रविवार, अक्तूबर 16, 2011

अंधेरा 15

- ये आप क्या कह रहे हो । वह बेहद हैरत से बोला - मुझे बिलकुल भी विश्वास ही नहीं हो रहा ।
- मुझे भी नहीं होता । प्रसून भावहीन स्वर में बोला - पर कभी कभी अजीव बातों पर भी विश्वास करना ही पङता है । तुम्हारी ये ढोलक क्या गजब ढा रही है । शायद कोई भी इस पर यकीन न करे । एक मासूम लङकी तुम्हारी वजह से कटी पतंग की तरह बिना लक्ष्य भटकती हुयी यहाँ तक आ पहुँची है । और निराधार अंतरिक्ष में लटकी हुयी है । बल्कि लटकी कहना भी गलत है । वह तूफ़ानी बवंडर में कैद है । अभी मैं ये भी नहीं कह सकता कि वो जीती है । या मर चुकी है ।
उस बूङे के चेहरे पर गहरे अफ़सोस के भाव थे । वह मानों रो पङना चाहता था । उसकी वजह से किसी को घोर कष्ट हुआ था । यह सोच उसको मारे ही डाल रही थी । प्रसून को कम से कम अब इस बात की तो तसल्ली हो चुकी थी कि जो भी क्रिया हो रही थी । या अनजाने में की जा रही थी । उसका लक्ष्य जस्सी को कोई नुकसान पहुँचाना नहीं था ।
गोल बवंडर शून्य 0 स्थान में जस का तस थमा हुआ था । और अब उसकी मुश्किल और भी दुगनी हो गयी थी । जब जिसकी वजह से वह सब क्रिया हो रही थी । उसे ही कुछ मालूम नहीं था । तब फ़िर उसका कोई इलाज उसके पास क्या होता ।
- दाता ! उसने आह भरी - तेरा अन्त न जाणा कोय ।
अब सब कुछ संभालना उसका ही काम था । अगर कोई छोटी बङी शक्ति के स्वयँ जान में ये घटना हो रही थी । तब बात एकदम अलग थी । और अब बात एकदम अलग । उसने अन्दाजा लगाया । प्रथ्वी पर सुबह हो चुकी होगी ।  तब जस्सी को लेकर बराङ परिवार में क्या भूचाल मचा होगा । जस्सी मरी पङी होगी । वह भी मरा पङा होगा । कहीं ऐसा ना हो । वे उन दोनों का अन्तिम संस्कार ही कर दें । यहाँ से वापिसी भी कब होगी । कुछ पता नहीं था । और अब तो ये भी पता नहीं था कि वापिसी होगी भी या नहीं । यदि उनके शरीर नष्ट कर दिये गये । तो उनकी पहचान हमेशा के लिये खो जायेगी ।
तब क्या उसे यूँ ही वापिस लौटकर सारी स्थिति को देखना संभालना चाहिये । अचानक उसके पीछे क्या बात हुयी थी । वह न तो उन वर्तमान परिस्थितियों में अभी पता लगा सकता था । न ही उसके पास इतना समय था ।
उसने इतने अलौकिक स्थानों की यात्रायें की थी कि उसे याद भी नहीं था । पर ये अंधेरे नीच लोक अजीव ही थे । चमकता सूर्य और खिली धूप का क्या मतलब होता है । यहाँ के निवासी शायद जानते ही नहीं थे । हर समय धुंध सी फ़ैली रहती थी । और बहुत पीला सा मटमैला प्रकाश फ़ैला रहता था ।
सृष्टि नियम में काले पानी की सजा जैसा ये अजीव ही विधान था । लगता था । सृष्टि अपनी प्रारम्भिक अवस्था में थी । अलग अलग जगह अलग अलग लोकों में जीवन की कितनी अजीव परिस्थितियाँ विकसित थी ।
उसने बूङे को गौर से देखा । एक अजीव सा सूनापन उसकी आँखों में समाया हुआ था । वह जैसे ठहरा हुआ समय था । उसके पास ढोल रखा हुआ था । और शायद वही उसका अब साथी भी था । वह भारत के किसी पिछङे गाँव की तरह एक कच्चे से मकान में रहता था । जिसमें सिर्फ़ एक कमरा था । और बाहर बहुत सी खुली जगह थी । उसका ही घर क्या । अधिकतर बहाँ की आवादी ऐसी ही हालत में थी । उसके कमरे में पाँच छह पुरुष और तीन स्त्रियाँ बैठी हुयी थी ।  उन सबको उसको लेकर बहुत आश्चर्य था । वे बार बार उस पवित्र आत्मा को देख रहे थे । जो स्वेच्छा से यहाँ तक आ  गया था । और उसकी दिव्य आभा से वहाँ एक अजीव सा प्रकाश फ़ैला हुआ था ।
पर उसकी हालत खुद अजीव हो रही थी । उसका अगला कदम अब क्या हो ? उसे ही ये तय करना मुश्किल हो रहा

था ।  तब उसकी निगाह उस ढोल पर गयी । सारा रहस्य शायद इस ढोल में ही छुपा हुआ था । पहले उसने सोचा कि वह बूङे से उसके बारे में पूछे । उसका दिमाग कैप्चर कर ले । और समस्या को बारीकी से देखे । और वह यही करने वाला था ।
तब हठात ही उसे दूसरी बात सूझी । जो अधिक उचित थी । दरअसल वह जब तक यहाँ पहुँचा था ।  ढोल कृमशः मद्धिम होता हुआ रुक गया था । और वह इसी ध्वनि के सहारे यहाँ तक आया था । आज उसने योग का एक अजीव अनुभव किया था । उस ढोल की ध्वनि के साथ अजीव तरंगे आकार ले रही थी । और उनमें मानवीय आकार और जमीनी दृश्य किसी ग्राफ़िक विजुअलाइजेशन की तरह हौले हौले आकार ले रहे थे । जैसे किसी आडियों फ़ाइल को प्ले करने पर ध्वनि के आधार पर तरंगो की तीवृता और क्षीणता के आरोह अवरोह पर डिजायन बनती है ।
खास बात ये थी कि इसमें जस्सी करम कौर एक युवा नाविक मछुआरा एक बूङा और कुछ नटगीरी के करतब उसे नजर आये थे । लेकिन जैसे जैसे वह करीव आता गया । इन सब शरीरों की रूप आकृतियाँ बदलने लगीं । यही बङा अदभुत बिज्ञान उसने देखा था । वह इसे जानता तो था । पर ऐसा प्रत्यक्ष रूप पहली बार देखा था । उसने सोचा । किसी टीवी सेट इंटरनेट आदि में दृश्य ध्वनि का प्रसारण और रिसीविंग के मध्य कुछ कुछ ऐसा ही होता होगा ।
तब सारा रहस्य इसी बात में छुपा था । और वह बारबार इसी को सोच रहा था । वह जब उधर से आ रहा था । तब जस्सी और करम कौर की आवृतियाँ उनके वर्तमान स्वरूप की बन रही थी । लेकिन बीच रास्ते में उसने उतनी ही संख्या में दूसरी अपरिचित आवृतियाँ देखीं । जो इस नीच लोक की तरफ़ से उसी पथ पर जा रही थी । और इसका चित्रण इस तरह से बनता था । जैसे जस्सी करम कौर और अन्य एक रास्ते पर आ रहे हों । और उतनी ही संख्या में वैसे ही लिंगी इधर से जा रहे हों । तब एक बिन्दु पर वे शरीर मिले । और जस्सी उस अपरिचित लङकी में समा गयी । करम कौर एक औरत में समा गयी । इधर का दृश्य उधर के दृश्य से मिल गया । और मामला ठहर गया । फ़िर ये वीडियो क्लिप जैसा चित्र पाज होकर स्टिल चित्र में बदल गया । ये उसने देखा था ।
बूङा सूनी आँखों से उसी की तरफ़ देखता हुआ कुछ बोलने की प्रतीक्षा कर रहा था । पर क्या बोले वह ? वह खुद चाहता था कि वह बोले ।
- बाबा ! तब वह ही बोला - मैं आपके इस ढोल को बजते हुये सुनना चाहता हूँ । मेरा मतलब जैसा आप हमेशा से करते आये । जिन भावों से । जिन वजह से आप ढोल बजाते रहे । ठीक सब कुछ वैसा ही देखना सुनना चाहता हूँ । लेकिन मनोरंजन के लिये नहीं । इसमें किसी की जिन्दगी मौत का सवाल छुपा है । और शायद मेरी जिन्दगी मौत का सवाल भी ।
सबने चौंककर उसकी तरफ़ देखा । एक ढोल बजने से किसी की जिन्दगी मौत का क्या लेना देना । ये उनकी समझ में नहीं आ रहा था । बूङे ने बङे असहाय भाव से इंकार में सिर हिलाया । उसकी बूङी आँखों में दुख का सागर लहरा रहा था । उसके इंकार पर प्रसून को बङी हैरत सी हुयी । उसका आगे का पूरा कार्यकृम ही उसके ढोल बजने पर निर्भर था ।
- ये सब । वह कमजोर आवाज में बोला - खुद होता है । मैं वैसा ढोल हमेशा नहीं बजा सकता । बल्कि ये मान लो । वह खुद ब खुद बजने लगता है । और ये यहाँ । उसने छाती पर हाथ रखा - यहाँ हूक उठने पर होता है । अभी मैं बहुत देर से ढोल बजाता रहा हूँ । इसलिये मेरा दर्द शान्त हो चुका है । भावनाओं का ज्वार शान्त हो चुका है ।
ये भावना हमेशा पूरे जोर पर नहीं होती । बल्कि कभी कभी ही होती है । तब मैं ढोल बजाने लगता हूँ । और गाता हूँ । अपना दुख व्यक्त करता हूँ । ये सब मैं यकायक करता हूँ । तब ये लोग । उसने कमरे में मौजूद लोगों पर दृष्टि डाली - खिंचे से चले आते हैं । ये भी अपने वाध्य यन्त्र बजाते हैं । और गाने में मेरा साथ देते हैं । तब एक अजीव सा तरंगित माहौल बन जाता है । और मैं पूरी तरह डूबा हुआ अपने अतीत में लौट जाता हूँ ।
प्रसून के चेहरे पर रहस्यमय मुस्कराहट आयी । उसका ख्याल एकदम सही था । पर उससे क्या होना था । उसका ढोल बजना बहुत जरूरी था । उसी बात पर उसकी और जस्सी की जिन्दगी निर्भर करती थी । जस्सी जो चक्रवाती बवंडर में यहाँ से दूर निराधार लटकी हुयी थी ।
मगर बूङा भी अपनी जगह सही कह रहा था । सुख और दुख का असली भाव कृतिम रूप से पैदा करना संभव ही नहीं था । वो भी तब जब अभी अभी वह उस स्थिति से उबरा हो । उसने एक निगाह खुले आसमान की तरफ़ डाली । क्या टाइम हो रहा था । इसका भी अन्दाज नही हो पा रहा था । कितनी देर हो चुकी थी । इस बात को लेकर भी वह असमंजस में था । उसे जल्दी ही कोई निर्णय लेना था । और अब इसके लिये एक ही उपाय बचा था ।

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