मंगलवार, जुलाई 26, 2011

डायन THE WITCH 9

जलवा को उस कमरे में घुसने से बेहद घिन आ रही थी । कमरा मांस जलने की दुर्गन्ध और बूटियों के जलने की अजीब बू से भरा हुआ था । उस पर वह वीभत्स लाश ।
- ऐ ! योगिनी मानों उसे डपटती हुयी बोली - नादान छोरे ! तेरी आँखे ही नहीं नाक भी खराब है ।
कहते हुये उसने अपने चेहरे पर वृताकार हाथ घुमाया । और जलवा की तरफ़ फ़ूँक दिया । जलवा को लगा । कमरा यकायक नशीली मदहोश करने वाली सुगन्ध से भर गया । हवन कुण्ड में सुन्दर पुष्पों के मध्य अगरबत्तियों का गुच्छा लगा हुआ था । मौलश्री पीले रंग के खूबसूरत छोटे गलीचे पर बैठी थी ।
- तायी ! नीलेश आराम से उसके पास जलवा के साथ बैठता हुआ बोला - क्यों बच्चे को जादू दिखा रही है । बच्चे की जान लेगी क्या ? आराम से बात करते हैं ना ।
- ठीक है । वह अर्थपूर्ण स्वर में होठ दवाती हुयी बोली - मगर एक शर्त है । लेन देन बराबर का होना चाहिये । जलवा की तो लार ही टपक गयी होती ।

नीलेश ने सहमति में सिर हिलाया । और एकटक उसकी ओर देखने लगा । बाबाजी की वाणी उसके दिमाग में गूँजी - सर्वत्र । और वह चेन से जुङने लगा । उसने मन ही मन भाई और गुरु को अभिवादन किया ।
मौलश्री को कुछ बैचेनी सी महसूस हुयी । और वह पहलू बदलती हुयी सी बैठ गयी ।
- योगी ! उसकी धीर गम्भीर वाणी गुंजायमान होने लगी - मैं जानती हूँ । तुम्हारा आने का कोई उद्देश्य नहीं है । यह सब तन्त्र ( सिस्टम ) का कार्य है । जो जैसा करता है । वैसा उसको भरना ही होता है । यही नियम है । मैं भी निमित्त हूँ । तुम भी निमित्त हो । मरने वाला भी निमित्त है । और मारने वाला भी निमित्त है । बस मायावश प्राणी को अहसास होता है कि वह इसका कर्ता है । यही सच है । यही सच है ।
- तायी ! वह बोला - आप एक बात भूल गयीं । एक बचाने वाला भी होता है । और वह भी निमित्त होता है ।

- ऐसा कोई नहीं होता । वह क्रोध से फ़ुंकारी - अगर होता है । तो उस वक्त कहाँ मर गये थे नामर्द । जब मुझ पर जुल्म दर जुल्म हो रहा था । और मैं एक मासूम कन्या से डायन बन रही थी ।
नीलेश को यकायक कोई जबाब नहीं सूझा ।
- ड डायन डायन डायन डायन...! फ़िर से उसके दिमाग में गूँजने लगा - ड डायन डायन डायन डायन...! ड डायन डायन डायन डायन...ड डायन डायन डायन डायन...! !
कुछ सोचता हुआ वह जिद सी करता हुआ बोला - मैं नही मानता कि ..?
- कि मेरे साथ कोई जुल्म हुआ है । वह नफ़रत से बोली - तो सुनो योगी ! मैं बहुत छोटी थी । हमारा हँसता खेलता परिवार था । मेरे माता पिता और हम छह भाई बहन । और दादा दादी थे । मेरे पिता कारिन्दा थे । दादा दादी हमारे ही साथ रहते थे । जबकि उनके सात अन्य पुत्र भी थे । दादा के पास काफ़ी धन और जेवर था । जिस पर अन्य खानदानी लोगों की नजर थी । उनका ये ख्याल था कि दादाजी ये सारा माल मेरे पिता को दे देने वाले थे । जिसके लिये सब भाई अक्सर झगङा करते थे । जबकि दादाजी का कहना था कि वह जीते जी अपनी सम्पत्ति का बटबाँरा नहीं करेंगे । और अन्त समय सबको बराबर बाँट जायेंगे ।
पर किसी को इस बात का विश्वास न था । तब उन लोगों ने एक रात मिलकर सब लोगों को मार डाला । मैं और मेरी माँ उस रात पास के गाँव में शादी में गये हुये थे । बहीं हमें यह खबर मिली । मैं उस समय सिर्फ़ नौ साल की

थी । मेरी माँ ने तुरन्त खतरा सूंघ लिया । और वह वापस गाँव न आकर वहाँ से बहुत दूर चली आयी । और एक गाँव के बाहर मन्दिर में रहने लगी । उस मन्दिर में सिर्फ़ एक अधेङ काना पुजारी था  । माँ उसी मन्दिर की साफ़ सफ़ायी करती हुयी गुजारा करने लगी । एक रात उस पुजारी ने सभी मर्यादायें तोङते हुये मेरी माँ को हवस का शिकार बना लिया । मेरी बेबस माँ ने भी उसके आगे समर्पण कर दिया । यह पूरा दृश्य मैं चुपचाप खङी देखती रही । उसके बाद माँ भी उसी रंग में रंग गयी ।
कुछ दिनों में ही बहुत से लोग आने लगे । और मेरी माँ नगरवधू बन गयी । कामवासना ने मन्दिर को कलंकित कर दिया । वह अशुद्ध हो गया । और अशुद्ध होते ही वह नीच दुष्ट आत्माओं का गढ बन गया । जैसा कि अक्सर ही होता है । फ़िर बह मन्दिर मन्दिर की बजाय नीच तामसी साधनायें करने वालों का गढ बन गया । और वहाँ वासना मिश्रित तन्त्र प्रयोग होने लगे । भले लोगों ने मन्दिर की तरफ़ देखना भी छोङ दिया । ऐसे ही लम्हों में एक खतरनाक कापालिक ने किसी सिद्ध प्रयोग में मेरी माँ की बलि चढा दी ।
अब मैं इस निठुर और स्वार्थी संसार में बिलकुल अकेली हो गयी ।
वह काना पुजारी मेरे ऊपर भी बुरी नियत रखता था । वह मुझ मासूम को अपने साथ ही सुलाता था । वे सभी लोग मेरे सामने ही माँ का इस्तेमाल करते थे । अतः मैं यह सब जान गयी थी ।
जब मन्दिर की आमदनी बिलकुल बन्द हो गयी । तब काना पुजारी मुझे फ़िर से साथ लेकर दूर देश चला आया ।

और उसने मुझे एक योजना समझायी । उस योजना के तहत मैं एक पहाङी पर बैठकर देवी होने का नाटक करने लगी । जबकि काना मेरा शीलभंग कर चुका था । वह लोगों के सामने मुझे माँ कहता । मेरे चरण छूता । और रात में एकान्त होते ही वासनापूर्ति करता । मैं भी इस नाटक में बेहद होशियार हो गयी । लोग मेरे चरण छूते । और चङावा आदि चङाते । धीरे धीरे वहाँ पहाङी पर मन्दिर बनने लगा । और लोगों की निगाह में मैं देवी रूप ही हो गयी । पर कच्ची उमर की भङकी हुयी मेरी वासना विकराल रूप लेने लगी । इसका उस काने को शायद अहसास न था । अब वह मेरे लिये बेकार था । मुझे किसी बलिष्ठ नौजवान की आवश्यकता थी । अतः योजनावद्ध तरीके से मैंने उसे मार डाला । मेरे देवी होने के कारण किसी को शक भी नहीं हुआ कि ये साधारण मौत नहीं मरा । बल्कि अपने दुष्कर्मों के चलते मरा है ।
इसके बाद एक रात मैं चुपचाप वहाँ से भाग निकली । अपना देवी वाला रूप मैंने गंगा में बहा दिया । और बाई बनकर साधुओं के झुंड के साथ यहाँ वहाँ घूमने लगी । मैं हट्टे कट्टे साधुओं का ही चयन करती थी । इस तरह मेरी अतृप्त वासना भोग के बाबजूद दिन पर दिन बङती गयी । जबकि मेरी उमर अभी बहुत कम थी ।
तब रंगीलाला से मेरी भेंट हुयी । वह अच्छे दिल का अच्छा इंसान था । पर मेरे खौफ़नाक इतिहास से अपरिचित था । मेरे मन में भी किसी से शादी करने की इच्छा जागृत हो चली थी । जो कि एक लङकी की स्वाभाविक इच्छा होती है । तब रंगीलाल ने मुझसे शादी कर ली । आगे की बात तुम जानते ही हो ।

- दादा ! अब जलवा से रुका नहीं गया । और वह बोला - ऐसा मालूम पङा । बालीबुड की तीन तीन मूवी एक ही परदे पर एक साथ चल रही हों ।
- तायी ! नीलेश जलवा की बात पर ध्यान न देकर बोला -  ये वो कहानी नहीं हैं । जिसमें मेरी दिलचस्पी हो । मेरी दिलचस्पी तो उसमें है कि तुम मृत्युकन्या की गण हो । एक अधिकार प्राप्त डायन । मगर इसमें तो डायन कहीं है ही नहीं । आयी ही नहीं ।
- मैं ! वह बेहद नफ़रत से बोली - डायन नहीं हूँ । ( फ़िर वह जोर से चिल्लायी ) योगी मैं डायन नहीं हूँ ।
- ड डायन डायन डायन डायन...! नीलेश के दिमाग में तुरन्त गूँजने लगा - ड डायन डायन डायन डायन...! ड डायन डायन डायन डायन...ड डायन डायन डायन डायन...! !
- दादा हालीवुड मूवी है । जलवा मानों समझाता हुआ बोला - अभी पार्ट टू आयेंगा । फ़िर थ्री भी आयेंगा ।

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