सोमवार, सितंबर 19, 2011

प्रसून का इंसाफ़ 13

फ़िर उसी दिन । लगभग उसी समय । रात के दस बजे ।
जब महावीर प्रसून से पहली बार मिला था । और सुरेश की चिता जल रही थी । शालिमपुर के शमशान में आज दस चितायें एक साथ जल रही थी ।
आज की सुबह शालिमपुर में हाहाकार मचाती हुयी आयी थी । शहर से 40 किमी दूर हुयी नालन्दा एक्सप्रेस और सूमो की भीषण टक्कर की खबर आग की तरह पूरे शहर में फ़ैल गयी थी । हर न्यूज चैनल पर ये खबर प्रमुखता से प्रसारित हो रही थी । पर प्रसून लापरवाह सा घोङे बेचकर सो रहा था ।
वह रत्ना को छोङने जब शालिमपुर के शमशान तक गया था । तव पौ फ़टने ही वाली थी । रत्ना उसकी तरफ़ देख भी नहीं रही थी । उसके दिल में प्रसून के लिये सिर्फ़ घोर नफ़रत ही थी । घोर नफ़रत । वह चुपचाप बिना उसकी तरफ़ देखे खोह में चली गयी । उसने भी उससे बातचीत करने की कोई कोशिश नहीं की । और वापस कामाक्षा लौट आया । रत्ना की तरह उसके मन में भी कुछ सवाल थे ।
दोपहर के बारह बजे वह उठा । और गाङी लेकर महुआ बगीची पार करके रूपिका के पास पहुँचा । वह खुशी और दुख दोनों एक साथ महसूस कर रहा था ।
- मुझे । वह परेशान सा बोला - यह फ़ैसला कुछ समझ नहीं आया । ये कैसा अजीव इंसाफ़ था । सूमो में बैठे मारे गये अन्य आठ लोगों की किस बात की सजा मिली ? जो उन्हें अकाल मौत मार दिया गया ।
- प्रसून जी ! रूपिका गम्भीरता से बोली - ये अकाल मौत नहीं थी । बल्कि सबकी काल मौत थी । काल उन ग्रामवासियों पर ही नहीं पूरे गाँव पर मंडरा रहा था । यूँ समझो । बाकी सब बहुत सस्ते में छूट गये । माफ़ी पा गये । और आप अफ़सोस मना रहे हो ।
- स्पष्ट बोलो । वह झुँझलाकर बोला - महावीर और इतवारी के परिवार को किस बात का दण्ड मिला । क्या सिर्फ़ इस बात का कि वे उसके परिवार के थे ?
- नहीं । वह दृणता से बोली -  कभी किसी को । किसी बात का । दण्ड इसलिये नहीं मिलता कि वह किसी से जुङा है । या उसका परिचित है । या उसके साथ है । सबको अपने अपने कर्मा गति से ही विधान अनुसार दण्ड मिलता है । और विधि के संयोग से ऐसा समय आने पर सब इकठ्ठे हो जाते हैं । और स्वतः ही मृत्यु पथ पर चल देते हैं । और कभी ये भृम भी मत पालो कि ये सब आपने किया है । या मैंने किया है । हम सब बस निमित्त हैं । कठपुतलियाँ हैं । जिसकी डोर ऊपर वाले के हाथ है । वह जैसा चाहता है । नचाता है ।
और प्रसून जी ! मुझे भी कभी कभी हैरत होती है । ये सब कुछ एक बङे ही स्वचालित ढंग से स्वयं ही क्रियान्वित हो रहा है । न कोई मर रहा है । न कोई किसी को मार रहा है । ये सब कुछ स्वयँ ही हो रहा है । तुम ज्ञानी पुरुष हो । फ़िर अज्ञान युक्त वाक्य क्यों बोलते हो । जब वही परमात्मा सब में एक ही है । तो ये सब उसका खेल ही है ।
देखो । वह फ़िर से बोली - इंसान का जीवन एक कच्चे घङे के समान है । जिसमें आयु रूपी जल भरा हुआ है । विभिन्न पाप कर्मों से इस घङे में छेद हो जाता है । तब आयु रूपी जल बूँद बूँद करता हुआ तेजी से कम होने लगता है । और घङा खाली हो जाने पर जीव मृत्यु को प्राप्त होता है । अब ये सब किसने किया । खुद उसी इंसान ने ना ।
देखो । उसने सामने जमीन पर उगे पेङों की ओर इशारा किया - यहाँ अच्छे फ़ूलदार फ़लदार पौधे भी हैं । और तन

को छेद देने वाले । पीङा देने वाले । कांटेदार वृक्ष भी हैं । एक सुख देता है । दूसरा दुख देता है । ये सब अपने कर्मों अनुसार । कोई किसी के पास । कोई किसी के पास । उगने रहने को विवश हैं । फ़िर यहाँ एक तवाही होती हैं । और तव कुछ अच्छे । कुछ बुरे । पेङ पौधे नष्ट हो जाते हैं । और भयंकर तवाही के बाद भी । कुछ आश्चर्यजनक रूप से बच जाते हैं । अब बोलो । तवाही समान रूप से इस क्षेत्र में हुयी । फ़िर अंजाम अलग अलग क्यों हुआ ? सोचो । गहराई से सोचो ।
प्रसून ने पूर्ण सहमति में सिर हिलाया । उसे कुछ समय पूर्व हुयी सुनामी की तवाही याद आयी । जिसमें शहर के शहर । देश के देश । बिलकुल मिट ही गये थे । जबकि दूध पीते अनेकों मासूम बच्चे किसी चमत्कार की तरह सकुशल बचे थे । न सिर्फ़ बचे थे । उन्हें मामूली खरोंच भी नहीं आयी थी ।
उसे यकायक तमाम वे घटनायें याद आयीं । जिनमें 70 मंजिला तक से निर्दयता से फ़ेंके गये दूध पीते बच्चे किसी पेङ आदि की शाखा में उलझकर सकुशल बचे थे । बिना कोई मामूली रगङा खाये भी ।
- इसलिये । रूपिका फ़िर से बोली - ये कभी मत समझो । जो आज घट रहा है । वो आज की वजह से है । या पिछले कुछ दिनों के कर्मों का परिणाम है । या सिर्फ़ इस जीवन के कर्मों की ही वजह से है । वास्तव में ये सिलसिला लाखों जन्मों में कभी पूर्व में किये कर्मों का परिणाम है । जो आज वृक्ष बनकर फ़ल फ़ूल रहा है । ये सभी कर्मफ़ल संयोग जब एक जगह इकठ्ठा हो जाते हैं । तब शालिमपुर जैसी घटना घटती है । मैं बस इतना ही जानती हूँ । और जो मुझे पता था । वो मैंने तुम्हें बताया ।
- दाता ! उसके मुँह से कराह निकली - तेरा अन्त न जाणा कोय ।
- खैर ! वह फ़िर से जान बूझ कर बोला - अब रत्ना और उसके बच्चों के बारे में बोलो । उनका क्या होगा ।
नरसी का क्या होगा ? सुरेश की क्या गति हुयी होगी ? और इन दसों की क्या गति होगी ।
- हाँ । वह भावहीन शून्यता से बोली - सुरेश तो पहले ही नरक में गया । महावीर और इतवारी भी मेरी जानकारी के अनुसार भयानक नरक में जायेंगें । अन्य आठ लोग भी कुछ समय के लिये अपने कर्म अनुसार थोङे समय हेतु साधारण अन्य नरकों में जायेंगे । फ़िर भगवान जाने । उनका क्या होगा । मुझे यही तक की गति मालूम रहती है । क्योंकि ये मेरे कार्यक्षेत्र में आता है ।
और रत्ना और उसके परिवार की आप चिन्ता मत करो । नरसी पहले ही सुरेश की पत्नी के गर्भ में जा चुका है । रत्ना भी उसी के खानदान में जन्म लेगी । और उसके बच्चे भी । इन सभी की आयु अभी शेष है । रत्ना दोबारा से संस्कार शेष होने से नये जन्म में फ़िर से नरसी की पत्नी होगी । उसके बच्चे भी किसी न किसी रूप में उनके सम्बन्धी होंगे । बस खास बात ये होगी कि जिस बीस बीघा जमीन के लिये सुरेश ने उसे मार दिया था । वह तो उसकी होगी ही । और भी उसकी तमाम जमीन का वह मालिक होगा । सुरेश की पत्नी अपने पुत्र और पुत्रवधू को बहुत प्यार करने वाली होगी । और इस सबकी व्यवस्था । मतलब उन तीनों के पुनर्जन्म की व्यवस्था अगले तीन महीनों तक हो जायेगी । और क्योंकि वे जीवात्मायें पुनर्जन्म के लिये विशेष श्रेणी में आ गयीं । इसलिये प्रेत प्रेतनियाँ उनको तब तक मेरे आदेश से कभी तंग नहीं करेंगे ।
कहकर वह चुप हो गयी । प्रसून ने सतुष्टि की एक गहरी सांस भरी ।

कोई टिप्पणी नहीं:

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...