मंगलवार, जुलाई 26, 2011

डायन THE WITCH 13

अगले दिन के अखवार पर जैसे ही नीलेश की नजर गयी । वह खबर पढकर मुस्कराया ।
- और हुयी रहस्यमय बुङिया की रहस्यमय मौत । डायन का अन्त ।
हमारे विशेष संवाददाता के अनुसार - शहर में आतंक का पर्याय मानी जाने वाली रहस्यमय डायन के नाम से प्रसिद्ध वह बूङी औरत आखिरकार रहस्यमय तरीके से ही मृत्यु को प्राप्त हुयी । ऐसा अनुमान लगाया लगाया जाता है कि उसके घर में किसी तरह आग लग गयी । और वह जल मरी । डायन के नाम से प्रसिद्ध यह औरत अपने बेहद टूटे फ़ूटे पुश्तैनी मकान में अकेली रहती थी । उसके रिश्तेदारों सम्बन्धियों के बारे में भी उसके आसपास रहने वालों को कुछ पता नहीं है । कुछ बुजुर्ग लोगों ने बताया कि उसका एक पुत्र है ।  पर वह कहाँ है । किसी को कुछ पता नहीं । डायन के नाम से प्रसिद्ध उस औरत का दाह संस्कार करने की भी आवश्यकता नहीं आयी । क्योंकि उससे पहले ही वह जल चुकी थी । उसकी आधे से अधिक जली लाश को पोस्टमार्टम हेतु ले जाया गया है ।

इसके कुछ ही देर में पीताम्बर का फ़ोन आ गया - हाँ नीलेश जी ! आपको एक खुशखबरी सुनाता हूँ । डायन मर गयी । आखिर भगवान भी कोई चीज है भाई । मेरा तो यही मानना है । भक्ति में बङी शक्ति है । देखो आप माइंड मत करना । पर ..पर क्योंकि अभी आप सीख ही रहे हो । मुझे नहीं लगता आप कुछ कर पाते ।
और मुझे नहीं लगता । वो आपके प्रसून जी भी कुछ ज्यादा कर पाते । वो कोई छोटी मोटी चीज नहीं थी । वो डायन थी । डायन । आखिर हम लोगों ने कहाँ कहाँ नहीं मन्नत माँगी थी । उससे छुटकारे के लिये । अब छुटकारा हो गया । हमेशा के लिये हो गया । अब हमारे बच्चे निर्भय होकर खेल सकते हैं । हम बहुत सुखी हो गये ।
इसके तीन बाद जलवा का फ़ोन आया - हाँ दादा ! वो रामू जी शूटिंग कबसे कर रहे हैं ? अगर वो लोकेशन पसन्द ना हो । तो फ़िर मेरे गाँव में आपको एक साथ 40 भूत मिल जायेंगे । हमारे खेत में बम्बे के पास जो बगिया में बरी ( बरगद का पेङ ) है ना । उस पर 40 भूत रहते हैं ।

- अरे तो तुम लोग क्या । नीलेश अजीब से स्वर में बोला - हनुमान चालीसा की जगह भूत चालीसा पढते हो ।
- मतलव ? जलवा उलझकर बोला ।
- मतलव यही हनुमान चालीसा पढने से  40 भूत भाग जाते हैं । और तेरे गाँव में  40 भूत  रहते हैं । फ़िर इसका मतलब तो यही हुआ । लोग जरूर भूत चालीसा पढते होंगे ।
- सही बोला दादा । मुझे लगता है । जलवा आश्चर्य से बोला - आप सच ही कह रहे हो । इस प्वाइंट पर तो मैंने आज तक सोचा ही नहीं । कभी गौर ही नही किया । लेकिन दादा ! आपसे एक ही रिकवेस्ट है । रामू जी की फ़िल्म में किसी छोटे मोटे भूत का रोल मुझे जरूर दिलवाना ।
- ओके..जलवा.. ओके ! कहकर नीलेश ने फ़ोन काट दिया ।
दरअसल अलौकिक घटनाओं के समय जलवा शून्यवत ही हो जाता था । और जो बाह्य घटनायें उसने देखी भी थी । वह मृत्युकन्या का मामला अलौकिक प्रसंग होने से उसे किसी भूले हुये आधे अधूरे भृमित सपने की तरह ही याद रहना था । क्योंकि उस पूरा समय वह नीदं स्वपन जागृति से हटकर तन्द्रा अवस्था में रहा था
तब उसे मानसी की याद आयी । उसने नम्बर डायल किया । और सेलफ़ोन कान से लगाकर उसके मधुर स्वर की प्रतीक्षा करने लगा ।
- यू लुच्चे लफ़ंगे.. बदमाश..बास्टर्ड.. यू फ़ूल । उधर से मानसी की दहाङ सुनाई दी - तेरी हिम्मत कैसे होती है साले । मुझे फ़ोन करने की । यू भैण के लुक्के । गली के फ़ुक्के..बस एक बार अपना पता बता । तू मेरे को अपनी आई डी बता साले । फ़िर तेरा....न निकाल दूँ तो कहना ।

- बाप रे बाप ! नीलेश आश्चर्य से बोला - तू ऐसे भी बोल लेती है ।
- क्या ..हा..ओ माय गाड ! वह बकरी की तरह मिमियायी - यह तुम हो । हा...मैं मर जाँवा । ओय रब्ब.. हा.. ये क्या क्या बोल गयी मैं । ओय रब्ब  ।
- अच्छा पश्चाताप छोङ ! नीलेश हँसता हुआ बोला - ये आशीर्वाद किसको दे रही थी । क्या मुझे ?
- हा..मेरी जीभ को आग लगे । वह अफ़सोस से बोली - जो कभी तुम्हें सपने में भी ऐसा बोलूँ । मैंने गुस्से में बिना नम्बर देखे ही बोलना शुरू कर दिया । कोई साला लुक्का मेरे को ब्लेंक काल करता है । मैं समझी वही है ।
- पर जाँनू ! अचानक वह इठलाती हुयी सी बोली - कहाँ हो तुम । आजकल केलों का सीजन है । मेरा खाने को बहुत दिल करता है ।
नीलेश ने हँसते हुये फ़ोन काट दिया । तुरन्त फ़िर से फ़ोन बजा । उसने फ़िर से काटा । फ़िर से बजा । अब यही सिलसिला चलना था । क्योंकि दूसरी तरफ़ मानसी थी । आखिरकार वह बात करने लगा ।

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