मंगलवार, जुलाई 26, 2011

डायन THE WITCH 8

- आओ मेरे बच्चो ! बुङिया बङे प्यार से धीमे धीमे मरी आवाज में बोली - बैठ जाओ । आज बङे दिनों बाद इस बरसों से सूनी पङी हवेली में मेरे अलावा भी कोई आया है । जानते हो क्यों ? क्योंकि लोग कहते हैं । मैं एक डायन हूँ । ( कहते कहते वह सुबकने लगी ) एक डायन । क्या तुम लोगों को मैं किसी तरफ़ से भी डायन लगती हूँ ।
- ये बोल ! जलवा ने बेहद घृणा से मन ही मन में सोचा - किस एंगल से नहीं लगती । तू तो डायन क्या ? डायन की अम्मा नानी दादी चाची सब लगती है । मेरा मूत क्या ऐसे ही निकल गया होता ।
नीलेश ने उसकी कसमसाहट समझते हुये उसकी हथेली दबायी । और वह बैठता तो कहाँ । अतः कमरे में बने आलमारी के गन्दे खानों में ही टेक लेता हुआ टिक गया । नीलेश ने बाजार से खरीदी मोटी और बङी मोमबत्ती से एक मोमबत्ती जलाकर वहाँ चिपका दी । मजबूरी में जलवा ने भी वैसा ही किया ।  वैसे वह तो इस कमरे से क्या । इस मकान से क्या । इस शहर से ही चला जाना चाहता था । इतनी घिनौनी बूङी औरत से उसका आज तक पाला नहीं पङा था ।

- बिलकुल नहीं ! नीलेश सामान्य स्वर में बोला - लोगों के देखने में फ़र्क है । निगाह का अन्तर जिसे कहते है । आप तो एकदम संतोषी माँ लगती हो । यहाँ वहाँ जहाँ तहाँ । मत पूछो कहाँ कहाँ । है संतोषी माँ । अपनी संतोषी माँ ।
- मेरा नाम मौलश्री है । बुङिया कमजोर आवाज में बोली - तुमने कुछ खा पी लिया मेरे बच्चों !
- क्या खिलायेगी पिलायेगी हरामजादी ! जलवा के मन में घिन हुयी - ये सङी हुयी बकरिया । या चमगादढ का खून ।
- ताई ! अचानक नीलेश जलवा की व्यग्रता समझता हुआ बोला - वो हरीश अभी है । या तूने उसे मुक्त कर दिया ? शायद जो काम तू वहाँ न कर पायी हो । वो यहाँ कर दिया हो । क्योंकि आज दो दिन और हो गये ।
- अभी कहाँ ...अभी तो बहुत काम बाकी है रे ! वह कोहनी के बल टिकती हुयी बोली - अभी बहुत काम बाकी है रे । मुझ बूङी को क्या क्या नहीं करना पङता ? क्या क्या नहीं ? 70 लोगों को ले जाने की डयूटी है मेरी । अब तक 56 । ही हुये । 14 अभी भी बाकी हैं ।
- फ़िर बङा स्लो काम करती है तू । 85 की तो तू हो ही गयी । और 85 में सिर्फ़  56 । तेरे ऊपर वाले कुछ टोकते नहीं क्या ?
उसने कोई जबाब नहीं दिया । और ब्लाउज में हाथ डालकर बगल खुजाने लगी । उसके बेहद ढीले ब्लाउज के सिर्फ़ दो बटन लगे थे । और इस तरह खुजाने से उसका एक दुही जा चुकी बकरी के थन के समान निचुङा स्तन बाहर आ गया । जलवा को इतनी घिन आयी कि अबकी बार उसने कोई परवाह न करते हुये साइड में ही थूक दिया ।

- तुम ठीक कहते थे ..निगाह का फ़र्क है । वह जलवा को लक्ष्य करती हुयी बेहद धीमें स्वर में बोली - सिर्फ़ निगाह का फ़र्क ?
- एक बात तो है । नीलेश सिगरेट सुलगाता हुआ बोला - खूबसूरत बहुत है तू ! जवानी में तो कयामत ही ढाती होगी ।
- अभी कौन सा कम ढा रही है । जलवा मन ही मन भुनभुनाया - मल्लिका शेरावत भी तो कुछ नहीं इसके सामने । बताओ दोनों को मेरी निगाह ही खराब लग रही है । अभी या तो मैं पागल हूँ । या फ़िर जल्दी ही होने वाला हूँ ।
जलवा को इस सब नौटंकी पर नीलेश का कोई रवैया समझ नहीं आ रहा था । नीलेश जैसी हस्ती इस नरक में क्या और क्यों कर रही थी । दूर दूर तक उसकी समझ में नहीं आ रहा था । पर वह उसका साथ देने के लिये विवश था । जबकि नीलेश बारबार घङी देख रहा था । मानों किसी विशेष समय का इंतजार कर रहा हो । आखिरकार रात के दस बजे उसने मौलश्री से इजाजत ली । और डायनी महल के उसी कमरे में आ गया । जिसको रहने के लिये उसने साफ़ किया था ।
उसने फ़िर से एक मोमबत्ती जलाकर कमरे में रोशनी की । और कीङों मकोङों मच्छरों को भगाने वाले चार क्वाइल सुलगाकर कमरे के चारों कोनों में रख दिये । साथ ही बेहद खुशबूदार धूपबत्ती को सुलगाकर भी उसने रख दिया । और फ़िर दोनों स्लीपिंग बैग बिछाकर उस पर लेट गये ।
- दादा ! अचानक जलवा अपने आपको रोक न सका । और बोला - लोकेशन की तो बात समझ आयी । पर ये हीरोइन अपने को समझ नहीं आयी । और हम लोग यहाँ के बजाय वहाँ होटेल में भी तो रुक सकते थे ।

- देख भाई ! नीलेश बिस्तर की तरफ़ आते जा रहे तिलचट्टे को उंगली से दूर छिटकता हुआ बोला - भुतहा फ़िल्म की लोकेशन और उसकी बैक ग्राउंड का सही अंदाजा रात को बारह एक बजे पर ही पता चलता है । जब चाँद एकदम सिर पर होगा । यहाँ ये इधर उधर रेंगते जीव अपने बिलों में घुसे साँप छँछूदर कैसी आवाज करेंगे । चाँदनी रात में यह महल और आसपास का नजारा कैसा होगा । ये सब पहले से कैसे पता चले । और रही बात उस बुङिया की । तो अब मुझे क्या पता था कि यहाँ कोई रहता भी होगा । इसलिये कुछ ले दे के उसको भी निपटा देंगे ।
- अच्छा ! जलवा ने ठंडी सांस भरी - फ़िर ठीक है । बस एक बात और बता दो । शूटिंग तो मैं अभी के अभी ही देख रहा हूँ । फ़िल्म देख पाऊँगा या नहीं ? मतलब तब तक जीता तो रहूँगा ।
- डांट वरी जलवा ! मैं हूँ ना । ज्यूँदा रह पुत्तर ।
नीलेश भी अच्छी तरह से जानता था । जलवा के मन में बहुत सी बातें हैं । जिनको वह कह नहीं पा रहा । पर अगर वह कहता भी । तो नीलेश के पास उसका कोई जबाब ही नहीं था । वह सोच रहा था कि जलवा गहरी नींद में सो जाये । तो ज्यादा अच्छा हो ।
लगभग दो घन्टे से ही थोङा पहले जलवा के खर्राटे गूंजने लगे । नीलेश ने बेहोशी लाने वाली जङी उसे सुंघाने की सोची । फ़िर कुछ सोचकर हाथ हटा लिया । और कमरे से बाहर निकल आया । उसने नीचे झांककर देखा । पर वहाँ सन्नाटा ही था । रात के अंधेरे में डायनी महल में डरावनी सांय सांय ही गूंज रही थी । क्या कर रही होगी डायन इस समय ? उसने सोचा ।


- प्फ़ावर ! जैसे ही नीलेश के दिमाग में यह विचार आया । डायन की आवाज उसे सुनाई दी - अँधेरा ..कायम रहेगा ।
- ड डायन डायन डायन डायन...! उसके दिमाग में गुँजायमान होने लगा - ड डायन डायन डायन डायन...! ड डायन डायन डायन डायन...ड डायन डायन डायन डायन...! !
ठीक बारह बजे ।
जब एक दीवाल के सहारे पीठ टिकाये खङा नीलेश सिगरेट के कश लगाता हुआ नीचे आंगन में देख रहा था । उसे मौलश्री बाहर आंगन में नजर आयी । उसकी चाल ढाल हरकतों से किसी भी तरह से नहीं लगता था कि वह कोई बूङी कमजोर औरत है । बस उसका शरीर और मुँह अवश्य बूङों वाला था ।
उसके हाथ में पानी से भरा हुआ एक बङा सा मटका था । मौलश्री ने अपने शरीर से सभी कपङे उतार दिये । और आंगन में घूम घूमकर अपने सर पर से पानी गिराती हुयी वह स्नान करने लगी । इसके बाद उसने वही कहीं से लाल रंग के कपङे उठाये । और पहन लिये । फ़िर वह एक दूसरे अन्य कमरे की तरफ़ चली गयी

नीलेश तेजी से नीचे उतर आया । और उसी कमरे की तरफ़ बङ गया । उस कमरे में कमरे के अन्दर एक और कमरा था । जो लगभग सुरक्षित हालत में था । अन्दर वाले कमरे का गेट खुला था । पर नीलेश बाहर ही रुक गया ।
अन्दर कमरे में एक बङा दिया रोशन था । उसका प्रकाश पूरे कमरे में फ़ैला हुआ था । तांत्रिकी क्रियाओं के सामान से भरा कमरा अपनी कहानी खुद ही कह रहा था । अन्दर बीच कमरे में मौलश्री एक नग्न पुरुष लाश के ऊपर बैठी हुयी थी । लाश पुरानी थी । और तंत्र क्रिया तथा अन्य लेपों द्वारा सुरक्षित की गयी थी ।
उसके समीप ही कच्चे फ़र्श में गढ्ढा खोदकर हवन कुण्ड सा बनाया गया था । जिसमें उसने आग जलाना शुरू कर दी थी । पास ही एक प्याला टायप मिट्टी के बरतन में कुछ अधमरे घायल से चमगादढ गिरिगिट जैसे छोटे जीव थे ।

लाश के ऊपर बैठी मौलश्री को अगर कोई देख लेता । तो उसकी रूह तक कांप जाती । पर नीलेश के लिये ये कई बार के देखे दृश्य थे । वह आराम से खङा हुआ उसके क्रियाकलाप देख रहा था । मगर बिना किसी उत्सुकता और आश्चर्य के ।
कच्चे कुण्ड की अग्नि भङक उठी । मौलश्री ने विभिन्न जङी बूटियों के छोटे छोटे टुकङे उसमें डाल दिये । अग्नि और भी तेज हो गयी । इस निरंतर तेज होती अग्नि के साथ ही उसका चेहरा भभकने सा लगा । और उसने प्याले के घायल जीव कुण्ड में झोंक दिये ।
कमरे में अजीव सी बू वाला धुँआ का गुबार उठता हुआ कमरे की छत में बनी चिमनी से बाहर जाने लगा ।
वह तंत्र जगाती हुयी मंत्रोच्चारण आदि भंगिमायें करने लगी ।
अचानक चट चट की आवाज के साथ उसके शरीर में बदलाव होने लगा । और देखते ही देखते वह अत्यन्त खूबसूरत युवती में बदल गयी । उसके वृहदाकार स्तनों और अन्य शरीरी अंगो ने मानों तीवृता से विकास किया । और उनके बंधन स्वतः टूट गये ।
- मैंने कहा था ना । वह नीलेश के पीछे दृष्टिपात करती हुयी बोली - यह सिर्फ़ निगाह का फ़र्क है ।
नीलेश ने सहमति में सिर हिलाया । और पीछे मुढकर देखा । वहाँ हतप्रभ सा जलवा खङा था ।
- मल्लिका शेरावत ! वह मधुर स्वर में बोली - या विपाशा बसु ?
जलवा के मुँह से चीख निकलते निकलते बची । उसके सामने मल्लिका शेरावत ही बैठी हुयी थी । उसने बारबार आँखे मलते हुये उस तरफ़ देखा । मगर एक परसेंट भी धोखा नहीं था । वह सौ परसेंट मल्लिका सहरावत ही थी ।
- तायी ! नीलेश जलवा का हाथ पकङता हुआ बोला - बच्चे की जान लेगी क्या ? तू आरजीनल ही ठीक है ।

कोई टिप्पणी नहीं:

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...