सोमवार, सितंबर 19, 2011

प्रसून का इंसाफ़ 9

अगले दिन दोपहर के बारह बजे थे । लेकिन दिन का समय किसी भी अच्छे योगी के लिये रात के समान ही होता है । सो वह गहरी नींद में सोया हुआ था । और घोङे बेचकर सोया हुआ था । पिछले कुछ दिनों से जबसे वह रत्ना के जीवन से रूबरू हुआ था । उसकी आत्मा पर एक बोझ सा लदा हुआ था । कभी कभी कितने अजीब क्षण जीवन में आते हैं । क्यों ये हवसी इंसान ऐसा जुल्म करता है । जिसकी कोई इंतिहा नहीं । जिसकी शायद कोई सुनवाई नहीं ।
कितनी सही बात कही थी किसी ने - कुछ न कहने से भी छिन जाता है  राजाजी सुखन । जुल्म सहने से भी जालिम की मदद होती है । हन्ते को हनिये । इसमें दोष न जनिये । उसका दिल यही कर रहा था । उसके हाथ में सेमी ओटोमैटिक रायफ़ल होती । और वह रत्ना के अक्यूज्ड को सरेआम भून देता । पर इसमें तमाम कानूनी झमेले थे । शरीफ़ इंसान को डराने दहशत में रखने वाले कानूनी झमेले । और गुनहगारों की मदद करने वाले कानूनी झमेले ।
शालिमपुर में कोई एक घण्टा प्रेत सेना उत्पात मचाती रही । फ़िर वापस चली गयी । तब तक वह बराबर पेङ पर ही शान्त बैठा रहा । पर उसकी तरफ़ किसी का ध्यान नहीं गया । और जाने का सवाल भी नहीं था ।
एक बजे के करीब उसकी मोबायल के अलार्म से आँख खुली । और वह आँखे मलता हुआ उठकर बैठ गया । चाँऊ बाबा उसके लिये गरम चाय ले आया था । तब उसे पीते हुये उसने अपना मेल चेक  किया । और एक दिलचस्प मेल पर अटक कर रह गया । मेल भेजने वाली उसके लिये अज्ञात थी ।
लिखा था - हेल्लो प्रसून जी ! मै आपको बेहतर से जानती हूँ । कैसे ? उसको छोडिये । मैं आपसे अपने दिल की ये बात इसलिये कह बैठी । क्यूँ कि पिछ्ले हफ़्ते सपने में मैंने 1 अजनबी से सेक्स किया था । मैंने आपको देखा तो नहीं है । लेकिन मैं आपके बारे में अक्सर सोचती रहती हूँ । सपने में बबलू घर पर नहीं था । मेरा छोटा बच्चा सोया हुआ था । और मैं अपने बेडरूम में किसी अजनबी से सेक्स कर रही थी । सेक्स के दौरान मेरे मुँह से ये निकल रहा था - प्रसून जी ! जरा आराम से प्लीज ! उस दृश्य में कोई बहुत सुन्दर आदमी था । जिसे मैं प्रसून जी कहकर बुला रही थी । सपने में वो व्यक्ति बेड पर बिलकुल निर्वस्त्र लेटा हुआ था । मैं उसकी तरफ़ मुँह करके उसकी गोद में थी । उसका पौरुषत्व मेरे इन था । उसके हाथ मेरे नितम्बों पर थे । मैं अपने हाथों से उसके बाल सहला रही थी । मेरा एक उरोज उसके... । वो मेरे...को... कर.... पी रहा था ।
प्रसून जी ! जो मुझे सपना पिछ्ले हफ़्ते आया । मैंने ज्यूँ का त्यूँ बता दिया । ये सपना क्यूँ आया ? क्या ये सिर्फ़ 1 इत्तफ़ाक था । या सिर्फ़ 1 कल्पना । ये मुझे पता नहीं । मैंने आपको तो कभी देखा नहीं । लेकिन जिसे मैं सपने में प्रसून जी कहकर बुला रही थी । वो आदमी बहुत ही जवान और सुन्दर था । अब आप इस रहस्य से पर्दा उठाईये ।
मेल पढकर उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कराहट आयी । और फ़िर वह..आय लव यू प्रसून..हाय डियर..हाय डार्लिंग..जैसे तमाम मेल्स को बिना ओपन किये ही सिलेक्ट करता गया । और फ़िर डिलीट कर दिया । उसे हैरत थी । वह कई बार अपनी मेल आई डी और फ़ोन नम्बर बदल चुका था । फ़िर भी लोगों को पता चल ही जाता था । इसका कारण भी बह जानता था । आप मुझे बता दीजिये । कसम से किसी से नहीं कहूँगा । जैसा प्रोमिस करने वाले भी एक दूसरे को और दूसरा तीसरे को..इस तरह सैकङों लोग जान जाते थे ।
उसने 7 इंच स्क्रीन की वह पी सी नोटबुक बैग में डाल दी ।
और सिगरेट सुलगाता हुआ खिङकी के पास आकर बाहर शालिमपुर की तरफ़ देखने लगा । कल की ही रात शालिमपुर वालों की नींद हराम नहीं हुयी होगी । बल्कि बहुत समय के लिये हो गयी थी । वह देर तक ऐसे ही विचारों में खोया रहा । और शाम होने का इंतजार कर रहा था ।
उसने रिस्टवाच पर दृष्टिपात किया । दोपहर के तीन बजने वाले थे । तभी उसे सीङियों पर किसी के आने की आहट हुयी । और अगले कुछ ही मिनटों में बदहवास सा महावीर दो अन्य आदमियों के साथ आया । उसके चेहरे पर हवाईयाँ उङ रही थी । वह बिना किसी भूमिका के - प्रसून जी जल्दी से मेरे साथ चलिये । की टेर लगाने लगा ।
बङी मुश्किल से प्रसून ने उसे शान्त किया । और सब बात बताने को कहा । उसके जल्दी चलिये जल्दी चलिये पर उसने तर्क दिया । बिना बात समझे । बिना तैयारी के नहीं जाया जा सकता । तब वे तीनों वहीं तख्त पर बैठ गये । और महावीर प्रसून को कल की घटना बताने लगा । उसकी आँखों के सामने कल का दृश्य जीवन्त हो उठा ।
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इससे एक दिन पहले की बात थी । रात के 9 बजने ही वाले थे । शालिमपुर के ज्यादातर घरों में रात्रि भोजन हो रहा था । शहर के नजदीक होने से इस गाँव में लाइट की अच्छी व्यवस्था थी । केबल टीवी इंटरनेट की भी घर घर में पहुँच थी । सो ज्यादातर स्त्री पुरुष बच्चे आन टीवी के सामने ही भोजन आदि से निबट रहे थे । महावीर भी भोजन कर चुका था । और कमरे में तकिये से टेक लगाये टीवी पर नेतागीरी की खबरें देख रहा था । उसकी औरत भी खाना आदि से फ़ारिग होकर उसके पास ही बैठी थी । उसका नाम फ़ूलमती थी  । जिसे ग्रामीण संस्कृति के अनुसार फ़ूला फ़ूला कहने लगे ।

ग्रामीण आवोहवा और शुद्ध भोजन की उपलब्धता में पली बढी फ़ूला किसी तन्दुरस्त पंजाबन के से लूक वाली थी । पर उसमें हिन्दू संस्कार के चलते काम भावना सीमित ही थी । या जो थी भी । उसको वह व्यक्त नहीं कर पाती थी । कुछ भी हो वह महावीर का घर कुशलता से चला रही थी ।
तब टीवी देखते हुये अधलेटे से महावीर की निगाह अचानक फ़ूला पर गयी । वह मादक अन्दाज में अंगङाईंया ले रही थी । उसने अपने बालों का जूङा खोल दिया था । और उन्हें बार बार झटक रही थी । उसका मुँह थोङा सा तिरछा था । अतः महावीर उसके चेहरे के हाव भाव नहीं देख सकता था । अचानक महावीर को उसका बदन ऐंठता सा लगा । और उसकी साँसे यूँ तेज तेज चलने लगी । मानों नागिन फ़ुफ़कार रही हो । वह एकदम चौंक गया । ये नार्मल साँस लेने की आवाज नहीं थी । ऐसा लगता था । जैसे उसके पेट में कोई प्राब्लम हुयी हो । और वह फ़ूऽऽऽ फ़ूऽऽऽऽ करती हुयी पेट की वायु को निकालने की कोशिश कर रही हो । बङी अजीव सी स्थिति में महावीर ने उसका हाथ पकङकर अपनी तरफ़ घुमाया । और उसके छक्के छूट गये । उसका चेहरा बुरी तरह अकङ गया था । और उसकी एकदम गोल गोल हो चुकी आँखों से मानों चिंगारियाँ निकल रही थी । उसका चेहरा बदलकर वीभत्स हो चुका था । और किसी चिता की राख से पुता सा मालूम होता था । उसकी नाक के नथुने एकदम फ़ूलकर रह गये थे । और मुँह से जहरीली नागिन की तरह फ़ुसकार निकल रही थी ।
उसने फ़ूला फ़ूला क्या हुआ फ़ूला करते हुये उसे हिलाने की कोशिश की । तो उसने पलटकर इतना झन्नाटेदार थप्पङ उसके गाल पर मारा कि वह चारों खाने चित्त जमीन पर जा गिरा । एक ही थप्पङ में महावीर की आँखों के सामने सितारे घूमने लगे । एक औरत का थप्पङ किसी पहलवान की लात जैसा शक्तिशाली हो सकता है । ये उसने कभी सोचा भी न था । और सोच भी नहीं सकता था ।
महावीर का इससे पहले ऐसी स्थिति से कोई वास्ता न पङा था । उसकी समझ में न आया कि वह क्या करे । एकदम उसके दिमाग में भूत प्रेत जैसी बात जैसे शब्द आये अवश्य । पर वह तो उनको मानता ही नहीं था । उनके बारे में कुछ जानता ही न था । पर कभी कहीं देखे दृश्य के अनुसार उसके दिमाग में आया कि प्रेत गृस्त औरत के बाल पकङ कर उसका परिचय प्रश्न आदि पूछने से वह वश में हो जाती है । और साथ में हनुमान चालीसा पढते जाओ । या बजरंग वली का नाम लेते जाओ ।
सो उसने तात्कालिक बनी बुद्धि के अनुसार ऐसा ही किया । और भूत पिशाच निकट नहीं आवे । महावीर जब नाम सुनावे । बारबार कहते हुये उसने फ़ूला के लम्बे लहराते बाल पकङ लिये । और हिम्मत करके बोला - ऐ कौन है तू ?
ये कहना ही मानों गजब हो गया । फ़ूला का फ़ौलादी मुक्का सनसनाता हुआ उसके पेट में लगा । महावीर को लगा । मानों उसकी अंतङिया बाहर ही आ गयी हों । पेट पकङकर वह दोहरा हो गया । फ़ूला उसके गिरते ही उसकी छाती पर सवार हो गयी । और उसकी नाक में जोरदार दुहत्थङ मारा । और तब महावीर को उसकी शक्ल स्पष्ट दिखाई दी । टयूबबैल पर सपने में आने वाली आज उसके घर में उसकी छाती पर साक्षात बैठी थी ।  फ़ूला दूर दूर तक कहीं न थी । उसका साफ़ साफ़ चेहरा उसे दिख रहा था ।
बस आगे की बात समझते उसे देर नहीं लगी । और वह उठकर किसी तरह उससे जान बचाकर बाहर भागा । फ़ूला उसके पीछे पीछे साले हरामी कहते हुये भागी । उसके मुँह से भयंकर फ़ूऽऽऽ फ़ूऽऽ की सीटी सी बज रही थी । मगर बाहर निकलकर तो उसकी हालत और भी खराब हो गयी । गाँव की ज्यादातर औरतें बच्चे मानों पागल हो गये थे । और एक दूसरे पर विभिन्न तरीकों से आकृमण कर रहे थे । तब वह किससे क्या कहता । किससे मदद की गुहार करता । बस उसने एक बात जरूर नोट की थी कि ये पागलपन सिर्फ़ औरतों पर ही सवार हुआ था । मर्द सिर्फ़ पिट रहे थे । और भाग रहे थे । छोटे बच्चे भी उनको ईंटों से मार रहे थे । सारे गाँव में आतंकवादी हमले जैसी भगदङ थी । जिसे जहाँ जगह मिल रही थी । जान बचाकर भाग रहा था । और बस भाग ही  रहा था । अभी वह क्या करे । और कैसे करे । ये न कोई बताने वाला था । और न ही कोई पूछने की स्थिति में था ।
इस तरह ये तांडव लगभग एक घण्टे चला । और अपने आप ही शान्त हो गया । फ़िर भी सभी मर्द सशंकित से रात के बारह बजे डरते डरते ही घर लौटे । इतना बताकर वह चुप हो गया । और आशा भरी नजरों से प्रसून को देखने लगा ।
महावीर तो अपनी बात बताते समय अपनी धुन में मग्न था । अतः वह कोई खास प्रसून के हाव भाव नहीं जान सका । पर वे दोनों आदमी बङी गौर से प्रसून को ही देख रहे थे । घटना को गौर से सुनते हुये वह मानों थरथर काँप उठता था । उसके चेहरे पर हवाईंयाँ सी उङ रही थी । और ऐसा लग रहा था । किसी भी क्षण डर के मारे उसका पेशाब ही निकल जायेगा । और निकल भी गया हो । तो कोई आश्चर्य नहीं । ऐसा वे दोनों आदमी सोच रहे थे ।
वे यह भी सोच रहे थे । महावीर क्या सोचकर इस लौंडे के पास अपनी करुण कथा सुनाकर समय को बरबाद कर रहा है । पर अब आ ही गये हैं । तो आगे आगे देखें होता है क्या । सोचकर वह चुप बैठे थे । हालांकि कल की घटना में वह खास पीङितों में से नहीं थे । पर क्या पता अगली कल में वह भी हो जायें । यही सोचकर आगे के लिये सतर्क सावधान हो जाना उनकी उत्तम सोच थी । मौत से किसकी रिश्तेदारी है । आज मेरी तो कल तेरी बारी है । यह उनका पक्का जीवन दर्शन था ।
- हाँ तो बताईये प्रसून जी ! महावीर के बोलने से अचानक उन दोनों की सोच भंग हुयी । गौर से सुनता हुआ प्रसून भी जैसे एकदम चौंका - ये सब क्या था । क्या है ?
प्रसून हाथों की उँगलियों को आपस में उलझाकर ऐसे चटकाने लगा । मानों उसे कोई उपाय सूझ न रहा हो । उसके चेहरे पर गहन निराशा और अफ़सोस के भाव थे । उनके लिये दुख और बेबसी उसके चेहरे से मानों मूसलाधार बरसात की तरह बरस रही थी । और वह डर के मारे पीला पङा हुआ था । महावीर को कुछ कुछ हैरत सी हो रही थी । पर फ़िलहाल वही डूबते को तिनके का सहारा था ।
फ़िर उसने सिगरेट सुलगायी । और मानों गहरे सोच में डूब गया । उसकी आँखें शून्य 0 में स्थिर थी ।
कुछ देर बाद वह बोला - सारी ! मुझे बङा अफ़सोस है । पर मुझे नहीं लगता कि ये मेरे बस की बात है । अपनी जिन्दगी में मैंने आज तक ऐसा प्रेतक हमला न देखा । न सुना । जिसमें पूरा गाँव ही प्रभावित हुआ हो । बताईये । जब प्रेत किसी टेरिरिस्ट की तरह अटैक कर रहे हों । तब कहाँ गद्दी लगेगी । मन्त्र कहाँ पढा जायेगा । कौन हेल्परी करेगा । और सवाल ये है । आवेशित गद्दी पर कैसे बैठेगा । अब कोई तांत्रिक भूतों के पीछे भागता हुआ तो तांत्रिकी करने से रहा । अब मैं क्या बताऊँ । महावीर जी मेरी समझ में खुद नहीं आ रहा । आपने किन्ही और तांत्रिकों से बात नहीं की ।
महावीर के चेहरे पर गहन निराशा के बादल मंडराने लगे । वह गहरी सोच में डूब गया ।
प्रसून का दिल कर रहा था । वह खुलकर राक्षसों की भांति अट्टाहास करे । और हँसता ही चला जाये । हँसता ही चला जाये । इस स्टोरी को सुनते हुये वह दिल ही दिल में मरुदण्डिका को हजारों बार थेंक्स बोल चुका था । उसे बहुत अफ़सोस इस बात का था कि वह हरामी सुरेश पहले ही मर गया था । बङी आसान मौत मर गया था । उसे कुछ दिन और जिन्दा रहना चाहिये था । और वह शायद रहता भी । जो उसकी मरुदण्डिका से पहले मुलाकात हो जाती । पर अब क्या हो सकता था । तीर कमान से निकल चुका था ।
- और तांत्रिको से.. । महावीर कुछ सोचता हुआ सा बोला - कई तांत्रिकों के पास सुबह से गाङी लेकर घूम रहा हूँ । पर सबने यही कहा । यह प्रेतक नहीं । दैवीय प्रकोप है । और अगर प्रेतक प्रकोप है भी । तो कम से कम उनके बस की बात नहीं । तब मुझे आपका ध्यान आया । चाँऊ महाराज ने आपकी बहुत तारीफ़ की थी । मैंने सोचा । आपके पास इसका कोई हल शायद हो । शायद । शायद ।
- शायद ! प्रसून उसका ही शब्द दोहराता हुआ बोला - शायद इसका हल है तो । मगर बह मेरे पास नहीं है । वैसे..। अचानक उसे कुछ याद आया । और वह बोला - हाँ ये बताओ । इस हमले से गाँव के सभी बच्चे औरतें पीङित हुये । या सिर्फ़ कुछ ही घरों के लोग ? मेरा मतलब बाद में मामला शान्त होने पर जानकारी तो हुयी होगी ।
- हाँ ! महावीर कुछ याद करता हुआ भय से काँपकर बोला - खास तीन घर ही अधिक प्रभावित हुये थे । मेरा । इतवारी का । और जो कुछ दिन पहले बेचारा जवान लङका मरा सुरेश । ये ज्यादा प्रभावित हुये थे । पर थोङा थोङा प्रभाव सभी घरों पर हुआ था । बस कुछ गिनती के घर ही बचे थे । जो बहुत सीधे साधे घरों के लोग थे । और उन्हें तो ठीक से उस समय जानकारी भी नहीं हो पायी कि गाँव में हंगामा बरपा हुआ है । उनमें से बहुत से जल्दी सो गये थे । वे आराम से सोते रहे । उन्हें दूसरे दिन ही पता चला । बहुत छोटे बच्चे और बुजुर्ग भी प्रभावित नहीं हुये । सुरेश के घर की जवान लङकियाँ तो खुद नंगा होकर गलियों में नाची ।
- ओह ओह..। प्रत्यक्ष में गहरी सहानुभूति दिखाता हुआ प्रसून मन ही मन घृणा से बोला - उल्लू के पठ्ठे ।  साले । हरामी । फ़िर भी तुझे समझ में नहीं आया । अपने पाप याद नहीं आये । और पाप का प्रायश्चित करने के बजाय । खुद के इलाज को भागा भागा फ़िर रहा है । अगर तुझे जरा भी अक्ल होती । तो तुझे तो तुरन्त भगवान के आगे कनफ़ेस करना चाहिये था । सर फ़ोङ देना चाहिये था अपना । उसके न्याय में देर है । अँधेर नहीं । उसकी लाठी बे आवाज होती है साले कुत्ते ।
सोचते सोचते उसके आँसू फ़िर से निकलने को हुये । जिसे उसने जबरन ही रोका । और अपनी आवाज को भर्राये जाने से बचाता हुआ बोला - देखिये । अगर इंसान खुद को सुधारना चाहे । तो...। अपनी बात का रियेक्शन उसने गौर से महावीर के चेहरे पर देखा । और बोला - मेरा मतलब कोई स्थिति बिगङ गयी है । तो इलाज तो हो ही जाता है । पर जिन्दगी की हर बात में शायद अवश्य जुङी होती है । और शायद का मतलब है । अनिश्चितिता । शायद ऐसा हो जाय । और शायद ऐसा न भी हो । शायद । है ना ।

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