सोमवार, अगस्त 22, 2011

अंगिया वेताल 6

चोखा भगत आँखे बन्द किये तेजी से मन्त्र का जाप कर रहा था । किसी औरत के पायलों के नूपुर की मधुर छन छन छन उसे भी सुनायी दी थी । पर लपटा की चेतावनी को ध्यान रखता हुआ वह आँखे बन्द किये बैठा ही रहा । और सावधानी से मन्त्र का जाप करता रहा । प्रेतनियाँ उसकी साधना में विघ्न डालने की बात भूलकर उस दिव्य सुन्दरी को ही देखने लगी । छोटे प्रेतों के दिल में अपने जीवित होने के समय जैसी हिलोरे उठने लगी । सभी गण आपस में यही खुसर पुसर कर रहे थे कि - आखिर ये देवी जैसी कौन है ?
ये मनुष्य ही लग रही है । पर मनुष्य जैसे डरपोक प्राणी का इस समय शमशान में उपस्थित होना असंभव था । फ़िर आखिर ये कौन है ? वह प्रेत समुदाय से नहीं थी । यह भी निश्चित ही था ।
लेकिन इन सबकी हालत से बेखबर एक पेङ की डाली से लटकी हुयी रहस्यमय शख्सियत बङे गौर से इस दिलचस्प नजारे को देख रही थी । और बेसब्री से आने वाले पलों का इंतजार कर रही थी ।
मगर इस सबसे बेपरवाह वह रूपसी धीरे धीरे चहलकदमी सी करती हुयी चोखा के आसपास चक्कर काटती रही । उसने उस मुर्दा ग्राउंड के चारों तरफ़ टहलते हुये कुछ चक्कर से लगाये । और फ़िर आकर ठीक चोखा के सामने खङी हो गयी । उसने किसी मुजरा नायिका की तरह पाँवों की ऐडी हिलाकर घुँघरू छनकाये । फ़िर हाथों की चूङियों को भी खनकाया ।
और बेहद सावधान सधे स्वर में बोली - चोखा भगत ! आँखे खोल । देख मैं आ गयी ।
इस मधुर और धीमी झनकार युक्त आवाज ने भी चोखा को मानों बिजली सा करेंट मारा । और उसने हङबङाकर आँखे खोल दी । फ़िर मानों उसके होश ही उङ गये ।
- रूपा..तू ! वह एकदम उछलते हुये बोला ।
वास्तव में उसके सामने रूपा ही खङी थी । इस धरती पर किसी गलती से शाप भोगने आयी मनुष्य रूपिणी अप्सरा । पीले रंग की कढी हुयी साङी और काला ब्लाउज पहने काली लिपिस्टक लगाये वह दूध जैसी गोरी.. गोरी एकदम उसके सामने ही खङी थी । एक मधुर मोहक और आमन्त्रण भरी मुस्कान के साथ ।
चोखा मानों होश ही खो बैठा । वह भूल ही गया कि किसलिये यहाँ आया है ? वह भूल ही गया कि जिस आधी साधना को वह जागृत कर चुका है । उसे बीच में छोङने का परिणाम क्या होगा ? वह भूल ही गया । लपटा बाबा की वह चेतावनी - आँधी आये या तूफ़ान । साधना बीच में छोङने का मतलब सिर्फ़ मौत । कारण कोई भी हो । मगर परिणाम एक ही मौत । खिलखिलाती हुयी । सीने पर चङकर मारने वाली खुद बुलायी मौत । वास्तव में इसीलिये कहा है - क्या देव । क्या दानव । क्या मनुष्य़ । क्या अन्य । कामवासना ने सबको मुठ्ठी में किया हुआ है । फ़िर भला चोखा कैसे बच सकता था ।
- हाँ भगत ! रूपा किसी देवी के समान मधुर मुस्कान के साथ बोली - मैं तेरी चाहत में यहाँ तक भी खिंची चली आयी । यही चाहता था न तू ।
- मगर..तेरे घर के लोग..तू.. मतलब..! वह अटक अटक कर बोला - इस समय यहाँ आ कैसे गयी ।

- भगत ! वे सब सोये पङे हैं । जिस तरह इंसान सदियों से अग्यान की मोह निद्रा में सोया हुआ है । फ़िर तूने सुना नहीं है कि - प्यार अँधा होता है भगत । फ़िर मैं तेरे सपनों की रानी भी हूँ । तू कल्पना में मुझे भोगता था । आज इस देवी ने तेरी सुन ली । तेरी मनोकामना पूर्ण हुयी । आज तेरे ख्वावों की मलिका तेरे सामने खङी है । आखिर कब तक मैं तेरा प्यार कबूल न करती ।
चोखा को कहीं न कहीं किसी गङबङ का किसी धोखे का अहसास हो रहा था । और वह एकदम किसी जादुई तरीके से आसमान से उतरी हुयी इस मेनका के रूपजाल से बचना भी चाहता था । पर जाने क्यों अपने आपको असमर्थ सा भी महसूस कर रहा था । उसकी छठी इन्द्रिय बारबार उसे खतरे का अहसास करा रही थी । पर जैसे ही वह रूपा को देखता । उसका दिमाग मानों शून्य 0 हो जाता ।
- लेकिन..। वह हकलाता हुआ सा बोला - तुझे यहाँ आने में डर..?
- भगत ! रूप की नायिका फ़िर से खनकते हुये सम्मोहित करने वाले स्वर में बोली - इस अगर मगर किन्तु परन्तु लेकिन वेकिन में समय नष्ट न कर । मैं कह चुकी हूँ - प्यार अँधा होता है । वह अँजाम की परवाह नहीं करता । वह किसी भी बात की परवाह नहीं करता ।
- परन्तु..। न चाहते हुये फ़िर भी भगत के मुँह से निकल ही गया ।
और तब अपनी उपेक्षा से रूठकर मानों वह अनुपम सुन्दरी जाने को मुङी । भगत का मानों कलेजा ही किसी ने काट डाला हो ।
- ठहरो रूपा ! कहते हुये वह अपने राख आसन से उठ गया । उसने एक बेबसी की निगाह चिता पर रखी हंडिया पर डाली । और गले से माला उतार कर चिता पर फ़ेंक दी । चंडूलिका का काम हथियार फ़िर कामयाव रहा था । सफ़लता से चलती साधना सिद्धि खण्डित हो चुकी थी । गणों की खुशी का ठिकाना नहीं था । वे दिलचस्पी से सारा नजारा देख रहे थे ।
रूपा ने अपना आँचल नीचे गिरा दिया । उसके उन्नत स्तन भगत को चुनौती देने लगे । भगत ने तेजी से उसे आलिंगन में भर लिया । और रूपा मेरी रूपा ओ मेरी जान करने लगा
तभी जंगली पेङ की डाली से झूलता हुआ वह साया तेजी से हवा में लहराता हुआ सा आया । और भगत में समाते हुये उसने भगत को अपने आवेश में ले लिया । एक क्षण को सिर्फ़ एक क्षण को भगत बेजान लाश के समान गिरने को हुआ । मगर दूसरे ही क्षण लङखङा कर संभल गया । इसके साथ ही गणों को मानों होश आया । और वे तेजी से वहाँ से चले गये । चोखा फ़िर से किसी पहलवान की तरह तनकर खङा हो गया । और रूपा के बदन  को सहलाने लगा ।
फ़िर वह लरजते हुये से स्वर में बोला - र र र रूप ! मेरी रानी ।
- हाँ..स्पर्श..! रूपा आँखे बन्द कर बोली - कितनी तङपी हूँ मैं ..।
- स स स सुन्दरी..अ.अ.आज तेरी त्रुप्ति होगी ! वह उसे समेटता हुआ बोला - इस मानव शरीर के द्वारा ।
फ़िर वह दोनों मुर्दे के पास ही गिरते चले गये । और एकाकार होने लगे । रूपा कराहने लगी । और स्पर्श उसे घङी की सुईयों की भांति उसी स्थान पर गोल गोल घुमाने लगा । उसी अवस्था में जब सरकते सरकते रूपा मुर्दे की राख के एकदम समीप पहुँची । तब वह मुठ्ठी में राख भर भरकर चोखा पर फ़ेंकने लगी ।
दो घण्टे बीत गये ।
रूपा निढाल सी एक तरफ़ बैठी थी । चोखा अलग जमीन पर बैठा था । वह किसी खूँखार शेरनी की तरह रति स्थान पर टपके रक्त को देख रही थी । उसकी आँखों में घृणा का सागर उमङ रहा था ।
फ़िर अचानक वह उठी । इसके साथ ही किसी यन्त्र सा चोखा भी खङा हो गया । वह रक्त के पास पहुँची । और उसे उँगली से लगाया । फ़िर उसने चोखा का तिलक किया । और अपने माथे पर गोल बिन्दी लगायी ।
- अब ! वह खतरनाक स्वर में बोली - जाओ ( फ़िर वह चीखी - जाओ तुम । मैंने कहा । जाओssss..।
चोखा के बदन से परछाई नुमा साया निकलकर पेङ पर चला गया । चोखा फ़िर लङखङाया । और गिरता गिरता संभल गया । बल्कि वह गिरने ही वाला था । जब रूपा ने उसे संभाला ।
- तूने..। फ़िर यकायक वह घोर नफ़रत से बोली - मेरा कौमार्य भंग किया । बोल.. तूने मेरी वो अमानत । जो मैंने.. अपने पति को.. सौंपने को रखी थी । उसे नष्ट किया । बोल..पापी..बोल..अब बोलता क्यों नहीं ।
चोखा को समझ में नहीं आ रहा था । वह क्या कह रही है । और क्यों कह रही है । उसे तेज चक्कर सा आ रहा था । और वह मुश्किल से खङा हो पा रहा था ।
रूपा ने किसी महाराष्ट्रियन औरत की भांति साङी समेटी । उसने साङी का पल्लू कसकर खोंसा ।
फ़िर वह किसी लङाका की भांति चोखा की तरफ़ बङी । और जबरदस्त घूँसा चोखा के जबङे पर मारा । चोखा को काली रात में दिन सा नजर आने लगा । घूँसा उसे किसी भारी घन की चोट के समान महसूस हुआ । उसका जबङा हिल गया । और खून निकलने लगा ।
फ़िर रूपा ने किसी दक्ष फ़ायटर की तरह उसे लात घूँसों पर रख लिया । चोखा पलटवार तो दूर अपना बचाव भी न कर सका । और अन्त में पस्त होकर चिता के पास ही गिर पङा । उसकी नाक से भल भल कर खून निकल रहा था ।
तब घायल शेरनी सी रूपा ने अपनी झूलती लटों को अपने सुन्दर मुखङे पर पीछे फ़ेंका । और गहरी गहरी सांसे लेने लगी । उसका सीना तेजी से ऊपर नीचे हो रहा था ।
- धन्यवाद चंडूलिका । उसके कानों में सुनाई दिया - धन्यवाद देवी ।
- ऐ । अचानक वह गुर्राई - खाली धन्यवाद नहीं वेताल । हमें शरीर बार बार नहीं मिलते । वो भी ऐसे काम प्रवाहित माहौल में । जलती चिता । दो माध्यम जिस्म । वो भी जवान कन्या । और कद्दावर मनुष्य । मैं मृत्युवाहिनी हमेशा इसी की भूखी रहती हूँ ।
- पर । उसके कानों में भयभीत स्वर सुनाई दिया - ये माध्यम रूपा मर जायेगी देवी । और मैं इससे बहुत प्यार करता हूँ ।
- मर जाने दे । वह नफ़रत से बोली - मैं तो चाहती हूँ । सभी मर जायें । इस समाज की मूर्ख बन्दिशों के चलते ही हम प्रेतनियाँ अतृप्त मरी हैं । तू भी इन्हीं मनुष्यों का शिकार ही तो हुआ था । मनुष्य । हाँ मनुष्य । जो कभी हम भी थे ।
कहते कहते अचानक वह फ़ूट फ़ूटकर रोने लगी । फ़िर तेज स्वर में अट्टाहास करने लगी । यकायक उसने भरपूर थप्पङ चोखा के गाल पर मारा । और उसी पल चोखा उस पर झपट पङा । चिता पूरी तरह जल चुकी थी । अब उसमें अंगार ना के बराबर थे । बस उसकी राख ही गर्म थी ।
रूपा अपने प्राकृतिक रूप में खुल गयी । चोखा ने उसे उसी चिता के ऊपर लिटा दिया ।
- वेताल ! रूपा आह भरती हुयी बोली - तू कितना सुख देता है ।
- हाँ । चोखा बोला - चंडूलिका साक्षी ! तू अदभुत है । मौत की देवी ।

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