सोमवार, अगस्त 22, 2011

अंगिया वेताल 1

जून 1988
शाम का अंधेरा तेजी से गहराता जा रहा था । आजकल कृष्ण पक्ष होने से अंधेरे की कालिमा और भी अधिक होती थी । चलते चलते अचानक रूपा ने कलाई घङी में समय देखा । सुई आठ के नम्बर से आगे सरकने लगी थी । पर कोई चिन्ता की बात नहीं थी । उसे सिर्फ़ दो किमी और जाना था ।
भले ही यह रास्ता वीरान सुनसान  छोटे जंगली इलाके के समान था । पर उसका पूर्व परिचित था । अनेकों बार वह अपनी सहेली बुलबुल शर्मा के घर इसी रास्ते से जाती थी । इस रास्ते से उसके और बुलबुल के घर का फ़ासला सिर्फ़ चार किमी होता था । जबकि सङक के दोनों रास्ते 11 किमी दूरी वाले थे । अतः रूपा और बुलबुल दोनों इसी रास्ते का प्रयोग करती थी ।
यह रास्ता पंजामाली के नाम से प्रसिद्ध था । पंजामाली एक पुराने जमाने की विधि अनुसार ईंटो का भट्टा था । जिसमें कुम्हार के बरतन पकाने की विधि की तरह ईंटों को पकाया जाता था । इसी भट्टे के मालिक से पंजामाली कहा जाता था । और इसी भट्टे के कारण इस छोटे से वीरान क्षेत्र को पंजामाली ही कहा जाता था । पंजामाली भट्टे से डेढ किमी आगे नदी पङती थी । और उससे एक किमी और आगे रूपा का घर था ।
हांलाकि बरसात का मौसम शुरू हो चुका था । पर पार उतरने वाले घाट पर अभी नदी में घुटनों तक ही पानी था ।  नदी के पानी को लेकर रूपा को कोई चिंता नहीं थी । क्योंकि वह भली भांति तैरना जानती थी ।
खेतों के बीच बनी पगडण्डी पर लम्बे लम्बे कदम रखती हुयी रूपा तेजी से घर की ओर बङी जा रही थी । उसे घर पहुँचने की जल्दी थी । तेज अंधेरे के बाबजूद स्थान स्थान पर लगे बल्ब उसको रास्ता दिखा रहे थे । हालांकि चलते समय बुलबुल ने उसे टार्च दे दी थी । पर रूपा को उसकी कोई आवश्यकता महसूस नहीं हो रही थी ।
अचानक रूपा का दिल धक से रह गया । उसकी कल्पना के विपरीत लाइट चली गयी । और तेजी से बादल के गङगङाने की आवाज सुनाई दी । लाइट के जाते ही चारों तरफ़ घुप अंधेरा हो गया ।
यह सब तो उसने सोचा ही न था । उसने तब ध्यान ही नहीं दिया । यह कृष्ण पक्ष के दिन थे । उसने ध्यान ही नहीं दिया । लाइट अचानक जा भी सकती थी । अब वह अकेले आने के अपने निर्णय पर पछता रही थी ।
रूपाली शर्मा एक बेहद खूबसूरत लङकी थी । जिसे संक्षिप्त में सब रूपा कहते थे । रूपा अपनी खास कमनीय देहयष्टि से अप्सराओं जैसी प्रतीत होती थी । 34 - 27 - 37 का आकार और 5 फ़ुट 6 इंच की  लम्बाई तथा शंख के समान गर्दन उसकी छवि को मनोहारी रूप प्रदान करते थे । इसके बाद उसकी चाल में एक विशेष प्रकार की लचक थी । नृत्य की थिरकन जैसी चाल उसके विशाल नितम्बों में एक वलय सा पैदा करती थी । जो उसको अप्सराओं के एकदम करीब ले जाती थी ।
वास्तव में वह गलती से इस प्रथ्वी पर उतर आयी कोई अप्सरा ही प्रतीत होती थी । और तब युवक क्या उसको देखकर बूङों के दिल में भी उमंगे लहराने लगती थी ।
पर इस नादान लङकी को मानों अपनी सुन्दरता और भरपूर यौवन का कोई अहसास ही न था । जबकि वह 18 से ऊपर की हो चुकी थी । और 11वीं कक्षा की छात्रा थी । रूपाली शर्मा ब्राह्मण न होकर मैथिल ब्राह्मण थी । उसके परिवार में फ़र्नीचर आदि लकङी का बिजनेस होता था ।
रूपा की सबसे पक्की सहेली का नाम बुलबुल था । आज बुलबुल के घर में किसी समारोह का आयोजन था । जिसमें शामिल होने के लिये रूपा आयी हुयी थी ।
उस समय घङी धीरे धीरे शाम के सात बीस बजाने वाली थी । और रूपा के सुन्दर मुखङे पर चिन्ता की लकीरें बङती जा रही थीं । क्योंकि उसे घर लौटना था । और जल्दी ही लौटना था । उन दिनों मोबायल फ़ोन या लेंडलाइन फ़ोन का आम चलन नहीं हुआ था । जो वह अपने घर पर किसी प्रकार की सूचना देकर घरवालों को संतुष्ट कर सकती थी ।
दरअसल रूपा शाम को 6 बजे ही बुलबुल से विदा होकर निकलने लगी थी । पर बुलबुल ने - थोङा और रुक ले । थोङा और रुक ले । कहकर उसे इतना लेट कर दिया  । और अब साढे सात बज चुके थे ।
जब वह चिंतित थी । तव बुलबुल ने कहा कि उसको वह अपने भाई द्वारा साइकिल से घर छुङवा देगी । पर एन टाइम पर उसका भाई एक मित्र के घर चला गया । और अब इंतजार करते करते ज्यादा टाइम हो गया । तब उसने अकेले जाने का ही तय कर लिया ।
यकायक रूपा का कलेजा मानों बाहर  आने लगा । आसमान में बहुत जोरों से बिजली कङकी । और मूसलाधार बारिश होने लगी । उसके मन में आया । जोर जोर से रोने लगे । हे भगवान ! वह बिन बुलाई मुसीवत में फ़ँस गयी थी । पर अब क्या हो सकता था । उसने दिल को कङा किया । और मचान की तरफ़ बङ गयी । जहाँ वह पानी से अपना कुछ बचाव कर सकती थी ।
यह मचान एक विशाल पीपल के पेङ नीचे था । वह मचान के नीचे जाकर चुपचाप खङी हो गयी । चारों तरफ़ गहन काला अंधकार छाया हुआ था । और इस अंधेरे में खङे तमाम पेङ पौधे उसे रहस्यमय प्रेतों जैसे नजर आ रहे थे । उसे अन्दर से अपनी मूर्खता पर रोना आ गया । पर अब वह क्या कर सकती थी ।
दरअसल उसका सोचना गलत भी नहीं था । पहले भी कई बार इसी समय वह इस रास्ते से गुजरी थी । पर उसे कोई डर महसूस नहीं हुआ था । क्योंकि शार्टकट रास्ता होने से यह आमतौर पर दस बजे तक आने जाने वालों से गुलजार रहता था । पर ये संयोग ही था कि आज उसे कोई नजर नहीं आया ।
मचान तक पहुँचते पहुँचते भी उसके कपङे एकदम भीग गये थे । और उसकी माँसल देह से चिपक से गये थे । रूपा ने बैग में से टार्च निकाली । और हाथ में पकङे हुये बारिश के बन्द होने या कम होने की प्रतीक्षा करने लगी ।
तभी उसे अपने पीछे कुछ सरसराहट सी सुनाई दी । जैसे कोई सर्प पत्तों में रेंग रहा हो । और उसका दिल तेजी से धक धक करने लगा । घवराहट में उसने टार्च जलाकर आवाज की दिशा में देखा । पर वहाँ कोई नहीं था । उसे आश्चर्य और घवराहट इस बात पर हुयी थी । बारिश से जमीन पेङ झाङियाँ पत्ते सब पानी से तरबतर हो चुके थे । ऐसे में सरसराहट की आवाज का कोई प्रश्न ही न था । उसके दिल में भय जागृत हो गया । और उसका सीना तेजी से ऊपर नीचे होने लगा ।
अचानक उसकी चीख निकलते निकलते बची । उसे अपने ठीक पीछे किसी के सांस लेने जैसी आवाज सुनाई दी । और फ़िर उसकी गर्दन के पास ऐसी हवा का स्पर्श होने लगा । जैसी नाक से सांस लेते समय बाहर आती है ।
- हा..। वह कांपते स्वर में बोली - क क क कौन है ?
मगर कोई जबाब न मिला । एक मिनट को उसकी बुद्धि ने काम करना बन्द कर दिया । फ़िर वह सचेत होकर उसी मूसलाधार बारिश में घर जाने को सोचकर आगे बङी ।
और तब उसकी चीख ही निकल गयी - बचाओ ।
उसे अपनी कमर के इर्द गिर्द किसी के हाथों का घेरा साफ़ महसूस हुआ । उसे अहसास हो रहा था । कोई लम्बा तगङा बलिष्ठ पुरुष उसके ठीक पीछे सटकर खङा हो । उसके दिल में आया । तेजी से भाग खङी हो । पर जैसे किसी ने उसे अदृश्य बेङियों में जकङ दिया हो ।
- त त तु तु म..। उसके कानों में अजीव सी भिनभिनाहट जैसी आवाज रुक रुक कर सुनाई दी - बहुत सुन्दर हो । और जवान भी । क्या नाम है तुम्हारा ?
- र र र रू रू रू प प प पा..। वह अजीव से भय मिश्रित सम्मोहन में कंपकंपाती आवाज में बोली ।
- हाँ ..रूपा ! वही सर्द आवाज फ़िर अहसास हुयी - वाकई तुम कमाल हो । सुन्दरता की देवी हो तुम ।
रूपा इस बेहद ठण्डी महीन झंकार जैसी आवाज को सुनकर कांपकर रह गयी । उसके शरीर में एक सिहरन सी दौङ गयी । उसके शरीर का रोम रोम खङा हो गया । अग्यात अदृश्य पुरुष उसके शरीर पर हाथ फ़िराता हुआ उसे एक अजीव सम्मोहन में ले जा रहा था । और वह न कुछ बोल पा रही थी । न ही कुछ प्रतिरोध कर पा रही थी ।
उसके अब तक के जीवन में किसी पुरुष का यह प्रथम स्पर्श ही था । वह सचेत होना चाहती थी । पर वह जादुई कामुक स्पर्श उसकी आँखें बन्द कराता हुआ एक मीठी बेहोशी में ले जा रहा था । वह अग्यात पुरुष उसके पुष्ट उरोजों को हवा के स्पर्श की तरह सहला रहा था । उसके जादुई हाथ घूमते हुये कमर की घाटी तक जा पहुँचे थे ।
- रूपा..। वह मानों उसके मष्तिष्क में बोला - लेट जाओ । और उस वर्जित काम का आनन्द लो । जो इस सृष्टि के निर्माण का प्रमुख कारण बना था ।
- हं हं हाँ..हाँ । भरपूर सम्मोहन अवस्था में कहते हुये रूपा ने अपने कपङे हटा दिये । और लरजती आवाज में बोली - पर हे जादूगर ! कौन हो तुम ?
- स्स्स्पर्श । उसके दिमाग में ध्वनि हुयी - एक अतृप्त आत्मा ।
रूपा खोई खोई सी लेट गयी । और स्पर्श उसके अंगों को सहलाने लगा । उसके समस्त शरीर में काम संचार होने लगा ।
- र र र रूप पा । वह उसके नाभि से नीचे हाथ ले जाता हुआ बोला - अप्सराओं सा यौवन है तुम्हारा । मैंने इतनी सुन्दर कोई चुङैल आज तक नहीं देखी ।
रूपा की आँखे बन्द होने लगी । उसने अपने दोनों पैर उठाते हुये 90 अंश से भी अधिक मोङ लिये । और फ़िर उसके मुँह से घुटी हुयी सी चीख निकल गयी । उसका शरीर तेजी से हिलने लगा । और वह शिथिल होती चली गयी ।
कृमशः

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