सोमवार, सितंबर 19, 2011

प्रसून का इंसाफ़ 11

महावीर की औरत फ़ूला और इतवारी की औरत सुषमा को उसी पेङ से रस्सियों से जकङकर बाँध दिया गया था । जिस पर बैठकर योगी ने उल्टा मारक आहवान किया था । उनके चारों और गाँव वालों का हुजूम सा इकठ्ठा हो गया था । दरअसल एक स्पेशल नाटक के तहत थोङा उत्पात मचाकर प्रेतनियाँ शान्त हो गयीं थी । और तब लोगों की समझ में यही आया कि तांत्रिक के आने तक अगली किसी घटना को बचाने के लिये उन्हें मजबूती से बाँध दिया जाय ।
सो कभी गाँव के मर्दों बूङों के आगे सिर भी न खोलने वाली वे औरतें पूरी बेहयाई से अधफ़टे वस्त्रों में खङी थी । और रस्सियाँ तोङने को मचल रही थी । वे खुलकर उन पर गन्दी नंगी अश्लील गालियों की बौछार सी कर रही थी । लेकिन मजबूर से वे सब शान्ति से सिर झुकाये खङे थे । किसी को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था । उन्हें महावीर का इंतजार था । जो किसी पहुँचे हुये तांत्रिक को बुलाने गया था ।
इसलिये गाङी रुकते ही सबका ध्यान उसकी ओर आकर्षित हुआ । और कई लोग गाङी में झांक झांक कर किसी लम्बी दाङी वाले साधु महात्मा की तलाश करने लगे । उन्होंने इशारे से महावीर से पूछा भी । पर उसने चुप रहने का इशारा कर दिया । तब उन सबका ध्यान प्रसून की तरफ़ गया ।
पर उन सबकी मनोदशा से एकदम बेपरवाह सा चलता हुआ वह पेङ से बँधी औरतों के पास पहुँचा । उसकी पीठ भीङ की तरफ़ थी । फ़ूला ने सबकी निगाह बचाकर उसे आँख मारी । और अश्लील भाव से स्तन हिलाये । प्रसून ने ऐसे माहौल में कहीं हँसी न निकल जाये । इसलिये फ़ौरन उसकी तरफ़ से मुँह फ़ेर लिया । उसकी निगाह कार की छत पर बैठी रत्ना पर गयी । जो बङी हैरत से यह सब देख रही थी । गाँव के सभी लोगों को वह स्वाभाविक ही पहचानती ही थी ।
उसने यूँ ही हाथ को फ़ालतू सा घुमाते हुये निगाह बचाकर समय देख लिया । साढे दस से ऊपर ही होने वाले थे । रामलीला की जगह कामलीला शुरू होने ही वाली थी । दर्शक जमा हो चुके थे । आज पूरा गाँव ही चर्चा फ़ैल जाने से यहाँ इकठ्ठा हो गया था । गली के पोल पर जलते दो बल्बों से लाइट का पर्याप्त इंतजाम था । बस कलाकारों की एंट्री होना शेष थी । वे खास कलाकार । जो उसके निमन्त्रण पर आने वाले थे ।
वह ऐसे सीरियस माहौल में सिगरेट पीना नहीं चाहता था । पर अपनी तेज तलब को वह रोक नहीं पाया । और पब्लिक की तरफ़ बहाने से एक मिनट कहता हुआ सिगरेट बीच में ही सुलगाता हुआ गाङी की तरफ़ आया । अपने पीछे लपकती भीङ को इशारे से उसने वहीं रोक दिया ।
और कार की खिङकी से अन्दर झांककर फ़ुसफ़ुसाता हुआ बोला - महावीर जी ! बङी गङबङ है यहाँ । साक्षात मौत का खेल जान पङता है । प्रेतों की संख्या बीस से भी ऊपर महसूस हो रही है । मेरे लिये संभालना बहुत ही मुश्किल जान पङ रहा है । पर मैं सिर्फ़ भागते भूत की लंगोट ही सही । जितना काम तो शायद कर ही लूँगा । देखो मैं इनको वश अश में तो नहीं कर पाऊँगा । क्योंकि बहुत बङे प्रेत हैं । लेकिन उनकी मिन्नतें करके समझौता कराने की कोशिश करूँगा ।
इसलिये आपको मेरी सलाह है कि कार से कतई बाहर न निकलें । चाहे कुछ भी हो जाय । समझो अभी प्रलय भी आ जाय । फ़िर भी नहीं निकलना । मौत से किसी की रिश्तेदारी नहीं होती । अन्दर से लाक भी लगा लो । क्योंकि इतना तो मैं जानता हूँ । भूत प्रेत लाक खोलकर अन्दर आपको मारने । उसने मारने शब्द पर जोर दिया - मारने नहीं आ सकते । वैसे आप निश्चिन्त रहो । मुझे उम्मीद है । समझौता हो ही जायेगा । भगवान आपके साथ पूरा इंसाफ़ करेगा । सच्चा इंसाफ़ ही करेगा । एकदम सच्चा इंसाफ़ ।

महावीर ने बङे श्रद्धा भाव से सिर हिलाया । और उसको वापस जाते देखता हुआ भयभीत इतवारी से बोला - कितना अच्छा और सच्चा इंसान है । एकदम भगवान के जैसा । मुझे तो इसमें ही साक्षात भगवान नजर आता है । भगवान ।
वह फ़िर से वापस पेङ के पास पहुँच गया । उसने एक निगाह बँधी औरतों और जमा पब्लिक पर डाली । फ़िर उसने नीचे गन्दी जमीन की तरफ़ देखा । उसका इशारा समझते ही तुरन्त आनन फ़ानन ही वहाँ गद्दी जैसे साजो सामान की सब व्यवस्था हो गयी ।
वह गद्दी पर बैठ गया । उसके पलकों पर आँसू तैरने लगे । उसने आज तक कभी इस ज्ञान का उपयोग किसी के बुरे के लिये नहीं किया था । सदा भले के ही लिये किया था । पर आज उसकी खुद समझ में नहीं आ रहा था कि जो वह करने जा रहा था । वह भला था । या बुरा । एक पल के लिये वह कमजोर सा पङने लगा । उसका आत्मविश्वास डगमगाया । नहीं । शायद ये गलत होगा । तभी उसकी निगाह रत्ना पर गयी । और उसके दिमाग में जमा उसकी जिन्दगी की रील उसके आगे घूमने लगी । वहशी दरिन्दे सुरेश के आगे गिङगिङाती एक असहाय अवला की चीखें - मेरे ब ब बच्चों पर र र रहम करो भईयाऽऽऽ ।
दूसरे ही पल उसके शिथिल होते शरीर में फ़िर से तनाव जागृत होने लगा । उसकी निर्बलता एकदम गायब हो गयी । और वह भावहीन कर्तव्यनिष्ठ योगी सा नजर आने लगा । उसकी आँखें एकदम गोल शून्य 0 होकर चमकने लगी ।
उसने शक्तिशाली सम्मोहिनी तन्त्र से पूरे गाँव क्षेत्र को ही बाँध दिया । ये उसी तरह से था । जैसे जादू वाले निगाह बाँध देते है । कुछ अच्छे जानकार सिद्ध बुद्धि को भी बाँध देते हैं । फ़िर उसने एक तगङा सामूहिक गण आहवान प्रयोग किया । और आँखे बन्द कर मन्त्र जगाने लगा । तुरन्त उसे मरे जानवर पर मंडराते चील कौवों की भांति छोटे बङे प्रेतों के हिल्लारते दल नजर आने लगे । कुछ ही मिनटों में उसने कार्यवाही पूरी कर दी ।
अब स्थिति ये थी कि अदृश्य प्रेतों की पूरी सेना किसी आतंकवादियों की भांति गाँव के एक एक आदमी को कवर किये खङी थी । पूरा गाँव प्रेतों की घेरेबन्दी में आ चुका था । सभी सम्मोहित से गाँव वालों को कुछ अजीव सा महसूस हो रहा था । पर क्या । वे नहीं जानते थे । पर क्यों । वे नहीं जानते थे । वे आधे होश में । और आधे बेहोश से थे ।
- मुझे खोल साले भङुये ! फ़ूला अचानक मचलते हुये बोली । और मुझे भी..सुषमा कसमसाकर बोली ।
प्रसून तेजी से खुद उनके पास गया । और फ़ुसफ़ुसाकर बोला - शर्म नहीं आती कामारिका तुझे । इतने लोगों के सामने नंगी हो गयी । फ़िर वह प्रत्यक्ष में ऊँचे स्वर में बोला - ठीक है । खोल देता हूँ । पर एक शर्त है । तुम लोग कोई बदतमीजी वाला काम नहीं करोगी । ये सब गाँव वाले । उसने चारों तरफ़ उँगली घुमाकर इशारा किया - बेचारे शरीफ़ आदमी हैं । अतः तुम भी पूरी शराफ़त से पेश आओगी । ऐसा मैंने इनसे वादा किया है ।
उन दोनों ने बङी सीधाई से समर्थन में सिर हिलाया । तब प्रसून ने उन्हें खोल दिया । और गाँव वालों को अर्ध बेहोशी से मुक्त कर दिया । ताकि वे आगे की स्थिति भली भांति जान सके । सभी गाँव वाले मानों एकदम नींद से जागे । और चैतन्य होकर देखने लगे ।
- जल्दी करना सालिया । फ़ूला होठ काटकर दबे स्वर में बोली - मुझे तेज खुजली होती है । फ़िर मुझसे बर्दाश्त नहीं होता ।
उसकी बात पर कोई ध्यान न देकर प्रसून अपना काम करने लगा । उसने मानसिक रूप से मरुदण्डिका से सम्पर्क किया । और होठों में ही बोला - ध्यान रहे रूपिका । प्रेत किसी निर्दोष को प्रभावित न करें ।
जबाब उसके इच्छानुसार ही मिला । फ़िर वह मन्त्र पढता हुआ फ़ूलों की पंखरिया उछालने लगा । भीङ में खङी औरतें लहरा लहरा कर एक एक करके झूमती हुयी गद्दी के पास गिरने लगीं । जबकि फ़ूला और सुषमा शान्त बैठी थी । माफ़ी माफ़ी कहती हुयी वे औरतें गद्दी के आगे सिर झुकाती थी । और फ़िर कुछ ठीक सी हालत में चली जाती थी । मुश्किल से पन्द्रह औरतें आयीं । इसका मतलब था । यही लोग रत्ना की घटना में किसी न किसी प्रकार से साझीदार थे । या फ़िर राजदार तो थे ही । मगर सब कुछ जानते हुये भी चुप थे । जैसे ही औरतों के साथ यह क्रिया हुयी । उनसे संबन्धित सामान्य स्वभाव के पुरुष भी किसी अपराध बोध से स्वतः प्रेरित खुद भी माफ़ी माफ़ी करते हुये सिर झुका गये । इस तरह इंसाफ़ के इस मुकद्दमें में मामूली और दया के पात्र मुजरिम उसी वक्त रिहा हो गये ।
और अब मुख्य अभियुक्तों की वारी थी । मुख्य अभियुक्त । जो बङी हैरानी की बात थी कि वहाँ नहीं थे ।
उसने फ़िर से पंखुरियाँ उछाली । और जमीन पर प्रतीकात्मक अभिमन्त्रित हथेली मारी ।
कुछ ही क्षणों में उसे भीङ के पीछे शोर सा नजर आया । फ़िर सुरेश के घर की औरतें लङकियाँ भागती हुयी उधर आयी । और भीङ को चीरती हुयी गद्दी के पास खङी हो गयी । तभी अब तक शान्त बैठी तन्दुरस्त फ़ूला और सुषमा हय्याऽऽ हय्याऽऽ  चिल्लाती हुयी खङी हो गयी । और उन औरतों और लङकियों को गिरा गिराकर मारने लगी । उन्होंने बेदर्दी से उनके कपङे फ़ाङ डाले । कुछ हौसला मन्द उनका हस्तक्षेप करने आगे बङे । पर फ़िर किसी अज्ञात प्रेरणा से बँधे हुये से कसमसा कर खङे रह गये ।
शायद ही उस गाँव में ऐसा नंगा नाच कभी हुआ हो । बिलकुल द्रौपदी चीरहरण जैसा दृश्य था । और सभी महाबली नपुंसक की भांति असहाय से खङे थे । और अपने ही घर की औरतों की बेइज्जती का खुद तमाशा देखने को विवश थे । प्रसून की निगाह रत्ना पर गयी । वह मानों बारबार अपने आँसू पोंछ रही थी । आँसू जो प्रेतों को कभी नहीं आते ।
आखिरकार कोई बारह बजे समझौते की बात शुरू हो ही गयी । माध्यम अभी भी वे ही दोनों थी ।
- क्या समझौता करायेगा तू । फ़ूला भङक कर बोली - ये साले इंसान कहाँ है । जो कोई समझौता करेंगे । ये साले हिजङे हैं हिजङे । एक अवला पर मर्दानगी दिखाने वाले हिजङे । किसी गरीब सीधे साधे इंसान का घरबार उजाङ देने वाले नपुंसक । नामर्द साले । और बाबे । तू भी फ़ूट ले । यहाँ से । साले । कोई समझौता नहीं होगा । सबको वहाँ...। उसने शालिमपुर के शमशान की तरफ़ उँगली उठाई । और दाँत पीसकर बोली - वहाँ पहुँचाकर ही छोङूँगी । कुत्तो तुम्हारे आँगन में अब बच्चे नहीं । मौत खेलेगी । सिर्फ़ मौत ।
तमाम भीङ में भय की सिहरन दौङ गयी । उनके रोम का एक एक बाल खङा हो गया । औरतें और लङकियाँ तो फ़ूट फ़ूटकर रोने लगी । यह फ़रमान सुनकर भीङ में चिल्ली सी मच गयी ।
- समझने की कोशिश करो । वह मिन्नतें सी करता हुआ बोला - इंसान गलतियों का पुतला होता है । अगर उसमें गलती ना हो । तो वह देवता ना हो जाये । फ़िर वह फ़ुसफ़ुसाकर बहुत धीमे से बोला - अभी लात पङी ना । तो सब फ़िल्मी डायलाग भूल जायेगी । मुझसे भी मजा ले रही है । कम से कम मुझसे तो तमीज से बोल ।
- ये कोई ऐसी गलती नहीं । वह फ़िर से चिल्लाई - जो माफ़ की जाये महात्मा । बुला उन साले कुत्तों को । जो कार में छुपे बैठे है । भैण के..।
प्रसून ने जोर से आवाज लगाई । तो वे आ गये । फ़ूला और सुषमा को उन्हें देखकर एकदम बिजली सी चमकी । और वे उस पर झपट पङी । उस अदम्य अदभुत शक्ति के आगे प्रसून के बचाते बचाते भी दोनों ने उनको धुन ही दिया । और फ़िर कामारिका और कपालिनी पूरी मस्ती में आ गयी ।  प्रसून के रोकते रोकते उन्होंने चर्रऽऽ से ब्लाउज फ़ाङ दिया । और मानों घुटन से आजाद होकर मुक्ति महसूस की । महावीर और इतवारी की शर्म से गरदन झुक गयी ।
- क्यों । वह व्यंग्य से बोली - जब दूसरों की औरत को नंगा करते हो । तब शर्म नहीं आती । जब उसको बेआबरू करते हो । तब तुम्हारी शर्म कहाँ जाती है । देखो आज तुम्हारे घर की इज्जत भरे बाजार बेइज्जत हो रही है । अब दो मूँछो पर ताव । सालों हिजङों । थू । थू है तुम पर ।

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