मंगलवार, जुलाई 26, 2011

डायन THE WITCH 5

- हम लोग आज रुक गये । वह बेहद गर्मजोशी से बोला - क्या आप एक सिगरेट और पिला सकते हैं ।.. दरअसल भगवान की कृपा से हमारा काम बन गया । नीचे बाबाओं में जो गजानन बाबा हैं । उन्होंने कहा है । डायन क्या उसकी माताजी भी हमारी बस्ती छोङ देगी । उन्होंने बहुत टेङी टेङी डायनों चुङैलों को ठीक किया है । वे आपके बारे में कह रहे थे । आप अभी नौसिखिया हैं । ..नीलेश जी माइंड मत करना । ये डायन चुङैल वास्तव में बच्चों के काम नहीं हैं । फ़िर अभी आप तंत्र विध्या सीख ही तो रहे हो । उमर ही क्या हुयी होगी अभी आपकी । अभी तो शायद शादी भी नहीं हुयी होगी । वैसे आप शादी तो करेंगे ना । बुरा मत मानना । मैंने सुना है । साधु लोग अक्सर शादी नहीं करते ना । देखो हम गृहस्थ लोगों का तो शादी बिना एक रात भी गुजारा नहीं हो सकता । सच कह रहा हूँ ना ।


- कमाल है । नीलेश मन ही मन हैरान सा रह गया - इसमें अचानक राखी सावंत की आत्मा कैसे घुस गयी । तब उसे ख्याल आया । ये गांजा भरी चिलम पीने का कमाल था । जो उसने थोङी देर पहले नीचे साधुओं के साथ पी थी । और उसे पीने से काफ़ी हद तक उसके मन से डायन का खौफ़ जाता रहा था ।
मगर मौत का बिगुल बज चुका था । मौत और मरने वाला आमने सामने आ चुके थे । और उस मौत से अनजान ये इंसान कितना खुश था । सिर्फ़ कुछ घन्टे बाद होने वाली मौत से ।
नीलेश उससे हरीश के बारे में पूछना चाहता था । पर उसमें एक बेहद दिक्कत वाली बात यह थी कि हरीश वाकई मर जाता । या अन्य कोई बङा हादसा होता । तो उसके तार खामखाह उससे जुङ जाने वाले थे । क्या पता । हरीश के साथ क्या और कैसे होने वाला था ? और इस तरह पूछकर एक होने वाली बात से जानबूझ कर सम्बन्ध बनाता हुआ वह एक और नयी मुसीबत को जन्म नहीं देना चाहता था ।
लेकिन तभी डायन की आवाज उसे सुनायी दी - चिंता न करो । और मौत का नंगा नाच देखो । जो आप जानना चाहते हो । यह खुद बतायेगा । बिना पूछे ही बतायेगा ।


- अब देखो ना । पीताम्बर सिगरेट का गहरा कश लेता हुआ बोला - मेरे लङके हरीश को ही देखो । अभी क्या उमर है उसकी । पर मैंने उसकी शादी तय कर दी है । देखिये नीलेश जी ! बुरा न मानिये । आज इंडिया में विदेशों की तर्ज पर फ़्री सेक्स का चलन होता जा रहा है । ऐसे में कुछ उल्टा सुल्टा हो जाये । तो कुल खानदान पर दाग ही लग जाता है । इसलिये मैं उसकी जल्द से जल्द शादी कर देना चाहता हूँ ।
- मगर मौत से । चंडूलिका सर्द स्वर में बोली - वो भी कुछ ही देर में । अर्थी रूपी घोङे पर बैठा हुआ । रक्त से सरोबार सजा हुआ । तुम्हारे रुदन की मातम रूपी शहनाईयाँ  सुनता हुआ । वह शमशान को अपनी बारात ले जायेगा । और मौत की देवी का आलिंगन करेगा । जो बेकरारी से उसका इंतजार कर रही हैं । मौत की देवी । सिर्फ़ मौत ।


उस बेहद सर्द स्वर को सुनकर नीलेश जैसे इंसान के भय से रोंगटे खङे हो गये । यह कहते समय चंडूलिका साक्षी के रूप में मानों स्वयँ मौत की देवी उपस्थिति हुयी हो । पर वह असहाय ही था । पीताम्बर जाने क्या क्या बोल रहा था । पर अब उसे कुछ भी सुनायी नहीं दे रहा था । उसने रेडियम डायल वाली कलाई घङी पर निगाह डाली । रात के नौ बजने ही वाले थे । बदरी बाबा उसका खाना लेकर आया था । पर नीलेश की भूख तो गायब ही हो चुकी थी । उसने बेमन से कुछ कुछ खाया ।
मंदिर में मौजूद सभी लोग विश्राम के लिये मंदिर के बरामदे में जाकर लेट गये । पर नीलेश की आंखों में नींद नहीं थी । वह हरीश के बारे में सोचता हुआ चंडूलिका को ही देख रहा था । उसका एक एक पल युग समान गुजर रहा था । ठीक दो घन्टे बाद ।
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ठीक दो घन्टे बाद

जैसे ही घङी ने रात के ग्यारह बजाये । हरीश को कुछ बैचेनी सी महसूस हुयी । ये बैचेनी क्यों थी । इसका उसे कुछ पता नहीं था । उसे लघुशंका की भी आवश्यकता महसूस हो रही थी । उसने अपने पास सोये लोगों पर निगाह डाली । वह तखत से उठ खङा हुआ । और लघुशंका हेतु मंदिर के पिछवाङे पहुँचा । तभी उसे मंदिर से कुछ ही फ़ासले पर स्थिति छोटी पहाङियों के नजदीक जुगनू की तरह चमकती मगर उससे अधिक प्रकाश वाली चार आँखे सी चमकती नजर आयीं । जो किन्ही जंगली जीवों जैसी प्रतीत होती थी । हरीश ने इससे पहले ऐसी अदभुत चीज कभी नहीं देखी थी । वह बेख्याली में सम्मोहित सा उधर जाने लगा । जैसे किसी अदृश्य डोर में बंधा हुआ हो । यह मौत का बुलावा था । अंतिम आमंत्रण ।
उसे नहीं पता था कि गजानन बाबा चुपचाप उसके पीछे दूरी बनाकर चल रहा था ।
बाहर हल्की हल्की सर्दी सी थी । यूँ भी खुले में गर्मियों में भी ठंड सी मालूम होती है । नीलेश ने अपने बदन पर जैकेट डाल ली । और उसकी जेवों में हाथ डाले हुये वह पहाङियों की तरफ़ जाने लगा । डायन कहाँ हैं ? क्या कर रही है ? अब इससे उसे कोई मतलब नहीं था ।

दरअसल उसने आज रात जागते ही गुजारने का तय कर लिया था । और वह इन आगंतुकों पर बराबर नजर रखे हुये था । उसे अच्छी तरह मालूम था कि डायन का कहा मिथ्या नहीं हो सकता था । और वह इस मौत का लाइव टेलीकास्ट देखना चाहता था । जो बकौल चंडूलिका साक्षी अलफ़ थी । और टल भी सकती थी । हालांकि डायन ने अपने सभी पत्ते नहीं खोले थे । पर वह बेचारी भी नहीं जानती थी कि नीलेश महान योगियों के शक्तिपुंज से एक चेन द्वारा जुङा हुआ है । और वह बहुत कुछ जान गया है ?
जैसे ही हरीश उन जानवरों के समीप पहुँचा । उनका कुछ कुछ आकार उसे समझ आने लगा था । वे चीते के बच्चे समान कोई जानवर थे । और आपस में लङते हुये से मालूम हो रहे थे ।  उससे कुछ ही अलग चलते हुये गजानन बाबा ने किसी अदृश्य प्रेरणा से हाथ में पत्थर का टुकङा उठा लिया था । और उन जंगली जानवरों को लक्ष्य कर मारने वाला था । उसका इरादा हरीश को बचाने का था ।
चंडूलिका साक्षी इस डैथ ग्राउंड से कुछ ही अलग शान्त खङी थी । पर उसकी आँखों में एक प्यासी खूनी चमक तैर रही थी । चार भयंकर यमदूत पहाङियों पर आ चुके थे । और वे अंतिम क्षणों के लिये तैयार थे । जिसमें अब कुछ ही देर थी ।


गजानन बाबा के हाथ से फ़ेंका गया पत्थर सनसनाता हुआ एक बिल्लोरी जानवर की ओर लपका । बस इसी का डायन को इंतजार था । पत्थर लगते ही जानवर मानों अपमान से तिलमिलाया हो । उसने बैचेनी से अपने शरीर को इधर उधर घुमाया । ठीक उसी क्षण चंडूलिका ने अपनी उंगली जानवर की ओर सीधी कर दी । वह पारदर्शी आकृति वाला जानवर सशरीर हरीश के जिस्म में समाकर एकाकार हो गया । हरीश मानों एकदम से लङखङाया हो । और फ़िर झटके से सीधा हुआ । अब उसकी आँखों में वही बिल्लोरी जानवर जैसी तेज चमक नजर आ रही थी ।
गजानन बाबा के छक्के छूट गये । वह वापस बचाओ बचाओ चिल्लाता हुआ मंदिर की तरफ़ भागा ।
- अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः । अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व  । चंडूलिका साक्षी की गम्भीर महीन आवाज गूँजी -  यह देह तो मरणशील है । लेकिन इस शरीर में बैठने वाला आत्मा अमर है । इस आत्मा का न तो अन्त है । और न ही इसका दूसरा कोई मेल है । इसलिये मौत से मत भाग गजानन । और उससे युद्ध कर । मौत से भागकर तू कहाँ जायेगा । मौत तेरे सिर पर नाच रही है । तेरा अन्त आ गया ।

तभी दूसरा बिल्लोरी जानवर उछलकर लपका । और दूसरे ही क्षण वह गजानन बाबा के शरीर में समा गया । बाबा ने भागना बन्द कर दिया । और सधे सख्त कदमों से पलटकर हरीश की ओर बङा ।
- भाग..हरीश.. भाग ! अचानक सचेत होकर नीलेश चिल्लाया - भाग हरीश । जितना तेज भाग सके । यहाँ से दूर भाग ।
मगर हरीश ने मानों सुना तक नहीं । और वह किसी मल्ल योद्धा की भांति गजानन बाबा से भिङ गया । और दोनों एक दूसरे का गला दबाने लगे । यहाँ तक कि दोनों की जीभें बाहर निकल आयीं । मगर गले पर उनकी पकङ कम नहीं हुयी ।
- प्फ़ावर ! नीलेश को डायन की आवाज सुनाई दी - अँधेरा ..कायम रहेगा ।
नीलेश एक क्षण में ही मौत के कानून की इस धारा को समझ गया । अब वह पीताम्बर एण्ड कंपनी के यहाँ तक आने और गजानन बाबा से जुङने तक की कहानी के एक एक पहलू को समझ गया ।
उसे याद आया । हिमालयी क्षेत्र में स्वर्ग सीङी के नजदीक भी ऐसा ही स्थान है । जहाँ पूर्वजन्म के संस्कारों से एकत्र हुये लोग स्वतः प्रेरित होकर एक दूसरे का गला दबाने लगते हैं । वास्तव में मौत के इस ओटोमैटिक सिस्टम के चलते वे दोनों शिकार खुद ही एक जगह पर आ गये । और मौत का खेल शुरू हो गया  
- हे योगी ! चंडूलिका बोली - अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे । गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः । जिनके लिये शोक नहीं करना चाहिये । उनके लिये तुम शोक कर रहे हो । और बोल तुम बुद्धिमानों की तरह रहे हो । ज्ञानी लोग न उनके लिये शोक करते है । जो चले गये । और न ही उनके लिये जो हैं ।
और अब अंतिम खेल शुरू हो चुका था ।
डायन ने उसे डन का अंगूठा दिखाया ।


मगर उसकी तरफ़ से एकदम बेपरवाह नीलेश ने खुद को एकाग्र किया । और बुदबुदाया - ..लख अलख . लख ..अलख..।
इसके साथ ही बह अपनी मध्य उंगली को अंगूठे से इस तरह से बारबार छिटकने लगा । मानों उसमें कोई गन्दी चीज लगी हो ।
तुरन्त ही वह बिल्लोरी जानवर इस शक्तिशाली प्रयोग से भयभीत हुआ हरीश के शरीर से निकलकर डायन में समा गया । डायन गुस्से में भयंकर रूप से दहाङी ।
- भाग हरीश ! अबकी बार नीलेश गला फ़ाङकर चिल्लाया - मौत से बचना चाहता है । तो भाग । जितना तेज भाग सकता है । उतना तेज भाग । और मंदिर भी मत जाना । यहाँ से दूर भाग जा । सुबह ही मंदिर लौटना । तब मैं देखूँगा ।
हरीश पर यकायक मानों नशा सा उतरा हो । उसने बिलकुल बिलम्ब नहीं किया । और तेजी से भागने लगा । नीलेश के शब्द उसका पीछा कर रहे थे - भाग हरीश । जल्दी भाग । और जल्दी । मौत तेरे पीछे है ।
गजानन बाबा जमीन पर गिर पङा था । और निचेष्ट सा हो गया था । चारों यमदूत उसके करीब आ गये थे । और उसके प्राणों को समेटकर बाहर ला रहे थे । प्राणीनामा संयुक्त होते ही बाबा का शरीर दो बार हल्के से हिला । और दम निकलते ही वह बेदम हो गया ।
यमदूतों ने चंडूलिका साक्षी को प्रणाम किया । और बाबा के जीव को लेकर हवा में 200 फ़ुट ऊँचा उठे । इसके बाद एक उज्जवल चमक सी कुछ क्षणों के लिये नजर आयी । और फ़िर वे उत्तर दिशा में यमपुरी हेतु रवाना हो गये ।
कसमसाती हुयी चंडूलिका साक्षी ने नीलेश को गुस्से से घूरा । और फ़िर डन का अंगूठा दिखाती हुयी बोली - छोङूँगी नहीं ..- प्फ़ावर ! जैसे ही नीलेश ने पलटकर उसकी तरफ़ देखा । डायन अंगूठा दिखाती हुयी बोली - अँधेरा ..कायम रहेगा ।
इसके बाद वह अदृश्य हो गयी ।
नीलेश ने एक सिगरेट सुलगायी । और टहलता हुआ सा मंदिर की तरफ़ जाने लगा ।

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