सोमवार, अगस्त 22, 2011

अंगिया वेताल 9

पंजामाली के घाट से आगे निकल कर नीलेश उसी तरफ़ बढता चला गया । जहाँ नीलेश रूपा को पहली बार नदी के गहरे पानी में ले गया था । और देर तक नदी की जलधारा के बीच उन्मुक्त काम किल्लोल करता रहा था । इस तरह का डेरा ( प्रेतवासा ) कहाँ हो सकता है । यह पहचानना उसके लिये कोई मुश्किल काम नहीं था । आखिरकार एक जगह पहुँचकर वह रुक गया । यहाँ बङी संख्याँ में विलायती बबूल के पेङ और ढेरों अन्य झाङियाँ थी । यहाँ पर नदी ने वलयाकार मोङ लिया था । और काफ़ी बङा ऊसर टायप स्थान खाली पङा हुआ था । आयताकार जमीन पर जले के निशान और खास आकृति में काली रेख के निशान एकदम स्पष्ट बता रहे थे कि वहाँ मुर्दे जलाये जाते थे । कुछ निशान दो चार दिन ही पुराने मालूम होते थे ।
जलवा ने अपने दिल को कङा करने की काफ़ी कोशिश की । फ़िर भी उसके शरीर का एक एक रोयाँ खङा हो गया । नीलेश उसकी हालत समझ रहा था । भूतिया क्षेत्र में रोंये खङे रहना एक सामान्य बात थी । पर यह बात उस पर लागू नहीं होती थी ।
नीलेश ने उसे बताया नहीं था कि वह यहाँ क्यों आया है । उसने रिस्टवाच में टाइम देखा । आठ बजने वाले थे । फ़िर वह मुर्दों के दाहकर्म स्थान के सामने एक पेङ के नीचे खङा हो गया । उसने सिगरेट सुलगायी ।
और बोला - यहाँ ठीक है ।
उसका मतलब समझते ही जलवा ने तुरन्त एक बङा कपङा वहाँ बिछाया । और उसका बैग वगैरह रखकर बैठ गया । फ़िर बैग से निकाल कर उसने एक चार्जिंग टार्च जलाकर रख दी । नीलेश के इशारे पर जलवा बबूल की एक पतली सी टहनी तोङ लाया था । जिसे छीलता हुआ नीलेश अपने हिसाब से नोकीली कर रहा था । फ़िर वह उस नुकीली लकङी से जमीन पर इस तरह आङी तिरछी रेखायें बनाने लगा । जैसे चित्रकारी कर रहा हो ।
जलवा गौर से उसके क्रियाकलाप देख रहा था । पर नीलेश को मानों इसकी कोई परवाह ही नहीं थी । कुछ ही देर में उन लाइनों को देखता हुआ जलवा समझ गया कि नीलेश इसी स्थान का स्केच बना रहा था । जहाँ वह इस वक्त मौजूद थे । उसने बीचो बीच में नदी बनायी । उसके दोनों किनारे के पार का स्थान बनाया । फ़िर कुछ खास स्थानों का चयन करते हुये उसने कुछ आयत और वृत भी बनाये । और उनमें इंसानों जैसी आकृतियाँ भी बनायी ।
वास्तव में यह एक शक्तिशाली यन्त्र था । जो अब किसी रिमोट की भांति काम करने वाला था । जो क्रियायें अनपढ टायप तांत्रिक स्थूल कार्यों और वस्तुओं के सहारे से बहुत पेचीदगी और जटिलता से मेहनत के बाद कर पाते थे । वह इस शिक्षित योगी ने सिर्फ़ एक यन्त्र के माध्यम से कर दी थी ।
पूरी तैयारी करते करते उसे रात के दस बज गये । तब उसने एक बार फ़िर से रिस्टवाच में समय देखा । और फ़िर सब तरफ़ से आश्वस्त होकर उसने एक नयी सिगरेट सुलगायी । फ़िर उसके मुँह से निकला - अंगिया वेताल ।
तभी उसे दूर से आती हुयी बाइक की लाइट चमकती हुयी दिखायी दी । और फ़िर बाइक धीरे धीरे उनकी तरफ़ आने लगी । बाइक को चोखा भगत चला रहा था । जिस पर पीछे मालती और फ़िर उसके भी पीछे रूपा बैठी हुयी थी । बाइक उनसे कुछ ही दूर पर रुक गयी ।
वे तीनों उतर कर उसकी तरफ़ आने लगे । मगर नीलेश ने मालती और रूपा को वहीं रुकने का इशारा किया । और चोखा को आने का संकेत किया । वे दोनों वही कुछ ही आगे एक सूखे कुँये की मुंडेर पर बैठ गयी ।
चोखा भगत वहीं जमीन पर बैठ गया । अपनी जानकारी में वह नीलेश के बराबर का भगत बनकर आया था । और अब वे दोनों ही मिलकर इस प्रेत उपचार क्रिया को अंजाम देने वाले थे । इसलिये  वह बङी अकङ से और बङे रुआब से बैठा था । दूसरे आज शमशान जैसे स्थान पर वह दो दो औरतों को अपना हुनर दिखाने वाला था । इस सबने मिलाकर उसके चेहरे पर एक चमक सी पैदा कर दी थी ।
नीलेश ने देखा । शमशान में विचरने वाली कई आत्मायें नदी के पार खङी कौतूहल से इस अजीबोगरीब नजारे को देख रही थी । वह गौर से आसपास घूमती 28 के करीब रूहों को देखता रहा । पर उनमें अंगिया वेताल जैसा कोई प्रेत उसे नजर नहीं आया । सभी छोटे प्रेत ही थे । जबकि वहाँ वेताल होना चाहिये था । हाँ एक बात उसने जरूर महसूस की कि उसे भयंकरी की उपस्थित का अहसास अवश्य हो रहा था । जबकि भयंकरी जैसे बङे प्रेत आमतौर पर ऐसे स्थान पर अक्सर कम ही होते हैं । और उससे भी अलग वह चंडूलिका साक्षी के चिहन भी अनुभव कर रहा था ।
वे सभी छोटी रूहें नदी के उस पार ही थी । क्योंकि इस पार का काफ़ी इलाका उसने बाँध दिया था । अब इसमें वही रूहें आ सकती थी । जिनको वह बुलाता ।
- भगत जी महाराज ! फ़िर वह शालीनता से बोला - कार्यवाही शुरू की जाय ।
भगत ने किसी बङे भगत के से अन्दाज में सिर हिलाया । ये बात अलग थी कि उसे बङी हैरत हो रही थी कि बिना किसी सामान सट्टा के ये क्या और कैसे करने वाला है ? पर उस वक्त देखने के अलावा उसके पास कोई चारा न था ।

- स्साला अंगिया चोर ! फ़िर बहुत देर से मन ही मन वेताल का आहवान करता हुआ नीलेश चिढकर मन ही मन बोला । और उसने वेताल को लक्षित खाने में लकङी ठोक दी - सीधे रास्ते से मान ही नहीं रहा ।
- क्षमा दिव्य क्षमा ! सिर्फ़ उसे वेताल की गिङगिङाहट सुनाई दी - मैंने आपको समझने में भूल की ।
नीलेश के चेहरे से सभी साधारण भाव खत्म हो चुके थे । और अब वह एक सुलझा हुआ गम्भीर तांत्रिक योगी सा नजर आ रहा था ।
- दिव्य ! वेताल फ़िर बोला - माध्यम ही उचित है । उपचार तभी पूर्ण होगा ।
नीलेश ने चोर निगाह से जलवा को देखा । पर वह न जाने किन ख्यालों में खोया हुआ था । उसने टहनी को गोल गोल घुमाया । जलवा कला मुण्डी सा खेलता हुआ उसके ठीक सामने जाकर रुक गया । वेताल ने उसे आवेशित कर माध्यम बना लिया । और नीलेश के सामने हाथ जोङकर उसे प्रणाम किया ।
पर उस पर कोई ध्यान न देता हुआ नीलेश बेहद घृणा से बोला - क्यूँ..आखिर क्यूँ ? तूने इस भोली मासूम सुन्दर लङकी को हमेशा के लिये बरबाद कर दिया । इसका दुर्लभ मनुष्य जन्म नष्ट कर दिया । तू मुझे प्रेत कानून के अन्दर ही बता । इसकी क्या गलती थी ? जो तूने इसे निशाना बनाया ।
जलवा ने असहाय स्थिति में शर्मिंदगी से सिर झुका लिया । वह कुछ न बोला । और नजरें चुराने की कोशिश करने लगा । बस एक बार उसने नदी के पार आसपास आशा भरी दृष्टि अवश्य फ़ेंकी ।
- अच्छा । नीलेश उसको लक्ष्य करता हुआ बोला - भयंकरी का सहयोग अपेक्षित कर रहा है तू । और वो तेरी अम्मा चंडूलिका साक्षी । वो कहाँ है इस वक्त ?
जलवा बुरी तरह से चौंका । उसके चेहरे पर भूचाल सा नजर आया । इन दो नामों का नीलेश द्वारा जिक्र होते ही वह मानों एकदम टूट ही गया । तभी उसे नीलेश की आवाज फ़िर से सुनाई दी - मैंने कुछ पूछा है तुझसे ?
- यह धर्म चक्र ( मासिक धर्म ) से थी । वह खोखले स्वर में बोला - और अशुद्ध थी । गलत स्थान पर थी । सुरक्षा रहित थी । इसलिये..इस..लिये ।
- नीच वेताल । नीलेश बेहद नफ़रत से बोला - लङकी का चक्र से होना कोई उसका दोष हुआ । हर लङकी समय पर चक्र से होती ही है । यह स्वतः होने वाली प्राकृतिक क्रिया ही है । वह अपने सहेली के समारोह में गयी थी । वह इस रास्ते से अक्सर आती जाती थी । वह देर तक चलने वाला एक आम रास्ता था । माना ( फ़िर उसने लकङी को इधर उधर घुमाया ) यहाँ कुछ स्थान प्रेतों के हैं । लेकिन इंसानो के उससे अधिक हैं । रूहों की हदें हैं । लेकिन इंसान उनके स्थानों पर फ़िर भी जा सकता है । क्योंकि वह इस बात से अनजान हैं । अब बोल क्या जबाब है तेरे पास ?
- दिव्य ! वह भावहीन निराश स्वर में बोला - हम अतृप्त और अकाल रूहें होती हैं । इस तरह का लालच प्रेतों की जिन्दगी का एक आम हिस्सा ही है । हमें इंसानों से नफ़रत सी होती है । क्योंकि हमारी इस अवस्था में पहुँचने का कारण कहीं न कहीं इंसान ही होते हैं । इंसान द्वारा बनायी दो मुँही पाखण्डी व्यवस्था ही होती है । उसकी कथनी कुछ और । करनी कुछ और होती है । वह स्वयं के लिये तो नैतिक अनैतिक सब कुछ चाहता है । पर एक थोथे आदर्शवाद का पाखण्डी राग अलापता है । और अन्दर से दानवी होते हुये भी वह स्वयं को देव तुल्य प्रदर्शित घोषित करना चाहता है ।
हालंकि वो एकदम सच कह रहा था । पर नीलेश उससे सहानुभूति दिखाने के पक्ष में नहीं था । अतः जानबूझ कर बोला - वो कैसे ?
- इस समाज का विचित्र तन्त्र है । युवा होते जिस्मों को जब काम का आवेश सताता है । तब इस समाज ने उस खास समय पर रूढिवादी पाबन्दियों की कङी जकङ लगा रखी है । कितना अजीव है । विवाहित और अधेङ और वृद्ध भी अनैतिक काम सम्बन्धों का अपने ऊपर कोई खास पाबन्दी न होने से छिपकर ही सही लगभग खुला उपभोग करते हैं । जबकि वह इस अनुभव और तृप्ति को पूर्व में भी प्राप्त कर चुके होते हैं ।
पर किशोरों में नये नये उत्पन्न हुये सबल काम को उनकी प्रथम शादी न होने तक अक्सर दमित यौन इच्छाओं से गुजरना होता है । मेरा आशय उन किशोर किशोरियों से है । जिनमें जवानी की उमंगे तरंगे उठने लगी हैं । पर अभी वे समाज के बहुत से नियमों के कारण इस इच्छा को पूरा नहीं कर पाते । तब वे अप्राकृतिक मैथुन आदि का सहारा लेते हैं । और अपनी यौन भावनाओं का दमन करते हैं । ये दमन भावना का बीज धीरे धीरे उनमें पङता ही चला जाता है । प्रेत योनि या प्रेत आवेश का ये एक मुख्य कारण हैं ।
- तेरा मतलब है । बच्चों को काम क्रीङा का खुला खेल खेलने दें । नीलेश ने फ़िर से जान बूझ कर उसका व्यर्थ का ही विरोध किया ।
- वो मैं नहीं जानता । पर देखो दिव्य । अक्सर लङका लङकी प्रेम करते हैं । या कोई महिला पुरुष प्रेम करते हैं । पर सामाजिक वर्जनाओं के चलते यह प्रेम फ़लीभूत नहीं होता । तब वे अन्दर से इस प्रेम को लेकर अतृप्त हो जाते हैं । इनमें से बहुत से प्रेमी जोङे समाज की क्रूरता का शिकार होकर अक्सर बहु भांति हत्या द्वारा अकाल मृत्यु का शिकार होते हैं । या कोई उपाय कोई रास्ता न पाकर खुद भी शरीर हत्या कर लेते हैं । ये सभी अतृप्त रूहें बनती हैं ।
- एक बात बता । अचानक नीलेश को कुछ याद आया - तू अपनी छाया पण्डितानी के घर भी छोङ आया । तूने रूपा से उसके घर में ही किल्लोल किया । ये तो प्रेत कानून के विरुद्ध ही था ।
- वो घर पहले से ही वायु प्रभावित था । भगत और मालती के अनैतिक सम्बन्धों से भगत से जुङी नीच रूहों से अपवित्र था । मालती और उसकी सास टोना टोटकों में खासी रुचि रखती थी । और प्रेतों पर विश्वास भाव वाली थी । इसलिये..। फ़िर भगत ने रूपा की मौजूदगी में ही जान बूझ कर प्रेत आवेशित रूपा को भङकाने हेतु मालती से खिलवाङ किया । ऐसे पर्याप्त कारण बन गये ।
- अब इसको छोङने के बारे में बोल । नीलेश व्यंग्य से बोला - कोई भेंट पूजा । कोई नियम धर्म जैसा कुछ ?
वेताल ने घबराकर नीलेश के सामने हाथ जोङ दिये । फ़िर वह बोला - पहले ही छोङ दिया । आपकी बात सही है । लङकी की कोई गलती नहीं थी । अतः किसी भरपाई जैसी कोई बात ही नहीं है ।
नीलेश उसकी साफ़गोई से बेहद खुश हुआ । फ़िर उसने गुङमुङ गुङमुङ सी करते हुये दोस्ताना अन्दाज में कुछ रहस्यमय मुस्कराहट के साथ कुछ बातें वेताल से कहीं । वेताल आवेशित जलवा के मुँह पर भी रहस्यमय मुस्कराहट आयी । मगर प्रत्यक्ष में उसने शालीनता से जी..जी.. ही कहा ।
- भगत जी ! तब नीलेश चोखा से बोला - एक छोटी मोटी रूह तो मैंने हटा दी । अब आप भी अपनी विध्या आजमाकर बङी वायु को दूर करें । इस पर भयंकरी नामक वायु और लगी हुयी है ।
भगत इससे पहले न भयंकरी को जानता था । न वेताल को जानता था । वह सिर्फ़ भूत प्रेत जिन्न चुङैल मसान आदि जैसे आम प्रचलित शब्दों से ही परिचित था । और भगतई का मौका आने पर इनमें से ही कोई नाम बता देता था ।
भगत ने हङबङाकर एक निगाह मुंडेर पर बैठी मालती और रूपा पर डाली । फ़िर बङे गर्वित भाव से वह माध्यम जलवा की ओर मुङा । और बोला - कौन है वे तू ?
ठीक इसी पल नीलेश ने मुँह फ़ेरकर हँसते हुये चुपचाप से अपने यन्त्र में जलवा और वेताल के खाने में बीचो बीच से लाइन खींचते हुये आधा आधा कर दिया । इसका मतलब ये हो गया कि माध्यम जलवा फ़िफ़्टी फ़िफ़्टी में बदल गया । वह आधे भाव से वेताल आवेशित रहा । और आधे भाव से जलवा ।
- ओये..मैं हू जलवा । जलवा उसे घूरकर बोला - मुझे नहीं जानता । जलवा भयंकरी ।
फ़िर नीलेश की शह पर वेताल द्वारा माध्यम जलवा के मुँह से कभी जलवा और कभी वेताल के ऊटपटांग जबाब सुनकर उसकी खोपङी ही घूम गयी । नीलेश ने चोखा के आहवान करने से पूर्व ही रूपा और मालती को भी बहीं बुला लिया था । वे इस नीलेश रिमोट से संचालित अदभुत हास्य वार्ता को सुनकर बार बार हँसने लगती थी ।
इससे चोखा को बङी किरकिरी सी महसूस हो रही थी । तब उसने बही पुराना रुआब डालने और जबरन साधारण केस को भी भूत सिद्ध करने का फ़र्जी तांत्रिकों वाला मारपीट का फ़ार्मूला शुरू करने हेतु जलवा को - तू ऐसे नहीं कबूलेगा..कहते हुये मारने के लिये हाथ उठाया ।
- तेरी माँ का । जलवा उसका हाथ बीच में थामता हुआ बोला - साकी नाका । साले जलवा से पंगा लेता है । अभी बताता हूँ तुझे ।
कहते हुये जलवा ने उठकर उसे लात घूँसों पर रखते हुये फ़ुटबाल ही बना दिया । अब जलवा के जवान हाथों से पिटते हुये चोखा को ये समझ नहीं आ रहा था कि इसका एक घूँसा इंसानों जैसा पङता है । जबकि दूसरा घूँसा तुरन्त ही हथौङे जैसी चोट मारता है ।
नीलेश ने इत्मीनान से एक सिगरेट सुलगायी । और गहरा कश लेकर ढेर सारा धुँआ छोङा । वास्तव में उसे वेताल जैसी रूहों से उतनी चिङ नहीं थी । जितना चोखा जैसे पाखण्डी भगतों से थी । जो नासमझ इंसान को बरबाद करने में कोई कसर बाकी नहीं रखते थे । वे एक उपचार के बदले सौ बीमारी देते ही देते थे ।

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