सोमवार, अगस्त 22, 2011

अंगिया वेताल 10

इसके कुछ साल बाद एक दिन प्रसून की मनोहर से मुलाकात हुयी । जब वह बाबाजी के गाँव गया । उसे रूपा के बारे में जानने की इच्छा हुयी ।
- वह मर गयी । मनोहर उदासीन भाव से बोला - उसने आग लगा ली थी ।
प्रसून ने हैरानी से उसकी तरफ़ देखा ।
- हाँ भाई ! वह दुखी स्वर में बोला - नीलेश भाई ने सब मामला सही कर दिया था । लेकिन शायद उसने डेरे पर जाना बन्द नही किया था । या कुछ और बात । बहुत दिनों तक वह सही रही । फ़िर उसकी शादी हो गयी थी । कुछ  दिन बाद पता चला कि पति पत्नी दोनों प्रेतवायु से आवेशित हैं । फ़िर उन्होंने या कहो । मैंने भी आप लोगों को बहुत तलाश किया । पर आप दोनों कहीं नहीं मिले । तब फ़िर दूसरे तांत्रिकों को दिखाया ।
- क्यों वो चोखे जी ? प्रसून कुछ याद सा करता हुआ बोला - वह नहीं आये ।
- अरे हाँ ! मनोहर जैसे चौंककर बोला - वह भी मर गया । रूपा के केस के बाद मेरी जब भी उससे मुलाकात हुयी । वह बाबला सा ही दिखा । पहले जैसा हट्टा कट्टा भी नहीं दिखा । वह कहता था कि किसी जिन्न को सिद्ध करने वाला है । मैंने उसे बहुत मना किया । पर वह नहीं माना । फ़िर एक बार नशे में वह एक्सीडेंट करवा बैठा । इसके बाद भी वह नहीं माना । और आखिरकार एक एक्सीडेंट में ही मर गया ।
- लेकिन रूपा ने आग क्यों लगा ली थी ?
- ठीक ठीक नहीं कह सकता । पर शायद कई वजहें थी । बहुत सी बातें सामने आयीं । पर सच क्या था । कोई नहीं बता सका । एक तो उसकी अपने पति अलकेश से बनती नहीं थी । वह कहती थी कि अलकेश औरत के लायक नहीं है । जबकि अलकेश कहता था कि वह अब भी डेरे पर जाती है । दूसरे अलकेश यह भी कहता था कि पण्डितानी ने प्रेतवायु से पीङित अपनी लङकी को उसके गले बाँधकर उसके साथ बहुत बङा धोखा किया है । इस तरह उनके घर में आये दिन कलेश मची ही रहती थी ।
भाई ये तो मैंने खुद भी देखा कि बेचारा ढंग से अपनी दुकान पर भी नहीं जा पाता था । और आये दिन वायु से आवेशित हो जाता था । दो तीन साल तक यही ढर्रा चलता रहा । अलकेश न घर का रह गया । न घाट का । अब वह पण्डितानी का सिर्फ़ घर जमाई ही बनकर रह गया था । उसकी जिन्दगी एक तरह से नरक बन गयी थी ।
फ़िर भी भाई । जाने क्या बात थी । या शायद पण्डितानी की बेहद सुन्दर छोरी के रूप का ही जादू था । वह अपने घर वालों के कहने पर भी उसे छोङता नहीं था । और न ही तलाक देना चाहता था । मालती के कुचक्र से चोखा उनका भला करने के बजाय बुरा अधिक कर रहा था । फ़िर उस लङकी को कुछ अच्छे तांत्रिक भी मिले । पर शायद उसकी किस्मत कुछ और ही लिखी जा चुकी थी ।
उन तांत्रिकों ने सफ़ल इलाज हेतु कुछ शर्तें रखी । घर में चोखा को बिलकुल न आने दिया जाय । सात्विक पूजा ही अधिक से अधिक करें । रूपा और अलकेश एक साल तक बिलकुल पति पत्नी वाले सम्बन्ध तब तक न करें । जब तक सात्विक इलाज से प्रेत प्रभाव उन पर से बिलकुल नहीं हट जाता । रूपा रात को छिपकर डेरे पर न जा पाये । उसे कङी निगरानी में ताले में रखा जाय ।
लेकिन बङे भाई अपनी बिगङी मजबूर आदतों के चलते वे लोग इनमें से एक भी बात नहीं मान पाये । चोखा का आना जाना बन्द नहीं हुआ । पति पत्नी लगभग नियम से ही सहवास करते थे । और सात्विक पूजा में उनकी कोई खास दिलचस्पी नहीं जगी । उल्टे वे टोना टोटका की शक्ति को भक्ति से अधिक ही मानते थे । कुल मिलाकर ऐसे रूपा की जिन्दगी की नाव डूब ही गयी । और फ़िर एक दिन उसने रहस्मय हालत में आग लगा ली । भाई मैंने उसे तब खुद देखा था । आग उसके नीचे वाले हिस्से से लगी थी । और उसके अन्दरूनी अंग को बेहद प्रभावित किया था । मेरे कहने का मतलब आग का असर उसके शरीर के अन्दर भी बहुत ज्यादा हो गया था । और ऊपर भी बहुत जल गयी थी । भाई अगर वो बच भी जाती । तो उसका जीवन शापित जीवन सा ही रहता । रूप की देवी अब अपने जले चेहरे से खौफ़नाक चुङैल में बदल गयी थी । उसके एक एक अंग से पहले जहाँ हीरे सी किरणें निकलती थी । वहाँ अब जले हुये माँस के भयंकर काले लाल दाग थे ।
- और उसका पति ?
- वो अब भी है भाई । निकम्मा और दीवाना सा बना घूमता रहता है । उसका जीवन मानों बेमकसद सा ही हो गया है ।
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मानसी विला ।

रात के दस बजे थे । नीलेश टी वी पर हालीबुड की कोई एक्शन मूवी देख रहा था । मानसी बाहर लान में टहलती हुयी अपनी किसी सहेली से फ़ोन पर बात करने में व्यस्त थी । बीच बीच में नीलेश की निगाह उस पर चली जाती थी । उसे लगा । मानसी अब एकदम फ़ूल की तरह खिल गयी थी । उसका अंग अंग भरकर यौवन की खुशबू से महकने लगा था । ओरेंज कलर के गाउन में लान गार्डन के फ़ूलों के बीच वह किसी परी की तरह आसमान से उतरी हुयी परी ही लग रही थी ।
बात करते करते जब वह मुढकर नीलेश की तरफ़ पीठ करती थी । तब लान में फ़ैली दूधिया लाइट में कम्पन करते उसके नितम्बों में ऐसा बल सा पङता था । मानों नदी में नाव लहराती हुयी जा रही हो । उसके प्रष्ठ भाग को थिरकते हुये नीलेश बारबार ही चोरी से देखता रहा । उसे लग रहा था । मानसी यूँ ही रात भर टहलती रहे । और वह उसे निहारता रहे । फ़िर उसके दिल में उमंगे जवान होने लगी । मगर मानसी की बात खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी । यहाँ तक कि उसका धैर्य समाप्त होने लगा । हाँ यार .. हाँ यार कहती हुयी उसकी बात लम्बी होती ही जा रही थी ।
- ओ यार की यारनी । आखिर में वह झुँझलाकर बोला - इधर आ स्साली ।
- आई ना जीजाजी ! वह शोख अदा से हाथ हिलाकर नीलेश को इशारा करती हुयी बोली - आयी आयी । बस अभी आयी जीजाजी..फ़िर जल्दी से वह फ़ोन में बोली - मेरा जीजा बुला रहा है ..उई माँ । लगता है । आज छोङने वाला नहीं । ऐ मोनी ..तुझसे फ़िर बात करती हूँ ।
फ़िर वह तेजी से चलती हुयी दरबाजा पार करती हुयी नीलेश के पास पहुँच गयी । और जान बूझ कर हमेशा की तरह नीलेश के एकदम पास सटकर बैठने के बजाय सामने सोफ़े पर बैठी । वह उसकी मचलती मन स्थिति से वाकिफ़ थी । और उसे भरपूर रूप से तङपाना चाहती थी । इससे नीलेश और तङप कर रह गया ।
- क्यूँ री साली ! वह झूठमूट दाँत पीसता हुआ बोला - मैं तेरा जीजा कबसे हो गया ?

- जीजाजी । वो शर्माकर बोली - जबसे मैं आपकी साली हो गयी । अभी अभी आपने ही बोला ना.. साली ।
अब नीलेश की सहन शक्ति से बाहर हो गया । वह उठा । और मानसी पर झपटा । वह ऐसे बचकर भागी । मानों सचमुच अपने बहकते जीजा से खुद को बचा रही हो । पर उन्मत्त नीलेश ने उसे पकङकर सोफ़े पर गिरा ही दिया ।
और दस मिनट बाद । उसे ऊपरी तौर पर तब तसल्ली मिली । जब मानसी हाय हाय कर गयी ।
- सैंया जी ! फ़िर वह बोली - मेरे साथ म्याऊँ म्याऊँ कुक्कङ कुक्कङ खेलो ना ।
नीलेश ने प्रश्नात्मक ढंग से हैरानी से उसकी तरफ़ देखा ।
तब उसका भाव समझती हुयी वह बोली - इस गेम में एक बिल्ली मीन पूसी होती है । और दूसरा प्लेयर कुक्कुट मीन काक होता है । बिल्ली बारबार मुर्गे को खा जाती है । मगर चतुर मुर्गा बारबार बच जाता है । और बिल्ली को हराकर ही मानता है । तब उसे खाने की इच्छा पाले हताश बिल्ली आखिर पानी माँग जाती है ।
नीलेश ने बङी मुश्किल से हँसी रोकी । वह जानता था । अब पासा पलट चुका था । और अब मानसी के अरमान बेकाबू हो रहे थे । अतः वह तुरुप चाल चलता हुआ बोली - चल झूठी । इम्पासिबल । मैं नही मान सकता । कोई बिल्ली मुर्गे को जीता छोङ दे ।
- मानों ना सैंया जी ! वह मचलती हुयी बोली - ऐसा ही होता है । वो भी जमाने से ।
फ़िर वह उसके एकदम करीब आ गयी । नीलेश उसका साथ देने ही वाला था कि उसका सेलफ़ोन बजा । वह झुँझलाकर उसे डिसकनेक्ट करने ही वाला था कि उसकी निगाह आई डी पर गयी ।
- प्रणाम भाई ! वह सावधान होकर आदर से बोला - बतायें ।
प्रसून उधर से बात करने लगा । नीलेश हैरत से अच्छा अच्छा करते हुये उसकी बात सुनता रहा । उसे जैसी उम्मीद थी । परिणाम ठीक वैसा ही निकला था ।
फ़िर दूसरी तरफ़ से फ़ोन कट गया । नीलेश होठों को गोल गोल कर सीटी बजाता रहा । और आखिर में बोला - मधूलिका कम आन बेबी ।
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समाप्त

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