रविवार, अक्तूबर 16, 2011

अंधेरा 11

दूसरे दिन सुबह आठ बजे का समय था । प्रसून बराङ साहब की कोठी की सबसे ऊपरी छत पर था । उसकी उँगलियों में जलती हुयी सिगरेट फ़ँसी हुयी थी । जिससे निकलती धुँये की लकीरें सी ऊपर आसमान में किसी अज्ञात सफ़र पर जा रही थी । स्वयँ बराङ उसके आसपास टहल रहा था । और जस्सी की बीमारी के बारे में कम । उससे जस्सी की शादी को लेकर ज्यादा फ़िक्रमन्द था । उसके कहने पर राजवीर ने जस्सी और उसके एकान्त साथ के बारे में कुरेद कुरेदकर पूछते हुये उसका रुख जानने की कोशिश की थी । जिस पर जस्सी सिर्फ़ शर्माकर रह गयी थी । और.. मुझे कुछ नहीं पता..उन्हीं से पूछो ना ..कहकर भाग गयी थी । तब राजवीर के दिल में मीठी मीठी गुदगुदी सी हुयी । उन्हीं से पूछो ना..ये उन्हीं वर्ड कुछ न बताता हुआ भी सब कुछ बता गया । ओ रब्ब ! तेनूं लख लख शुक्र है । क्या राजकुमार भेजा था । उसकी कुङी के लिये । जैसी परी सी छोरी । वैसा ही सुन्दर वो राजकुमार ।
उसने बराङ साहब से उसी की शरारत के अन्दाज में बोला । बोलती है - उन्हीं से पूछो ना..। तब वे दोनों भरपूर हँस भी नहीं सके । हँसना चाहते थे । पर सिर्फ़ खुशी के आँसू ही निकले । पहली बार बराङ जैसे अभिमानी ने जाना । जिन्दगी में माधुर्य रस क्या होता है । पहली बार उसे लगा । वह एक जवान बेटी का बाप है । और वह आँसू भरी आँखों वाला बबुला ख्यालों में ही बङे लाङ से अपनी लाङो को उसके प्रियतम की डोली में बैठाकर खुद भावपूर्ण विदाई कर रहा था । ऐसे कितने ही अग्रिम मधुर दृश्य उन सरदार पति पत्नी की आँखों के सामने तैर गये ।
और अब वह बिना देरी किये इस मामले में प्रसून से बात करने वाला था । पर प्रसून के सामने उसके पास आते ही उसके सारे भाव एकदम साबुन के झाग की तरह बैठ गये । प्रसून भावहीन सा सिर्फ़ विचार मग्न था ।  तब शादी वाली बात कहने की वह हिम्मत नहीं कर पाया । और बात को शुरू करने के लिये जस्सी की स्थिति के बारे में पूछने लगा । जिसके बारे में उसने संक्षिप्त में इतना ही कहा - बराङ साहव ! मैं अपनी जान की कीमत पर भी जस्सी को ठीक करके रहूँगा । चाहे इस बाधा की जङ आकाश से लेकर पाताल तक क्यों न फ़ैली हो ।
वह मोटी अक्ल का सरदार इस बात का कोई अर्थ निकाल पाता । तब तक जस्सी नहाकर ऊपर आ गयी ।  ये देखते ही वह उन्हें एकान्त देने के लिये वह वहाँ से नीचे चला गया । छत पर टहलते हुये से प्रसून की निगाह बाहर कहीं निकलते सतीश पर पङी । उसके यहाँ आने का कारण सतीश ही था ।
जब जस्सी के घर में हुयी कानाफ़ूसी टायप बातें उसके भी कानों में आयी । तब उसने जस्सी की बात का कोई पता न होने का बहाना सा करते हुये..हमारी तरफ़ के लोग आज के जमाने में भी एक ऐसे अदभुत योगी को जानते हैं । उसके बारे में ऐसा सुना है । वैसा सुना है । जैसी अकारण सी सामान्य चर्चा की तरह बात की । जिसे बराङ दम्पत्ति खास राजवीर ने पूरी दिलचस्पी से ध्यान से सुना । और वे भी जस्सी को अलग रखते हुये उससे प्रसून के बारे में अधिक से अधिक पूछने लगे । और आखिर में उन्होंने जानना चाहा कि क्या वह जरूरत होने पर उसे बुला भी सकता है । या सिर्फ़ मुँह जबानी ही उसके बारे में जानता है ।
वास्तव में यू पी की मानसिकता वाला सतीश एक तीर से दो शिकार कर रहा था । वह बखूबी जानता था कि प्रसून को बुलाने का मतलब था । उसको कम से कम पचास हजार की इनकम होना । जो उसको योगी के खोजने के लिये मिलनी थी । दूसरे वह अपने घर मुफ़्त में घूमने जाता । तीसरा उनका काम सफ़ल हो जाता । तो न सिर्फ़ बराङ दम्पत्ति बल्कि इस पंजाबी क्षेत्र में उसका रौब गालिब हो जाना था । और खुद उसकी नजर में ये बेबकूफ़ सरदार उसे झुककर सलाम करने वाले थे । हर चालाक आदमी की तरह उसने भी ऐसे ही ढेरों प्लान यकायक सोच लिये थे । जिसे उसके यूपी में बहती गंगा में हाथ धोना कहा जाता था । पर वह सिर्फ़ हाथ धोकर नहीं रह जाना चाहता । पूरा का पूरा स्नान ही कर लेना चाहता था ।
लेकिन जब बराङ दम्पत्ति ने यकायक उससे बुलाने के बारे में कहा । तो मानों उसके हाथों से तोते ही उङ गये । वह जो कल्पना कर रहा था कि प्रसून को थोङी ही कोशिश से खोज लायेगा । अब उसे एकदम फ़ालतू की बात लगी । क्योंकि वह उसे सीधे सीधे नहीं जानता था । उसने किसी से सुना था । उस किसी ने भी किसी से सुना था । और उस किसी ने भी किसी और से बस सुना भर था । उसे जानता कोई भी न था ।
तब फ़िर किसी ने किसी को फ़ोन किया । उस किसी ने और किसी को फ़ोन किया । पूरे दो दिन सतीश दिन भर बैठा हुआ अपने किसी को फ़ोन मिलाता रहा । वह आगे अपने किसी को मिलाता रहा । तब सैकङों बार की बातचीत के बाद उसे बहुत दूर के किसी से प्रसून की कोठी का बस लैंडलाइन नम्बर ही हासिल हुआ । और उस पर भी जिस सख्त पर आंसरिग मशीन की तरह मधुर ध्वनि की लेडी आवाज सुनाई दी । उसने तो मानों उसके सब अरमानों पर पानी ही फ़ेर दिया ।
दूसरी तरफ़ से अल्ला बेबी बोल रही थी । उसने बहुत संक्षेप में बिना कुछ सुने कहा - सर ! अभी घर पर नहीं है । सिक्स मन्थ बाद आयेंगे । तब आप फ़ोन करना । कहकर उसने बिना कुछ सुने फ़ोन काट दिया ।
सतीश की समस्त आशा ही खत्म हो गयी । अभिमानी बराङ को खामखाह ही यूँ लगा । भरे बाजार उसकी बेइज्जती हुयी हो ।
पर राजवीर समझदार थी । उसने दो तीन बार स्वयँ प्रयास किया । तब कहीं फ़ोन उठा । तब अल्ला बेबी से उसकी बात हुयी ।  प्रोफ़ेशनल लोगों से बात करने का तरीका समझ आया । तब बात बनी ।
उसने बिना किसी भूमिका के कहा - देखिये । प्लीज ये एक जिन्दगी मौत का सवाल समझो । मैं आपसे प्रसून जी का नम्बर नहीं माँग रही । कोई अन्य रिकवेस्ट नहीं कर रही । पर कोई बहुत इम्पोर्टेंट बात आने पर आप उनको डायरेक्ट कान्टेक्ट कर सकती हो । ये तो मैं जानती हूँ । तब यदि आप कहें । तो मैं अपनी बात कहूँ ।
दरअसल सतीश और राजवीर को दूसरी तरफ़ से बोलने वाली कोई युवा लेडी मालूम हो रही थी । जबकि वह महज 13 वर्ष की अल्ला बेबी थी । जो बङी दक्षता से एक कुशल सेक्रेटरी की तरह ऐसी बातों को डील करती थी । और बहुत भावुक दिल भी थी । बस उसकी आवाज एकदम सपाट और भाव रहित थी । उसने राजवीर के स्वर में दर्द महसूस किया । तो स्वतः ही उसकी आवाज अतिरिक्त मधुरता से भर उठी ।
- कहिये । वह नमृ होकर बोली - मैं आपकी हेल्प करने की पूरी पूरी कोशिश करूँगी ।
- देखिये । राजवीर बोली - मैं बहुत संक्षिप्त में बात कहूँगी । आपका कीमती समय खराब नहीं करूँगी । मेरे पास अदृश्य बाधा पीङा के अपनी बेटी के कुछ वीडियो क्लिप्स हैं । आप अपना ई मेल मुझे बता दें । मैं वे क्लिप्स और खास प्वाइंट आपको लिखकर भेज दूँगी । प्लीज आप उन्हें नजर अन्दाज न करना । और किसी की जिन्दगी मौत का सवाल जानकर देखना । और फ़िर आपको मेरी बात सही लगे । खुद विश्वास आये । तो ये बात आप अपने सर तक पहुँचा देना । मेरा मतलब मेरे मेल का मैटर आप उन्हें ई मेल कर देना । बाकी मेरी बेटी के भाग्य में जो होगा । जिन्दगी या मौत । ये फ़ैसला तो रब्ब के हाथ ही होता है । कहते कहते राजवीर कुछ भावुक सी हो गयी थी । और उसने सुबकते हुये फ़ोन स्वयँ ही रख दिया था ।
काश ! वह देख पाती । दूसरी तरफ़ उस भावुक लङकी की नीली आँखों में आँसू झिलमिला उठे थे । उसने न सिर्फ़ अपना ई मेल बताया था । बल्कि अगले चार घण्टे में तीन बार क्लिप्स की उत्सुकता में मेल चेक किया था । तब चार घण्टे बाद उसे 14 वीडियो क्लिप मेल से मिले । और एक दो क्लिप देखकर ही वह मामले की गम्भीरता और प्रसून के लिये उसका महत्व समझ गयी । उसने न सिर्फ़ तुरन्त प्रसून को ज्यों का त्यों वह मेल भेजा । बल्कि वह तुरन्त देखे । इस हेतु उसे साथ के साथ फ़ोन भी किया । और फ़िर वो फ़ोन जिस पर हजार कोशिश के बाद लोगों की बात मुश्किल से हो पाती थी । अगले चार सेकेण्ड में पहली बार में ही उसकी बात हुयी । प्रसून इस ईसाई लङकी की समझदारी का बेहद कायल था । जहाँ उसमें बच्चों सा भोलापन भी था । वहीं गजब की समझदारी भी थी ।
उस समय वह विदेश में था । और संयोगवश अभी अभी ही काम से फ़्री हुआ था । और भी डबल संयोगवश उस समय वह नेट पर ही बैठा था । जब उसे अल्ला बेबी का फ़ोन पहुँचा । बेबी ने बङे भावुक स्वर में रिकवेस्ट की थी - प्लीज सर । अभी देखें । बात खास है ।
ओ के डियर कहकर वह क्लिप देखने लगा था । और सबसे पहले तो जस्सी को देखकर ही चौंक गया था । क्या बला की सुन्दरी थी । नेचुरल ब्यूटी । सुन्दरता की देवी । वीनस की प्रतिमा । उसने अपने आपको कंट्रोल किया । और क्लिप को गम्भीरता से देखने लगा । उसने अल्ला बेबी को मन ही मन लाख थेंक्स बोला ।  और 14 क्लिप देखने में टाइम खराब न करते हुये तुरन्त नम्बर डायल किया ।
राजवीर पर तो मानों भगवान स्वयं ही मेहरवान हुआ था । क्लिप भेजने के महज 50 मिनट बाद उसके फ़ोन की घण्टी बज उठी थी । और तब तो वह एकदम से उछल ही पङी । जब दूसरी तरफ़ से उसे बहुत मधुर और संतुलित स्वर सुनाई दिया - हल्लो ! मैं प्रसून बोल रहा हूँ ।
और फ़िर सीधा ही वह यहाँ आ गया था । उसने महसूस किया था । जस्सी सिगरेट को पसन्द नहीं करती थी । पर बोलती कुछ नहीं थी । उसने सिगरेट नीचे उछाल दी । क्या गजब लग रही थी वह । उसके गीले से लम्बे बाल कन्धों पर लहरा रहे थे । बिना किसी मेकअप के वह गजब ढा रही थी । और सबसे बङी बात प्रसून को उसमें प्रेमिका नजर आ रही थी ।
वह उससे नजरें चुरा रहीं थी । और चोरी चोरी कनखियों से उसे देख रही थी । संभवत कल के अभिसारी क्षण उसे

बारबार याद आते थे । तब तुरन्त ही उसके गोरे गुलाबी गालों पर शर्म की लाली सी दौङ जाती थी । पर एक लङकी की परेशानी शायद वह समझ नहीं पा रहा था । उसे कल के मिलन की वजह से चलने में खास परेशानी थी । इसलिये वह बहुत धीरे धीरे संभलकर चल रही थी । और खास ध्यान रख रही थी कि उसकी चाल का बदला्व किसी के नोटिस में ना आये । पर इसके बाद भी वह अभी भी प्रसून द्वारा उसे बाँहों में लेकर चूमने की प्रेममयी कल्पना कर रही थी ।
वह जानता था । संसार ही कल्पनाओं में जीता है । पर सबकी कल्पनायें उनकी अपनी भावनाओं के अनुसार अलग अलग होती है । बराङ दम्पत्ति उसको जमाई बनाने की कल्पना में खोये हुये थे । जस्सी अपनी कल्पना में उसकी महबूबा बनी हुयी थी । और उसकी कल्पना सिर्फ़ उस रहस्य के लिये भटक रही थी । जिसके अदृश्य तार जस्सी से जुङ रहे थे । ऐसे आखिर वह कब तक वहाँ रुका रह सकता था । मगर दूसरे उसने ये भी तय कर लिया था । चाहे जो हो जाये । इस रहस्य का पता लगाकर ही जायेगा । खेल को खत्म करके ही जायेगा ।
उसने देखा । बालों को हौले हौले सुखाती हुयी जस्सी उसके एकदम करीब आने से बच रही थी । और बारबार करीब भी आ रही थी । इकरार भी । इंकार भी । इजहार भी । मनुहार भी । सभी एक साथ । एक ही समय में । अजीव होती हैं । ये लङकियाँ भी । उसने सोचा । और फ़िर शरारत के अन्दाज में बोला - नाराज हो मुझसे । कल की वजह से ।
- ब्रेकफ़ास्ट ! वह तिरछी निगाहों से परे देखती हुयी बोली - ब्रेकफ़ास्ट कर लीजिये । अब नीचे चलिये ।
कहकर वह तेजी से सीङियाँ उतरती चली गयीं । हठात प्रसून उसके गोल आकर्षक नितम्बों में पङते हुये बल देखता रहा । वह बार बार इस लङकी के प्रति क्यों आकर्षित हो रहा था - उसके चेहरे को ओक में भर लूँ । ज़िंदगी को इस तरह पिया जाएगा ।
वह जानता था । बराङ साहब उससे बात करने के खास इच्छुक थे । पर अभी तक ऐसा कोई संयोग नहीं बन पाया था । वह जानता था । वे क्या बात करेंगे । और फ़िर वह क्या जबाब देगा । जो भी हो सज्जनता यही कहती थी कि उनके दिल की बात भी सुनना चाहिये । उसे महत्व भी देना चाहिये । सो वह नाश्ते पर उनके सामने बैठा था । सामने ही जस्सी और उसके बगल में राजवीर बैठी थी ।
- देखिये प्रसून जी ! बराङ बोला - धर्म और अलौकिक बातों के प्रति मेरी सोच कुछ अलग ही है । वैसे मैं भी और सिखों की तरह गुरुद्वारा जाता हूँ । दिल में कहीं न कहीं उस परम्परा का सम्मान भी करता हूँ । पर जाने क्यों मुझे लगता है । ये मन्दिर मस्जिद गुरुद्वारा चर्च जाना महज एक सामाजिक गतिविधि सी बनकर रह गया है । जिस तरह इंसान मेले नुमायश देखने जाता है । और कहीं भी धर्मस्थल देखकर अपनी जाति धर्म से मिले संस्कारवश उसे मत्था टेकता है । तो कोई अलग बात नहीं । मैं भी ऐसा करता हूँ । पर जाने क्यों मैं दिली तौर पर नास्तिक ही हूँ । और नास्तिक होने में ही सुख पाता हूँ । फ़िर जाने क्यों मुझे ऐसा भी लगता है कि मैं धर्म को नहीं मानता । इसलिये बहुत बङा बेबकूफ़ हूँ । मगर दूसरे ही पल मुझे अहसास होता है कि मैं इस प्रचलित परम्परागत धर्म को कट्टरता से मान रहा होता । तो शायद उससे भी बङा बेबकूफ़ होता । मैं दोनों ही तरफ़ से खुद को बेबकूफ़ सा महसूस करता हूँ ।
तभी जस्सी शरारत से बोली - डैडी ! 1 बार 1 सरदार था.. आगे बोलूँ क्या ?
अभी प्रसून इस बात को ठीक से समझ नहीं पाया था कि राजवीर जस्सी की पीठ में धौल मारती हुयी जोर से हँसी । वह पानी का घूँट मुँह में भरे हुये थी । जो उसकी हँसी के साथ फ़व्वारे के रूप में सीधा बराङ साहब के ऊपर गिरा । फ़िर वे दोनों माँ बेटी ठहाका मारते हुये हँसने लगी । बराङ भी मुक्त भाव से हँसा । पर वह नहीं हँसा ।
- देखा मिल गया तुरन्त सबूत । वह टावल से मुँह पोंछता हुआ बोला । दोनों माँ बेटी अभी भी हँस रही थी । और राजवीर उसके धौल जमाती हुयी कह रही थी - चुप भी कर मरी । डैडी को ऐसा क्यों बोलती है । वो संता बंता तो नहीं है ।
- देखा प्रसून जी ! वह खुलकर हँसता हुआ बोला - ये मेरी अपने घर में पोजीशन है । बाइज्जत बामुलाहिजा बराङ साहब । ज्यादातर सिख लङकियाँ सरदार लङकों को पसन्द नहीं करतीं । उनकी फ़र्स्ट च्वाइस सिर्फ़ हिन्दू लङके हैं । और शायद । वह राजबीर की तरफ़ देखता हुआ बोला - यही हाल सरदार औरतों का भी है । इन दोनों को भी ये दाङी वाले कतई नासपसन्द हैं । कम से कम मेरा ख्याल तो अब तक यही बना है ।
- ओये चुप करो जी । राजवीर मानों प्यार से डाँटकर बोली - मैंने ऐसा कब बोला आपको । मुझे तो आप पूरे राजकपूर जैसे हीरो लगते हो ।
- मेरा नाम जोकर वाले । जस्सी फ़िर शरारत से प्रसून की तरफ़ देखते हुये बोली ।
उसकी बात पर एक जोरदार संयुक्त ठहाका लगा । अबकी बराङ साहब भी पहले से ही खुलकर हँसे । फ़िर वे तीनों भी साथ में हँसने लगे ।
- बङी प्यारी फ़ैमिली है मेरी । वह भावुक सा होकर बोला - हम आपस में एक दूसरे से बहुत प्यार करते हैं । लेकिन प्रसून जी मैंने आपसे एक प्रश्न किया है । कुछ जानना चाहा है । मैं नास्तिक क्यों बन गया । जब सदियों से भारत की धार्मिकता की जङों में काफ़ी गहराई है । रूटस जिसे बोलते हैं । फ़िर भी हर आदमी यहाँ नास्तिक सा क्यों है ?
वह गम्भीर हो गया । शायद इसी को संगति का असर कहते हैं । शायद बराङ को अब तक ऐसा कोई मिला नहीं होगा । जँचा नहीं होगा । जिससे वह बरसों से अपने दिल में छिपी इस बात को कह पाता । आज मानों उसने अपनी सारी भङास निकाली थी ।
- आपने ! वह प्रभावशाली सौम्य स्वर में बोला - एकदम सही बात कही है । और ये सिर्फ़ आपकी ही बात नहीं है । एक आम इंसान की बात है । पर किसी को इसको व्यक्त करने का मौका मिलता है । और किसी को नहीं । लाइफ़ में किसी को अपने प्रश्न का उत्तर मिल जाता है । किसी को नहीं ।
जब एक छोटा बच्चा जो एक दो साल का होता है । तब उसको बेसिक नालेज के लिये प्रारम्भिक शिक्षा हेतु बुक दी जाती है । उसमें A से एप्पल होता है । B से बनाना होता है । C से कैट होती है । सोचिये बराङ साहब । गहराई से सोचिये । A से एप्पल B से बनाना C से कैट को सचित्र किताब में लिखने की क्या आवश्यकता है ? ये सब चीजें तो हमारे आसपास उपलब्ध ही हैं । किताब से सिखाने की क्या आवश्यकता है ? इसके बाद शिक्षा के लिये स्कूल कालेजों की क्या आवश्यकता है । जब किताब है । प्राइवेट तौर पर सिखाने पढाने वाले शिक्षक भी हैं । तब इस सब फ़ालतू से सिस्टम की क्या आवश्यकता हो सकती है ।
सोचिये । एक बच्चा सिर्फ़ किताब में ही जीवन भर A से एप्पल B से बनाना C से कैट को देखता रहे । और स्कूल भी न जाये । पेङों पर लगा या हाथ में फ़ल रूप में  A से एप्पल B से बनाना न कभी देखे । न कभी खाये । C से कैट को भी रियल्टी में न देखे । न किसी तरह का यूज करे । लेकिन उसको बार बार बताया जाये । उसके दिमाग में भर दिया जाये । A से एप्पल स्वीट होता है । ताकतवर होता है । B से बनाना मीठा और टेस्टी होता है । तो उसे क्या कोई उनमें रस आयेगा । उसकी आस्तिकता इन चीजों में होगी । नहीं । तब वह इन सभी चीजों के प्रति अन्दर से नास्तिक ही होगा ।
वही आप हो । दूसरे हैं । आप सिर्फ़ ABCD की किताब पढकर रह गये । आप स्कूल गये अवश्य । पर आपको एप्पल की मिठास का अहसास कराने वाले शिक्षक नहीं मिल सके । यह एप्पल ट्री आप कैसे उगाकर ढेरों एप्पल खुद पैदा कर लो । ये बताने वाला कोई रियल गुरु आपको नहीं मिला ।
एक जिन्दगी में असफ़ल गरीब आदमी भी अमीरी के शौक वैभव को लेकर नास्तिक ही होता है । क्यों ? वह उसे हासिल नहीं है इसलिये । तब उसकी अमीरी में आस्तिकता कैसे उत्पन्न हो । तब वह अपनी कुण्ठावश अमीरी और अमीरों को गालियाँ ही देता है । उनमें झूठे दोष निकालता है । जबकि दोषी वह स्वयँ है । प्लीज डोंट माइण्ड बराङ साहब । यदि आप ऐसा महसूस करते हैं । तो आप धार्मिक गरीव हैं । असफ़ल इंसान हैं । यदि सभी सिख ऐसा सोचते हैं । तो वे सभी बेहद गरीब हैं । ये आपका मकान कोठी गाङी धन आपके साथ अन्त में कुछ नहीं जाने वाला । तव आप एकदम खाली हाथ जाओगे । एक फ़टेहाल भिखारी की तरह । वहाँ सिर्फ़ सुमरन की कमाई साथ होती है । अब आप अपना आंकलन स्वयँ करें ।
बराङ को मानों सरे बाजार जूते पङे हों । उसका सारा घमण्ड इस देवदूत ने कुछ ही शब्दों में चूर चूर कर दिया था । पर कितना आश्चर्य था । उसे अपनी बेइज्जती में एक अजीव सा सुख हासिल हो रहा था । उस लङके ने मानों उसे हकीकत का आइना दिखा दिया हो । कितना जादू था । उसके शब्दों में । उसे लग रहा था । वो ये दिव्य वाणी सी यूँ ही बोलता रहे । और वो सुनता रहे । कितना अजीव सा सुख मिला था उसे । उसने मन ही मन उन तमाम  साधुओं बाबाओं धार्मिक लोगों को माँ बहन की भद्दी गालियाँ दी । जो उसे जीवन में अब तक मिले थे । और जो धर्म के नाम पर जाने क्या क्या बकबास करते हुये आदमी को भृमित ही करते हैं । और सत्यता को करीब से तो बहुत दूर । दूर दूर तक नहीं जानते । दूसरे वह सिर्फ़ बोल ही नहीं रहा था । इतने दिनों में जस्सी को एक भी अटैक न आना । उसके घर में एक अजीव सी सात्विकता की खुशबू सी जो उसके आने से फ़ैली थी । वह बिना बताये बहुत कुछ बता रही थी । अब तक के घोर अभिमानी बराङ को दिल में बहुत ही प्रबल इच्छा हुयी कि वह इस पहुँचे हुये महात्मा के चरणों में गिर पङे । और बोले - आप ही मेरे गुरु हो ।
पर वह ऐसा कर न सका । अभी वह कुछ कहना ही चाहता था कि प्रसून फ़िर से बोला ।
- देखिये बराङ साहब ! ये ढोंगी और स्वयँ के लिये भी अज्ञानी बाबाओं द्वारा एक आम पर मजबूत धारणा बना दी गयी हैं कि परमात्म ज्ञान को जानना बेहद कठिन है । जबकि सभी धार्मिक ग्रन्थ बङी सरलता से कहते हैं - आत्मा अनादि अजन्मा अमर अजर और अबिनाशी है । आत्मा अनादि और अनन्त है । आत्मा आदि अन्त रहित है ।..और आप अपने मूल रूप में आत्मा ही हो । अपनी सिर्फ़ यही मजबूत और स्थायी पहचान हमेशा पक्के तौर पर याद रखने से परमार्थ ज्ञान बहुत सरल हो जाता है । और तब फ़िर आप चाहकर भी नहीं कह पाओगे कि - मैं नास्तिक हूँ ।
अब मनदीप साफ़ साफ़ और पहले से भी अधिक प्रभावित दिखा । राजवीर तो मानों भक्ति सागर में ही डूब रही थी । न आस्तिक न नास्तिक बस अपनी जवानी में मस्त जस्सी भी आश्चर्य से उसकी बातें सुन रही थी । उसका दिल साफ़ साफ़ कर रहा था कि वह प्रसून के गले में तुरन्त बाँहें डाल दे । और उसके होंठ चूम ले । ये वो उसे अभी अभी की ज्ञान वार्ता पर तोहफ़ा देना चाहती थी । पर वह ऐसा कर न सकी ।

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