्भीर और दब्बू स्वभाव का था ।
- देखिये राजीव जी ! वह मानों भूमिका बनाता हुआ बोला - मैं आपको यही राय दूँगा कि आप इस क्षेत्र में बिलकुल न रहें । अब हम लोग तो अपना मकान होने से मजबूरी में फ़ँसे ही हुये हैं । पर आप क्यों बेकार में किसी चक्कर में फ़ँसे । वह बुङिया हंड्रेड परसेंट डायन है । नो डाउट । शीज रियल विच ।
और ऐसा मेरा ही नहीं । यहाँ के भुक्तभोगी हजारों लोगों का यही मानना है । डायन ने उन्हें बहुत नुकसान पहुँचाया है । बहुत डराया है । पर लोग आखिर करें । तो करें भी क्या ? हाँ सरकार को इस मामले में कोई उचित कदम उठाना चाहिये । एंटी टेरिरिस्ट की तरह कोई एंटी घोस्ट टायप यूनिट वगैरह ।
- क्या नुकसान ? नीलेश को उत्सुकता हुयी ।
- यही तो अजीब बात है कि हम ये कह भी नहीं सकते कि ये नुकसान या हादसे उसी की वजह से होते हैं । पर जाने क्यों दिल को ऐसा लगता है कि इसके पीछे उसी का हाथ है । वह

हमारे दरबाजे पर आकर खाना माँगती है । और न देने पर हमारे बच्चे के मर जाने की बात कहती है । पुरुष के मर जाने की बात कहती है । स्त्री को रांड होने की दुआयें देती है । यदि हम खाना दे भी देते हैं । तो कभी आधा ऊधा खाकर हमारे ही दरबाजे पर डाल जाती है । वह हमारे घर के आगे हड्डियाँ बिखेर जाती है । कोयले ईंट आदि से विचित्र सा कुछ लिख जाती है । वह पीने को शराब भी माँगती है । कभी कहती है । उसे श्रंगार का सामान दो । उसे श्रंगार करना है । और जब भी वह ऐसा करती है । हमारे घर कोई न कोई हादसा घटित होता है ।
- पर ये तो एक पागल औरत के लक्षण हुये । नीलेश दार्शनिक अंदाज में बोला ।
- यही तो । यही तो । लगता यही है कि यह पागल औरत के लक्षण हैं । पर हमारे बुजुर्ग बताते हैं । ये सब डायन के लक्षण हैं । वह रात को यकायक हमारे घर के बाहर खङी मिलती है । बच्चों को दूध पिलाने या गोद में खिलाने की बात भी करती है आदि...
कुछ देर बाद इस तरह समझाकर वह हाथ मिलाकर विदा हो गया ।
- दादा इसको । जलवा कान खुजाकर बोला - डायन की कम इस बात की ज्यादा फ़िक्र लगती है कि कहीं आप इसके किरायेदार न बन जाओ । फ़िर आधी रात को..।
- शटअप ! नीलेश बनाबटी गम्भीरता से बोला - किसी का मजाक बनाना अच्छी बात है क्या ।
और एक तरफ़ चल दिया । अब तक कोई खास बात नहीं बनी थी ।

कोई टिप्पणी नहीं:

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...