सोमवार, सितंबर 19, 2011

प्रसून का इंसाफ़ 12

- ये सब छोङ । उसने मानों फ़रियाद की - समझौते की बात बोल ।
- मैंने कहा ना । वह जिद भरे स्वर में बोली - कोई समझौता नहीं हो सकता । इन कुत्तों को मरना ही होगा । जैसे को तैसा । ये प्रभु का बनाया नियम है ।
- उसी प्रभु ने । प्रसून झूठी हताशा का प्रदर्शन करता हुआ बोला - दया का भी नियम बनाया है । माफ़ी का भी नियम बनाया है । इंसान को सुधारने हेतु बहुत गुंजाइश है । उसके कानून में ।
- तो सुन बाबा । वह आदतानुसार छिपाकर फ़िर भी प्रसून को आँख मारने से नहीं चूकी । और फ़िर साधारण उच्च स्वर में बोली - इस गाँव में इस दैवीय तवाही का कारण है । नरसी और उसके परिवार पर हुआ बेइंतिहा जुल्म । जिसको इसमें बैठे से बहुत से नामर्द जानते भी हैं । बहुत सी औरतें भी जानती हैं । पर वे चुप हैं । बोलो बोलो । अब क्यों चुप हैं । अतः उसकी कब्जायी जमीन पर गाँव वालों के पैसे से एक शानदार मन्दिर बनबाया जाय । उसमें एक तरफ़ नरसी उसकी बीबी और बच्चों की यादगार मूर्तियाँ लगवायीं जाय । ताकि किसी निर्दोष पर हुये हैवानी जुल्म । और उसके बाद ईश्वर के बेआवाज लाठी की मार से फ़ैला ये दैवीय प्रकोप इस गाँव के इतिहास में सदा के लिये लिख जाय । और कोई जालिम किसी पर जुल्म करने से पहले सौ बार सोचे । हजार बार सोचे ।
और ये दोनों परिवार । उसने इतवारी और महावीर की तरफ़ इशारा किया - इस दैवीय प्रकोप और वायु प्रकोप से मुक्ति हेतु किसी वैष्णों देवी जैसे मन्दिर के लिये आज के आज यहीं से निकल जाय । तब कुछ शान्ति संभव है । वरना..। वह बेहद खतरनाक स्वर में बोली - वरना इस गाँव के घरों में चूल्हे नहीं । चितायें जलेगी । चितायें ।
- प्रसून जी ! तभी उसे रूपिका का संदेश सुनाई दिया - कृपया जल्दी खत्म करें इसे । समय ऊपर हो रहा है । चुङैलों का तो ऐसी मस्ती करने का स्वभाव होता है । पर आपको क्यों मजा आ रहा है । मैं समझ नहीं पा रही । कृपया समय पर ध्यान दें । समय अपनी कार्यवाही हेतु तैयार है ।
वास्तव में वह सही कह रही थी । जाने क्यों उसे लग रहा था । ये रात आठ घण्टे के बजाय आठ सौ घण्टे की होती । और वह इन दुष्टों को भरपूर त्रासित करता । जाने क्यों उसके अन्दर एक वक्ती तौर पर राक्षस सा पैदा हो गया था । जो खुलकर अट्टाहास करना चाहता था । खुलकर उन सबको बताना चाहता था । उसके न्याय में तिनका भर रियायत नहीं है । बेबकूफ़ इंसान । उसका कानून है - आँख का बदला आँख । हाथ का बदला हाथ । बेइज्जती का बदला बेइज्जती । और जान का बदला जान । जान ।
उसने इतवारी और महावीर को देखा । और मानों इशारे से पूछा । समझौते की शर्त मंजूर है । या नहीं । पर उनकी हालत तो पैना छुरा लिये कसाई के सामने खङे उस बकरे की तरह थी । जो पूछ रहा था - भाई ! तुझे झटके से हलाल कर दूँ । या धीरे धीरे रेतकर । और बकरा कह रहा था - जैसे मर्जी कर । अब हलाल तो होना ही है ।
सभी गाँव वाले खुश थे । गाँव पर पिछले दो दिन से छाई तबाही उस लङके जैसे महात्मा की कृपा से टल चुकी थी । सभा समाप्त हो गयी थी । इंसाफ़ की अदालत उठ चुकी थी । फ़ैसला सुनाया जा चुका था ।
महावीर और इतवारी सोच रहे थे कि दो चार दिन बाद वैष्णों देवी आदि जायें । उन्होंने प्रसून से इस बात का मशविरा किया । तो उसने बेहद लापरवाही से कहा । जो आपकी मर्जी । जो आपको ठीक लगे । पर तभी और लोगों ने याद दिलाया कि देवियों ने सीधा यही के बाद जाने को कहा था । अतः फ़ालतू में उनको नाराज करना ठीक नहीं । जो फ़िर से कोई नई तवाही आये । इसलिये सूमो से आज का आज ही अभी निकल जाओ । मौत के भय से भयभीत उन दोनों को भी यही उचित लगा ।
और उसी सूमो में महावीर और इतवारी का परिवार उसी समय मामूली तैयारी के साथ अपनी नयी यात्रा हेतु चल पङा । वे सब कोई दस लोग हुये थे ।
तब प्रसून ने मानों फ़ुरसत में रत्ना की तरफ़ देखा । वह चलता हुआ अपनी कार के पास आया । तो रत्ना ने इशारे से अपने घर जाने हेतु पूछा । जिसे इशारे से ही प्रसून ने मना कर दिया । और वहीं का वहीं बैठे रहने को कहा । जब तक वह न कहे । वह शान्त हो गयी ।
सूमो थोङी दूर निकल चुकी थी । तब प्रसून ने गाङी स्टार्ट की । और एक निश्चित फ़ासले के साथ सूमो के पीछे लगा दी । उसने एक सिगरेट सुलगाई । और बङे सकून के साथ स्टेयरिंग पर हाथ घुमाने लगा । कुछ ही देर में दोनों गाङियाँ बाईपास रोड पर आ गयी । इस सङक पर वाहनों का आना जाना 24 घण्टे ही रहता था । वह बङी बेसबरी से किसी खास बात का इंतजार कर रहा था ।
और तब उसे महावीर की गाङी के ठीक आगे ऊँचाई पर रूपिका नजर आयी । वह अपने आरीजनल रूप में थी । उसके हाथ में हड्डी का बना एक मुगदर सा हथियार था । वह पूर्णतः नग्न थी । और स्याह काली थी । उसकी आँखे बहुत छोटे लाल बल्ब के समान चमक रही थी ।

और तब अचानक ही महावीर की आँखों के सामने एक रील सी चलने लगी । जिन्दगी के बाद चलने वाली । मौत की रील । और मौत से ठीक पहले चलने वाली रील । उसे सफ़ेद साङी पहने लम्बे खुले लहराते बालों वाली रत्ना दिखाई दी । जो बाहें फ़ैलाकर उसको बुला रही थी । उसे उसके दो नन्हें बच्चे दिखाई दिये । जो उसको उँगली के इशारे से बुला रहे थे । उसे नरसी भी दिखाई दिया । वह भी उसे बुला रहा था । उसके जीवन में जो जो हत्यायें उसके सामने या उसके द्वारा हुयी थी । वे सभी जीवित हो उठे । और अपने पास बुलाने लगे ।
फ़िर उसे अपना मृत शरीर दिखाई दिया । जिस पर तमाम चील कौवे मँडरा रहे थे । और तमाम उसको नोच नोच कर खा रहे थे । तब आगे उसने अपने आपको एक चिलचिलाती धूप में एक विशाल बंजर मैदान में खङे अकेले को देखा । फ़िर उसे वे सब जीव जन्तु नजर आये । जिसका उसने कभी आहार किया था । तमाम अण्डे उसके सर पर बारबार गिर गिर कर फ़ूट रहे थे । उसके द्वारा खाये चूजे मुर्गे तीतर उसके घायल शरीर में बारबार चोंच मार रहे थे । वह बुरी तरह पीङा से तङप रहा था । केकङे झींगे मछलियाँ आदि जो कभी उसका आहार बने थे । वे उसका माँस नोच रहे थे । उसके द्वारा खाये बकरे अपने पैने सींगों से उसको बारबार घायल करके फ़िर से सींग घुसा देते थे । इन सबके बीच वह अकेला असहाय पीङा से चीख रहा था । और बारबार भगवान से दुहाई कर रहा था । फ़िर कभी ऐसा पाप न करने की कसम खा रहा था । गिङगिङा रहा था । माफ़ी देने की गुहार लगा रहा था । पर उसकी सुनने वाला कोई नहीं था ।
फ़िर उसे काले भयंकर यमदूत दिखाई दिये । जिनके हाथ में पैने काटेदार हथियार थे । वे उसको निर्दयता से मारते हुये नरक की तरफ़ ले जा रहे थे । और एक लम्बी यातना के बाद उसको विशाल भयानक अग्निकुण्ड के नरक में झोंक दिया गया । जहाँ तमाम अन्य जीवात्मायें हा हाय हा करते हुये तङप रही थी । बिलबिला रहे थे । रहम रहम की पुकार कर रहे थे । पर उस पुकार को सुनने वाला कोई नहीं था ।
- देख लिया । तब अचानक उसे गाङी के शीशे में से आसमान में खङी रूपिका साफ़ साफ़ खुली आँखों से दिखाई दी । और सुनाई भी दी - यही तेरे साथ होना है पापी । ये प्रभु की अदालत है । यह उन सर्वशक्तिमान प्रभु की एक सटीक और स्वचालित न्याय व्यवस्था है । देख गौर से । वह फ़िर चिल्लाई - क्या यहाँ कोई न्यायाधीश है । तुझे नजर आया क्या ? सिर्फ़ तू है । और तेरे कर्मफ़ल हैं । यहाँ तू ही वादी है । तू ही प्रतिवादी है । तू ही खुद गवाह है । तू ही खुद सबूत है । तू ही मुकद्दमा भी है । तू ही खुद अदालत भी है । तू ही फ़ैसला है । और न्यायाधीश भी तू ही है ।
अतः हे आत्मा ! मैं तुझसे फ़रियाद करती हूँ । तू अब अपना न्याय खुद कर । क्योंकि सृष्टि रचना करते समय ये कानून तेरा खुद का बनाया हुआ था । जिसे तू खुद की बनायी माया में फ़ँसकर भूल गया । भूल गया तू । इसलिये न्याय कर । और सही इंसाफ़ कर । सच्चा इंसाफ़ । वही इंसाफ़ । जिसके सख्त कानून से ये पूरी सत्ता एक तिनका भी हिले बिना स्वचालित चल रही है । इसलिये सच्चा इंसाफ़ कर । क्योंकि अब तेरे फ़ैसले का वक्त आ गया है ।
किसी भी जीवन का ये अंतिम अटल सत्य साक्षात देखकर महावीर की आँखों से आँसुओं की मोटी मोटी धारायें बह रही थी । उसका पूरा चेहरा अपने ही आँसुओं से तरबतर था । पर वह मानों अपने होश में नहीं था । स्टेयरिंग पर उसके हाथ आटोमैटिक ही चल रहे थे । वास्तविकता यही थी । वह गाङी बहुत देर से नहीं चला रहा था । बल्कि वह यन्त्र की भांति आटोमैटिक ही चल रही थी । गाङी में बैठे अन्य लोग दीन दुनियाँ से बेपरवाह नींद की झपकियाँ सी ले रहे थे ।
और तब अचानक उसके हाथ स्टेयरिंग पर कस गये । उसने एक निगाह गाङी के लोगों पर डाली । और दृण स्वर में बोला - हाँ.. । हाँ.. मैं अपने सभी अपराध कबूल करता हूँ । और चाहता हूँ कि मुझ पर कोई दया न की जाय । कोई रहम न हो । हे मालिक । तू सर्वशक्तिमान है । और न्यायप्रिय है ।
सहसा प्रसून ने गाङी रोक दी । वे काफ़ी दूर आ चुके थे । अब दोनों गाङियाँ बिना फ़ाटक की क्रासिंग लाइन को काटती सङक पर चल रही थीं । उसने गेट खो्ला । और बाहर निकल आया । कुछ ही दूरी पर रेलवे लाइन पर एक्सप्रेस गाङी धङधङाती हुयी तेज रफ़्तार से आ रही थी । एक्सप्रेस और सूमो में मानों उस क्रासिंग प्वाइंट को - पहले मैं..स्टायल में पार करने की शर्त लगी थी ।
फ़िर एक भीषण विस्फ़ोट हुआ । और सूमो के परखच्चे उङ गये । प्रसून ने पहली बार खुलकर राक्षसी अट्टाहास किया । और करता ही चला गया । रूपिका ने उसे डन का अँगूठा दिखाया । और आसमान में ही लुप्त हो गयी । प्रसून ने मुढकर रत्ना की तरफ़ देखा । तो उसने बेहद नफ़रत से मुँह फ़ेर लिया । उसके चेहरे पर प्रसून के लिये अपार नफ़रत थी । उसने महा राक्षस को देवता समझने की भूल की थी ।
प्रसून ने उसकी हालत को समझते हुये भी । उसकी नफ़रत को जानते हुये भी मन ही मन इस देवी को प्रणाम किया । और गाङी वापस कामाक्षा की ओर मोङ दी ।

कोई टिप्पणी नहीं:

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...