सोमवार, सितंबर 19, 2011

प्रसून का इंसाफ़ 2

यही कोई रात के 11 बजे का समय होने जा रहा था । पर महावीर की आँखों में दूर दूर तक नींद का नामोनिशान नहीं था । वह अपने गाँव शालिमपुर से 6 किमी दूर अपने टयूबबैल पर लेटा हुआ था । अक्सर ही वह इस टयूबबैल पर लेटता था । कभी कभी उसके चार भाईयों में से भी कोई लेट जाता था । पर अभी कुछ दिनों से उसके भाईयों को यहाँ लेटने में एक अजीव सा भय  महसूस होने लगा था ।
वे कहते थे कि उनकी आम महुआ की बगीची की तरफ़ से कोई औरत सफ़ेद साङी पहने हुये अक्सर टयूब बैल की तरफ़ आती दिखाई देती थी । और तब अक्सर रात के एक दो बजे का समय होता था । हैरानी की बात ये थी कि जब वह दिखना शुरू होती थी । तब वे गहरी नींद में होते थे । उसी नींद में वह उसी तरह महुआ बगीची की तरफ़ से चलकर आती थी । और उन्हें जागते हुये की तरह ही दिखाई देती थी । उसके दिखते ही किसी चमत्कार की तरह उनकी नींद खुल जाती थी । और वे उठकर बैठ जाते थे ।
लेकिन बस उनके आँखे बन्द और खुले होने का फ़र्क हो जाता था । बाकी वह रहस्यमय औरत ठीक उसी स्थान पर होती थी । जहाँ तक वह आँखे बन्द होने की अवस्था में होती थी । उसको देखते ही उनके शरीर के सभी रोगंटे खङे हो जाते थे । उन्हें एकाएक ऐसा भी लगता था कि उन्हें तेज पेशाब सी लग रही है । मगर वह वहीं के वहीं मन्त्रमुग्ध से बैठे रह जाते थे ।
फ़िर वह औरत एक उँगली मोङकर उन्हें पास बुलाने का  इशारा करती थी । कामुक इशारे भी करती थी । पर वे भयवश उसके पास नहीं जाते थे । तब वह खीजकर एक उँगली को चाकू की तरह गरदन पर फ़ेरकर इशारा करती थी कि वह उन्हें काट डालेगी । फ़िर वह इधर उधर चक्कर लगाकर वापस बगिया के पीछे जाकर कहीं खो जाती थी ।
ऐसा अनुभव होते ही उसके भाईयों ने टयूबबैल पर लेटना बन्द कर दिया था । उसका भाई घनश्याम तो रात के उसी टाइम टयूबबैल छोङकर घर भाग आया था । और दोबारा नहीं लेटा । दूसरा पटवारी तीन चार दिन हिम्मत करके लेटा । फ़िर उसकी भी हिम्मत जबाब दे गयी । वह अचानक बीमार भी हो गया । और छोटा तो भूतों के नाम से ही काँपता था । सो अब यह जिम्मेवारी महावीर पर ही आ गयी थी ।
उन सबके देखे महावीर दिलेर था । वह भूत प्रेतों को नहीं मानता था । दूसरे कभी कभी वह एक गिरोह के साथ डकैती डालने में भी बतौर डकैत शामिल रहता था । अतः रात बिरात ऐसे बीहङों पर रहने का उसे खासा तर्जुबा था । उसने भूत छोङो । आज तक भूत का चुहिया जैसा बच्चा भी कहीं नहीं देखा था ।
अतः अपने भाईयों के डरपोक होने की हँसी उङाता हुआ वह टयूबबैल पर खुद लेटने लगा । और आज उसे दस दिन हो गये थे । इन दस दिनों में उसे एक काली सी छाया सिर्फ़ सपने में दिखाई दी । वह एक भयंकर काले रंग की पूर्ण नग्न औरत थी । जो हाथ में एक बङा सा हड्डा पकङे रहती थी । उसको देखते ही वह हङबङाकर जाग गया था । और जब वह उठा । तब वह पसीने से तरबतर था । उसकी साँस धौंकनी के समान चल रही थी । पर जागने पर कहीं कुछ न था । जैसा कि उसके भाई कहते थे । फ़िर ऐसा तीन चार बार हुआ था । बस एक बार ये अन्तर हुआ कि जब वह काली औरत दिखी । तो उसके स्तन  और कमर के आसपास काफ़ी बङे बङे बाल थे । मानों वह बालों से बना कोई वस्त्र पहने हो । बस इतना ही दृश्य उसे दिखा था ।


महावीर अपना लायसेंसी रिवाल्वर हमेशा साथ रखता था । अतः यहाँ भी सोते समय वह उसे पूर्ण ऐहतियात के साथ रखने लगा । पर आज तो उसे नींद ही नहीं आ रही थी । वह एक अजीव सी बैचेनी महसूस कर रहा था । अतः वह चारपाई पर उठकर बैठ गया । और बीङी सुलगाकर उसका कश लेते हुये दिमाग को संयत करने की कोशिश करने लगा । फ़िर उसने थोङी दूर स्थिति महुआ बगीची को देखा । बगीची के आसपास एकदम शान्ति छाई हुयी थी । रात के काले अँधेरे में सभी पेङ रहस्यमय प्रेत के समान शान्त खङे थे ।
वह उठकर टहलने लगा । रिवाल्वर उसने कमर में लगा ली । और बीङी का धुँआ छोङते हुये इधर उधर देखने लगा ।
तभी उसकी निगाह यमुना पारी शमशान की तरफ़ गयी । और वह बुरी तरह चौक गया । नीम शीशम के दो पेङो के बीच एक मँझले कद की औरत दो छोटे बच्चों के साथ घूम रही थी । अभी लगभग बारह बजने वाले थे । और यह औरत अकेली यहाँ इन छोटे छोटे बच्चों के साथ क्या कर रही थी । जहाँ इस वक्त कोई आदमी भी अकेले में आता हुआ घबराता है । यह ठीक वैसा ही था । जैसे कोई औरत अपने खेलते हुये बच्चों की निगरानी कर रही हो ।
वह इसका पता लगाने के लिये वहाँ जाना चाहता था । पर उसकी हिम्मत न हुयी । वह कुछ देर तक उन्हें देखता रहा । फ़िर वे लोग अंधेरे में गायब हो गये । दो बच्चों के साथ इस रहस्यमय औरत ने उसे और भी भयानक सस्पेंस में डाल दिया था । क्या माजरा था । क्या रहस्य था । उसकी कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था ।
अब उसे भी टयूब बैल पर लेटते हुये भय लगने लगा था । पर वह यह बात भला किससे और कैसे कहता । अतः उसे मजबूरी में लेटना पङता था । पर वह बिलकुल नहीं सो पाता था । वह काली नग्न औरत और वह दो बच्चों वाली रहस्यमय औरत उसे अक्सर दिखायी देते थे । जाने किस अज्ञात भावना से अब तक वह यह बात किसी को बता भी नहीं पाया ।
इतना बताकर वह चुप हो गया । और आशा भरी नजरों से प्रसून को देखने लगा । पर उसे उसके चेहरे पर कोई खास भाव नजर नहीं आया । जबकि वह कुछ जानने की आशा कर रहा था । तब उसने अपनी तरफ़ से ही पूछा ।
- कुछ खास नहीं । प्रसून लापरवाही से बोला - कभी कभी ऐसे भृम हो ही जाते हैं । अब जैसे तेज धूप में रेगिस्तान में पानी नजर आता है । पर होता नहीं है । जिन्दगी एक सपना ही तो है । और सपने में कुछ भी दिखाई दे सकता है । कुछ भी ।
महावीर उसके उत्तर से संतुष्ट तो नहीं हुआ । मगर आगे कुछ नहीं बोला । दरअसल उसे ये अहसास भी हो गया था कि प्रसून अपने तेज बुखार के चलते अशान्त था । और बात करने में परेशानी अनुभव कर रहा था । बस शिष्टाचार के चलते उसे मना नहीं कर पा रहा था ।
अतः उसने भी इस समय उसे तंग करना उचित नहीं समझा । और फ़िर किसी समय आने की सोचकर चला गया ।
वास्तव में यही सच था । प्रसून पर एक आंतरिक चिङचिङाहट सी छायी हुयी थी । पर ऊपर से वह एकदम शान्त लग रहा था । महावीर के जाने के बाद उसने चारपायी पर लेटकर आँखें बन्द कर लीं ।

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