सोमवार, अगस्त 22, 2011

अंगिया वेताल 7

कलियारी कुटी ।
दोपहर के एक बजे का समय था । अचानक ध्यान में लेटे हुये प्रसून ने आँखे खोल दी । वह सचेत होकर बैठ गया । और ध्यान टूटने की वजह सोचने लगा । तुरन्त ही उसे अपने ध्यान टूटने की वजह पता चल गयी । वे दो साये थे । जो उसी के बारे में बात करते हुये कलियारी काटेज की तरफ़ आ रहे थे । आन लगी हुयी सिद्ध कुटी ने किसी सचेत पहरेदार की तरह उसे सूचना कर दी थी । और तब वह तेजी से निकलकर झरना पार करते हुये कुछ दूर बनी उस पहाङी पर आ गया । जिस पर एक घने वृक्ष के नीचे दो बङी पत्थर की शिलाएं एक डबल बेड की तरह बिछी हुयी थी ।
( कलियारी कुटी के बारे में विस्तार से जानने के लिये पूर्व प्रकाशित प्रेत कथा - प्रेतनी का मायाजाल देखें )
वह उन्हीं शिला में से एक पर बैठ गया । और सिगरेट सुलगाकर आगंतुकों की प्रतीक्षा करने लगा । दरअसल वह नहीं चाहता था कि कुछ ही दूर गुप्त ढंग से बनी कलियारी काटेज के बारे में किसी को पता चले । पहले तो अदृश्य रूप से प्रतिबन्धित उस एरिया में कोई प्रवेश कर ही नहीं सकता था । और अगर करने की कोशिश भी करता । तो सिवाय उसे डरावने अनुभव के कुछ भी हासिल नहीं होने वाला था ।
फ़िर भी एक सच्चे सिद्ध योगी के नियमों का पालन करते हुये वह किसी को ऐसे अनुभवों से भी दूर रखना चाहता था । बस उसे हैरत इस बात की होती थी कि कैसे उसे जरूरतमन्द खोजते हुये इस अत्यन्त वीरान जगह पर भी आ ही जाते थे ।
जैसे ही वह साये उसके नजदीक आये । उनमें से एक को प्रसून ने तुरन्त पहचान लिया । वह मनोहर था । उसके गुरु की पुरानी पहचान वाला आदमी । दूसरा उसके लिये एकदम अपरिचित था । उनके इतने आसानी से वहाँ पहुँचने की वजह अब प्रसून को पता चल गयी थी । मनोहर ।
- बङे भाई ! कहते हुये उमर में उससे बङे मनोहर ने उसके चरण स्पर्श किये । और छाती से लग गया । फ़िर वह बोला - सच कह रहा हूँ । बता नहीं सकता । आज आपको देखकर कितनी खुशी हो रही है ।
वे दोनों भी दूसरी शिला पर बैठ गये । मनोहर बाबाजी के बारे में और तमाम पुरानी यादों के बारे में प्रफ़ुल्लित हुआ सा बात करने लगा ।
प्रसून को भी गुरु के बारे में सुनते हुये अच्छा लग रहा था । अतः वह आराम से सुनता रहा । कई वर्ष बाद मिलने से वे दोनों साथ आये व्यक्ति को मानों भूल ही गये ।

- अरे हाँ ! फ़िर मानों मनोहर को कुछ याद आया - प्रसून जी ! ये मेरा दोस्त चोखे है । ये भी भगत है । पर अबकी बार यह किसी ऐसी हवा वयार के चक्कर में उलझ गया कि इससे निबटते नहीं बन रहा । यह कहता है कि वे कई दुष्ट आत्मायें हैं । जिनके कारण यह उनको संभाल नहीं पा रहा । उनमें कुछ पिशाच मसान जिन्न जैसी प्रेत आत्मायें भी हैं । जिसकी वजह से ये कमजोर पङ जाता है । वैसे ये भी पहुँचा हुआ भगत है ।
प्रसून भावरहित मुख से उसकी बात सुनता रहा । फ़िर उसने सिगरेट सुलगायी । और केस उनकी तरफ़ बङाया । चोखे ने एक सिगरेट जला ली । मनोहर सिगरेट नहीं पीता । उसने अपने पास से बीङी जला ली ।
- वो मसान ! भगत बङी गम्भीरता से बोला - एक कुंवारी लङकी के ऊपर सवार है । और मेरे ख्याल से उसे एक साल से ऊपर हो गया । अभी कुछ समय से मैं उसका उपचार कर रहा हूँ । पर मुसीवत यह है । लङकी छुप छुप कर डेरे ( प्रेतवासा के स्थान ) पर जाती रही है । अतः कई प्रकार की वायु से आवेशित हो चुकी है । मैं एक का इंतजाम करता हूँ । तब तक दूसरा हावी हो जाता है । अतः इस कार्य हेतु दो या अधिक तांत्रिक शक्तियों की आवश्यकता है । तब कुछ बात बन सकती है ।
प्रसून के मन में आया । इस फ़्राड आदमी के जोरदार झापङ लगाये । और लात घूँसो से मार मार कर इसका बुरा हाल कर दे । पर मनोहर की तरफ़ देखते हुये उसने जबरन अपनी इच्छा पर नियन्त्रण किया । उसके  दिल में जोरदार इच्छा हुयी कि काश ! मेरी जगह तू नीलेश के पास पहुँचा होता । तो हमेशा के लिये भगतई करना भूल जाता । तांत्रिकों के नाम पर कलंक ।
- भगत जी ! लेकिन प्रत्यक्ष में सौम्य मुस्कराहट के साथ वह बोला - आपके भगतई जीवन में कभी कोई मरीज अगिया वेताल प्रेताबाधा से पीङित आया है ।
- अगिया वेताल ! चोखा के दिमाग में मानों बम फ़टा हो । वह अपनी जगह पर उछलते उछलते बचा ।
और आँखे फ़ाङ फ़ाङकर प्रसून को देखने लगा । जो किसी दिव्य आत्मा की तरह मधुर मुस्कान के साथ उसी को देख रहा था ।
अगिया वेताल ..अगिया वेताल..बारबार चोखे के दिमाग में यह अजीव सा नया शब्द गूँजने लगा । वह समझ गया कि वह शेखी कितना ही मारे । पर रूपा के रूप जाल में फ़ँसकर उसने भारी मुसीवत मोल ले ली थी ।
- बङे भाई ! मनोहर उत्सुकता से बोला - ये नाम पहली बार सुना है । अगिया वेताल क्या होता है भाई ? मैंने तो आज तक विक्रम वेताल ही सुना था ।
मनोहर के सरल भाव पर प्रसून की हँसी निकलते निकलते बची । फ़िर वह बोला - मनोहर जी ! जो इंसान अकाल मृत्यु को प्राप्त होते हैं । और किसी भी कारणवश उनका दाहकर्म या अंतिम संस्कार समय पर नहीं हो पाता । तब लावारिस ढंग से पङी हुयी ऐसी उपेक्षित लाश को मसान प्रेत आदि अधिकार में ले लेते हैं ।
- वो क्यों भाई ? मनोहर उत्सुकता से बोला ।
- एकदम पक्का तो मैं भी नहीं कह सकता । बात अधिक न बङाने के उद्देश्य से प्रसून ने सफ़ेद झूठ बोला - पर शायद  वे भोजन के लिये उसका इस्तेमाल करते हैं । अब ये मत पूछना । वे उसका भोजन किस तरह करते हैं । तब ऐसी लाश से जुङा मृतात्मा कुछ प्रक्रिया से गुजरकर ( जिसकी लाश थी ) अगिया वेताल हो जाता है ।

लेकिन इस शब्द को दूसरे कई अन्य अर्थों में भी प्रयोग किया जाता है । वास्तव में वेताल का सही अर्थ बिना लय यानी बे ताल के होना भी है । बिना नियन्त्रण के होना भी है । और अगिया को बहुत सी जगह स्थानीय बोली में आग के लिये प्रयोग किया जाता है । अतः ऐसी आग जो बेकाबू हो । नियन्त्रण के बाहर हो । उसे भी अगिया वेताल कहते हैं । इस तरह जब बेतहाशा गर्मी पङती है । जैसे मानों आग ही बरस रही हो । उसे भी अगिया वेताल कहते हैं । एक अगिया वेताल शिव का गण भी होता है । ( फ़िर वह मानों नीलेश को याद करता हुआ बोला । जिसने अपने स्वभाव अनुसार इस प्रेत का नाम ही बदल दिया था  ) लेकिन इस शब्द अगिया वेताल से कहानीकारों कवियों आदि ने अगिया को अंगिया करते हुये स्त्री के आंतरिक वस्त्र अंगिया यानी चोली से जोङकर तमाम तरह के श्रंगारिक भावों उपमाओं आदि से विभिन्न कल्पनायें की हैं ।
- लेकिन भाई ! मनोहर फ़िर से बोला - आप अगिया वेताल की कहानी क्यों सुनाने लगे ?

- क्योंकि । प्रसून मनोहर को गौर से देखता हुआ बोला - रुपाली शर्मा अगिया वेताल से ही पीङित है ।
चोखा भगत के छक्के छूट गये । उसके चेहरे पर भय साफ़ नजर आने लगा । दरअसल अब तक वह अगिया  वेताल जैसी किसी वायु से परिचित नहीं था । उसके उपचार के बारे में उसे कुछ मालूम नहीं था । और वैसी हालत में उसे लेने के देने पङ सकते थे ।
- महाराज ! अचानक उसके दिल में स्वतः प्रसून के लिये श्रद्धा हुयी - आप मेरी कुछ सहायता कर सकते हो ।
- नहीं । प्रसून दो टूक लहजे में बोला - मैं नहीं । लेकिन मैं इसी काम के उस्ताद को भेज दूँगा ।
- आपसे भी बङा ? चोखा हैरानी से बोला ।
- हाँ । प्रसून सौम्य मुस्कराहट से बोला - मुझसे भी बङा ।
फ़िर वह एक नम्बर सेल पर डायल करने लगा ।

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