सोमवार, सितंबर 19, 2011

प्रसून का इंसाफ़ 3

प्रसून चुपचाप लेटा हुआ था । उसकी आँखों में नींद नहीं थी । जबकि वह गहरी नींद सो जाना चाहता था । बल्कि वह तो अब हमेशा के लिये ही सो जाना चाहता था । जाने क्यों जिन्दगी से यकायक ही उसका मोहभंग हो गया था । वह इस जीवन से ऊब चुका था ।
उसने मोबायल निकालकर उसमें टाइम देखा । रात का एक बजने वाला था । रात काफ़ी गहरा चुकी थी । चारों तरफ़ सन्नाटा छाया हुआ था । सब नींद के आगोश में जा चुके थे । उसने एक सिगरेट सुलगायी । और बैचेनी से फ़िर से उठकर बैठ गया । उसका मुँह यमुना पारी शमशान की तरफ़ था । शमशान में भी पूर्ण शान्ति सन्नाटे का माहौल था । तमाम प्रेत इधर उधर अपनी रात्रिचर्या हेतु चले गये थे । बस राख बना सुरेश ही वहाँ अकेला पङा था ।
रात का ये माहौल कभी उसे बेहद पसन्द था । कितनी रहस्यमय होती है । ये रात भी । जो इंसान के लिये रात होती है । वह सिद्धों योगियों सन्तों के लिये दिन होता है । और जो इंसान के लिये दिन होता है । वह योगियों की रात होती है । कोई मामूली चीज नहीं होती है रात । रात में अधिकांश इंसानों की उनके सो जाने से संसार में फ़ैली वासनायें सिमट जाती हैं । और तब दो ही लोग जागते है । भोगी और योगी । काम इच्छा के भोगी रात के शान्त शीतल माहौल में मदन उत्सव मनाते हैं । और योगी अपनी शक्तियों को जगाते हैं । बस इंसानों के स्तर पर रात इन्हीं दो बातों के लिये ही होती है । लेकिन इसके अतिरिक्त रात के रहस्यमय आवरण में क्या क्या छुपा होता है । क्या क्या और होता है । ये बिरला ही जान पाते हैं ।
अतः रात उसके लिये कभी प्रेमिका के समान थी । एक शान्त प्रेमिका । जो प्रेमी का भाव समझकर उसकी इच्छानुसार समर्पण के लिये उसके सामने बिछी रहती है ।
बुखार बिलकुल भी कम नहीं हुआ था । बल्कि शायद और अधिक तेज हो गया था । पर वह एकदम शान्त था । वह चाहता तो बुखार दस मिनट में उतर जाता । इसी पहाङी से कुछ दूर झाङियों में वह औषधीय पौधे उसने देखे थे । जिनका सिर्फ़ एक बार काङा पीने से बुखार दस मिनट में उतर जाता । इसके अलावा भी वह आराम से किसी डाक्टर से दबा ले सकता था । पर ये दोनों ही काम वह नहीं कर सकता था ।
इनको करने का मतलब था । फ़ेल होना । योग की परीक्षा में फ़ेल हो जाना । अतः वह शान्त था । और शरीर की प्रयोगशाला में शरीर द्वारा ही शरीर को विकार रहित करने का सफ़ल प्रयोग देख रहा था । वह उन घटकों को स्वयँ शीघ्र भी क्रियाशील कर सकता था । जो उसे जल्द स्वस्थ कर सकते थे । पर ये भी गलत था । एक शान्त योगी के साथ प्रकृति कैसे अपना कार्य करती है । वह इस परीक्षण से गुजर रहा था ।
उसकी निगाह फ़िर से शमशान की तरफ़ गयी । और अबकी बार वह चौंक गया ।
उसके सामने एक अजीव दृश्य था । कपालिनी कामारिका और कंकालिनी नाम से पुकारी जाने वाली तीन गणें शमशान वाले रास्ते पर जा रही थीं । पर उसके लिये ये चौंकने जैसी कोई बात नहीं थी । चौंकने वाली बात ये थी कि वे रास्ते से कुछ हटकर खङी एक मँझले कद की औरत को धमका सा रही थी । औरत के पास ही दो छोटे बच्चे 


खङे थे । वह औरत उनके हाथ जोङ रही थी । कामारिका आगे खङी थी । और उस औरत के गाल और स्तनों में थप्पङ मार रही थी । फ़िर उसने औरत के बाल पकङ लिये । और तेजी से उसे घुमा दिया । फ़िर कपालिनी और कंकालिनी उसको लातों से मारने लगी ।
प्रसून की आँखों में खून उतर आया । उसका दहकता बदन और भी दुगने ताप से तपने लगा । शान्त योगी एकदम खूँखार सा हो उठा । फ़िर उसने अपने आपको संयत किया । और ध्यान वहीं केन्द्रित कर दिया । अब उसे वहाँ की आवाज सुनाई देने लगी ।
- नहीं नहीं ! वह औरत हाथ जोङते हुये चिल्ला रही थी - मुझ पर रहम करो । मेरे बच्चों पर रहम करो ।
पर खतरनाक पिशाचिनी सी कामारिका कोई रहम दिखाने को तैयार ही न थी । उसने दाँत चमकाते हुये जबङे भींचे । और जोरदार थप्पङ उस औरत के गाल पर फ़िर से मारा । इस पैशाचिक थप्पङ के पङते ही वह औरत फ़िरकनी के समान ही अपने स्थान पर घूम गयी । उसकी चीखें निकलने लगी । उसके बच्चे भी माँ माँ करते हुये रो रहे थे । पर डायनों के दिल में कोई रहम नहीं आ रहा था ।
- भगवान..हे भगवान..मुझे बचा ! वह औरत आसमान की तरफ़ हाथ उठाकर रोते हुये बोली - मुझे बचा । कम से कम मेरे बच्चों पर रहम कर मालिक ।
- मूर्ख जीवात्मा ! कामारिका दाँत पीसकर बोली - कहीं कोई भगवान नहीं है । भगवान सिर्फ़ एक कल्पना है । चारों तरफ़ प्रेतों का राज चलता है । तू कब तक यूँ भटकेगी ।
- ये ऐसे नहीं मानेगी ! कपालिनी आपस में अपने हाथ की मुठ्ठियाँ बजाते हुये बोली ।
फ़िर उसने उसके दोनों बच्चे उठा लिये । और गेंद की तरह हवा में उछालने लगी । बच्चे अरब देशों में होने वाली ऊँट दौङ पर बैठे बच्चों के समान चिंघाङते हुये जोर जोर से रोने  लगे । उधर कंकालिनी ने वापिस उसे लात घूँसों पर रख लिया ।
प्रसून को अब सिर्फ़ उस औरत के मुँह से भगवान और मेरे बच्चे तथा दोनों माँ बच्चों के चीखने चिल्लाने की ही आवाज सुनाई दे रही थी । तीनों डायनें मुक्त भाव से अट्टाहास कर रही थी ।
प्रसून की आँखे लाल अंगारा हो गयी । उसका जलता बदन थरथर कांपने लगा । यहाँ तक कि उसे समझ में नहीं आया । क्या करे । उसके पास कोई यन्त्र न था । कोई तैयारी न थी । वे सब वहुत दूर थे । और जब तक वह यमुना पार करके वहाँ पहुँचता । तब तक तो वो डायनें शायद उसका भुर्ता ही बना देने वाली थीं
उसने आँखे बन्द कर ली । और उसके मुँह से लययुक्त महीन ध्वनि निकलने लगी - अलख .. बाबा .. अलख .. बाबा .. अलख ।
एक मिनट बाद ही उसने आँखें खोल दी । उसके चेहरे पर आत्मविश्वास लौट आया था । उसने हाथ की मुठ्ठी बाँधी । और घङी वाले स्थान तक हाथ के रूप में औरत की कल्पना की । फ़िर उसने सामने देखा । कामारिका कमर पर हाथ टिकाये दोनों डायनों द्वारा औरत और बच्चों को ताङित होते हुये देख रही थी । उसने उसी को लक्ष्य किया ।
फ़िर उसने मुठ्ठी से उँगली का पोरुआ निकाला । और नारी स्तन के रूप में कल्पना की । फ़िर उसने वह पोरुआ बेदर्दी से दाँतों से चबा लिया ।
- हा..आईऽऽऽ ! कामारिका जोर से चिल्लाई । उसने अपने स्तन पर हाथ रखा । और चौंककर इधर उधर देखने लगी । वह पीङा का अनुभव करते हुये अपना स्तन सहला रही थी । कपालिनी कंकालिनी भी सहमकर उसे देखने लगी ।
प्रसून ने उसके दूसरे स्तन का भाव किया । और अबकी दुगनी निर्ममता दिखाई । कामारिका अबकी भयंकर पीङा से चीख उठी । उसने दोनों स्तन पर हाथ रख लिया ।  और लङखङाकर गिरने को हुयी । दोनों डायनें भौंचक्का रह गयी ।
फ़िर कपालिनी संभली । और दाँत पीसकर बोली - हरामजादे ! कौन है तू ? सामने क्यों नहीं आता । जिगरवाला है । तो सामने आ.. नामर्द ।
तभी कपालिनी को अपने गाल पर जोरदार थप्पङ का अहसास हुआ । थप्पङ की तीवृता इतनी भयंकर थी कि वह झूमती हुयी सी उसी औरत के कदमों में जा गिरी । जिसका अभी अभी वह कचूमर निकालने पर तुली थी ।
- बताते क्यों नहीं ! कामारिका फ़िर से संभलकर सहमकर बोली..त त तुम..आप..आप कौन हो ?
- इधर देख ! प्रसून के मुँह से मानसिक आदेश युक्त बहुत ही धीमा स्वर निकला ।
तीनों ने चौंककर उसकी दिशा में ठीक उसकी तरफ़ देखा । फ़िर - योगी है..कहकर वे बेशर्म स्ट्रिप डांसरों  के समान उसकी तरफ़ अश्लील भाव से स्तन हिलाती हुयी भाग गयीं ।
वह औरत बङी हैरानी से यह दिलचस्प नजारा देख रही थी । उसने अपने दोनों बच्चों को गोद में उठा लिया था । और आश्चर्यचकित सी थी । उसने एक एक बात सुनी थी । फ़िर वह वहीं टीले पर बैठ गयी ।
प्रसून ने एक निगाह नीचे कामाक्षा के आँगन में सोये लोगों पर डाली । और फ़िर जीने से उतरने के बजाय सीधा पहाङी पर कूद गया । वह यमुना पाट की तरफ़ जाने को हुआ । लेकिन फ़िर कुछ सोचकर वापस मन्दिर की तरफ़ आया । और उसने चढावे का बहुत सा प्रसाद आदि एक थैली में बाँध लिया ।
फ़िर तेजी से इधर उधर कूदता फ़ाँदता हुआ वह रास्ता पार करके यमुना के पाट पर आया । एक मिनट के भीतर ही उसने सभी कपङे उतार दिये । और बिलकुल नंगा हो गया । यमुना के ठण्डे पानी और अपने बुखार की कल्पना करके एक बार को वह काँप गया । फ़िर उसके चेहरे पर दृण भाव आये । और कपङों की पोटली हाथ में थामे ऊँचा किये हुये वह यमुना के पानी में उतर गया । कुछ ही देर में तैरता हुआ वह दूसरी तरफ़ पहुँच गया । उसने तेजी से कपङे वापस पहने । और फ़िर तेज तेज कदमों से शमशान की तरफ़ जाने लगा ।

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