सोमवार, सितंबर 19, 2011

प्रसून का इंसाफ़ 7

रात के पूरे बारह बज चुके थे । रात किसी यौवन से उफ़नती मचलती नायिका की तरह पूर्ण जवान हो चुकी थी । और पूरी मदहोशी से अँधेरे के आलिंगन में समायी हुयी कसमसा रही थी । अँधेरा उससे और.. और.. और एकाकार होता जा रहा था ।
प्रसून ने चलते चलते एक सिगरेट सुलगाई । और सामने देखा । वह फ़िर से लगभग उसी स्थान पर आ पहुँचा था । कल जहाँ से आगे जाने का इरादा उसने छोङ दिया था । फ़र्क बस इतना था कि कल सुबह के चार बजने वाले थे । भोर का उजाला फ़ैलने लगा था । और आज अभी आधी रात थी । दूर टयूब बैल के एक दिशा में महुआ बगीची दूर से ही नजर आ रही थी ।
कल वह बहुत देर तक यहीं बैठा रहा था । चार बज गये । पाँच बज गये । फ़िर छह भी बज गये । पर उससे उठा नहीं गया । वह गन्दी जमीन पर पैर फ़ैलाये कभी ऐसा कभी वैसा ऐसे ही बैठा सिगरेट पर सिगरेट फ़ूँकता रहा । जैसे घर के कालीन पर बैठा हो । यहाँ तक कि सभी सिगरेट भी खत्म हो गये । पर उसके दिमाग में उठता तूफ़ान खत्म नहीं हुआ । वह यही सोचता रहा । कितनी अजीव है ये जिन्दगी भी । कुछ ही दिनों में रत्ना की हँसती खेलती महकती बगिया उजङ गयी थी । न सिर्फ़ उजङ गयी थी । बल्कि वह उस गयी गुजरी जिन्दगी से भी बदतर हालत में अपने दो मासूम बच्चों के साथ भटक रही थी ।
जलते मुर्दों से उङने वाली घी आदि की खुशबू उसका आहार थी । उसके बच्चे मानव मल भी खाते थे । सुअर भी रहने से मना कर दे । ऐसी ढाय में रहती थी । और इस सबके बाबजूद भी वहाँ चैन से नहीं थी । प्रेत अपनी बिरादरी में उसे शामिल करना चाहते थे । और वह इस और भी नयी खौफ़नाक दुनियाँ से एकदम घबरायी हुयी थी । यहाँ तो वह फ़िर से मर भी नहीं सकती थी । देश गाँव छोङकर जा भी नहीं सकती थी । कहाँ जाती ? अकाल मरने के बाद जहाँ भी गयी । प्रेतों का राज नजर आया । यहाँ उसे खाने की कुछ सुविधा थी । और दूसरे प्रेत किसी राउन्ड की तरह ही कुछ घण्टे को आते थे । तब वह उनसे बचती हुयी छुपने की कोशिश करके अपने को बचाती थी । अपनी शेष आयु का पुनर्जन्म कैसे ले । ये शायद ही वह खुद जान पाती । कोई दयालु प्रेत ही रहम खाकर उसे ये तरीका बता सकता था । लेकिन इसमें भी सबसे बङी समस्या थी । उसके दो बच्चे । वह एक ममतामयी माँ थी । और अपने बच्चों को यहाँ अकेला छोङकर जन्म नहीं ले सकती थी । तब फ़िर दो बच्चों और एक औरत का पुनः जन्म हेतु गर्भ स्थापन किसी योगी के बगैर बङी टेङी खीर ही थी । प्रेत शायद ही एक साथ ये व्यवस्था करवा सकते थे । क्योंकि तीन खाली गर्भों की तलाश मुश्किल ही थी । और अकेले वह किसी भी कीमत पर नहीं जा सकती थी । दूसरे गर्भ स्थापन गर्भ खाली होने पर संस्कार मैच होने पर ही हो सकता था । फ़िर उसे कौन कैसे समझायेगा कि तेरे बच्चे पुनर्जन्म हेतु गर्भवास में चले गये । कोई सफ़ल योगी ही यह सबूत दिखा सकता था । तब ही शायद वह मान पाती । शायद बहुत समझाने पर ही अगले जन्म वाली बात उसकी समझ में आनी थी । शायद न भी आती । ये सभी बातें प्रसून के दिमाग में अँधङ की तरह आ रही थी ।
उसके सामने दो खास सवाल और भी थे । नरसी का क्या हुआ था ? और वह तीन हरामजादे किस हाल में थे ? उनका क्या होना था ? उन तीनों में एक शक्ल तो उसकी परिचित ही थी । दो को वह नहीं जानता था ।
प्रेतों के छोटे छोटे झुण्ड उसके पास से गुजर रहे थे । पर न उसे उनसे कोई लेना था । और न प्रेतों का उससे कोई देना था । वह प्रेतवासा बस इसी उम्मीद से आया था कि वह कौन सी गण थी । प्रेत थी । जो महावीर और उसके भाईयों को काट डालने का इशारा करती थी । डराती थी । धमकाती थी । और दूसरे शायद किसी भलमानस प्रेत से उसे यहाँ का मामला समझने सुलझाने में कोई मदद मिले । क्योंकि यह प्रेतों का मामला था । और इसमें प्रेतों की मदद से बहुत कुछ हो सकता था ।


यही सोचकर वह किसी प्रेत प्रेतनी से हल्लो बोलने ही वाला था कि अचानक उसके कानों में किसी मोबायल फ़ोन के स्पीकर से आती डिस्टर्बिंग साउण्ड की तरह झिन झिन मिश्रित आवाज के साथ स्त्री प्रेत की आवाज सुनाई दी - हे प्रसून ! तुम । निश्चय ही यह एक सरप्राइज हुआ मेरे लिये डियर ।
प्रसून को एक आश्चर्यमिश्रित सी खुशी हुयी । वह सिल्विया थी । मरने से पूर्व प्रसून की उससे कोई जान पहचान न थी । पर मरने के बाद हुयी थी । मरने से पूर्व वह मनोविज्ञान की शोध छात्रा थी । और " प्रेत अँधविश्वास या सच " सबजेक्ट पर रिसर्च कर रही थी । इस हेतु वह उपलब्ध जानकारी के सहारे प्रेतवासों में रातों में घूमती रही । और धीरे धीरे प्रेतभाव से गृसित होती गयी । लेकिन अपनी आधुनिक सोच के चलते वह इसे विभिन्न मनोभ्रांतियों के प्रभाव जानती हुयी नकारती रही । और इंगलिश मेडीसन के सहारे अपने दिमाग को दुरुस्त रीचार्ज करती रही ।
पर वह बेचारी नहीं जानती थी कि अज्ञात प्रेत आवेशों से उसका जीवन रस तेजी से सूख रहा था । और उसके अन्दर प्रेतत्व मैटर बढता जा रहा है । प्रेतों की तलाश उसको खुद को प्रेत बना रही थी । और फ़िर उसे शायद बहुत लम्बे समय तक अपने ही खोये अस्तित्व को तलाश करना था । शायद कुछ हजार साल तक ।
जब प्रसून को वह मिली थी । तब उसमें सुधार की कोई गुंजाइश न बची थी । वह 34 की होकर मरी थी । और अनजाने में उसने अपनी आयु घटाकर शून्य 0 कर ली थी । तब वह उसको समझाकर दूसरा जन्म या रीबोर्न हेतु भी कोई हेल्प नहीं कर सकता था । उसे भारी हैरत हुयी कि सिल्विया प्रेत बनने के बाद भी खुद को रोमांचित सा महसूस कर रही थी । और इस नये परिवेश में काफ़ी उत्साहित थी ।
प्रसून से उसकी मुलाकात चैन्नई के एक स्थान पर हुयी थी । और यह तो उसके लिये और भी दिलचस्प था कि कुछ खास स्पेशिलिटी रखने वाले इंसान प्रेतों से सीधा कनेक्ट हो सकते हैं । इसको वह और भी बङा रोमांच मानती थी । दूसरे एक योगी के रूप में प्रसून जैसी दिलचस्प इंटरनेशनल हस्ती को पाकर वह बेहद खुश हुयी थी । और घण्टों बात करती थी । शायद एक ऐसा अकेला इंसान । जिससे वह इंसानी जीवन की भांति बात कर सकती थी । कोई हेल्प भी ले सकती थी ।
- तुम ! वह भी लगभग हैरत से बोला - मगर यहाँ ?
- एराउण्ड द वर्ल्ड ! वह उत्साहित सी बोली । फ़िर उसने तारों की तरफ़ इशारा किया - कभी कभी वहाँ भी जाती हूँ । वो भी बिना प्लेन के । बिना ट्रेन के । यार क्या अनोखी लाइफ़ है । प्रेतों की ।
- यहाँ कब से हो ? वह महुआ बगीची की ओर दृष्टि घुमाता हुआ बोला ।
उसने बताया । वह पिछले 6 महीने से यहाँ थी । प्रसून को एकदम आशा सी बँध गयी । अब उसे फ़ालतू के प्रेतों से माथा पच्ची नहीं करनी थी । अतः वह बोला - अभी पिछले 6 महीनों में यहाँ कोई खास घटना भी हुयी है ।
- मैं समझी नहीं । वह उलझकर बोली - खास घटना से तुम्हारा क्या मतलब है । यहाँ तो सभी घटनायें खास ही होती हैं । और फ़िर सभी आम भी ।
प्रसून ने उसकी सहमति में सिर हिलाया । उसका जबाब ही बता रहा था कि वह एक परिपक्व प्रेतनी हो चुकी है । प्रेतजगत से उसका अच्छा परिचय हो चुका था । उसके चेहरे पर चमक आ गयी । उसने घूमकर शालिमपुर की तरफ़ उँगली उठायी । और मधुर स्वर में बोला - मेरा मतलब । उस विलेज से जुङी ।
-  ओ या ! वह साधारण स्वर में बोली - परसों ही कुलच्छनी ने वहाँ से.. एक को वहाँ । उसने ऊपर उँगली उठाई - वहाँ रवाना किया है । बङा पहुँचा हुआ हरामी था साला । मैं होती ना.. उसको घसीट घसीटकर मारती । इसकी बङी चर्चा हुयी थी ।
- कुलच्छनी ! वह कुछ सोचता हुआ सा बोला - मतलब ? ये वर्ड तो शायद लूज करेक्टर लेडी के लिये इस्तेमाल करते हैं । या फ़िर किसी अन्य बुरी आदतों वाली ।
- वो सब मुझे नहीं पता । लेकिन यहाँ कुलच्छनी एक पिशाच श्रेणी की गण होती है । वह ऐसी गण कैसे बनती है । ये भी मैं नहीं जानती । पर उसका काम ऐसे लोगों को अटैक कर मारना होता है । जो अपनी दुष्ट आदतों के चलते । अत्यन्त क्रूरता पापमय जीवन के चलते आयु से बहुत पहले ही अपनी आयु समाप्त कर लेते हैं । तब उनको मारने कुलच्छणी ही जाती है । जिसको अभी मारा । साला सुअर पैदायशी हरामी था । दूसरों की जमीन कब्जाना । दुर्बल गरीब औरतों से रेप कर देना । निर्दोष लोगों की हत्या करना । मानों उसके लिये खेल था । अभी अभी कुछ टाइम पहले कमीने ने हँसते खेलते परिवार का नाश कर दिया । कोई बेचारा बहुत सीधा किसान था । उसके दो छोटे बच्चे भी थे । उनको भी मार डाला ।
प्रसून लगभग उछल ही पङा - क्या ! उसके मुँह से निकला - वह मर गया ।
- वही तो मैं बोल रही हूँ डियर ! साला बहुत आसान मौत मर गया । लकी अनलकी था साला हरामी ।
उसके लकी अनलकी शब्द से प्रसून ने असमंजस से उसकी तरफ़ देखा । तब वह बोली - मेरे भोले राजा ! लकी इसलिये था कि उसे मरने में कोई तकलीफ़ नहीं हुयी । कुलच्छणी एक ब्लू मिक्स ब्लैक कलर बाडी वाली भयंकर गण होती है । वह फ़ुल न्यूड होती है । उसकी हाइट लगभग 4 फ़ुट होती है । और शरीर किसी गठीले आदमी जैसा । अगर उसके अवाउट 28 साइज ब्रेस्ट न हों । तो वह मैन जैसा ही फ़ील देती है । उसके हाथ में हड्डी का बना एक वैपन टायप होता है । उसको लेकर वह सुरेश के घर के पास लगभग थाउजेंड मीटर अप साइड आसमान में गयी होगी । उसने सुरेश को लक्ष्य कर वैपन चलाया होगा । उसकी एक चोट से ही सुरेश को हार्ट पेन और तेज चक्कर सा आया होगा । वह वही जमीन etc पर गिर गया होगा । और इसके बाद डैड । यानी महज 5 मिनटस का खेल । तो ये लकी डैथ ही हुयी ना ।
और अनलकी इसलिये । क्योंकि इसका सिनी मैटर इतना अधिक बना है कि इसको अवाउट 10 lac year hell  में जाना होगा । जिसको महा रौरव नरक बोलते हैं । मीन इसकी मर्सी अपील की कोई गुंजाइश नहीं । इसके बाद भी इसको सजा ए काला पानी टायप नीच और गन्दे अँधेरे लोकों में बारबार फ़ेंका जायेगा । तब लाखों वर्ष में इसके पाप धुलेंगे । तब कहीं ये 84 के बाद इंसान होगा ।
प्रसून को मानों गहरी तसल्ली हुयी । उसे एक असीम शान्ति सुख सकून का अनुभव सा हुआ । उसने एक गहरी सांस भरी । मानों उसके सीने से बहुत बङा बोझ उतर गया हो । फ़िर उसने बेहद प्रसंशा से सिल्विया की ओर देखा ।
ओर बोला - कमाल है डियर ! आपने बहुत अच्छा रिसर्च किया है ।
- ओ नो प्रसून ! वह वहाँ से गुजरते दो प्रेतों को हाइ का हाथ हिलाते हुये बोली - इनफ़ेक्ट ये आदमी अपने को छटुर समझटा हय । बट होटा हय साला छूटिया । छटुर छूटिया ।
पिछले चार दिन से उदास और अभी भी बुखार में तपते प्रसून ने उसके इंगलिश टोन में कही बात को समझ लिया । और उसके मुँह से जबरदस्त ठहाका निकला । सिल्विया भी उसके साथ मुक्त भाव से हँसी । प्रसून उसकी तरफ़ हा हा हा के साथ उँगली करता हुआ बोला - यू मीन चतुर चूतिया ना । प्लीज इसको एक्सप्लेन भी कर । चतुर चूतिया । हा हा हा । ओ माय गाड । व्हाट अ स्पेशल वर्ड चतुर चूतिया ।

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