सोमवार, अगस्त 22, 2011

अंगिया वेताल 4

जैसे ही घङी ने रात के ग्यारह बजाये । रूपा एक झटके से बिस्तर से उठकर खङी हो गयी । अभी वह पहले के दिनों की तरह चुपचाप पंजामाली जाने के लिये निकलने ही वाली थी कि उसे अपने पीछे वही चिर परिचित स्पर्श का अहसास हुआ । और इसके साथ ही उसके शरीर में खुशी की लहर सी दौङ गयी । स्पर्श वहीं आ चुका था । और हमेशा की तरह पीछे उसके साथ सटा हुआ था ।
- र र रू प पा ! वह उसके दिमाग में बोला - तुम्हारी याद मुझे फ़िर से खींच लायी ।
- अ अ आज मैं भी ! वह थरथराती आवाज में बोली - बैचेन हूँ । उस कमीने भगत ने आज मेरे सामने ही  भाभी को..।
- मैं जानता हूँ । स्पर्श उसी तरह धीरे धीरे बोला - और खास इसीलिये आया हूँ । वह आधा भगत मुझे मसान समझता है । और सोचता है कि वह मुझे काबू में कर लेगा । पर उसके लिये ऐसा करना संभव नहीं है । उल्टे मैं उसे तिगनी का नाच नचाने वाला हूँ । बस तुम गौर से मेरी बात सुनो । रूप मेरी रानी मैं तुम्हें बहुत चाहता हूँ ।
रूपा ध्यान से उसकी बात सुनने लगी । ज्यों ज्यों स्पर्श उसको बात बताता जा रहा था । उसके चेहरे पर अनोखी चमक बङती जा रही थी । एक नये रोमांच का पूर्व काल्पनिक अनुभव करते हुये उसकी आँखे नशे से बन्द होने लगी ।
- स्पर्श ! वह फ़िर मदहोश होकर बोली - मैं प्यासी हूँ । बहुत प्यासी..।
- हाँ रूप ! स्पर्श लरजते स्वर में बोला ।
फ़िर वह बिस्तर पर गिरती चली गयी । और कुछ ही क्षणों में उसके कपङे तिरस्कृत से अलग पङे हुये थे ।
- हा..! अचानक रूपा मानों सोते से जागी । यह सब क्या हो रहा है उसके साथ ? वह मानों गहन अँधकार में गिरती ही चली जा रही हो । चारों तरफ़ गहरा अँधकार । और वह बिना किसी आधार के नीचे गिरती ही चली जा रही थी । कहीं कोई नहीं था । बस अँधेरा ही अँधेरा । फ़िर वह अँधेरे की एक लम्बी सुरंग में स्वतः गिरती चली गयी । पता नहीं कब तक । गिरती रही । गिरती रही । और अन्त में उस सुरंग का मुँह योनि के समान दरबाजे में खुला । तुरन्त दो पहलवान जैसे लोगों ने उसे अपने पीछे आने का इशारा किया । और वह मन्त्रमुग्ध सी उनके पीछे चलती गयी ।
एक अंधेरे से ही घिरी पीली सी बगिया में वे दोनों उसे छोङकर गायव हो गये । वह ठगी सी खङी रह  गयी । बगिया के पेङ बँधे हुये प्रेतों की तरह शाँत से खङे  मानों उसी को देख रहे थे । कहीं कोई नहीं था । रूपा को ऐसा लगा । मानों प्रलय के बाद धरती पर विनाश हो गया हो । और समस्त धरती जनजीवन से रहित हो गयी हो । फ़िर वह कैसे जीवित बची रह गयी ? बहुत दूर कुछ आवादी जैसे मकान नजर आ रहे थे ।

उसे बहुत कोशिश करने पर अपना घर हल्का सा याद आता था । और तुरन्त ही भूल जाता था । उसे अन्दर से लग रहा था कि वह डरना चाह रही थी । पर डर भी नहीं पा रही थी । उसे कभी कभी  दिल में रोने जैसी हूक भी उठ रही थी । पर वह रो भी नहीं पा रही थी । उसकी समस्त इच्छायें भावनायें एक अदृश्य जादुई नियंत्रण में थी ।  जिससे वह बाहर निकलना चाहती थी । पर निकल नहीं पा रही थी ।
फ़िर अचानक रूपा को कुछ इच्छा हुयी । और वह खिंचती हुयी सी बस्ती की तरफ़ चलने लगी ।
तभी उसकी गरदन पर गर्म गर्म सांसो जैसी हवा का स्पर्श हुआ । सांसो जैसा । मगर कुछ और ही तरह का ।
- र र र रूप ! उसे वही परिचित आवाज सुनाई दी । और उसके जिस्म में अनजानी खुशी की लहर सी दौङ गयी । इस अपरिचित बियावान जगह पर स्पर्श के मिलने से उसे बहुत राहत मिली ।
- स्पर्श हम कहाँ है ? वह सहमी सी बोली - ये प्रथ्वी तो नहीं मालूम होती ।
- हाँ रूपा ! तुम सच कह रही हो । ये प्रथ्वी नहीं हैं । बल्कि ये अतृप्त और अकाल मृत्यु को प्राप्त इंसानों के रहने का प्रेतलोक है । तुम यहाँ अपने आंतरिक शरीर से आयी हो । तुम्हारा स्थूल शरीर तुम्हारे कमरे में मृतक के समान ही पङा है । क्या तुम्हें भय लग रहा है रानी ?
उसने न में सिर हिलाया । और अपने बदन पर स्पर्श की छुअन महसूस करने लगी ।
विशेष - मेरा आप सभी से आग्रह है । ये प्रेतकथायें आप सिर्फ़ मनोंरंजन की दृष्टि से पढें । और प्रेत होते हैं । या नहीं होते हैं ? इसके भी चक्कर में न पङकर आप आधुनिक समय का यही विचार मानें कि - भूत प्रेत कुछ नहीं होते । क्योंकि वे हों । या न हों । उन्हें मानने की बजाय न मानने में अधिक लाभ होता है । दूसरे मेरे पुराने पाठक जानते ही हैं कि - ये सब कहानियाँ में आप लोगों की बेहद डिमांड पर ही लिखता हूँ । वास्तव में नई सी जानकारियाँ देती ये कहानी रोमांचक तो होती हैं । पर इन्हें पढने से लाभ कुछ नहीं होता । क्योंकि अक्सर पाठक इनका अच्छा पक्ष न देखकर खराब पक्ष से अधिक प्रभावित हो जाते हैं ।

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