मंगलवार, जुलाई 26, 2011

डायन THE WITCH 2

- ये बङी विचित्र कहानी है । गिलास से चाय का घूँट भरता हुआ पीताम्बर बोला - समझ में नहीं आ रहा । कहाँ से शुरू करूँ ?
नीलेश कुछ नहीं बोला । और साधारण भाव से उन्हें देखता रहा ।
आगंतुको में लगभग 50 साल के दोनों आदमियों का नाम पीताम्बर सेठ और रामजी था । युवा लङके का नाम हरीश था । और साथ में आये वृद्ध - जो एक गारुङी ( ओझा ) था का नाम सुखवासी था । उन चारों में से कोई भी नीलेश का पूर्व परिचित नहीं था । और न ही इससे पहले उन्होंने नीलेश को देखा था ।
सुखवासी बाबा तो उसे बेहद उपहास की नजर से देख रहा था । बाकी तीनों के चेहरों का खत्म होता विश्वास भी बता रहा था कि किसी ने उन्हें यहाँ भेजकर भारी गलती की है । ये बच्चा भला क्या करेगा ?
पर जब आये हैं । तो औपचारिकता भी निभानी है । और शायद..? भेजने वाले का कहा सच ही हो । दूसरी बात - 


जब अपना ऊँट खो जाता है । तो घङे में भी खोजा जाता है । ऐसे ही मिले जुले भाव रह रहकर उन चारों के चेहरे पर आ जा रहे थे ।
लेकिन गारुङी सुखबासी बाबा की पूरी पूरी दिलचस्पी नीचे आंगन में बैठे बाबाओं में अवश्य थी । और उसे लग रहा था कि उनमें से कोई दिव्य पुरुष पीताम्बर की समस्या दूर कर सकता है । कुछ कुछ ऐसे ही भाव शेष तीनों के भी थे कि नीचे वालों से बात करते । तो ज्यादा उचित था ।
नीचे बैठे बाबाओं ने भी उन्हें मुर्गा बकरा समझते हुये घेरने की कोशिश की । पर उनकी हकीकत से परिचित बदरी ने उन्हें सख्ती से रोकते हुये आगंतुको को ऊपर भेज दिया । और वे चारों अब उसके सामने बैठे थे । बदरी बाबा सबके लिये चाय रख गया था । जिसे पीते हुये बातचीत शुरू हो गयी थी ।
- ये पूरा मायाजाल । पीताम्बर आगे बोला - दरअसल एक रहस्यमय बुढिया औरत को लेकर है । जो हमारी ही कालोनी में मगर सभी मकानों से काफ़ी दूर हटकर एक पुराने किलानुमा बेहद बङे मकान में रहती है ।
यह सुनते ही नीलेश को न चाहते हुये भी हँसी आ ही गयी


- मैं । पीताम्बर थोङा सकपका कर बोला - आपके हँसने का मतलब समझ गया । मगर कभी कभी वास्तविकता बङी अटपटी होती है । दरअसल हमारी कालोनी जिस स्थान पर है । उससे 2 फ़र्लांग की दूरी पर ( 5 फ़र्लांग = 1 किमी ) किसी जमाने में किसी छोटे मोटे राजा का किला था । करीब 200 साल पुराना वह किला और किले के आसपास उसी समय के बहुत से जर्जर भवन अभी भी गुजरे वक्त की कहानी कह रहे हैं । बहुत से प्रापर्टी डीलरों ने इस भूमि को लेकर इसका नवीनीकरण करने की कोशिश की । पर विवादों में घिरी वह सभी भूमि जस की तस पुरानी स्थिति में ही है ।


दूसरे वह टूटी फ़ूटी हालत के भवन झाङ पोंछ देख रेख के उद्देश्य से किराये पर उठा दिये थे । जिसकी वजह से बहुत से किरायेदारों ने लगभग उस पर कब्जा ही कर रखा है । ऐसी हालत में वह एक किमी के क्षेत्रफ़ल में फ़ैला किला और राजभवन से जुङे अन्य भवन सभी खस्ता हालत में निम्न वर्ग के लोगों की बस्ती बन गये हैं । और जैसा कि मैंने कहा कि - हमारी निम्न मध्यवर्गीय कालोनी सिर्फ़ उससे 2 फ़र्लांग की दूरी पर ही है ।
नीलेश ने एक सिगरेट सुलगायी । और बेहद शिष्टता से सिगरेट केस उन लोगों की तरफ़ बङाया । हरीश को छोङकर उन तीनों ने भी एक एक सिगरेट सुलगा ली ।
- अब मैं वापस उस रहस्यमय बुढिया की बात पर आता हूँ । पीताम्बर एक गहरा कश लगाता हुआ बोला - ये आज से कोई बीस बाइस साल पहले की बात है । जब बुढिया के बारे में लोगों को पता चला कि..??
अचानक नीलेश बुरी तरह चौंका । और तिमंजिला कमरे की खिङकी की तरफ़ देखने लगा ।


- ड डायन डायन डायन डायन...! एकदम उसके बोलने से पहले ही नीलेश के मष्तिष्क में एक शब्द ईको साउंड की तरह गूँजने लगा -ड डायन डायन डायन डायन...ड डायन डायन डायन डायन...ड डायन डायन डायन डायन...!
उसके खुद के रोंगटे खङे हो गये । बङी मुश्किल से उसने खुद को खङा होने से रोका । और संभलकर आगंतुको को देखने लगा । हँसती हुयी छायारूप एक खौफ़नाक बुढिया खिङकी पर बैठी थी ।
- मृत्युकन्या ! इस शब्द को उसने बहुत मुश्किल से मुँह से निकलने से रोका - साक्षात मृत्युकन्या की गण बहुरूपा यमलोक की डायन खिङकी पर विराजमान थी । और निश्चित भाव से हँस रही थी । इतनी जबरदस्त शक्ति कि प्रेतवायु के जिक्र पर ( यानी अपने बारे में बात होने पर ही ) ही जान जाती थी । किसी आवेश की आवश्यकता नहीं । किसी मन्त्र संधान की आवश्यकता नहीं । उफ़ ! वह कालोनी फ़िर भी सलामत थी । यह कोई चमत्कार ही था ।


- कोई चमत्कार नहीं योगी ! डायन उससे सूक्ष्म सम्पर्की होकर बोली - मेरा मतलब बस खास लोगों से ही होता है । जिनसे मैंने बदला लेना है । और जिनको यमलोक जाना है ? बाकी से मेरा क्या वास्ता ।
- ओ माय गाड ! नीलेश माथा रगङता हुआ मन ही मन बोला - सच ही कह रही थी वह । पर ऐसी डायन से उसका आज तक वास्ता न पङा था । ये यहाँ से डायन होकर जाने वाली डायन नहीं थी । बल्कि वहाँ से डयूटी पर आयी डायन थी । एक सिद्ध डायन । एक अधिकार सम्पन्न डायन । एक नियम अनुसार आयी डायन ।
- किस सोच में डूब गये भाई ! पीताम्बर उसको गौर से देखता हुआ बोला - मैं आगे बात करूँ ?
नीलेश का दिल हुआ । इन अग्यानियों से कहे । क्या बात करोगे । जब बात खुद ही मौजूद है । पर वह हाँ भी नहीं कर सकता था । ना भी नहीं कर सकता था । सच तो ये था कि उसकी खुद की समझ में नहीं आ रहा था कि वो डायन को डील करे । या पीताम्बर कंपनी को ।


- हाँ तो मैं कह रहा था । पीताम्बर घङी पर निगाह डालता हुआ बोला - कि बीस बाइस साल पहले जब उस बुढिया ने अपने ही नाती को मार डाला । और उसका खून पी गयी । तभी हमें पता चला कि...!
- ड डायन डायन डायन डायन...!  पुनः नीलेश के दिमाग में गूंजने लगा - ड डायन डायन डायन डायन... ड डायन डायन डायन डायन...ड डायन डायन डायन डायन...ड डायन डायन डायन डायन...!
उसकी निगाह फ़िर से स्वतः खिङकी पर गयी । डायन पहली की तरह ही खौफ़नाक मधुर मुस्कान में हँस रही थी ।
दरअसल नीलेश चाह रहा था कि किसी तरह पीताम्बर कंपनी को समझ आ जाता कि डायन बाकायदा मौजूद ही है । तो वह कुछ मन्त्र सन्त्र चलाता भी । पर पीताम्बर और उसके साथी न सिर्फ़ अपनी धुन में थे । बल्कि उन्हें अब ये भी लग रहा था कि नीलेश कुछ घबरा सा रहा है ।
उधर नीलेश ये सोच रहा था कि ये उसके लिये एकदम नया मामला था । और वह ये भी नहीं चाहता था कि नीचे बदरी बाबा और अन्य बाबाओं को खबर लगे कि मंदिर में डायन मौजूद है ।
- दाता ! उसके मुँह से निकल ही गया ।

खिङकी पर बैठी सुन्दरी ने उसे उपहासी भाव से अँगूठा दिखाया । और न चाहते हुये भी फ़िर से वह ध्वनि नीलेश के दिमाग में गूँजने लगी -ड डायन डायन डायन डायन...! ड डायन डायन डायन डायन...! ड डायन डायन डायन डायन...!   ड डायन डायन डायन डायन...!
पीताम्बर बारबार घङी देख रहा था । वह सोच रहा था कि नीलेश कुछ हाँ ना करे । तो वह समय रहते घर वापस पहुँच जाये । पर उसे ऐसे लग रहा था कि इस " लङके " की हवा खुद ही खराब हो रही है । ये भला क्या हाँ ना करेगा । छोटे मोटे भूत सूत उतार लेता होगा । छोटे मोटे टोने टोटके वाला बाबा ।
दरअसल भेजने वाले ने उन्हें किन्ही प्रसून जी का नाम बताया था । पर पिछले एक साल से प्रसून से मिलने के लिये उन्होंने जितनी जद्दोजहद की । उतने में तो शायद लादेन भी मिल जाता । पर प्रसून जी नहीं मिले । हाँ ये नया लिंक मिल गया कि - आप इनसे बात करिये ।
ये सोचते ही पीताम्बर के दिमाग में तुरन्त एक बात आयी । और वह बोला - माफ़ करिये । नीलेश जी ! ये प्रसून जी इस समय कहाँ हैं ?
नीलेश ने एकदम चौंककर उसकी तरफ़ देखा । और उसका दिल हुआ । जबरदस्त ठहाका लगाये । उसने सोचा - कह दे । शरीर किसी काटेज में । गुफ़ा में । और बन्दा । दो आसमान बाद किसी अग्यात लोक में । जाओ ..मिल आओ ।
पर वह शिष्टाचार के नाते संयमित स्वर में बोला - बहुत दिनों से उनसे मिला नहीं । शायद अपनी कीट बिग्यानी रिसर्च के चलते कहीं विदेश में हैं ।
फ़िर उनके अन्दरूनी भाव और सभी स्थितियों पर तेजी से विचार करता हुआ वह निर्णय युक्त स्वर में बोला - हाँ अब बताईये ?
पीताम्बर मानों चौंककर पूर्व स्थिति में आया । और बोला - बुढिया का बेटा उन दिनों पढाई कर रहा था । उसकी शादी हो चुकी थी । बहू के दो साल से छोटा एक बच्चा था । जिसे बुढिया ने कुँए के पत्थर पर पटक पटककर मार डाला । यह घटना शाम आठ बजे की है । तब मंदिर की तरफ़ जाते कुछ लोगों ने उसे बच्चे का खून पीते भी देखा । और तब पहली बार लोगों को पता चला कि..?
ड डायन डायन डायन डायन...! नीलेश के दिमाग में फ़िर से गूँजने लगा - ड डायन डायन डायन डायन...!ड डायन डायन डायन डायन...!  ड डायन डायन डायन डायन...! ड डायन डायन डायन डायन...! 

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