सोमवार, सितंबर 19, 2011

प्रसून का इंसाफ़ 6

मौत सिर्फ़ एक है । एक बार ही आती है । अंजाम भी एक ही होता है । वो शरीर जो अब तक चल फ़िर रहा था । उसका निष्क्रिय हो जाना । मिट्टी के पुतले मानुष का वापस मिट्टी में ही मिल जाना । सारे रिश्ते नातों को एक झटके से बेदर्दी से तोङ देती है मौत ।
पर ये एक बार की मौत भी कई अजीव रंग लेकर आती है । कभी खामोशी से । कभी गा बजा के । कभी हाहाकार फ़ैलाती हुयी । कभी सिसकियों के साथ । दुश्मनी भाव में कभी खुशी के भी साथ । अनेक रंग है इसके । अनेक रूप है इसके । इसके रहस्य जानना बङा ही कठिन है ।
ऐसा ही मौत का अजीव रंग नरसी की मौत पर भी छाया था । वो इंसान पता नहीं । कब से जीवित ही मौत को देख रहा था । और एक स्वस्थ हाल आदमी किसी बीमार जर्जर आदमी की मौत मरने पर विवश हुआ था ।
बीस मिनट हो चुके थे । नरसी की लाश जमीन पर पङी थी । अब वह हमेशा के लिये न उठने को गिर चुका था । रत्ना को जोर से रोने भी न दिया था । वह अपनी जगह पर ही तङफ़ङा कर रह गयी थी । और फ़टी फ़टी आँखों से बस नरसी की लाश को देखे जा रही थी ।
अचानक उसका चेहरा सख्त हो गया । भावहीन सी उसकी आँखे शून्य हो गयी । तीनों अभी भी बैठे शराब पी रहे थे । उसने नरसी की लाश पर निगाह डाली । और दौङकर उससे लिपट गयी । अब तक जबरन रोकी गयी उसकी रुलाई फ़ूट पङी ।
- हेऽऽ ईश्वरऽऽऽऽ । वह गला फ़ाङकर चिल्लाई - अबऽऽऽ विश्वास नहीं होता कि तू हैऽऽऽऽ । नहीं विश्वास होता । इस दुनियाँ में कोई ईश्वर । कोई भगवान है । इस देवता आदमी ने क्या गुनाह किया था । अपने जान में इसने कभी चींटी नहीं मरने दी । हर परायी औरत को माँ बहन समझा । दूसरे की भलाई के लिये कभी इसने रात दिन नहीं देखा । तेरे हर छोटे बङे द्वार पर इसने सर झुकाया ।
- और परिणामऽऽऽ । उसने छाती पर हाथ मारा । और दहाङती हुयी बोली - मुझे जबाब देऽऽऽ भगवान । मुझे जबाब चाहिये । मुझे जबाब चाहियेऽऽ । वह अपना सर जमीन पर पटकने लगी - मुझे जबाब देऽऽ भगवन । आज एक दुखियारी औरत । एक बेबा औरत । एक अवला नारी । दो मासूम बच्चों की माँ । सिर्फ़ तुझसे जबाब चाहती है । क्या यही है तेरा न्याय ? क्या ऐसाऽऽ ही भगवान है तूऽऽ । तूने मेरे साथ ऐसा क्यूँ किया ? तूने क्यूँ मेरी हरी भरी बगिया उजाङ दी । मुझे जबाब देऽऽ भगवान । वह फ़िर से भयंकर होकर दहाङी - मैं सिर्फ़ऽऽ जबाब चाहती हूँऽऽऽ । मैं तुझसे दया की भीख नहींऽऽ माँग रही । सिर्फ़ जबाब देऽऽ । तुझे जबाब देनाऽऽ ही होगा । मुझे एक बार जबाब दे भगवान ।
मगर कहीं से कोई जबाब नहीं मिला । फ़िर वह उठकर खङी हो गयी । उसके चेहरे पर भयंकर कठोरता छायी हुयी थी । उसने बेहद घृणा और नफ़रत से तीनों की तरफ़ देखा ।
और जहर भरे स्वर में बोली - कान खोलकर सुन हरामजादे । नाजायज । रण्डी से पैदा सुअर की औलाद । अगर तूने कुतिया का दूध नहीं पिया । तो मार डाल मुझे भी इसी वक्त । और मार डाल । उन दो नन्हें बच्चों को भी ।
- भाभी..भाभी.. भाभी माँ । सुरेश रोता हुआ बोला - ऐसा मत बोलो । मैं बहुत कमजोर दिल इंसान हूँ ।
- थू..थू.. थू है तुझ पर । वह घृणा से थूक कर बोली - आखिरी बात । गौर से सुन हरामजादे । ये एक अवला औरत । एक पतिवृता नारी । और एक देवता इंसान की.. पत्नी का शाप हैऽऽ तुझेऽऽ । कहते कहते उसने पेट पर नाभि के पास गोल गोल हाथ घुमाया । और ऊपर देखती हुयी बोली - अगर मैंने जीवन भर एक सच्ची औरत के सभी धर्म निभाये हैं । तो यही जमीनऽऽऽ । जिसके लिये.. तूने मेरा घर.. बरबाद कर दिया । बहुत जल्द तुझे मिट्टी में मिला देगी ।
कहकर वह बिना मुङे झटके से बाहर निकल गयी । सुरेश ने इतवारी को उसे छोङने हेतु भेजा भी । पर वह अँधेरे में पैदल ही भागती चली गयी । वह बहुत तेजी से अपने घर की तरफ़ भाग रही थी ।
चलते चलते प्रसून रुक गया । उसकी गहरी आँखों में आँसुओं का सैलाव सा उमङ रहा था । और चेहरे पर अजीव सी सख्ती छायी हुयी थी । क्रोध से योगी की सभी नसें नाङियाँ फ़ूल उठी थी । वह वहीं खङे पेङ के तने पर बेबसी से मुठ्ठी बारबार मारने लगा । काफ़ी देर बाद वह शान्त हुआ । फ़िर योगस्थ होकर उसने गहरी गहरी साँसे खींची । और वहीं पेङ के नीचे बैठकर ध्यान करने लगा । सुबह के तीन बजने वाले थे । प्रेत अपने स्थानों पर वापस जाने लगे होंगे । अतः उसने महुआ बगीची की ओर जाने का ख्याल छोङ दिया । वैसे भी वह निरुद्देश्य वहाँ जा रहा था । उसका पूर्व निर्धारित लक्ष्य अभी कुछ नहीं था । शायद कुछ हो । बस यही सोच थी ।
पर अभी भी उसके सामने सवाल थे । आगे आखिर क्या हुआ था ? क्या रत्ना ने दोनों बच्चों के साथ आत्महत्या कर ली थी । नरसी की मौत के बाद उसका क्या हुआ था । जाने क्यों वह इस कहानी को देखना नहीं चाहता था । पर देखने को मजबूर ही था । उसने एक निगाह दूर पीछे छूट गये शालिमपुर के शमशान की तरफ़ डाली । और रत्ना की जिन्दगी का अगला अध्याय खोला ।


नरसी की मौत के बाद रत्ना ने शालिमपुर छोङ दिया था । वह अपने दोनों बच्चों के साथ खेत पर रखवाली के उद्देश्य से बनी झोंपङी का ही विस्तार कर उसमें रहने लगी थी । अब उसमें जीने की कोई चाह नहीं रही थी । वह बस लाश की तरह अपने बच्चों के लिये जी रही थी । वह अकेली ही दिन रात खेत में जी तोङ मेहनत कर अपने को थका लेती थी । और शाम को सब कुछ भूलकर बेहोशी जैसी नींद में चली जाती थी । बस यही उसकी जिन्दगी रह गयी थी । उसने एक बार दोनों बच्चों के साथ जान देने के बारे में भी सोचा । मगर नरसी के अन्तिम शब्द और उसका लिया हुआ वादा याद आते ही वह काँपकर रह गयी । फ़िर उसने अपनी जिन्दगी की बेलगाम कश्ती को वक्त के निर्मम थपेङों के साथ उसके हालात पर छोङ दिया । उसके चेहरे पर एक स्थायी शून्यता छा गयी थी । उसकी सूनी सी स्याह आँखों में जिन्दगी का कोई रंग नहीं बचा था ।
नरसी की लाश एक नहर के पास से बरामद हुयी थी । जिस पर सभी गाँव वालों ने रोते पी्टते हाय हाय करते हुये किसी अज्ञात हत्यारे द्वारा अज्ञात कारणों से हत्या की रिपोर्ट दर्ज करा दी थी । फ़ूट फ़ूटकर रोता हुआ सुरेश अपने तयेरे भाई के साथ ही मानों मर जाने को ही तैयार था । बङी मुश्किल से लोगों ने उसे रोका । वह भाभी भाभी माँ कहते हुये रत्ना के पैरों से भी लिपटता था । और बारबार छाती पीटते हुये यही अफ़सोस करता था कि - काश ! मौत के समय वह भी नरसी भैया के पास होता । तो अपनी जान देकर भी वह उन्हें बचाता ।
रत्ना भावहीन चेहरे से ये सब अन्तिम नाटक देखती रही । और फ़िर वह गाँव का घर छोङकर खेतों पर आ गयी ।
तब रात के बारह बजे थे । पूरे शालिमपुर में सन्नाटा छाया हुआ था । गाँव के सभी लोग नींद के आगोश में जा चुके थे । शालिमपुर के शमशान में प्रेतों की चहल पहल जारी थी । रत्ना गहरी नींद में सोयी पङी थी कि अचानक हङबङा कर उठ बैठी ।
कोई उसके सीने पर आहिस्ता आहिस्ता हाथ फ़ेर रहा था । आँखे खुलते ही उसे वे तीन शैतान नजर आये । महावीर और इतवारी एक तरफ़ खङा था । सुरेश जमीन पर आराम से पालथी लगाये उसके स्तनों को सहला रहा था ।
- तू जाग गयी । सुरेश मीठे स्वर में बोला - मैंने सोचा । तुझे डिस्टर्ब न करूँ ।
रत्ना ने भावहीन चेहरे से पास सोये अपने दोनों बच्चों को देखा । बेबसी से उसके आँसू निकलने को हुये । जिसे उसने सख्ती से निकलने से पहले ही रोक दिया । उसने अपना आँचल ठीक करने की कोशिश की । जिसे सुरेश ने फ़िर से झटक दिया । उसे मन ही मन अपनी प्रतिज्ञा याद आयी कि - जीवन में कितना भी जुल्म उस पर हो । वह कोई विरोध नहीं करेगी । बल्कि वह देखेगी कि इस दुनियाँ में भगवान का न्याय क्या है ? भगवान है भी । या नहीं । या यहाँ सिर्फ़ शैतान का राज है । सिर्फ़ शैतान का राज । शैतान ।
और शैतान उसके सामने थे ।
सुरेश उसका ब्लाउज हटाने लगा । वह लाश की तरह हो गयी । और उसने सख्ती से अपनी आँखे बन्द कर ली ।
- आँखे खोल भाभी ! सुरेश उसका गाल थपथपाकर बोला - यूँ मुर्दा मत हो । क्यूँ मेरा दिल तोङती है तू । अपने देवर का स्वागत नहीं करेगी क्या । कैसी भाभी है तू । देवर क्या होता है । नहीं जानती । देवर का मतलब होता है । दूसरा वर । जब पहला वर न हो । तब वर की जगह पूरी करने वाला दूसरा वर । देवर .. ही होता है ।
उसके शरीर से उतरते कपङों के साथ साथ उसके आज तक के पहने विश्वास के आवरण भी उतरते जा रहे थे । ईश्वर भी उसकी भावनाओं से उतर गया । भगवान भी उतर गया । खुदाई मददगार भी उतर गये । रिश्ते उतर गये । नाते उतर गये । गाँव उतर गया । शहर उतर गये । और वह अन्दर बाहर से पूर्ण नग्न हो गयी । एकदम नग्न । एक मन्दिर में लगी बेजान पत्थर सी नग्न मूर्ति ।
शैतान उसके मुर्दा शरीर को मनचाहा घुमा रहे थे । और खुद के विचार उसके मन को घुमा रहे थे । ये इंसान किस कदर अकेला है । किस कदर असुरक्षित है । चारों तरफ़ हैवानियत का नंगा नाच हो रहा है । बच्चे कहीं जाग न जायें । इसलिये उसने अपने मुँह से निकलने वाली हर आवाज को रोक दिया था ।
तीनों के चेहरे पर तृप्ति के भाव थे । पर वह किसी भावहीन वैश्या की तरह अपने कपङे ठीक कर रही थी । उसकी सभी भावनायें अभी अभी रौंदी जा चुकी थी । मानसिक हलचल के तिनकों को दरिन्दों की वासना का तूफ़ान उङा ले गया था । उसकी आखिरी अमानत । आखिरी पूँजी । उसका सतीत्व भी लुट गया था । अब कुछ नहीं बचा था । जिसको बचाने का जतन करना था ।
- हे प्रभु ! वह भावुक होकर मन ही मन बोली - आपको बारम्बार प्रणाम है । प्रणाम है । आपकी लीला अपरम्पार है । पार है । आप दयालु से भी दयालु हो । दयालु हो । सबकी रक्षा करने वाले हो । करने वाले हो । कोई द्रौपदी नंगी होती है । नंगी होती है ।  तब आप दौङे दौङे आते हो । दौङे दौङे आते हो ।  हे दाता प्रभु ! आप किसी असहाय पर जुल्म होता नहीं देख सकते । नहीं देख सकते । आपकी इस महिमा को भला आपके सिवा दूसरा कौन समझ सकता है । कौन समझ सकता है । मेरा बारम्बार प्रणाम स्वीकार करें प्रभु । स्वीकार करें प्रभु ।
तभी वह फ़िर से चौंकी । ख्यालों में खोयी उसे सुरेश की आवाज फ़िर से सुनाई दी । वह मधुर स्वर में बोला - भाभी..भाभी जी..भाभी तू कितनी अच्छी है । देख । वैसे तो हम ये सोचकर आये थे कि नरसी मर गया है । किसी राक्षस हत्यारे ने उसे मार डाला । कुछ तेरा हालचाल पूछ आयें । कुछ तेरी भूख प्यास का इंतजाम करें ।
लेकिन भाभी ! आजकल इतना भी टाइम नहीं किसी के पास कि सिर्फ़ एक काम के लिये किसी के पास भागा भागा पहुँच जाये । आज आदमी एक बार के जाने में दो काम निकालता है । तीन भी निकाल लेता है । चार भी । और पाँच भी ।
सो देख । तेरा पहला काम तो हमने निकाल दिया । अब इसे तेरा काम समझ ले । या मेरा समझ ले । ये तेरी मर्जी । हमने तो तुझ पर दया ही की । हमेशा दया । भाभी । वह भीगे स्वर में बोला - मैं बचपन से ही बङा भावुक हूँ । किसी का दुख मुझसे देखा नहीं जाता । यहाँ ..उसने दिल पर हाथ रखा - यहाँ से रोना आता है । क्यों भाइयों कुछ गलत बोला मैं । गलत हो तो । भाभी का जूता । और मेरा सिर ।
- कुछ गलत नहीं । महावीर संजीदगी से बोला - आप सच्चे धर्मात्मा हो । गजनी धर्मात्मा ।
- कमीनों ! वह नफ़रत से बोला - डफ़र ! आज शायद पहली बार तुम सही बोले हो । खैर..तुम भाङ में जाओ । मैं अपनी प्यारी भाभी से बात करता हूँ । भाभी ! उसके हाथ में एक शीशी प्रकट हुयी - इसको पायजन बोलते हैं । हिन्दी में जहर । बङे काम की चीज बनायी है । भगवान ने ये । कोई दवा.. दुख दर्द दूर न कर पाये । ये सभी दुख दर्द मिटा देती है । वो भी हाथ के हाथ । इधर दवा अन्दर । उधर दुख बाहर । फ़िर भला मैं कैसे तुझे दुखी देख सकता हूँ । लेकिन ये..। उसके हाथ में कागज और एक पैड प्रकट हुआ -  ये भी देख भाभी । इससे अँगूठा की ठप्पा निशानी लगाते हैं । और ये ठप्पा इन कागजों पर लगाना है । इस ठप्पे का मतलब ये है कि हालतों से मजबूर तूने ये जमीन हमें बेच दी । बाकी कोर्ट कचहरी के कुछ झंझट होते हैं । जो सब ले देकर निबट जाते हैं । जैसे दारोगा निबट गया । थाना निबट गया । बीस हजार जमा करो । और थाने में बोलकर मर्डर करने जाओ । अब उनके भी बाल बच्चें होते हैं भाभी । बाल बच्चे..। कहते कहते उसने एक सर्द निगाह सोये हुये मासूम बच्चों पर डाली - बाल बच्चे । जैसे ये हैं । और मैं चाहता हूँ । दो तीन साल के छोटे छोटे ये बाल जैसे फ़ूल से बच्चे भी क्यूँ इस बेदर्द जालिम दुनियाँ में कष्ट भोगें ।
रत्ना के चेहरे पर कोई भाव नहीं था । उसने एक निगाह अपने बच्चों पर डाली । और.. एक मिनट..सुरेश कहती हुयी झोंपङी से बाहर आ गयी । उसने एक निगाह दूर तक फ़ैली अपनी जमीन पर डाली । जिसके जर्रे जर्रे से नरसी की महक आ रही थी । वह झुकी । उसने मिट्टी उठाकर हाथ में ले ली । और उसे अपने बदन पर लगाने लगी । वे तीनों हैरत से उसे देख रहे थे । उसने मिट्टी से मुँह पोत लिया । छाती पर लगाया । और हर जगह लगाया । फ़िर उस विधवा ने उसी मिट्टी का सिन्दूर अपनी माँग में भर लिया । उसने शून्य 0 आँखों से अन्तिम बार फ़िर से खेतों को देखा । और पति के चरणों का भाव करते हुये उसे झुककर प्रणाम किया । उसने मुङकर शालिमपुर को देखा । जहाँ कभी उसके अरमानों की डोली आयी थी । उसने हाथ जोङकर अपनी ससुराल का भाव करते हुये उसे भी प्रणाम किया ।
वह फ़िर से भीतर आयी । और एक निगाह उसने फ़िर से बच्चों पर डाली । किसी भी चिन्ता से बेफ़िक्र वे मासूम मीठी नींद सो रहे थे । उसने एक झटके से सुरेश से कागज ले लिये । और बताये गये स्थान पर अँगूठा लगाती गयी । फ़िर उसने सुरेश के हाथों से जहर की शीशी ले ली । और अपने बच्चों के पास बैठ गयी । न चाहते हुये भी उसके दोनों आँखों से एक एक बूँद गालों पर लुङक ही गयी । उसने अपने बच्चों के गाल पर प्यार से हाथ फ़ेरा । उनके माथे पर चुम्बन किया । और फ़िर दृणता से ढक्कन खोल लिया । सोते हुये बच्चों का मुँह खोलकर उसने बारी बारी से उनके मुँह में जहर उङेल दिया । फ़िर उसने संतुष्टि भाव से शीशी में बचे जहर को देखा । और - हे प्रभु ! कहते हुयी बचा हुआ जहर गटागट पी गयी ।

कोई टिप्पणी नहीं:

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...