मंगलवार, जुलाई 26, 2011

डायन THE WITCH 11

शाम घिरने लगी थी । अंधेरा फ़ैलता जा रहा था । नीलेश को मालूम था । मौलश्री दिन के समय अपने निवास पर ना के बराबर ही जाती है । अतः वह पूरा दिन शहर में ही घूमता रहा । उसने मौलश्री के पीछे जाने की कोई कोशिश न की कि दिन में वह कहाँ जाती है । और क्या करती है ? एक बार को उसके दिमाग में आया कि वह पीताम्बर या हरीश से सम्पर्क करे । फ़िर अपने इस विचार को उसने दिल से निकाल दिया । ऐसा करना उसकी योजना में बाधक हो सकता था । अतः वह उस कालोनी में जाने से भी बचा । जो पीताम्बर की कालोनी थी ।
वास्तव में वह अकेले ध्यान में बैठना चाहता था । जो इस समय उसके लिये बेहद जरूरी था । और बेहद सहायक हो सकता था । पर जलवा नाम की मुसीबत उसके साथ थी । इसलिये ऐसा कर पाना मुश्किल हो रहा था ।
रात नौ बजे के करीब खाना वाना खाकर वह डायनी महल पहुँचा । मौलश्री अपने कमरे में ही मौजूद थी । और जारजार आँसुओं से रो रही थी । उन दोनों को देखकर भी उस पर कोई असर नहीं हुआ । और वह काफ़ी देर तक रोती रही । नीलेश ने उसे रोकने की कोई कोशिश नहीं की ।
फ़िर जब उसने आँसू पोंछे । तो नीलेश बोला - क्या हुआ तायी ?
- कुछ नहीं बेटा ! वह शून्य में देखती हुयी मरी मरी आवाज में बोली - कुछ नहीं । इस दुनियाँ में कोई किसी का नहीं होता । मैं बूङी अकेली असहाय औरत इस क्रूर दुनियाँ से थक गयी । लङते लङते थक गयी । पर जाने क्यों मुझे मौत नहीं आती । दूध पीते बच्चे मर जाते है । जवान मर जाते हैं । पर मैं बूङी ज्यों की त्यों बैठी हुयी हूँ ।

- हे भगवान ! उसने अचानक जोर जोर से छाती पीटी - किसी और की मौत आती हो । वो मुझे आ जाये । मेरी बन के आ जाये । क्यूँ मुझ बुङिया को घसीट रहा है ।
- ये तेरा कैसा इंसाफ़ है । ऊपर वाले । लोग मुझे डायन कहते हैं । अपने बच्चों को मेरी नजर से बचाते हैं । किसी के दरबाजे पर जाऊँ । तो डर से उसके प्राण ही सूख जाते हैं । मेरी औलाद तक मुझे छोङ गयी । फ़िर भी तूने मुझे क्यों जिन्दा रखा हुआ है ।
कहकर उसने चाकू उठा लिया । और अपने सीने को लक्ष्य करते हुये बोली - लगता है । अब तू मुझे मुक्ति नहीं दे पायेगा । मैं खुद ही..?
- तायी ! नीलेश ने झपटकर उसका चाकू छीना - क्या करती है ?
मौलश्री का चेहरा सख्त हो गया । उसकी आँखे लाल लाल होकर खूनी भेङिये के समान चमकने लगी । नीलेश को

वनखण्डी मन्दिर के पीछे लङते सूक्ष्म शरीरी बनाबटी जीवों की याद हो आयी । बुङिया के हाथों में गजब की ताकत आ गयी । उसने नीलेश को मारने के लिये हाथ ऊँचा किया ।
जिसे नीलेश ने हवा में ही थाम लिया । और बुङिया की खूनी आँखों में आँखें डाल दी ।
- योगी ! वह गुर्राई - मेरे काम में दखल न दे । यह सृष्टि का नियम है । यह सत्ता का खेल है । इसको कोई रोक नहीं सकता ।
- चंडूलिका साक्षी ! नीलेश गम्भीर स्वर में बोला - तूने वह कहानी नहीं सुनी । मारने वाले से बचाने वाला अधिक बङा होता है । और तन्त्र ( सिस्टम ) उसका ही मददगार होता है । यह ठीक है । तू नियम के अंतर्गत ही मारती है । पर यह भी उतना ही ठीक है कि मैं नियम के अंतर्गत ही बचाता हूँ । तेरा काम मारना है । तो मेरा काम बचाना है । अगर रोग होता है । तो दवा भी होती है । समस्या होती है । तो समाधान भी होता है । क्या तू मुझे बतायेगी । इस लङकी ( मौलश्री ) की क्या गलती थी ? जो इसे जीती जागती डायन बना दिया गया ।
वह अचानक कसमसाई । उसने अपने मुँह पर वृताकार हाथ घुमाया । और शरीर परिवर्तन करने लगी । कुछ ही देर में बूङी मौलश्री की जगह पूर्ण युवती नजर आने लगी । पैर के नाखून से लेकर सिर तक वह भरपूर शरीर वाली सौंदर्य की देवी में बदल गयी । उसने बेहद कामुक नजरों से नीलेश को देखा ।

- मैंने ! वह बिना विचलित हुये बोला - तुमसे कुछ पूछा है । इस लङकी की क्या गलती थी ? जो इसे जीती जागती डायन बना दिया गया ।
- ये मैं नहीं जानती । वह पूर्ण निर्भीकता से बोली - किसी को कुछ भी क्यों बनाया जाता है । कोई भी कुछ क्यों बनता है । इससे हमें कोई मतलब नहीं । किसी को क्यों मारा जाता है । इससे हमें कोई मतलब नहीं । किसी को क्यों छोङ भी दिया जाता है । इससे भी हमें कोई मतलब नहीं । हमारा काम देवी मृत्युकन्या के आदेश का पालन करना भर है बस ।
वह सही कह रही थी । एकदम सही कह रही थी । नीलेश को लगा । वह कच्चा पङने वाला है । तभी उसके दिमाग में गूँजा - सर्वत्र ।
- तो फ़िर ! वह खोखले स्वर में बोला - फ़िर इसका जबाबदेह कौन है ? कौन होगा ।
- स्वयँ मृत्युकन्या ! वह बोली - या फ़िर स्वयँ भगवान ।
नीलेश ने उसका हाथ छोङ दिया । चंडूलिका को मानों अपने वस्त्रों से खासी परेशानी हो रही थी । उसने सभी वस्त्र निकालकर एक ओर उछाल दिये । जलवा चोर नजरों से उसकी देहयष्टि को देख रहा था । और वह भी प्यासी नायिका की तरह उन्हें ही देखे जा रही थी । तब नीलेश को अचानक एक ख्याल आया । प्रसून भाई का सफ़ल फ़ार्मूला ।

- देख साक्षी ! वह बोला - माध्यम शरीर ही सही । पर तू अभी का अभी स्वर्ग का मजा लूट सकती है । दो जवान लङके तुझे तृप्त करने हेतु काफ़ी हैं । फ़िर हम लम्बी रेस के घोङे भी हैं । क्या ख्याल है तेरा ?
उसने दाँतो से होठ काटा । उसकी आँखों में पल भर के लिये चमक सी लहरायी । फ़िर वह बोली - कहो । मगर वादा याद रखना ।
- पहले ही कह चुका । वह फ़िर से बोला -  इस लङकी की क्या गलती थी ? जो इसे जीती जागती डायन बना दिया गया ।
- ये अभी डायन नहीं है । वह बोली - ये अभी सिर्फ़ निमित्त है । यह अभी सिर्फ़ उपकरण मात्र है । वास्तव में इसका नियंत्रण मेरे हाथ में है । और इसका निमित्त होना इसकी संस्कार फ़ल से बनी किस्मत का खेल ही है । सुनो योगी । ये कहानी वहीं से शुरू हो गयी थी । जब ये बहुत छोटी थी । और इसकी माँ मन्दिर परिसर में कामभोग करती थी । ये छुपकर छुपकर उसको देखती थी । अभी ये रजस्वला भी नहीं हुयी थी । और काम इसके शरीर में जागृत होने लगा । तुम्हें मालूम होगा । रजस्वला होने से कुछ पहले तक लङकी देवी रूपा होती है । आगे अगर वह कायदे से इस रज को तपाती हुयी अपने पति को ही समर्पित होने को तैयार होती है । और समय आने पर उसको अर्पित करती है । तब वह महान पतिवृता होती है । इसके बाद जब वह पति को ही अपनी देह अर्पित करती है । और पर पुरुष का ख्याल तक नहीं लाती । तब वह सत को साधने वाली सती और फ़िर से देवी रूप होने लगती है । इसके बाद अपने से पहले पति की मौत हो जाने पर उसके विछोह को अनुभव करते हुये नहीं जीती । अर्थात पति के साथ ही प्राण त्याग देती है । और एक ही चिता पर दोनों का दाहकर्म होता है । वे पति पत्नी हजारों वर्ष स्वर्गिक भोग का आनन्द लेते हैं । ठीक 


यही नियम पुरुष पर भी लागू होता है ।
नीलेश ने उसे टोकना चाहा ।
पर वह उससे पहले ही बोली - मैं वह भी बता रही हूँ । लेकिन मौलश्री कन्या पन में ही अछूत हो चुकी थी । कच्चा काम इसके शरीर में जागृत हो चुका था । ऐसा पात्र या तो रोगी होकर मृत्यु को प्राप्त होता है । या फ़िर अदम्य शक्तिशाली काम नायिका के रूप में उसका रूपांतरण हो जाता है । केवल वस्त्रों को रंगे मगर अन्दर से काम भावना के भूखे भेङिये रूपी साधु इसको बेटी पुत्री कहकर जब दुलारते थे । सहलाते थे । वे अपनी वासना की ही पूर्ति करते थे । उन सभी के द्वारा आरोपित कामभावना रूपी काम कीङे मौलश्री के बदन में बेतहाशा रेंगने लगे । और ये वर्जित फ़ल के लिये व्याकुल होने लगी । उधर काने साधु ने इसके रजस्वला होने से पहले ही इसका शीलभंग कर दिया । और आप गलती पूछ रहे हो ।
मन्दिर में कामवासना का खेल । रजस्वला होने से पूर्व कामसेवन । अवैध कामभोग । कई पुरुषों की कामिनी नायिका । तरह तरह के तांत्रिक मांत्रिक कापलिकों आदि से से इसने मुक्त भोग किया है । फ़िर भी तृप्त नहीं हुयी । तब बताईये । कितनी देर ये पापिन बच सकती थी । नियम अनुसार तो कच्चा काम सेवन करने से ही यह घोर पापिन हो गयी थी । उसी समय तय हो गया था कि इसको मृत्युकन्या की गण बनना होगा । क्योंकि अतृप्त भोग की अवैध अदम्य चाह ही हम जैसी डायनों चुङैलों यक्षणियों निम्न देवियों आदि का निर्माण करती है । और आप कह रहे हो । इसकी क्या गलती थी ।
नीलेश को यकायक कोई बात न सूझी । वह अक्षरशः सच कह रही थी ।

- फ़िर भी ! वह बोला - उसमें मासूम मौलश्री की क्या गलती थी । परिस्थितियों ने जैसा खेल उसके साथ खेला । वह बनती चली गयी । गलती तो उन लोगों की है । जिन्होंने इस नासमझ को पतन के गर्त में झोंक दिया ।
- गलती है । वह जहरीले स्वर में बोली - इसकी बराबर गलती है । चलो जब ये मजबूर थी । नासमझ थी । बेबस थी । माना इसकी गलती नहीं थी । मगर बाद में तो ये अपना रुख बदल सकती थी । संसार में ऐसे भी जीव ( इंसान ) हैं । जो नदियों का रुख बदल देते हैं । पहाङों का सीना चीरकर रास्ता बना देते हैं । हवा को अपना रुख बदलने पर मजबूर कर देते हैं । धरती में लात मारकर पानी की धारा निकाल देते हैं । जो किस्मत का लिखा दुर्भाग्य मेंटकर सौभाग्य में बदल देते हैं । स्वर्ण अक्षरों में जिनका इतिहास लिखा जाता है । और आप कह रहे हो । इसकी क्या गलती थी ।
- मगर इसको ! वह जिद भरे स्वर में बोला - वैसा कोई प्रेरक नहीं मिला ।
- हे योगी ! तुम व्यर्थ की जिद कर रहे हो । ऐसा कभी नहीं होता । दुनियाँ में हर चीज के दोनों ही पक्ष मौजूद है । एक सही पक्ष । और दूसरा गलत पक्ष । एक पाप । और एक पुण्य । यहाँ दयालु हैं । तो क्रूर भी हैं । यहाँ लुटेरे हैं । तो दानी भी हैं । हर बारह घन्टे बाद दिन ( सुख ) होता है । तो उसके तुरन्त बाद रात ( दुख ) भी आती है । फ़िर उस बारह घन्टे की रात के बाद

फ़िर से दिन आता है । इस तरह दोनों पक्षों का आना जाना लगा रहता है । अतः एक से दिन कभी नहीं रहते । इंसान को ऐसे ही क्षणों ( दुख के ) में संयम और धैर्य से कार्य लेना चाहिये । यह जिस समय भी चाहती । अपना जीवन सुधार सकती थी । किस्मत की धारा मोङ सकती थी । पर इसने ऐसा किया क्या । इसको बराबर प्रेरक मिले । बचाने वाले मिले । सबको ही मिलते हैं । पर इसने बचना ही नहीं चाहा । और आप कह रहे हो । इसकी क्या गलती थी । तब इसने डायन बनना ही बनना था ।
- मैं यह कह रहा हूँ । नीलेश ने मानों व्यर्थ का मूर्खतापूर्ण प्रश्न जानबूझ कर किया - मान लो । इसके परिवार को न मारा जाता । तो इसकी माँ वहाँ से इसे लेकर न भागती । मन्दिर की शरण न लेती । तब शायद इसका जीवन आज कुछ और ही होता ।
- कोई न काहू सुख दुख कर दाता । चंडूलिका साक्षी शून्य 0 में देखती हुयी बोली - निज करि कर्म भोग सब भ्राता । योगी । ये संसार विलक्षण है । विचित्र है । इन शब्दों पर ध्यान दो । विलक्षण और विचित्र । विलक्षण मतलव जिसके लक्षण न जाने जा सकें । विचित्र मतलव जिसका कोई एक निश्चित चित्र दृश्य स्पष्ट न बनता हो । यहाँ जो आज घटित होता है । उसकी रूपरेखा हजारों वर्ष पूर्व गुजरे जन्मों में ही लिख गयी होती है । कर्म संकलन के निचोङ से जो फ़ल बनता है । वो कई जन्मों बाद घटित होता है । यह दैव है ।
लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि इस पर कोई नियंत्रण नहीं हो सकता । जीव ( सिर्फ़ इंसान ) जिस क्षण से चाहे । अपने कर्मों की गति मोङ  सकता है । पापी पुण्यात्मा बनना शुरू हो सकता है । और धर्मात्मा किसी भी क्षण से पापी बनना शुरू हो सकता है । आज ये 85 वर्ष की डायन को जीवन में कितना ही समय और कितने ही अवसर आये होंगे । जब यह अपने कर्मों की धारा विपरीत मोङ सकती थी । पर इसने ऐसा किया क्या ? और आप कह रहे हो । इसकी क्या गलती थी ।
- मैं एक बात और भी बताती हूँ । इसके साथ जो हुआ था । उसके फ़लस्वरूप इंसानी दुनियाँ के लिये इसके मन में जहर ही जहर भरा हुआ है । इसने कई दूध पीते बच्चों को मारा है । कामभोग के द्वारा आवेशित कर इसने कामी पुरुषों का सार ( जीवन सत्व । इसे वीर्य न समझें । यह अलग और चेतना से सम्बन्धित होता है । इसमें चेतना निर्बल होती है ) निचोङा है । यह लोगों को अपने से भयभीत हुआ देख आनन्दित महसूस करती थी । तब इसकी प्रतिशोध भावना को अपार सुख होता था ।
- ड डायन डायन डायन डायन...! नीलेश के दिमाग में अनायास ही फ़िर से गूँजने लगा - ड डायन डायन डायन डायन...! ड डायन डायन डायन डायन...ड डायन डायन डायन डायन...! ! 

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