मंगलवार, जुलाई 26, 2011

डायन THE WITCH 4

नीलेश बाहर आकर नीचे मंदिर के प्रांगण में झांककर देखने लगा । पीताम्बर एण्ड कंपनी क्या कर रही है ? उसकी आशा के मुताबिक ही वे नीचे अन्य साधुओं से बात कर रहे थे ।
वह फ़िर से कमरे में आ गया ।
- आप फ़्रिक मत करिये ! उसे डायन का मधुर स्वर सुनाई दिया - उन्हें आज मंदिर में ही रुकना होगा । और उनमें से एक को । उसने आसमान की तरफ़ उँगली उठायी - आज रवाना होना पङेगा । क्या खेल है ना । मृत्यु की गोद में बैठे इंसान को भी पता नहीं होता कि - बस वह कुछ ही घंटों का मेहमान और है । यही नियम है । यही दस्तूर है ।
वह जो भी बोलती थी । उससे आगे बोलने के लिये नीलेश के पास शब्द ही नहीं होते थे । फ़िर वह क्या बोलता । क्या करता । वह खुद को एकदम असहाय महसूस कर रहा था । उसे बाबाजी की जरूरत महसूस हो रही थी । उसे प्रसून भाई की जरूरत महसूस हो रही थी । पर क्या पता । वे कहाँ थे ?
फ़िर भी वह बोला - लेकिन इसका क्या प्रमाण । जो आप कह रही हो । वह सच है ? मतलब आप मृत्युकन्या द्वारा नियुक्त हो ।


- प्रत्यक्षम किं प्रमाणम । वह किसी देवी की ही तरह बोली - हे द्वैत योगी ! आज रात का खेल जब आप देखोगे । तब यह प्रश्न खुद ही समाप्त हो जायेगा । मेरे द्वारा शरीर मुक्त की गयी आत्मा को लेने जव यमदूत आयेंगे । वे मुझे प्रणाम करेंगे । और त्रिनेत्रा योगी के लिये ये दृश्य देखना कोई बङी बात नहीं है । वो आप हो ।
नीलेश का सर मानों धङ से अलग होकर अनन्त आकाश में तेजी से घूमने लगा । और वह सिर रहित धङ ही रह गया ।
- फ़िर ! अचानक उसे आशा की एक किरण दिखायी दी । और यह ध्यान आते ही उसके चेहरे पर खुशी की चमक लौटने लगी । वह उत्साहित होकर बोला - फ़िर शरणागत का मतलब क्या हुआ ? फ़िर निमित्त का क्या मतलब हुआ ? फ़िर उनके यहाँ आने का क्या मतलब हुआ ?
डायन के चेहरे के रंग यकायक फ़ीके पङ गये । उसने बैचेनी से पहलू बदला । और वह जाने के लिये हुयी ।
- ठहरो ! अचानक नीलेश गम्भीर स्वर में बोला - अभी आपने ही सत्ता के नियमों की बात कही । इसलिये मेरे प्रश्न का उत्तर देना । आपके लिये अनिवार्य है ।
- अगर ! वह मानों विवशता से बोली - बता दूँ । तो भी कोई लाभ नहीं होगा ।
- मैं भविष्य के लिये जान जाऊँगा । यही लाभ बहुत है । नीलेश के स्वर में खोया हुआ विश्वास लौटने लगा ।
- तो सुनो ! वह फ़िर से खिङकी पर सही होकर बैठ गयी - मैं अभी यह तो नहीं बता सकती कि इनमें से किसकी । मगर जिसकी भी मृत्यु उसे यहाँ खींचकर लायी है । उसके टलने के उपाय अवश्य होते हैं । बस उसका यह पूर्व तय मृत्यु स्थान बदल जाय । और मृत्यु के समय किसी भी तरह । वो बालबाल ही सही बच जाय । क्योंकि यह अलफ़ घात ( अकाल मृत्यु ) ही है । बच भी सकती है ।
- कैसे ? नीलेश ने एक मूर्खतापूर्ण प्रश्न किया । इतना मूर्खतापूर्ण प्रश्न कि उसे खुद ही अपने प्रश्न पर हँसी सी आयी ।


- क्षमा करें । वह बोली - इस सम्बन्ध में मैं ज्यादा नहीं जानती । बस ये जानती हूँ कि ये भी सम्भव है । और इतना और जानती हूँ कि अद्वैत का साधु इसे बिना स्थान परिवर्तन के भी रोक सकता है । क्योंकि अकाल मृत्यु का उन पूज्य सन्तों के आसपास फ़टकना भी वर्जित होता है । इसलिये....
कहते कहते अचानक उसे घबराहट सी होने लगी ।
नीलेश भी एकदम शून्यवत 0 होने लगा । उसके शरीर के चारों तरफ़ सिर से पैर तक एक अदृश्य किरण घेरा स्वतः बनने लगा । फ़िर उसके दिमाग से किसी का सम्पर्क जुङने लगा । और फ़िर उसके समूचे शरीर में खुशी की लहरें दौङ गयीं ।
- प्रणाम भाई ! वह बेहद श्रद्धा से बोला ।
मगर कहीं कोई प्रतिक्रिया नहीं हुयी । इसके कुछ क्षण बाद ही शून्यवत 0 होने की क्रिया फ़िर घटित हुयी । और फ़िर वह पहले जुङे सम्पर्क से चेन बनाता हुआ एक नये सम्पर्क से जुङा । और इस बार लगभग उछल ही पङा ।
- प्रणाम गुरुदेव ! वह अपार श्रद्धा से बोला - चरण स्पर्श स्वीकार करें ।


- देव देव ! उसे गम्भीर घन गर्जन के समान मगर बेहद मद्धिम स्वर सुनायी दिया - सफ़ल होओ । नीलेश.. वत्स ! हम तुम्हें सिर्फ़ इतना बताने आयें हैं कि एक सच्चे गुरु का शिष्य कभी अकेला नहीं होता । मगर एक शिष्य की तरफ़ से यह अटूट भावना उसके द्वारा विभिन्न प्रायोगिक स्थितियों से गुजरकर ही बनती हैं । दरअसल ये प्रयोग सत्ता द्वारा इसीलिये निर्धारित किये जाते हैं । बिना प्रयोगों के.. अनुभूति स्थितियों के एक अच्छे योगी का निर्माण संभव नहीं है ।
नीलेश अच्छी तरह जानता था । इस अदृश्य वाणी से बातचीत का सिलसिला कभी भी टूट सकता था । और वह अपनी तरफ़ से किसी हालत में सम्पर्क नहीं कर सकता था ।
अतः जल्दी से बोला - क्षमा गुरुदेव ! इस समय दादा कहाँ है ?
- सर्वत्र ! गम्भीर स्वर सुनायी दिया । और सब कुछ शान्त हो गया ।


सर्वत्र ! यह क्या अजीब बात थी । सर्वत्र का मतलब तो ये हुआ कि यहाँ भी । वहाँ भी । कहीं भी ।
अपने अब तक के साधक जीवन से वह ऐसी अजीबोगरीब परिस्थियों से कुछ हद तक तो परिचित था ही । लेकिन किसी भी योगी के लिये हर घङी एक कठिन घङी होती है । जब तक वह एक अध्याय सीखता है । समझता है । दूसरा शुरू हो जाता है । अभी भी ऐसा ही तो हो रहा था ।
- प्फ़ावर ! जैसे ही नीलेश के दिमाग में यह विचार आया । डायन अंगूठा दिखाती हुयी बोली - अँधेरा ..कायम रहेगा ।
- ड डायन डायन डायन डायन...!  उसके बोलते ही नीलेश के मष्तिष्क में गूँजने लगा -ड डायन डायन डायन डायन...ड डायन डायन डायन डायन...ड डायन डायन डायन डायन...!
- सुनो ! अचानक नीलेश को मानों कुछ याद आया । और वह डायन की ओर मुङता हुआ बोला ।
मगर डायन उसके सुनो को ना सुनो करती हुयी हवा के एक झोंके के समान उसी छत पर ऊपर पहुँच गयी । जिस छत के नीचे कमरे में वह मौजूद था ।

उसने डायन की तरफ़ से ध्यान हटा लिया । और कमरे से बाहर आकर  खुली छत पर पङी कुर्सी पर बैठकर नीचे आंगन में देखने लगा । हल्का हल्का अंधेरा घिरने लगा था । शाम के सात बजने वाले थे । अचानक उसकी निगाह मंदिर के आंगन में ही खङे पीपल के विशाल वृक्ष पर गयी । जिस पर बैठी पैर झुलाती हुयी डायन नीचे बैठे लोगों को ही देख रही थी ।
- सान्ता मारिया ! वह सीने पर क्रास बनाकर बोला - किसका सफ़ाया करने वाली है यह ? कौन जानता था ।
उसके दिमाग में कुछ देर पूर्व ही हुआ सारा वाकया किसी रील की तरह घूमने लगा । खासतौर पर बाबाजी का ये कहना " सर्वत्र..सर्वत्र..सर्वत्र..इसका तो मतलब यही हुआ ना कि प्रसून भाई उसके साथ ही है । लेकिन कहाँ ? इस बात का कोई उत्तर उसके पास नहीं था ।


पीताम्बर और उसके साथी वाकई रुक गये मालूम होते थे । पर वे क्यों कर रुके थे । ये अभी उसको पता नहीं था । बदरी बाबा और दो अन्य साधु मिलकर भोजन बनाने की तैयारी कर रहे थे । जो होगा । देखा जायेगा । सोचकर उसने एक सिगरेट सुलगायी । और गहरा कश लेते हुये पीपल पर झूलती हुयी सी डायन को देखने लगा ।
अचानक उसके दिमाग में एक बिजली सी कौंधी । और उसने समूची एकाग्रता डायन पर ही केन्द्रित कर दी । आज रात में डायन उन चार आगंतुकों में से किसी एक को यमलोक पहुँचाने वाली थी । इसलिये बहुत संभव था । डायन का पूरा ध्यान उसी लक्ष्य व्यक्ति पर केन्द्रित रहेगा । और तब इसकी सबसे बङी पहचान ये होगी कि उन चारों में से मौत की गोद में बैठ चुके व्यक्ति के मस्तक आदि पर मृत्यु के लक्षण जैसे जाला सा बनना । उसके दोनों सुरों का एक साथ चलना । उसकी चाल ढाल व्यवहार में एक सम्मोहन सा होना अवश्य होंगे । इससे बहुत आसानी से पता लग सकता था कि - आज कौन हलाल होने वाला है । और तब शायद कुछ किया भी जा सकता है । मगर शायद ही । शायद !
पर इस परीक्षण में भी बेहद कठिनाई थी । एक तो अंधेरा हो चुका था । इसलिये शरीर पर उभरे चिन्ह देखना आसान नहीं था । वे चारों अथवा नीचे वाले मिलाकर कई लोग हमेशा साथ ही रहने थे । अतः सम्मोहित को भी आसानी से तलाशना मामूली बात नहीं थी । दूसरे अगर डायन रात के दो बजे तक भी टारगेट को निशाना बनाने वाली थी । तो अब से लेकर सिर्फ़ सात घण्टे ही बचे थे । सिर्फ़ सात घन्टे ।


और इन सात घन्टों में ऐसा समय कोई भी नहीं आने वाला था । जब वह कुछ कर सकता था । कुछ । मगर क्या ? कुछ भी । जो अभी उसे ही नहीं पता था ।
फ़िर उसने वही अंधेरे में तीर चलाने का नुस्खा ही आजमाने की सोची । और डायन की दृष्टि का अनुसरण करने की कोशिश करने लगा । मगर नीचे पीताम्बर कंपनी को मिलाकर एक दर्जन से ऊपर लोग लगभग एक साथ ही बैठे हुये थे । और ऐसे में वह डायन किसको स्पेशली ध्यान में ले रही है । पता करना बेहद कठिन ही था । इम्पासिबल ।
- प्फ़ावर ! अचानक डायन वहीं बैठी बैठी उससे खुद ही सम्पर्की होकर बोली - अँधेरा ..कायम रहेगा । आप मेरी गतिविधियों को अध्ययन करने की कोशिश कर रहे हैं । चलो मैं खुद ही बता देती हूँ । मेरा लक्ष्य हरीश है । सबसे छोटा हरीश ।
नीलेश के दिमाग पर मानों घन प्रहार हुआ हो । स्वतः ही उसने नीचे देखना बन्द कर दिया । और कुर्सी की पीठ पर टेक लगाता हुआ अधलेटा सा होकर अब निश्चिंत भाव से डायन की तरफ़ देखने लगा । हरीश । मौत की खिलखिलाती गोद में जा चुका हरीश ।
- मगर क्यों ? वह बेहद खोखले स्वर और डूबी सी आवाज में बोला - मगर क्यों ? कोई वजह ।
सिर्फ़ उसे ही डायन की मधुर जलतरंग जैसी हँसी सुनाई दी । फ़िर वह बोली - क्यों एक ऐसा शब्द है । जिसका आज तक उत्तर ही नहीं बना । एक क्यों का उत्तर ग्यात होते ही उसमें से हजार क्यों और पैदा हो जाते है ।


- सच कह रही हो..सुन्दरी ! नीलेश प्रभावित स्वर में बोला ।
- मैं सुन्दरी नहीं हूँ । वह बिना किसी भाव के बोली - मेरा नाम चंडूलिका साक्षी है । और यमलोक मेरा निवास है । क्या तुम मेरा मेहमान बनना पसन्द करोगे ?
- कमीनी ! न चाहते हुये भी स्वभाववश नीलेश के मन में भाव आ ही गया - तेरा मेहमान बनना तो शायद मूर्ख से मूर्ख भी ना पसन्द करे ।
- ऐसा नहीं है । अबकी बार डायन बिना किसी उत्तेजना के शान्त स्वर में बोली - योगी आप डायन या ऐसी अन्य गण आत्माओं के बारे में जानते नहीं हैं । इसलिये ।
- मैं जानना भी नहीं चाहता । इस बार नीलेश के मुँह से निकल ही गया - मेरे दिमाग में इस समय एक ही बात है । हरीश की मौत होगी । मगर क्यों ? क्यों चंडूलिका साक्षी क्यों ? आखिर क्यों ? जबकि तुम इसे अलफ़ बता रही हो ।
- जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च । वह डाली पर ठीक से बैठती हुयी बोली - तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि । क्योंकि हे योगी !  जिसने जन्म लिया है । उसका मरना निश्चित ही है । और उसके बाद मरने वाले का जन्म भी तय है । जिसके बारे में कुछ किया नहीं जा सकता । कुछ भी नहीं किया जा सकता । फ़िर ऐसा जानकर उसके बारे में तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये ।
मगर ना जाने क्यों । ना जाने कौन सी अग्यात प्रेरणा से नीलेश अब उस डायन से प्रभावित नहीं हो रहा था । और अपने स्वभाव में लौट आया था । अब वह नीलेश था । वास्तविक नीलेश ।
अतः एकदम लापरवाह होकर बोला - तेरी माँ का..साकीनाका ।
तभी उसे पीताम्बर ऊपर आता दिखायी दिया ।

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